कभी-कभी कोई कलाकार फिल्म मे ऐसा काम कर जाते है जो उससे पहले कभी नहीं हुआ होता है, ऐसा ही कुछ कहानी है 1996 में आई निर्देशक अमोल पालेकर की फिल्म ‘दायरा’ और उसके मुख्य अभिनेता निर्मल पांडे की। जिनकी बेहतरीन कहानीकारी और साहसिक विषयों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। इस फिल्म में अभिनेता निर्मल पांडे ने ऐसा किरदार निभाया कि Daayraa Movie (1996) में उनकी शानदार एक्टिंग के लिए फ़्रांस के Valenciennes Film Festival ने उन्हें Best Actress Award दिया। जबकि इस फिल्म ने काम करने वाले अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी को Best Actor Award मिला।
क्या थी ‘दायरा’ फिल्म की कहानी? Story of Daayraa Movie (1996)
दायरा’ की कहानी भारतीय सिनेमा की उन चुनिंदा कहानियों में से है, जो समाज को आईना दिखाने वाली एक कला की कहानी है। इस फिल्म मे जहाँ एक तरफ अभिनेता निर्मल पांडे एक Transvestite का रोल अदा किया यानि एक ऐसा पुरुष जो अंदर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है और उसी तरह अपना जीवन जीना चाहता है। हालांकि, समाज उसे भी स्वीकार नहीं करता और उसे बाहर निकाल फेंका जाता है।
वही दूसरी तरफ अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी एक गाँव की लड़की होती है जिसे अपहरण कर लिया जाता है और उसे वेश्यावृत्ति के दलदल में धकेलने की कोशिश की जाती है। वह किसी तरह वहां से जान बचाकर भाग निकलती है, लेकिन बाहर की दुनिया में उसे एक कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ता है, जहाँ दरिंदों से खुद को सुरक्षित रखने के लिए ‘लड़के’ की पहचान अपनाकर सड़कों पर निकल पड़ती है।
कहानी की असली शुरुआत तब होती है, जब ये दोनों किरदार एक सफर के दौरान आपस में टकराते हैं। एक पुरुष जो ‘स्त्री’ की तरह जी रहा है, और एक स्त्री जो सुरक्षा के लिए ‘पुरुष’ बन गई है। जैसे-जैसे सफर आगे बढ़ता है, वे एक-दूसरे का दर्द समझते हैं और समाज के बनाए हुए ‘दायरे’ से बाहर निकलकर एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं।
कौन थे अभिनेता निर्मल पांडे? (Who was Nirmal Pandey?)
Actor Nirmal Pandey in Daayraa Movie 1996 received Best Actress Award
10 अगस्त 1962 को उत्तराखंड के नैनीताल में निर्मल पांडे का जन्म हुआ, बचपन से ही कला को लेकर उनका अलग ही जुनून था और इसी जुनून ने उन्हें दिल्ली के प्रतिष्ठित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा पहुँचाया, जहाँ उन्होंने थिएटर की बारीकियों को सीखते हुए एक मँजे हुए कलाकार बन गए। निर्मल पांडे को सबसे बड़ा ब्रेक दिया डायरेक्टर शेखर कपूर ने अपनी कल्ट क्लासिक फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ में। जहाँ उन्होंने फूलन देवी के प्रेमी ‘विक्रम मल्लाह’ का किरदार निभाया था। इस फिल्म में उनका अभिनय इतना रीयलिस्टिक था कि दर्शकों ने उन्हें रातों-रात एक इंटेंस एक्टर के रूप में स्वीकार कर लिया।
उसके बाद उन्होंने लगातार इस रात की सुबह नहीं (1996), दायरा (1996), ट्रेन टू पाकिस्तान (1998), प्यार किया तो डरना क्या (1998) में अपनी शानदार अभिनय से लोगों का दिल जीता। 90 के दशक या 2000 की शुरुआत में स्टार प्लस का सुपरहिट शो ‘हातिम’ में निर्मल पांडे ने मुख्य विलेन ‘दज्जाल’ का किरदार निभाया था। जिसके बाद भारतीय टेलीविजन के सबसे खूंखार और यादगार विलेन्स की लिस्ट में शामिल कर दिया।
बहुत कम लोग यह बात जानते हैं कि बेहतरीन एक्टिंग के साथ-साथ निर्मल पांडे एक बहुत सुरीले गायक भी थे। उन्होंने अपना एक म्यूज़िक एल्बम ‘जज़्बा’ भी रिलीज़ किया था, जो उनके हुनर का एक बिल्कुल अलग पहलू दुनिया के सामने लाया। निर्मल पांडे अब हमारे बीच नहीं हैं, 2010 में 47 की उम्र में उनका निधन हो गया।
कौन हैं सोनाली कुलकर्णी?
