रूस का गृहयुद्ध (Russian Civil War): जुलाई 1918 की एक रात, यूराल पर्वत के एकातेरिनबर्ग शहर का एक तहखाना में रूस के पूर्व ज़ार निकोलस द्वितीय और उनके पूरे परिवार को “फोटो खिंचवाने” के बहाने एक खाली कमरे में लाया गया था। परिवार में ज़ार निकोलस द्वितीय, उसकी पत्नी, उनके पांच बच्चे और चार नौकर भी शामिल था। लेकिन कैमरे की फ्लैश की जगह… दरवाज़ा खुला और हथियारों से लैस बोल्शेविक गार्ड्स अंदर दाखिल हुए। गार्ड्स के कमांडर याकोव युरोव्स्की ने एक पर्चा निकलते हुआ कहता है “तुम्हारे अपनों ने हमें तुम्हें खत्म करने का आदेश दिया है।
इससे पहले कि ज़ार कुछ समझ पाता, कुछ ही मिनटों में, 300 साल पुराने रोमानोव वंश का पूरा परिवार गोलियों से भून दिया जाता है, उनकी लाशों को तेज़ाब में गलाकर एक परित्यक्त खदान में फेंक दिया गया, ताकि इतिहास में उनका कोई निशान न बचे। लेकिन सवाल यह है: जो बोल्शेविक खुद को “मजदूरों और जनता की क्रांति” कहते थे… उन्होंने बच्चों समेत पूरे परिवार को रात के अंधेरे में एक कायरों की तरह क्यों मार डाला? क्या यह इस बात का सबूत था कि रूस का गृहयुद्ध अब सबसे खौफनाक और बेरहम मोड़ पर आ चुका था?

लाल बनाम सफेद: दुश्मनों का विशाल गठबंधन
अक्टूबर क्रांति के बाद, रूस टुकड़ों में बंट गया था। लेनिन द्वारा संचालित बोल्शेविकों (‘रेड्स’) के खिलाफ दुश्मनों का एक विशाल और खतरनाक गठबंधन खड़ा हो चुका था, जिन्हें “व्हाइट्स” (Whites) कहा गया। जिसमे शाही सेना के पुराने जनरल, उदारवादी, मध्यमार्गी समाजवादी, कोसैक सरदार, और यहां तक कि चेकोस्लोवाक सेना का एक पूरा दल जो साइबेरिया में फंसा हुआ था वो भी शामिल था।
भले ही उनके आपसी लक्ष्य अलग थे, कुछ ज़ार-तंत्र वापस चाहते थे, कुछ सिर्फ़ लोकतंत्र। जुलाई 1918 तक, व्हाइट सेनाएं और बागी चेकोस्लोवाक टुकड़ियां तेजी से एकातेरिनबर्ग शहर की तरफ बढ़ रही थीं।
रेड टेरर’ और ‘व्हाइट टेरर’: क्रूरता की सारी हदें पार
स्थानीय बोल्शेविक नेतृत्व को डर था कि अगर व्हाइट्स ने शहर पर क़ब्ज़ा किया, तो ज़ार को “आज़ाद” करा लिया जाएगा, और वो एक बार फिर बोल्शेविक-विरोधी ताक़तों का प्रतीक बन जाएगा, एक जीवित झंडा जिसके इर्द-गिर्द विरोध संगठित हो सकता था। निकोलस और उसके परिवार को क्रांति के बाद पहले साइबेरिया, फिर एकातेरिनबर्ग भेज दिया गया था, नज़रबंदी में।

इसके ऊपर, विदेशी शक्तियां, ब्रिटेन, फ़्रांस, अमेरिका, जापान, ने भी व्हाइट्स की मदद के लिए सैनिक और हथियार भेजे, इस डर से कि बोल्शेविक क्रांति पूरी दुनिया में फैल सकती है। रूस एक साथ गृहयुद्ध और विदेशी हस्तक्षेप, दोनों में उलझ गया।
उस समय रूस की हालत यह थी कि एक तरफ जहाँ बोल्शेविकों ने “रेड टेरर” का ऐलान कर दिया। उनकी नई गुप्त पुलिस ‘चेका’ ने बिना किसी मुकदमे के हज़ारों “वर्ग दुश्मनों” (अमीरों, पादरियों और विद्रोहियों) को तहखानों में ले जाकर भून डाला।
दूसरी तरफ व्हाइट्स भी पीछे नहीं थे; उन्होंने अपने इलाकों में वामपंथियों को फांसी पर लटकाया और भयानक यहूदी-विरोधी नरसंहार किए। इसके बाद शहरों और लाल सेना को भूखा मरने से बचाने के लिए लेनिन ने एक नीति लागू की: “वॉर कम्युनिज्म जो आग में घी डालने का काम किया। किसानों से उनकी फसलें जबरन छीन ली गईं। इसका नतीजा यह हुआ कि किसानों ने खेती करना ही छोड़ दिया। जिससे रूस मे फिर से एक विनाशकारी अकाल पड़ा जिसमें लाखों लोग मारे गए।
बोल्शेविक कैसे जीते? ट्रॉट्स्की का सैन्य कौशल की भूमिका
इन सब के बावजूद लेनिन इस whites पर भारी पड़ रहा था इसका मुख्य कारण बताया जाता था कि पर सैन्य रूप से, बोल्शेविकों के पास एक बड़ा फ़ायदा था, वो रूस के केंद्र, मॉस्को और पेट्रोग्राद जैसे औद्योगिक और रेलवे केंद्रों पर नियंत्रण रखते थे, जबकि व्हाइट्स चारों तरफ़ बिखरे हुए, अलग-अलग मोर्चों पर असंगठित होकर लड़ रहे थे।
लाल सेना के प्रतिभाशाली संगठनकर्ता लियोन ट्रॉट्स्की ने एक अनुशासित, केंद्रीकृत सेना खड़ी की, जो बिखरे व्हाइट्स पर भारी पड़ी। 1920 तक व्हाइट्स के सारे बड़े मोर्चे टूट गए। 1922 तक गृहयुद्ध खत्म हो गया। लेनिन की जीत हुई… लेकिन इस जीत की कीमत बहुत खौफनाक थी।
इस खूनी गृहयुद्ध, अकाल और बीमारियों ने करीब 1 करोड़ रूसियों की जान ले ली थी। रूस की अर्थव्यवस्था खंडहर में बदल चुकी थी, दिसंबर 1922 में, बोल्शेविकों ने एक नए, विशाल साम्राज्य की घोषणा की, यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (USSR) यानी सोवियत संघ! लेकिन जिस आदमी ने इस नए राष्ट्र को जन्म दिया था… वह खुद अब टूट चुका था। लेनिन को एक के बाद एक कई लकवा के स्ट्रोक मारे, और वह बिस्तर पर गिर पड़ा। वह बोलने में भी असमर्थ हो गया।
पार्टी के भीतर एक नई, खामोश और जानलेवा सत्ता की होड़ शुरू हो गई। अब सबसे बड़ा डर सता रहा था किसके हाथ में जाएगी इस नए, ख़ूनी संघर्ष से जन्मे राष्ट्र की बागडोर? और इसी बीच पर्दे के पीछे बैठकर, खामोशी से फाइलें खिसकाने वाले एक आदमी सामने आता है जिसका नाम इतिहास में आतंकवाद और खौफ का दूसरा नाम बनने वाला था? जानने के लिए देखें अगला एपिसोड – स्टालिन का उदय और आतंक!
पिछला भाग: जब लेनिन की बोल्शेविक पार्टी ने दुनिया का सबसे बड़ा तख्तापलट किया
