रूस का इतिहास: कैसे एक KGB अधिकारी व्लादिमीर पुतिन बना रूस का सबसे ताकतवर नेता? (भाग 22)

31 दिसंबर 1999 को बोरिस येल्तसिन ने इस्तीफा देकर एक गुमनाम KGB अधिकारी व्लादिमीर पुतिन को रूस की सत्ता सौंप दी। जानिए कैसे पुतिन ने 1990 के दशक की आर्थिक अराजकता और ओलिगार्कों को कुचलकर रूस में फिर से एक 'निरंकुश' और 'आक्रामक' साम्राज्य खड़ा कर दिया।

आधुनिक रूस का इतिहास व्लादिमीर पुतिन (Modern Russian History Putin): 31 दिसंबर 1999, 1990 के दशक का आखिरी दिन। नए साल की पूर्व संध्या पर रूसी टेलीविज़न पर एक ऐसी अप्रत्याशित घोषणा होती है जिसने पूरे देश को सन्न कर दिया। पूरा रूस जश्न मनाने की तैयारी कर रहा था, लेकिन तभी टीवी स्क्रीन पर राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन सामने आते हैं—थके हुए, बीमार और टूटे हुए। उन्होंने रुंधे गले से कहा: “मैं जा रहा हूं… मैंने जो चाहा वो नहीं कर पाया। लेकिन जो लोग नई पीढ़ी के हैं, वो इसे बेहतर कर सकते हैं।” 

वो समय से पहले इस्तीफ़ा दे देते हैं और सत्ता सौंप देते हैं एक लगभग अनजान, बेहद शांत, भावहीन और ‘ग्रे’ सी शख्सियत वाले पूर्व KGB अधिकारी को, जिसका नाम था व्लादिमीर पुतिन। पुतिन एक ऐसा शख्स थे जिनके बारे में उस वक्त रूस की आम जनता तो दूर, बड़े-बड़े नेता भी कुछ नहीं जानते थे। वो एक ऐसे पूर्व जासूस थे जिन्हें ‘बिना चेहरे वाला इंसान’ (The Man Without a Face) कहा जाता था। 

लेकिन येल्तसिन, जिसने ख़ुद 1991 में टैंक पर चढ़कर लोकतंत्र और आज़ादी का प्रतीक बनकर रूस को सोवियत संघ से आज़ाद कराया था… उसी ने अपना उत्तराधिकारी एक पूर्व ‘KGB अधिकारी’ को क्यों चुना? और यह अनजान शख़्सियत इतनी तेज़ी से रूस का सबसे ताक़तवर, सबसे लंबे समय तक टिकने वाला नेता कैसे बन गया? 

1990 का दशक: ‘शॉक थेरेपी’ और रूस का आर्थिक नरक

इस कहानी को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। 1990 के दशक का रूस, सोवियत संघ के पतन के बाद भारी तबाही से गुज़र रहा था। बोरिस येल्तसिन ने रूस में “शॉक थेरेपी” (Shock Therapy) लागू की थी। इसका मतलब था रातों-रात कम्युनिस्ट सिस्टम को खत्म करके फ्री-मार्केट को लागू करना। यानी क़ीमतें अचानक बाज़ार के हवाले कर दी गईं, जिसका नतीजा यह हुआ कि महंगाई आसमान छू गई और लाखों लोगों की जीवन-भर की बचत रातों-रात रद्दी बन गई। 

इसी अराजकता के बीच, राज्य की बड़ी औद्योगिक और ऊर्जा संपत्तियां बेहद सस्ते दामों पर, अक्सर संदिग्ध तरीक़ों से, मुट्ठी भर व्यापारियों के हाथ चली गईं। इन्हें ‘ओलिगार्क’ कहा गया, जिन्होंने रूस की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों पर अपनी ज़बरदस्त पकड़ बना ली। 1998 आते-आते रूस में एक बड़ा वित्तीय संकट आया, जिसने रूसी करेंसी रूबल को पूरी तरह मलबे में तब्दील कर दिया। ऊपर से चेचन्या के अलगाववादियों ने विद्रोह कर दिया था। येल्तसिन ख़ुद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, शराब की लत की अफ़वाहों और गिरती लोकप्रियता से जूझ रहे थे, जिसके बाद जनता उन्हें नाकामी और राष्ट्रीय अपमान का प्रतीक मानने लगी थी। 