सोनाली कुलकर्णी भारतीय सिनेमा की एक बेहद प्रतिभाशाली और बहुमुखी अभिनेत्री हैं। बॉलीवुड में दर्शक उन्हें ‘दिल चाहता है’, ‘मिशन कश्मीर’ और ‘सिंघम’ जैसी सुपरहिट फिल्मों में उनके शानदार काम के लिए पहचानते हैं। साल 1996 में आई ऐतिहासिक फिल्म ‘दायरा’ में उन्होंने एक ऐसी लड़की का जटिल किरदार निभाया था, जो अपनी सुरक्षा के लिए समाज में एक ‘मर्द’ बनकर रहती है। इसी दमदार अदायगी के लिए उन्हें फ्रांस में ‘Best Actor’ के अनोखे अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था।
दायरा’ महज़ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सिनेमाई प्रयोग था। निर्मल पांडे और सोनाली कुलकर्णी ने अपने किरदारों को इतनी शिद्दत से जिया कि इंटरनेशनल जूरी को अवॉर्ड्स की कैटेगरी तक बदलनी पड़ गई। भारतीय सिनेमा हमेशा इन दोनों कलाकारों के इस अद्वितीय योगदान का ऋणी रहेगा।
Frequently Asked Questions (FAQ)
Q1: किस भारतीय अभिनेता को ‘Best Actress’ का अवॉर्ड मिला है?
Ans: दिवंगत अभिनेता निर्मल पांडे दुनिया के इकलौते ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें 1996 की फिल्म ‘दायरा’ में एक महिला (Transvestite) का किरदार निभाने के लिए फ्रांस के Valenciennes Film Festival में ‘Best Actress’ का अवॉर्ड मिला था।
Q2: फिल्म ‘दायरा’ (Daayraa) के निर्देशक कौन थे?
Ans: इस साहसिक फिल्म का निर्देशन दिग्गज अभिनेता और फिल्ममेकर अमोल पालेकर ने किया था।
Q3: हातिम सीरियल में ‘दज्जाल’ का किरदार किसने निभाया था?
Ans: स्टार प्लस के मशहूर शो ‘हातिम’ में खूंखार ‘दज्जाल’ का किरदार अभिनेता निर्मल पांडे ने ही निभाया था।
“एक बार बिदाय दे माँ, घुरे आशि… हाशि हाशि पोरबो फांशी, देखबे भारतबाशी।”
ये पंक्तियां बंगाल के मशहूर कवि पीतांबर दास ने एक 18 साल के युवा क्रांतिकारी की शहादत को नमन करते हुए लिखी थीं। जिसका अर्थ है— “माँ, मुझे एक बार विदाई दे, मैं फिर लौटकर आऊंगा… मैं हंसते-हंसते फांसी का फंदा पहन लूंगा और पूरा भारत मुझे देखेगा।”
साल था 1908, अगस्त का महीना और तारीख थी 11। सुबह के 6 बज रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही एक 18 साल के युवा को फांसी के तख्ते की तरफ ले जा रहे थे। जेल के उस गलियारे की कोठरियों में बंद अन्य सभी साथी नम आंखों से उसे विदाई दे रहे थे। लेकिन 18 साल का वह युवा मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ बेखौफ आगे बढ़ रहा था। जब उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ाया गया, तो उसके हाथ में भगवद्गीता थी और उसी ऐतिहासिक मुस्कान के साथ उसने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।
और इस तरह, 18 साल के उस युवा— खुदीराम बोस (Khudiram Bose Story) ने हमेशा के लिए भारत के इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में अपना नाम अमर कर दिया।
खुदीराम बोस कौन थे?
