द टाइम ऑफ ट्रबल्स रूस का इतिहास (Time of Troubles Russian History in Hindi): साल 1604 की सर्द सुबह। पोलैंड-रूस सीमा पर कोहरा छाया हुआ था। एक जवान आदमी घोड़े पर सवार होकर रूस की तरफ़ बढ़ रहा है, उसके पीछे चल रहे थे हज़ारों पोलिश सैनिक। उसका दावा था कि वो ज़ारेविच दिमित्री है, इवान द टेरिबल का सबसे छोटा बेटा… जिसे पूरी दुनिया 1591 में मरा हुआ मान चुकी थी।
यहाँ तक कि पूरा रूस जानता था कि दिमित्री 13 साल पहले मर चुका था। उसकी लाश देखी गई थी, उसका अंतिम संस्कार हुआ था, और उसकी कब्र पर अंतिम प्रार्थनाएं पढ़ी गई थीं। और सबसे हैरान करने वाली बात, हज़ारों रूसी, यह जानते हुए भी कि यह शायद झूठ है, उसके पीछे क्यों खड़े हो जाते हैं? यही है रूसी इतिहास के सबसे अंधकारमय दौर की पहेली—“द टाइम ऑफ ट्रबल्स”।
जहाँ बीते पंद्रह साल में एक नहीं, दो नहीं… बल्कि चार अलग-अलग “फर्जी दिमित्री” सामने आए और हर बार यह दावा किया गया कि कब्र में दफन राजकुमार जिंदा बच निकला है। एक ऐसा मुल्क, जो असली और नकली में फर्क भूल चुका था। एक ऐसा समाज, जो जिंदा इंसानों को छोड़कर भूतों के पीछे भागने को तैयार था।
आखिर यह खौफनाक दौर कैसे शुरू हुआ? क्या यह सिर्फ धोखेबाजों का खेल था, या रूस की ज़मीन पर कोई ऐसी ईश्वरीय विपत्ति टूटी थी जिसने एक पूरे साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया?
दिमित्री की मौत और बोरिस गोदुनोव का राज्याभिषेक
1584 में इवान द टेरिबल की मौत के बाद, उसका कमज़ोर बेटा फ्योदोर गद्दी पर बैठा, पर सत्ता की असली लगाम थी एक शातिर और ताकतवर रईस के हाथ में जिसका नाम था बोरिस गोदुनोव। 1591 में, फ्योदोर के छोटे सौतेले भाई, आठ साल के दिमित्री, की उगलिच शहर में रहस्यमयी मौत हो गई।
सरकारी जांच में कहा गया कि यह एक दुर्घटना थी बच्चे को मिर्गी का दौरा पड़ा था और चाकू से खेलते समय वो गलती से अपनी ही गर्दन पर गिर गया। पर अफ़वाहें फैलीं कि बोरिस गोदुनोव ने ही बच्चे का कत्ल करवाया है, ताकि रुरिक वंश की आखिरी कड़ी खत्म हो सके और वो खुद गद्दी पर बैठ सके।
1598 में फ्योदोर की भी मौत हुई और इस तरह 700 साल से चली आ रही रुरिक वंश ख़त्म हुआ, और अब बोरिस गोदुनोव ख़ुद ज़ार बन गया। हालांकि पहला ग़ैर-रुरिक शासक होने के कारण उसकी वैधता हमेशा शक के घेरे में रही।
1601–1603 का महा-अकाल: ईश्वरीय प्रकोप और नरभक्षण का दौर
और तभी, 1600 में पेरू के हुआइनापुतिना ज्वालामुखी के फटने से पूरे उत्तरी गोलार्ध का मौसम बदल गया। कुदरत ने रूस पर ऐसा कहर ढाया जिसने देश की रीढ़ तोड़ दी। 1601 से 1603 के बीच रूस में इतिहास का सबसे भयंकर अकाल पड़ा, फ़सलें बर्बाद हुईं, लाखों लोग भूख से मर गए, हालात इतने भयानक थे कि लोग घास और कुत्तों का मांस खाने लगे।
