रूस का इतिहास: कैसे मिखाइल गोर्बाचेव के इस्तीफे के साथ सोवियत संघ 15 देशों में टूट गया (भाग 21)

25 दिसंबर 1991 को मॉस्को के क्रेमलिन से लाल झंडा हमेशा के लिए उतार लिया गया। बिना किसी युद्ध के, दुनिया का सबसे बड़ा और परमाणु हथियारों से लैस सोवियत साम्राज्य 15 देशों में टूट गया। जानिए गोर्बाचेव के सुधारों ने कैसे अनजाने में अपने ही देश का पतन कर दिया।

सोवियत संघ का पतन 1991 (Fall of the Soviet Union 1991): 25 दिसंबर 1991 की शाम, मॉस्को के क्रेमलिन में एक थका हुआ पूरे सोवियत संघ को संबोधित कर रहा था। मिख़ाइल गोर्बाचेव, सोवियत संघ का आख़िरी नेता, जो देश को टेलीविज़न पर संबोधित करते हुए अपने पद से इस्तीफ़े का ऐलान कर रहा है। भाषण ख़त्म होते ही, क्रेमलिन की छत पर सोवियत लाल झंडा, हथौड़ा और दराती वाला वो झंडा जो 74 सालों से वहां लहरा रहा था, धीरे-धीरे नीचे उतारा जाता है, और उसकी जगह रूस का तिरंगा फहरा दिया जाता है।

कोई गोलियां नहीं चलीं, कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ, कोई विदेशी सेना ने हमला नहीं किया, फिर भी दुनिया की वह महाशक्ति, जिसके पास हज़ारों परमाणु बम थे… लगभग शांतिपूर्ण तरीके से टूटकर 15 अलग-अलग देशों में बंट गई। लेकिन सवाल है, आख़िर ऐसा क्या हुआ कि इतनी विशाल, इतनी ताक़तवर सत्ता, बिना किसी बड़े युद्ध के, अंदर से ही बिखर गई? और जिस नेता इस साम्राज्य को ‘बचाने’ और ‘मजबूत’ करने आया था… उसी के फैसलों ने इस साम्राज्य का अंत का कारण कैसे बना?

सोवियत संघ का पतन 1991 (Fall of the Soviet Union 1991)

सोवियत संघ का पतन के मुख्य कारण क्या था?

1985 में जब मिखाइल गोर्बाचेव सत्ता में आया, उस समय तक सोवियत की अर्थव्यवस्था बुरी तरह ठप हो चुकी थी, तकनीक के मामले में भी रूस अमेरिका से दशकों पीछे छूट चुका था। हथियारों की अंधी दौड़ और अफगानिस्तान युद्ध ने तिजोरी खाली कर दी थी।

गोर्बाचेव ने सोवियत व्यवस्था को बचाने के लिए दो बड़ी नीतियां शुरू कीं, “पहला—पेरेस्त्रोइका (Perestroika) यानी ‘पुनर्निर्माण’। इसका मतलब था अर्थव्यवस्था में बाजार की कुछ आज़ादी लाना यानि बाज़ार-तत्वों को सीमित रूप से अपनाना और दूसरा था “ग्लासनोस्त” यानी ‘खुलापन’, जिसका मतलब था सेंसरशिप कम करना और लोगों को खुली बहस और आलोचना की इजाज़त देना।

गोर्बाचेव को लगा था कि इससे कम्युनिज्म मजबूत होगा। लेकिन इसका असर बिल्कुल उल्टा और भयानक हुआ। ग्लासनोस्त की वजह से, दशकों से दबाई गई सच्चाइयां, स्टालिन के अपराध, अफ़ग़ान युद्ध की नाकामियां, आर्थिक कुप्रबंधन, यहाँ तक कि पर्यावरणीय आपदाएं जैसे 1986 का चेरनोबिल परमाणु हादसा, जिसे सरकार ने शुरुआत में इस रेडिएशन के सच को दुनिया और अपनी ही जनता से छिपाने की कोशिश की। अब खुलकर सामने आने लगीं। जनता का व्यवस्था पर से भरोसा तेज़ी से टूटने लगा।

इसी बीच, पेरेस्त्रोइका के आधे-अधूरे आर्थिक सुधारों ने चीज़ों को और बिगाड़ दिया, पुरानी केंद्रीकृत व्यवस्था टूट रही थी, पर नई बाज़ार-व्यवस्था अभी ठीक से खड़ी भी नहीं हुई थी। जिसका नतीजा यह हुआ कि दुकानों में सामान की भारी कमी हो गई और महंगाई आसमान छूने लगी। लोग आज़ादी तो पा चुके थे, लेकिन उनके पास खाने को रोटी नहीं थी!