Khudiram Bose Story:Original photo of Freedom Fighter khudiram bose
खुदीराम बोस को आजादी की लड़ाई में फांसी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी माना जाता है। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में कायस्थ परिवार में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। उनके सिर से बहुत छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया था। जिसके बाद उनकी बड़ी बहन अपरूपा रॉय ने उनका पालन-पोषण किया।
बचपन से ही आजादी के जुनून में इतना रम गए थे कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। महज 15 साल की उम्र में खुदीराम बोस ‘अनुशीलन समिति’ नाम के एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए।
वे इतनी छोटी उम्र में ही ब्रिटिश राज के खिलाफ पर्चे बांटने, बम बनाने की कला सीखने और पुलिस की नाक के नीचे से हथियार सप्लाई करने के काम में माहिर हो चुके थे। 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम करने वाले वो शुरुआती हमले
फरवरी 1906 के आस-पास खुदीराम बोस अंग्रेजों के नजर मे आने लग गए थे जब पहली बार उसने मिदनापुर में हो रहे एक औद्योगिकऔर कृषि प्रदर्शनी में क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे गए ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पर्चे बांटने शुरू किया। उसी समय एक पुलिस वाले ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी सिपाही के मुंह पर जोरदार घूंसा मारा और बचे हुए पर्चे बगल में दबाकर फरार हो गए। बाद में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला, लेकिन गवाही न मिलने के कारण वे निर्दोष साबित हुए।
इसके बाद से गिरफ़्तारी और हमला का सिलसिला चलता रहा। 6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर बच गया। सन 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले।
किंग्सफोर्ड की हत्या करने का बनाया प्लान
मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रान्तिकारियों की गुप्त संस्था के से खुदीराम पहले ही में जुट चुके थे। लेकिन जब 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया जिससे विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट पद पर आसीन किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया।
इस घटना ने देश्वसियों को विचलित कर दिया जिसके बाद ‘युगान्तर’ समिति कि एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को ही मारने का निश्चय हुआ और इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया।
योजना के अनुसार 18 अप्रैल 1908 को खुदीराम और उनका एक साथी मुजफ्फरपुर के जज किंग्सफोर्ड जिसका तबादला कलकत्ता से मुजफ्फरपुर हुआ था, को मारने के लिए मुजफ्फरपुर निकल पड़े। दोनों ने मिलकर तय किया कि किंग्सफोर्ड जब बग्घी से वापस आएगा, तभी बम फेंक देंगे।
रात में साढ़े आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अँधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बँगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आने वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका।
यूँ तो खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाड़ी समझकर बम फेंका था परन्तु उस दिन किंग्जफोर्ड थोड़ी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। और जिस बग्गी पर खुदीराम ने बम फेंका उसमें दो महिलाएं सवार थीं, जिनमें से एक की इस हमले में मौत हो गई।
इसी घटना के चलते खुदीराम बोस को 1 मई 1908 को गिरफ्तार कर लिया गया था। बता दें, हत्या के इस मुकदमे के बाद अदालत ने खुदीराम को फांसी की सजा सुनाई।
Khudiram Bose under guard in1908 for the murder of two Englishwomen with a homemade bomb
जज से बोले- आपको भी बम बनाना सिखा दूं?
गिरफ्तारी के बाद खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। अदालत खचाखच भरी थी। जब जज ने इस 18 साल के लड़के को फांसी की सजा सुनाई, तो पूरे कोर्ट रूम में मौत का सन्नाटा छा गया। लेकिन कठघरे में खड़ा खुदीराम… वह मुस्कुरा रहा था!
जज को लगा कि शायद इस कम उम्र के लड़के को अपनी सजा की गंभीरता समझ नहीं आई है। हैरान होकर जज ने पूछा, “क्या तुम्हें पता है कि इस सजा का मतलब क्या है?” खुदीराम ने बेखौफ होकर जो जवाब दिया, वो आज भी इतिहास के पन्नों में गूंजता है। उन्होंने कहा:
“इस सजा और मुझे बचाने के लिए मेरे वकील साहब की दलील दोनों का मतलब अच्छी तरह से जानता हूं। मेरे वकील साहब ने कहा है कि मैं अभी कम उम्र का हूं। इस उम्र में बम नहीं बना सकता। जज साहब मेरी आपसे गुजारिश है कि आप खुद मेरे साथ चलें। मैं आपको भी बम बनाना सिखा दूंगा।”
अदालत ने खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाने के साथ ऊपर की अदालत में अपील का वक्त भी दिया। हालांकि, ऊपरी अदालतों ने मुजफ्फरपुर की अदालत के फैसले पर ही मुहर लगाई। ऐसे में, 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई।
कैसे पड़ा खुदीराम बोस का नाम?
