रोमानोव वंश का इतिहास (Romanov Dynasty History in Hindi): मार्च 1613, कोस्त्रोमा शहर के पास, इपात्येव मठ के बाहर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी। कड़ाके की ठंड में घोड़ों की टापें गूंज रही थीं। मॉस्को से आया एक विशाल प्रतिनिधिमंडल एक बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा था, जिसमें बिशप, बोयार यानि रईस और आम नागरिक सैकड़ों की संख्या में शामिल थे। वो एक मठ के दरवाज़े पर पहुंचते हैं और अंदर छुपे एक 16 साल के लड़के और उसकी मां से गुहार लगाते हैं।
लड़का रोता है, मना करता है। उसकी मां, जो अब एक नन बन चुकी थी, चीख़कर कहती है, “यह मुल्क एक जलता हुआ खंडहर है! मेरे मासूम बच्चे को इस आग में क्यों झोंक रहे हो?” पर प्रतिनिधिमंडल घुटनों पर बैठ जाता है, कहता है कि अगर उसने ना कहा, तो रूस हमेशा के लिए अराजकता में डूब जाएगा, और और इस मुल्क की बर्बादी का पाप तुम्हारे सिर होगा। आख़िरकार, मार्था जो उस बच्चे की माँ है हार मान लेती है। लड़का कांपते हाथों से बाहर आता है।
मिख़ाइल रोमानोव, जो अभी कल तक एक डरा हुआ लड़का था जो पोलिश सैनिकों से छुपकर भाग रहा था, वह अब रूस का नया ज़ार बनने जा रहा था।
मॉस्को के रईसों की कठपुतली शासक चुनने की सोची-समझी रणनीति
यहाँ इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली सामने आती है, 1613 के ज़ेम्स्की सोबोर में मिख़ाइल रोमानोव कोई अकेला दावेदार नहीं था। वहाँ पोलैंड और स्वीडन के ताकतवर राजकुमार थे, रूस के कई रईस-परिवार थे जिनके पास अपनी सेनाएँ थीं, और यहाँ तक कि वो अनुभवी सेनापति भी थे जिन्होंने ख़ुद पोलिश सेना को हराकर मॉस्को को आज़ाद कराया था।

तो फिर इन सब दिग्गज और अनुभवी उम्मीदवारों को दरकिनार करके… एक 16 साल के, अनुभवहीन और बेहद सीधे लड़के को पूरे मुल्क की कमान क्यों सौंप दी गई? क्या यह सच में “ईश्वर की मर्ज़ी” थी, जैसा उस वक़्त प्रचार किया गया? या रूस के चालाक रईसों की यह एक बेहद शातिर राजनीतिक चाल थी? जानंगे इस एपिसोड में।
सत्ता संघर्ष टालने के लिए एक ‘सुरक्षित’ ज़ार की तलाश
1613 का रूस सिर्फ एक मुल्क नहीं, बल्कि कब्रगाह बन चुका था। इतिहास में इस दौर को ‘टाइम ऑफ ट्रबल्स’ कहा जाता है। पंद्रह सालों की अराजकता, भयानक अकाल, गृहयुद्ध और विदेशी आक्रमणों ने देश को तोड़ कर रख दिया था। खेत बंजर थे, खज़ाना ख़ाली था।
और सबसे बड़ी बात, रईसों के बीच आपसी नफरत इतनी गहरी थी कि अगर किसी एक बड़े परिवार का व्यक्ति ज़ार बनता, तो दूसरा परिवार तुरंत गृहयुद्ध शुरू कर देता।
यहीं मिख़ाइल रोमानोव का “कमज़ोर और अनुभवहीन” होना ही उसकी सबसे बड़ी ताक़त बन गया। उसका परिवार, रोमानोव, रूस के पहले ज़ार ‘इवान द टेरिबल’ की पहली पत्नी अनास्तासिया के रिश्तेदार थे। यानी उनका शाही रुरिक वंश से एक भावनात्मक नाता तो था, लेकिन उन्होंने कभी सत्ता के लिए खूनी खेल नहीं खेला था। सबसे अहम बात, मिख़ाइल इतना मासूम और राजनीति से दूर था कि हर बड़ा रईस-परिवार सोचता था: इसे हम आसानी से नियंत्रित कर सकते हैं। कोई भी परिवार उसे अपने ख़िलाफ़ ख़तरा नहीं मानता था।
जब इवान सुसानिन मिख़ाइल की जान बचाने के लिए दी कुर्बानी
