इवान द टेरिबल का इतिहास (Ivan the Terrible History in Hindi): 1547, मॉस्को में क्रेमलिन के कैथेड्रल स्क्वायर पर स्थित एक ऐतिहासिक रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के अंदर। एक 16 साल का लड़का सोने का भारी ताज पहन रहा था। पहली बार रूसी इतिहास में, किसी शासक ने खुद को सिर्फ “ग्रैंड प्रिंस” या “गोसुदार” नहीं… बल्कि “ज़ार” घोषित किया यानी सीज़र बायज़ेंटाइन साम्राज्य का उत्तराधिकारी और मॉस्को को “तीसरा रोम” साबित करने के लिए यह उपाधि ले रहा था।
यही लड़का बड़ा होकर इतिहास के सबसे भयानक और रहस्यमयी शासकों में से एक बनने वाला था। रूसी भाषा में उसे कहा गया “इवान ग्रोज़्नी”—जिसका असली अर्थ था “दुर्जेय” या “कठोर”। लेकिन पश्चिमी दुनिया और इतिहास एक अलग ही नाम से याद रखेगा: इवान द टेरिबल।
लेकिन यहाँ इतिहास की सबसे खौफनाक पहेली सामने आती है। इवान अपने शुरुआती सालों में एक समझदार, सुधारवादी शासक था, जिसने रूस की पहली कानून संहिता बनाई, संसद बुलाई, सेना को आधुनिक बनाया और साम्राज्य की सीमाओं को दोगुना कर दिया। फिर अचानक, 1560 के दशक में, वो एक क्रूर और तानाशाह शासक में बदल गया, जिसने अपने ही लोगों का क़त्लेआम किया। आख़िर ऐसा क्या हुआ जिसने एक सुधारक को इतना क्रूर हत्यारा बना दिया? क्या यह सिर्फ सत्ता का नशा था, या कुछ और गहरी, व्यक्तिगत त्रासदी छुपी थी?
सत्ता संघर्ष, बोयारों का षड्यंत्र और ज़हर का स्थायी खौफ
इवान की इस क्रूरता को समझने के लिए उसके बचपन के उन ज़ख्मों को देखना होगा, जहाँ उसने ज़िंदगी का सबसे भयानक दौर देखा था। जब वो सिर्फ 3 साल का था, उसके पिता चल बसे। जब वो 8 साल का हुआ, तो उसकी मां एलेना ग्लिंस्काया को रईसों ने ज़हर देकर मार डाला। क्रेमलिन के अंधेरे कमरों में इवान बड़ा हुआ बड़े रईसों—यानी ‘बोयारों’ के खूनी षड्यंत्रों के बीच।
वे इवान को कठपुतली समझते थे, उसे भूखा रखते थे, और इवान ने अपनी आँखों के सामने अपने सबसे वफादार संरक्षकों को खिड़कियों से नीचे फेंककर कत्ल होते देखा था। इसी अविश्वास, ज़हर के खौफ और हर पल मौत के साए ने इवान के दिमाग को हमेशा के लिए तोड़-मरोड़ दिया।

संसद (ज़ेम्स्की सोबोर), कानूनी संहिता और कज़ान-अस्त्राख़ान विजय
1547 में सत्ता संभालते ही उसने अपनी ताकत दिखाई। उसने ज़ेम्स्की सोबोर यानी रूस की पहली राष्ट्रीय संसद बुलाई। सुदेबनिक नाम से एक निष्पक्ष कानून संहिता तैयार की। और मंगोलों के सदियों पुराने दो मजबूत गढ़ों कज़ान और अस्त्राख़ान को जीतकर वोल्गा नदी पर रूस का एकछत्र राज कायम कर दिया।
कज़ान विजय की याद में उसने मॉस्को में उस अजूबे को बनवाया जिसे आज दुनिया सेंट बेसिल कैथेड्रल के नाम से जानती है। सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक कि वो काली रात नहीं आई।
वह मोड़ जिसने इवान चतुर्थ को प्रतिशोध और सनक में धकेल दिया
1560 में इवान की पहली और सबसे प्रिय पत्नी अनास्तासिया रोमानोव्ना की रहस्यमयी हालात में मौत हो गई। इवान को पक्का यकीन हो गया कि बोयारों ने उसकी रानी को ज़हर दिया है। और यहीं से शुरू हुआ उसका भयानक पतन। शक, पागलपन और बदले की आग ने उसके पूरे वजूद को घेर लिया।