खुदीराम बोस (Khudiram Bose Story) के जन्म से पहले उनके दो भाइयों की बीमारी की चलते मृत्यु हो गई थी। उस दौर में बंगाल में एक मान्यता थी कि अगर नवजात बच्चे को उसकी बड़ी बहन कुछ मुट्ठी ‘खुदी’ यानि चावल के टूटे हुए दाने या कण के बदले खरीद ले, तो बच्चे पर मंडराता अकाल मृत्यु का साया टल जाता है। उनकी बहन ने उन्हें तीन मुट्ठी ‘खुदी’ देकर खरीदा था, इसीलिए इस बच्चे का नाम ‘खुदीराम’ पड़ गया।
26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना, तब हमें एक ऐसा संविधान मिला जो दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 75 साल बाद भी उस मूल दस्तावेज के पन्ने पीले (Indian Constitution Original Copy) नहीं पड़े, आखिर ऐसा क्यूँ? भारत के गौरवशाली इतिहास को सहेजने के लिए विज्ञान का एक ऐसा अद्भुत प्रयोग किया गया है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
हाथों से लिखा गया है भारत का संविधान
अक्सर लोग समझते हैं कि संविधान की मूल प्रति को टाइप या प्रिंट किया गया होगा, लेकिन हकीकत यह है कि इसे कैलिग्राफर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने अपने हाथों इसे इटैलिक शैली में लिखा था। रायजादा ने इसके लिए कोई फीस नहीं ली थी, बस उनकी एक शर्त थी कि संविधान के हर पन्ने पर उनका नाम और आखिरी पन्ने पर उनके दादाजी का नाम होगा। इसके साथ ही, शांतिनिकेतन के महान कलाकार नंदलाल बोस और उनकी टीम ने हर पन्ने पर भारत की संस्कृति और इतिहास को चित्रों के जरिए उकेरा है।
किस पेपर मे लिखी गई भारत का संविधान?
संविधान की यह मूल प्रति ‘पार्चमेंट पेपर’ पर लिखी गई है। यह कागज बहुत ही खास होता है, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या यह है कि नमी (Moisture) और ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर यह धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। हवा में मौजूद सूक्ष्मजीव और फंगस इसके रेशों को खा सकते हैं, जिससे स्याही फीकी पड़ सकती है।
कैसे सुरक्षित रखी गई भारतीय संविधान की कॉपी?
संविधान की सुरक्षा के लिए इसे संसद भवन की लाइब्रेरी के एक विशेष चैंबर में रखा गया है। इसे सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘हीलियम गैस’ तकनीक का चुनाव किया।
Indian Constitution Original Copy
ऑक्सीजन मुक्त वातावरण: हीलियम एक ‘इनर्ट’ यानी अक्रिय गैस है। यह किसी भी चीज के साथ रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Reaction) नहीं करती। गैस चैंबर से ऑक्सीजन को पूरी तरह बाहर निकालकर हीलियम भर दी जाती है, जिससे सूक्ष्मजीव पनप ही नहीं सकते।
तापमान और नमी का संतुलन: चैंबर के अंदर नमी को 40% (प्लस-माइनस 5%) और तापमान को स्थिर रखा जाता है। इसके लिए कक्ष में आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं जो हर पल डेटा मॉनिटर करते हैं।
सिल्ड बॉक्स: संविधान को काले फलालैन के कपड़े पर रखा गया है और फिर उसे सील बंद कांच के बॉक्स में रखा गया है।
शुरुआत में, संविधान की प्रतियों को मखमल के कपड़े में लपेटकर नेफथलीन बॉल्स के साथ रखा जाता था। लेकिन 1990 के दशक में महसूस किया गया कि यह तरीका लंबे समय के लिए सुरक्षित नहीं है। इसके बाद, 1994 में National Physical Laboratory (NPL) और भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर वैज्ञानिक तकनीक विकसित की। तब से, यह हीलियम गैस के सुरक्षित सुरक्षा चक्र में है।
भारत का संविधान हमारे लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। प्रेम बिहारी नारायण रायजादा की शानदार कैलिग्राफी और नंदलाल बोस की कलाकारी को सुरक्षित रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। हीलियम गैस चैंबर जैसी उन्नत तकनीक यह सुनिश्चित करती है कि भारत के निर्माण की यह गाथा आने वाले हजारों सालों तक सुरक्षित रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे देखकर गर्व महसूस कर सकें।
कौन थे प्रेम बिहारी नारायण रायजादा?