कुछ इलाक़ों में नरभक्षण तक की ख़बरें आईं। लोगों में यह विश्वास घर करने लगा कि यह अकाल कोई कुदरती आपदा नहीं, बल्कि गोदुनोव के उस ‘पाप’ की सजा है, उसने असली वारिस का कत्ल करके भगवान के चुने हुए सिंहासन को अपवित्र किया था।
‘फॉल्स दिमित्री’ का उदय और तोप से उड़ी राख
ठीक इसी माहौल में, पोलैंड से एक आदमी निकला जिसने ख़ुद को “ज़िंदा बचा दिमित्री” घोषित किया, इतिहास इसे “फ़ॉल्स दिमित्री प्रथम” कहता है। भूखे, ग़ुस्साए, अंधविश्वासी लोगों के लिए यह एक उम्मीद की किरण थी, कि शायद भगवान का असली चुना हुआ शासक वापस आ गया है।
1605 में ज़ार बोरिस गोदुनोव की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। मॉस्को के दरवाजे खुल गए। यह ‘फॉल्स दिमित्री प्रथम’ विजेता बनकर क्रेमलिन में घुसा और ज़ार का ताज पहन लिया। वो पोलिश कपड़े पहनता था, कैथोलिक तौर-तरीकों का समर्थन करता था। लेकिन उसका जश्न ज्यादा दिन नहीं चला। सिर्फ 11 महीने बाद, मई 1606 में रूसी रईसों ने उसे दिमित्री को खिड़की से फेंककर मार डाला गया।

रूसी रईसों की नफरत का अंदाजा आप इससे लगा सकते हो कि उन्होंने उसकी लाश को जलाया, उसकी राख को बारूद में मिलाया, और एक बड़ी तोप में भरकर उस राख को पश्चिम यानी पोलैंड की दिशा में दाग दिया ताकि उसका कोई निशान रूस की धरती पर न बचे।
लेकिन इससे अफरा-तफरी खत्म नहीं हुई, बल्कि और बढ़ गई।
एक के बाद एक, फ़ॉल्स दिमित्री द्वितीय और तृतीय सामने आए। पोलैंड और स्वीडन ने इस अराजकता का फ़ायदा उठाकर सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया, पोलिश सेना ने ख़ुद मॉस्को क्रेमलिन पर क़ब्ज़ा कर लिया। रूस लगभग एक स्वतंत्र देश के रूप में ख़त्म होने की कगार पर पहुंच गया।
जन-सेना का महा-विद्रोह
आख़िरकार 1611-1612 में, एक क़साई कुज़्मा मिनिन और एक राजकुमार दिमित्री पोझार्स्की ने आम जनता से एक “लोक-सेना” जिसको नरोदनोय ओपोल्चेनिये नाम रखा गया खड़ी की, व्यापारी, किसान, छोटे रईस, सबने मिलकर इसमे हिस्सा लिया और अक्टूबर 1612 में, इस जन-सेना ने मॉस्को पर धावा बोला। क्रेमलिन की घेराबंदी हुई और पोलिश सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया। अब मॉस्को फिर से आजाद हो चुका था।
1613 में एक नया ज़ेम्स्की सोबोर बुलाया गया, रूस के सभी वर्गों के प्रतिनिधियों ने मिलकर एक नए ज़ार को चुना, फिर से एक 16 साल का लड़का, मिख़ाइल रोमानोव। यह केवल एक ज़ार का चुनाव नहीं बल्कि यह उस रोमानोव राजवंश का जन्म था, जो अगले 304 सालों तक रूस पर हुकूमत करने वाला था, जब तक कि 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने उसे हमेशा के लिए मिटा नहीं दिया।
लेकिन एक 16 साल का अनुभवहीन लड़का, जिसे खुद नहीं पता था कि वो चुना गया है, इतने बड़े तबाह मुल्क को कैसे संभालेगा? और उस लड़के के पीछे असली ‘पपेट मास्टर’ कौन था? जानने के लिए पढ़ें अगला एपिसोड: रोमानोव वंश का जन्म—एक नए राजवंश की नींव।