1999 के बम धमाके और व्लादिमीर पुतिन का ‘मज़बूत’ नेता की रूप में एंट्री

इसी माहौल के बीच, अगस्त 1999 में येल्तसिन ने व्लादिमीर पुतिन को देश का प्रधानमंत्री बनाया। उस वक़्त तक पुतिन बाकी कई अधिकारियों की तरह ही एक “अस्थायी” चेहरा लग रहे थे, क्योंकि येल्तसिन पहले भी कई प्रधानमंत्री बदल चुके थे। पर उसी महीने, रूस के कई शहरों में रिहायशी इमारतों में भयानक बम धमाके हुए, जिनमें सैकड़ों बेकसूर नागरिक मारे गए। सरकार ने इन्हें चेचन आतंकवादियों की करतूत बताया, हालांकि इन धमाकों की पूरी सच्चाई पर आज भी कई गंभीर सवाल और विवाद उठाए जाते हैं। 

1999 Russian Apartment-House Bombings

पुतिन ने इन हमलों के जवाब में बेहद सख़्त, आक्रामक रुख अपनाया और तुरंत दूसरे चेचन युद्ध की शुरुआत कर दी। देश की सुरक्षा को प्राथमिकता देकर पुतिन ने ख़ुद को एक “मज़बूत और निर्णायक” नेता के रूप में पेश किया, जो थके और कमज़ोर येल्तसिन-युग के बिल्कुल उलट छवि थी। उनकी लोकप्रियता रातों-रात तेज़ी से बढ़ी। येल्तसिन ने जब देखा कि पुतिन जनता में खोया हुआ भरोसा वापस जगा पा रहे हैं, और शायद यह भी सोचकर कि पुतिन भविष्य में उनके और उनके परिवार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले नहीं खोलेंगे, उन्होंने पुतिन को अपना उत्तराधिकारी चुन लिया। 31 दिसंबर 1999 को रूस की कमान पुतिन के हाथों में आ गई। 

ओलिगार्कों का पतन और पुतिन द्वारा पॉवर वर्टिकल का निर्माण

मार्च 2000 में पुतिन आधिकारिक रूप से रूस के राष्ट्रपति चुने गए। सत्ता संभालते ही उन्होंने बेहद तेज़ी और चालाकी से काम किया। जुलाई 2000 में पुतिन ने रूस के सभी बड़े अरबपति ओलिगार्कों को क्रेमलिन के एक कमरे में बुलाया और उनके सामने एक सीधी और ठंडी शर्त रखी, जिसे इतिहास में “क्रेमलिन कैपिटल डील” कहा जाता है। पुतिन का संदेश साफ़ था: ‘तुमने 90 के दशक में जो भी संपत्तियां संदिग्ध तरीकों से बनाई हैं, उन्हें अपने पास रखो और ऐश करो। लेकिन… राजनीति और मीडिया से पूरी तरह दूर रहो। अगर किसी ने सरकार चलाने में दखल दिया, तो अंजाम बहुत बुरा होगा।’ 

ओलिगार्कों का पतन और पुतिन द्वारा पॉवर वर्टिकल का निर्माण

जिस ओलिगार्क ने इस चेतावनी को हल्के में लिया, उसे या तो जेल भेज दिया गया या देश निकाला दे दिया गया। उस समय रूस की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘युकोस’ के मालिक और रूस के सबसे अमीर आदमी मिखाइल खोदोर्कोवस्की ने पुतिन को लाइव टीवी पर चुनौती देने की गुस्ताखी की थी। नतीजा यह हुआ कि साइबेरिया के एक रनवे पर उनके प्राइवेट जेट के अंदर घुसकर नकाबपोश कमांडो ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पूरी दुनिया ने लाइव टीवी पर रूस के सबसे अमीर इंसान को कोर्ट रूम में एक लोहे के पिंजरे के पीछे लाचार बैठे देखा! इसके बाद कुछ ओलिगार्क देश छोड़कर भाग गए और बाकी पूरी तरह पुतिन के वफादार बन गए। 

पुतिन ने क्षेत्रीय गवर्नरों की ताकत छीन ली, सारे स्वतंत्र टीवी चैनलों को सरकार के कब्जे में ले लिया और सत्ता का एक ऐसा ‘पॉवर वर्टिकल’ बनाया—जहाँ हर छोटा-बड़ा फैसला सीधे क्रेमलिन से होने लगा। इसी बीच पुतिन की किस्मत ने भी उनका साथ दिया। 2000 के दशक में वैश्विक बाज़ार में तेल और गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं, जिन पर रूसी अर्थव्यवस्था टिकी थी। इसने रूस में आर्थिक स्थिरता और समृद्धि वापस लाने में मदद की, जिसने पुतिन की लोकप्रियता को अभेद्य दीवार बना दिया। उन्होंने रूसियों को 1990 की भुखमरी से निकालकर एक ‘स्थिर और सुरक्षित’ जीवन दिया। 