प्रेम बिहारी नारायण रायजादा का जन्म 1901 में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कैलिग्राफर परिवार में हुआ था। उनके दादा, राम प्रसाद सक्सेना, एक प्रसिद्ध विद्वान और कैलिग्राफर थे, जिन्होंने रायजादा को फारसी और अंग्रेजी कैलिग्राफी की बारीकियां सिखाईं। रायजादा ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से की थी। जब संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार कर लिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसे इटैलिक शैली में लिखवाना चाहते थे।
Indian Constitution Original Copy written by prem bihari narayan Rayjada
प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने संविधान के 395 अनुच्छेदों, 8 अनुसूचियों और प्रस्तावना को लिखने पूरे 6 महीने लगे। इस विशाल कार्य के लिए उन्होंने 303 नंबर के 432 होल्डर पेन निब का इस्तेमाल किया। पूरे संविधान में एक भी जगह काट-छांट या गलती नहीं मिली। उनकी इटैलिक लिखावट इतनी सधी हुई थी कि देखने वाले को वह प्रिंटेड लगती थी।
प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने जहाँ पन्नों पर शब्द उकेरे, वहीं शांतिनिकेतन के आचार्य नंदलाल बोस और उनकी टीम (जैसे राममनोहर सिन्हा) ने इन पन्नों के किनारों को सजाया। उन्होंने मोहनजोदड़ो से लेकर गुप्त वंश और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तक के चित्रों के जरिए भारत के इतिहास को संविधान के पन्नों पर जीवंत कर दिया।
बेगम हज़रत महल उन कुछ महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने 1857 के विद्रोह के दौरान अंग्रेज़ों को चुनौती दी थी। जब अंग्रेज द्वारा शासन के शीर्ष से नवाब को हटा दिया गया, तो प्रतिरोध थमा नहीं बल्कि रानी के साहस ने न केवल खाली तख्त को संभाला, बल्कि बिखरे हुए समाज को जोड़कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे लंबा और संगठित मोर्चा खोल दिया। उनका सफर गरीबी और गुमनामी से शुरू हुआ, लेकिन उनकी हिम्मत ने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। उनका नाम था— बेगम हज़रत महल (Begum Hazrat Mahal Story)।
Begum Hazrat Mahal Story as Freedom Fighter
महक परी से बेगम बनने का सफर (Begum Hazrat Mahal Story)
बेगम हज़रत महल का जन्म 1820 में अवध प्रांत के फैजाबाद जिले में हुआ था। उनका असली नाम मुहम्मदी ख़ानुम था। उनका शुरुआती जीवन बहुत संघर्षपूर्ण था। वे पेशे से एक गणिका थीं और दुर्भाग्यवश, उनके माता-पिता ने उन्हें शाही हरम के दलालों को बेच दिया था। शाही हरम में अपनी खूबसूरती और हुनर के कारण उन्हें ‘महक परी’ की उपाधि मिली।
उनकी किस्मत तब बदली जब अवध के नवाब वाजिद अली शाह की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने मुहम्मदी ख़ानुम से निकाह किया और उन्हें शाही बेगम का दर्जा दिया। जब उनके बेटे बिरजिस कादर का जन्म हुआ, तब उन्हें ‘हज़रत महल’ की उपाधि से नवाजा गया।
जब सत्ता का शून्य से बढ़ें सामाजिक असंतोष
साल 1856 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध पर कब्ज़ा कर नवाब वाजिद अली शाह को कोलकाता निर्वासित कर दिया। यह केवल सत्ता का परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक और ढांचागत हमला था। अंग्रेजों ने सड़कों और इमारतों के निर्माण के नाम पर पुराने मंदिरों और मस्जिदों को तोड़ना शुरू कर दिया। इसके अलावा, नई शिक्षा नीति और कारतूसों में चर्बी के इस्तेमाल जैसी खबरों ने जनता में गहरा अविश्वास पैदा कर दिया था।