फरवरी 1613 में मॉस्को की संसद ने मिख़ाइल को नया ज़ार चुन तो लिया, पर उसे ख़ुद इसकी ख़बर नहीं थी। पोलिश सेना को भनक लग चुकी थी कि अगर यह लड़का ज़ार बन गया तो रूस फिर से एक हो जाएगा। वे उसे खत्म करने के लिए कोस्त्रोमा की तरफ बढ़े। मिख़ाइल अपनी मां के साथ इपात्येव मठ में सुरक्षित ठिकाना ढूंढ़ चुका था।

इसी दौरान रूसी इतिहास की सबसे मशहूर लोक-कथा का जन्म हुआ। एक पोलिश टुकड़ी मिख़ाइल को ढूंढते हुए आगे बढ़ रही थी, तभी उन्हें इवान सुसानिन नाम का एक स्थानीय किसान मिला। सुसानिन ने मिख़ाइल का पता बताने के बहाने पोलिश सैनिकों को जानबूझकर एक घने और दलदली जंगल में भटका दिया। जब पोलिश टुकड़ी को समझ आया कि उनके साथ धोखा हुआ है, तो उन्होंने गुस्से में सुसानिन को तड़पा-तड़पा कर मार डाला, लेकिन तब तक मिख़ाइल की जान बच चुकी थी। आज भी इवान सुसानिन रूस में देशभक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक है।
मिख़ाइल और उसके पिता पैट्रिआर्क फ़िलारेट का दोहरा शासनकाल
जब मार्च 1613 में मिख़ाइल को आख़िरकार राज़ी किया गया, शुरुआती सालों में मिख़ाइल ने वही शर्त रखी जो रईस चाहते थे, उसने कहा कि वो अकेले फ़ैसले नहीं लेगा, बल्कि ज़ेम्स्की सोबोर और बोयार ड्यूमा यानि रईसों की परिषद से सलाह लेकर शासन करेगा।
शुरुआती सालों में मिख़ाइल एक कमज़ोर और नाममात्र का शासक रहा। असली सत्ता पलटी 1619 में, जब उसके पिता फ्योदोर रोमानोव पोलैंड की क़ैद से रिहा होकर मॉस्को लौटे। फ्योदोर को सालों पहले दुश्मनों ने जबरदस्ती भिक्षु बनाकर उनका नाम “फ़िलारेट” रख दिया था ताकि वो कभी जार नहीं बन सकें। लेकिन मॉस्को लौटते ही वे रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च के ‘पैट्रिआर्क’ (सर्वोच्च धर्मगुरु) बन गए। कहने को वो धर्मगुरु थे, लेकिन हकीकत में वो अपने बेटे के पीछे रहकर रूस के असली शासक बन गए। पिता की कूटनीति और बेटे की गद्दी ने मिलकर रूस को स्थिरता दी।
कैसे 15 साल की अराजकता से निकला 300 साल तक राज करने वाला वंश?
पिता-पुत्र की यह जोड़ी, एक धार्मिक सत्ता, दूसरा राजनैतिक, रूस को स्थिरता की तरफ़ वापस लाने में जुट गई। धीरे-धीरे रोमानोव वंश ने अपनी पकड़ मज़बूत की। पोलैंड और स्वीडन से संधियां हुईं, रूस का अर्थव्यवस्था फिर से खड़ी होने लगी, प्रशासनिक ढांचा दोबारा बना। जो “मुसीबतों का दौर” रूस को तोड़ चुका था, उसकी जगह अब एक नई, स्थिर सत्ता-व्यवस्था स्थापित हो रही थी।
लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना देखिए
जिजिस राजवंश की शुरुआत एक डरे हुए, रोते हुए 16 साल के लड़के से हुई थी, जिसे रईसों ने एक कमज़ोर कठपुतली समझकर गद्दी पर बिठाया था… उसी रोमानोव राजवंश ने आगे चलकर 300 सालों तक रूस पर राज किया और दुनिया के सबसे विशाल और अजेय साम्राज्य की नींव रखी।
इसी मिख़ाइल का पोता आगे चलकर इतिहास में ‘पीटर द ग्रेट’ कहलाया, जिसने रूस को आधुनिक बनाने के लिए दाढ़ी रखने पर भी टैक्स लगा दिया और रूस को यूरोप के नक़्शे पर ज़बरदस्ती खींच लाएगा। कठपुतली समझे जाने वाले एक लड़के से शुरू हुआ यह सफर, दुनिया के सबसे निरंकुश साम्राज्य के जन्म की कहानी देखिए देखिए अगले एपिसोड पीटर द ग्रेट और आधुनिक रूसी साम्राज्य का जन्म में।