लेकिन पुतिन सिर्फ विरोधियों को कुचल नहीं रहे थे, वो सत्ता की बिसात पर ऐसा चक्रव्यूह रच रहे थे जिसे भेदना नामुमकिन था। रूसी कानून के मुताबिक कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार से ज़्यादा राष्ट्रपति नहीं रह सकता था। 2008 में जब पुतिन के दो टर्म पूरे हुए, तो उन्होंने दुनिया को हैरान करते हुए अपने वफादार दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठाया और खुद प्रधानमंत्री बन गए—यानी चेहरा बदला, पर रूस का रिमोट कंट्रोल पुतिन की जेब में ही रहा। 

खेल यहीं नहीं रुका। साल 2020 में पुतिन ने रूस के इतिहास का सबसे बड़ा संवैधानिक दांव खेला। उन्होंने संविधान में एक ऐसा अनोखा संशोधन कराया जिसने पुतिन के पिछले सारे राष्ट्रपतीय कार्यकालों को ‘शून्य’ यानी जीरो कर दिया। कानून की एक कलम से पुतिन का इतिहास रीसेट हो गया, और उन्हें 2036 तक रूस का ‘अघोषित ज़ार’ बने रहने का कानूनी अधिकार मिल गया। 

जॉर्जिया से लेकर यूक्रेन युद्ध तक पुतिन का बढ़ता कद

पिछले दो से अधिक दशकों में, संवैधानिक बदलावों और राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री पद की अदला-बदली के ज़रिए पुतिन सत्ता के शिखर पर बने रहे। पुतिन ने सिर्फ रूस के भीतर ही नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर भी रूसी साम्राज्य का पुराना गौरव वापस पाने की कोशिश की। 2008 का जॉर्जिया युद्ध, 2014 में क्रीमिया पर क़ब्ज़ा, और 2022 में यूक्रेन पर एक फुल-स्केल मिलिट्री आक्रमण… उनके हर एक क़दम ने रूस को पश्चिमी दुनिया से और दूर तथा अलग-थलग कर दिया है, जबकि घरेलू स्तर पर विपक्ष और स्वतंत्र आवाज़ों की जगह लगातार सिकुड़ती गई है। 

रुरिक के बुलावे से शुरू हुई यह कहानी… आज 1,100 साल बाद यहाँ तक पहुँच चुकी है। कीवन रुस के स्वर्ण युग से लेकर मंगोलों की क्रूर गुलामी तक… इवान द टेरिबल के खौफ से लेकर पीटर द ग्रेट की पश्चिमी खिड़की तक… रोमानोव के महलों की चमक से लेकर 1917 की क्रांति के रक्तपात तक… और स्टालिन के आतंक से लेकर आज के पुतिन के रूस तक… 

इस 1,100 साल के लंबे और खूनी सफर ने हमें एक बहुत गहरी बात सिखाई है: एक राष्ट्र का भूगोल और उसका इतिहास कभी नहीं मरता, वह बार-बार खुद को दोहराता है। रूस हमेशा से एक ऐसे मसीहा की तलाश में रहा है जो उसे बाहरी दुश्मनों से बचा सके। और जब भी उसने किसी ‘मज़बूत ज़ार’ या नेता को चुना है, तो उसकी कीमत में उसने हमेशा अपनी आज़ादी चुकाई है। 

रूस की यह कहानी… सिर्फ ज़ारों, जनरलों या तानाशाहों की कहानी नहीं है। यह उन करोड़ों आम रूसियों की कहानी है, जो बर्फ, भूख, युद्ध और तानाशाही के बीच भी सदियों से अपनी ज़मीन पर ज़िंदा हैं। रूस की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। यह आज भी लिखी जा रही है… खून से, महत्वाकांक्षाओं से, और इतिहास के उसी पुराने चक्र से! 

यहाँ खत्म होती है हमारी “रूस का इतिहास (Russian History)” की यह 22 एपिसोड की महा-सीरीज़। ‘रुरिक से पुतिन तक’ का यह ऐतिहासिक सफर आपको कैसा लगा? कमेंट्स में जरूर बताएं। इस सफर में हमारे साथ जुड़ने के लिए… आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! 

Russian History Series:

पिछला भाग: कैसे मिखाइल गोर्बाचेव के इस्तीफे के साथ सोवियत संघ 15 देशों में टूट गया (भाग 21)

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