नवाब के जाने के बाद अवध में एक नेतृत्व का अभाव पैदा हो गया था। जनता में गुस्सा था, लेकिन उन्हें दिशा देने वाला कोई नहीं था। तब बेगम हज़रत महल ने अवध की बागडोर खुद संभालने का फैसला किया। उन्होंने अपने नाबालिग बेटे बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाया और खुद उसकी संरक्षक बनकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान कर दिया।
जब बेगम ने बनाई ‘महिलाओं की सेना’
आज़ादी के पहले युद्ध के दौरान, 1857 से 1858 तक, राजा जयलाल सिंह की अगुवाई में बेगम हज़रत महल के हामियों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के ख़िलाफ़ बग़ावत की; बाद में, उन्होंने लखनऊ पर फिर से क़ब्ज़ा कर लिया और उन्होंने अपने बेटे बिरजिस क़द्र को अवध के वली (शासक) घोषित कर दिया।
बेगम हज़रत महल की प्रमुख शिकायतों में से एक यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सड़कें बनाने के लिए मंदिरों और मस्जिदों को आकस्मिक रूप से ध्वस्त किया था। सूअरों को खाने और शराब पीने, सूअरों की चर्बी से बने सुगंधित कारतूस काटने और मिठाई के साथ, सड़कों को बनाने के बहाने मंदिरों और मस्जिदों को ध्वंसित करना, चर्च बनाने के लिए, ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए सड़कों में पादरी भेजने के लिए, अंग्रेज़ी संस्थान स्थापित करने के लिए हिंदू और मुसलमान पूजास्थलों को नष्ट करने के लिए, और अंग्रेज़ी विज्ञान सीखने के लिए लोगों को मासिक अनुदान का भुगतान करने के काम, हिंदुओं और मुसलमानों की पूजा के स्थान नष्ट करना इस अंग्रेज़ों को कार्य के लिए विद्रोह पर उतर आयी।
जब अंग्रेज़ों के आदेश के तहत सेना ने लखनऊ और ओध के अधिकांश इलाक़े को क़ब्ज़ा कर लिया, तो हज़रत महल को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। हज़रत महल नाना साहेब के साथ मिलकर काम करते थे, लेकिन बाद में शाहजहांपुर पर हमले के बाद, वह फ़ैज़ाबाद के मौलवी से मिले।
लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हज़रत महल ने किया था। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस क़द्र को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना का स्वयं मुक़ाबला किया। उनमें संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी और इसी कारण अवध के ज़मींदार, किसान और सैनिक उनके नेतृत्व में आगे बढ़ते रहे।
लखनऊ में बेगम हज़रत महल की महिला सैनिक दल का नेतृत्व रहीमी के हाथों में था, जिसने फ़ौजी भेष अपनाकर तमाम महिलाओं को तोप और बन्दूक चलाना सिखाया। रहीमी की अगुवाई में इन महिलाओं ने अंग्रेज़ों से जमकर लोहा लिया।
जब नेपाल में शरण लेकर बिताए आखिरी दिन
अंग्रेजों के पास आधुनिक हथियार और बड़ी सेना थी। धीरे-धीरे उन्होंने लखनऊ और अवध के ज्यादातर इलाकों पर वापस कब्जा कर लिया। हज़रत महल को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। उन्होंने आत्मसमर्पण करने और अंग्रेजों की पेंशन लेने से साफ इनकार कर दिया। वे अपने बेटे के साथ नेपालचली गईं। शुरुआत में नेपाल के प्रधानमंत्री जंग बहादुरने उन्हें शरण देने से मना कर दिया था, लेकिन बाद में रहने की इजाजत दे दी। वहां शरण लेने के बाद भी उन्होंने अंग्रेजों की पेंशन या समझौते के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