साथ ही, ग्लासनोस्त की खुली हवा ने सोवियत संघ के भीतर मौजूद अलग-अलग गणराज्यों में दबी हुई राष्ट्रवादी भावनाओं को भी जगा दिया, बाल्टिक राज्य जैसे कि लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, यूक्रेन, और मध्य एशिया के गणराज्यों में आज़ादी की मांग तेज़ होने लगी। पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया जैसे राज्यों में एक के बाद एक कम्युनिस्ट सरकारें गिरने लगीं।

सोवियत संघ का पतन 1991 (Fall of the Soviet Union 1991)

अगस्त 1991 का तख्तापलट और येल्तसिन का उदय

नवंबर 1989 में, बर्लिन की दीवार गिरा दी गई, जो 28 सालों से शीत युद्ध का सबसे बड़ा प्रतीक थी। रूस में इतने सब चल रहा था लेकिन इन्हें सैन्य बल से रोकने से इनकार कर दिया, जो ख़ुद एक बड़ा संकेत था कि मॉस्को अब पहले जैसा नियंत्रण रखने को तैयार नहीं।

सोवियत साम्राज्य को टूटता देख, कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ कट्टरपंथी नेताओं ने फैसला किया कि गोर्बाचेव को हटाना ही होगा। अगस्त 1991 में, जब गोर्बाचेव क्रीमिया में छुट्टियां मना रहा था, इन कट्टरपंथियों ने उसे नज़रबंद कर तख़्तापलट का ऐलान किया। लेकिन रूसी गणराज्य के एक नए और लोकप्रिय नेता बोरिस येल्तसिन ने मॉस्को की सड़कों पर, सोवियत टैंक के ऊपर चढ़कर, खुलेआम विद्रोहियों को चुनौती दी, और जनता और सेना के बड़े हिस्से ने येल्तसिन का साथ दिया। यह तख़्तापलट बुरी तरह नाकाम रहा।

तख्तापलट तो नाकाम हो गया, लेकिन उसने गोर्बाचेव की बची-खुची वर्चस्व भी खत्म कर दी। गोर्बाचेव मॉस्को लौटा, भले ही वो तकनीकी रूप से सत्ता में वापस आया लेकिन असली ताक़त अब येल्तसिन और गणराज्यों के हाथ में जा चुकी थी। एक-एक करके, सोवियत गणराज्यों ने आज़ादी की घोषणा करनी शुरू कर दी।

जब बिना किसी युद्ध के टूट गया दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य

दिसंबर 1991 में, रूस, यूक्रेन और बेलारूस के नेताओं ने मिलकर एक समझौता किया जिसमे लिखा गया था – सोवियत संघ अब एक भू-राजनीतिक हकीकत के रूप में खत्म हो चुका है और व्यवहारिक रूप से सोवियत संघ को भंग कर दिया।

आखिरकार 25 दिसंबर 1991 को गोर्बाचेव ने इस्तीफा दिया और सोवियत संघ आधिकारिक रूप से टूटकर 15 स्वतंत्र देशों में बदल गया। यह 20वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनैतिक घटनाओं में से एक थी।

लेकिन आज़ादी का यह जश्न रूस के लिए एक भयानक आर्थिक दुःस्वप्न लेकर आया।

रूस, जो अब सोवियत संघ का सबसे बड़ा उत्तराधिकारी राष्ट्र था, गहरे आर्थिक संकट में डूब गया, मुद्रा का पतन हो चुका था, लोगों के जीवन भर की बचत खत्म हो गई, अपराध और भ्रष्टाचार बेतहाशा बढ़ा, और मुट्ठी भर लोगों जिसे ओलिगार्क कहा गया ने राज्य की संपत्ति सस्ते दामों पर हड़प ली।

बोरिस येल्तसिन, जो तख़्तापलट के दौरान एक नायक बनकर उभरा था, जल्द ही अपने ही देश में अलोकप्रिय, बीमार, और अस्थिर होता चला गया। रूस टूट रहा था, और जनता किसी ऐसे तारणहार की तलाश में थी जो देश को इस अपमान और अराजकता से निकाल सके।

इसी अराजकता और अपमान के माहौल से, सदी के आखिरी दिन में, एक नया और अनजान चेहरा उभरने वाला था, एक पूर्व KGB अधिकारी, जो रूस को एक नई, कठोर, केंद्रीकृत दिशा में ले जाएगा, और कैसे आने वाले दशकों तक रूस की तक़दीर तय करेगा। जानने के लिए देखें अगला एपिसोड नया रूस: येल्तसिन से पुतिन तक।

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