1565 में इवान ने एक अनोखा और डरावना क़दम उठाया, उसने घोषणा की कि वो गद्दी छोड़ रहा है, फिर मॉस्को वापस लौटा इस शर्त पर कि उसे पूरे राज्य का एक हिस्सा, “ओप्रिचनिना”, पूरी तरह अपने निजी नियंत्रण में मिले, बिना किसी क़ानूनी रोक-टोक के।
ओप्रिचनिना सिर्फ ज़मीन का टुकड़ा नहीं था, यह सरकारी आतंक की एक खूनी मशीन थी।
इवान ने अपने लिए एक निजी सेना बनाई—ओप्रिच्निकी।
काले चोगे पहने इन सवारों के घोड़ों की काठी पर एक कटा हुआ कुत्ते का सिर और एक झाड़ू बंधी होती थी। जिसका संदेश था: “गद्दारों को कुत्ते की तरह कुतरना और झाड़ू की तरह साफ कर देना।”
इसके बाद शुरू हुआ कत्लेआम। हज़ारों बोयार परिवारों को रातों-रात जिंदा जला दिया गया, उनकी महिलाओं और बच्चों को बर्फीली नदियों में फेंक दिया गया, और उनकी ज़मीनें छीन ली गईं।
इस पागलपन की सबसे भयानक इंतहा हुई 1570 में—नोवगोरोद का नरसंहार।
सिर्फ एक झूठे शक पर कि नोवगोरोद शहर पोलैंड से सांठगांठ कर रहा है, इवान की सेना ने हफ्तों तक शहर में कत्लेआम मचाया। हज़ारों निर्दोष लोग मारे गए, कई इतिहासकारों के बताते है की इस नरसंहार में मारने वाले की संख्या 12,000 से 15,000 के बीच है।
युवराज इवान की हत्या और 700 साल पुराने रुरिक वंश का पतन
लेकिन इस त्रासदी का सबसे काला अध्याय आना बाकी था। जब 1581 में, एक बहस के दौरान गुस्से में, इवान ने अपने ही बेटे और उत्तराधिकारी, जिसका नाम भी इवान था, को लोहे की छड़ी से मार डाला। जैसे ही खून का फव्वारा फूटा, इवान का नशा उतर गया। वो चीखते हुए अपने बेटे से लिपट गया, खून से सने उसके सिर को चूमने लगा- “मैंने अपने बेटे को मार डाला! मैंने अपने बेटे को मार डाला!”

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुछ ही दिनों में युवराज की मौत हो गई। इस एक वार से इवान ने सिर्फ अपने बेटे को नहीं मारा था, उसने अपने पूरे 700 साल पुराने रुरिक राजवंश के भविष्य की गर्दन काट दी थी।
1584 में शतरंज खेलते समय इवान की मौत हो गई। उसने पीछे छोड़ा एक कमज़ोर, अस्थिर बेटा फ्योदोर, जो शासन के लायक़ नहीं था, और एक ऐसा राज्य जिसकी रईस-व्यवस्था को उसने ख़ुद तबाह कर दिया था। ओप्रिचनिना ने बोयारों की ताक़त तोड़ दी थी, पर साथ ही राज्य की प्रशासनिक रीढ़ भी कमज़ोर कर दी थी। जब फ्योदोर की भी बिना किसी उत्तराधिकारी के मृत्यु हुई, रुरिक वंश, जो 700 साल से रूस पर राज कर रहा था, ख़त्म हो गया।
पीछे बचा सिर्फ एक डरावना खालीपन एक ऐसा सत्ता-शून्य, जहाँ सिंहासन की खाली कुर्सी को हथियाने के लिए भेड़िये तैयार खड़े थे। अब रूस एक ऐसे दौर में गिरने वाला था, जहाँ भयंकर अकाल इंसानों को नरभक्षी बना देगा, जहाँ मरे हुए राजकुमार कब्रों से उठकर वापस आने का दावा करेंगे, और जहाँ देश का वजूद ही खत्म होने की कगार पर पहुँच जाएगा।
अगले एपिसोड में: जब अलग-अलग धोखेबाजों ने दावा किया कि वो मरे हुए राजकुमार हैं…यानि रूस के इतिहास का सबसे अंधकारमय दौर: द टाइम ऑफ ट्रबल्स
- पिछला भाग: एपिसोड 3: मॉस्को का उदय—इवान द ग्रेट