Begam Hazrat Mahal Story: Awadh_Royal_Family
एक महारानी, जिसने कभी लखनऊ पर राज किया था, उसने अपने आखिरी दिन गुमनामी में बिताए। 1879 में काठमांडू (नेपाल) में उनका निधन हो गया। उन्हें वहां की जामा मस्जिद के मैदान में एक साधारण सी कब्र में दफनाया गया। बेगम हज़रत महल ने साबित किया कि नेतृत्व किसी पद का मोहताज नहीं होता। उन्होंने एक ऐसे सिस्टम का संचालन किया जो युद्ध के दौरान भी काम करता रहा। उन्होंने अंग्रेजों पर यह आरोप खुलेआम लगाया कि वे सड़कों के नाम पर धार्मिक स्थलों को तोड़ रहे हैं, जिससे जनता का जुड़ाव उनके प्रति और गहरा हो गया।
बेगम हज़रत महल की उपलब्धियां और सम्मान
भले ही उनका अंत गुमनामी में हुआ, लेकिन भारत ने अपनी इस वीरांगना को नहीं भुलाया।
15 अगस्त 1962: महान विद्रोह में उनकी भूमिका के लिए लखनऊ के हज़रतगंज के पुराने विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर उनके सम्मान में रखा गया।
10 मई 1984: भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।
आज जब हम महिला नेतृत्व (Women Leadership) और स्वाभिमान की बात करते हैं, तो हज़रत महल का जीवन एक केस स्टडी है। उन्होंने महलों का सुख भोगने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुना। उनकी कहानी बताती है कि विषम परिस्थितियों में भी संसाधन जुटाए जा सकते हैं और एक महाशक्ति को चुनौती दी जा सकती है। उनका जीवन सिखाता है कि अधिकार मांगे नहीं जाते, उनके लिए खड़ा होना पड़ता है। एक साधारण ‘मुहम्मदी ख़ानुम’ से ‘बेगम हज़रत महल’ बनने तक का उनका सफर भारतीय नारी की शक्ति का प्रतीक है।
अक्सर कहा जाता है कि एक सुरक्षित नौकरी और बंधा-बंधाया वेतन ही सफलता की निशानी है। खास तौर पर तब, जब आप बड़ी एयरलाइन्स कंपनी में अच्छे पद पर काम कर रहे हों। लेकिन बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले अभिनीत सेतु के लिए सफलता की परिभाषा कुछ और थी। उन्होंने एविशन सेक्टर के चमकते करियर को छोड़कर एक ऐसा रास्ता चुना, जो आसान नहीं था, लेकिन जिसका मकसद बड़ा था—आयुर्वेद के ज़रिए समाज को स्वस्थ बनाना और युवाओं को रोजगार के काबिल बनाना। आज, ‘एस्क्लेपियस वेलनेस प्राइवेट लिमिटेड’ (Asclepius Wellness Pvt Ltd) के प्रमोटर के तौर पर, अभिनीत (Abhinit Setu Success Story) न केवल एक सफल उद्यमी हैं, बल्कि बिहार सरकार द्वारा ‘शौर्य सम्मान’ से सम्मानित एक यूथ आइकॉन भी हैं।
अभिनीत सेतु का शुरुआती सफर
अभिनीत की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी लग सकती है, लेकिन इसका संघर्ष असली है। समस्तीपुर बिहार के एक शिक्षक परिवार से आने वाले अभिनीत ने पास के ही हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी किये, उसके बाद उन्होंने ICFAI यूनिवर्सिटी से MBA किया और फिर 2012 से 2017 तक स्पाइसजेट और एयर इंडिया के लिए एयरलाइंस में ऑपरेशन मैनेजर के तौर पर काम किया।
अभिनीत के उद्यमी बनने का सफर 14 नवंबर, 2015 को ‘कैंडी कॉर्नर’ (The Box of Joy) के साथ शुरू हुआ। शुरुआत में उनका काम बड़ी कंपनियों के लिए कस्टमाइज्ड चॉकलेट और कॉर्पोरेट गिफ्ट्स तैयार करना था। लेकिन उन्होंने खुद को यहीं तक सीमित नहीं रखा। डायरेक्ट सेलिंग में कदम रखते ही उनकी यह छोटी सी शुरुआत एक बड़े मिशन में बदल गई—जहाँ चंद लोगों से शुरू हुआ उनका कारवां, आज 17,000 से ज्यादा लोगों की एक सशक्त कम्युनिटी बन चुका है।
आयुर्वेद के साथ लिखी सफलता की नई कहानी
सितंबर 2020 में, जब सरकार ने डायरेक्ट सेलिंग के लिए नए नियम लागू किए, तो उन्होंने इसे एक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने ‘एस्क्लेपियस वेलनेस’ (AWPL) को अपनी नई मंज़िल चुना क्यूकी उनका विजन साफ था कि बीमार पड़ने के बाद इलाज करने से बेहतर है, बीमार पड़ने से बचना और इसी सोच के साथ लॉकडाउन के ठीक बाद, 20 अक्टूबर से पूरी ताकत के साथ काम शुरू कर दिया।
अभिनीत कहते हैं, “आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव (stress) कई बीमारियों की जड़ है। हम आयुर्वेद के प्राचीन ज्ञान को मॉडर्न लाइफस्टाइल के साथ जोड़कर लोगों के सामने रख रहे हैं। हमारा मकसद सिर्फ प्रोडक्ट बेचना नहीं, बल्कि एक आयुर्वेदिक जीवनशैली को बढ़ावा देना है।”
उनकी इसी मेहनत और विजन को तब बड़ी पहचान मिली, जब उन्हें ‘बेस्ट एंटरप्रेन्योर’ के सम्मान से नवाजा गया। लेकिन यहाँ तक पहुचना आसान नहीं था। एक दौर ऐसा भी आया जब वे बैंक के कर्ज तले दबे थे। हालत ऐसी थी कि बाइक में पेट्रोल डलवाने के पैसे नहीं होते थे और पैसे बचाने के लिए वे अक्सर लंच या डिनर छोड़ दिया करते थे। उनके करीबी दोस्तों ने उनकी उम्मीदों और लक्ष्यों का मज़ाक उड़ाया, लेकिन अभिनीत का मानना था कि “एमबीए ने मुझे बिजनेस की थ्योरी सिखाई, लेकिन जीवन की कठिनाइयों ने मुझे असली बिजनेस सिखाया।
नौकरी मांगने वाले नहीं, देने वाले बने
अभिनीत की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी अपनी कमाई नहीं, बल्कि वह नेटवर्क है जो उन्होंने खड़ा किया है। उन्होंने 17,000 से अधिक लोगों की एक कम्युनिटी बनाई है। वे युवाओं को सिर्फ रोजगार नहीं देते, बल्कि उन्हें ‘आत्मनिर्भर’ बनाते हैं ताकि वे अपनी आय का स्रोत खुद तैयार कर सकें। अपनी मेहनत के दम पर आज अभिनीत ने 5-6 करोड़ रुपये की नेटवर्थ (संपत्ति) खड़ी कर ली है, आज वे ऑडी (Audi A4) जैसी लग्जरी कार के मालिक हैं और एक बेहतरीन लाइफस्टाइल जी रहे हैं, वे अब तक नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर और दुबई जैसे देशों की यात्रा कर चुके हैं। लेकिन उनकी असली कमाई वे सैकड़ों युवा हैं जो आज उनके मार्गदर्शन में अपने पैरों पर खड़े हैं।
सफलता पाने के बाद अक्सर लोग रुक जाते हैं, लेकिन अभिनीत का विजन बहुत बड़ा है। उनका कहना है कि यह तो बस शुरुआत है। उन्होंने अपना 2026 का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है— “5000 से ज्यादा लोगों को रोजगार देना।” वे चाहते हैं कि बिहार और देश का युवा नौकरी मांगने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बने। वे आयुर्वेद और डायरेक्ट सेलिंग के जरिए युवाओं को ‘आत्मनिर्भर’ बना रहे हैं।
अभिनीत सेतु की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे नेक हों और विजन स्पष्ट हो, तो एक छोटे शहर का लड़का भी बड़े बदलाव ला सकता है। उनका सफर बताता है कि असली कामयाबी केवल पैसा कमाना नहीं, बल्कि अपने साथ दूसरों को भी ऊपर उठाना है। आयुर्वेद को बढ़ावा देकर उन्होंने न केवल लोगों की सेहत सुधारी है, बल्कि बिहार और देश के युवाओं को उद्यमिता (entrepreneurship) का एक नया रास्ता भी दिखाया है।
चौधरी चरण सिंह भारत के इतिहास में इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो अपने कार्यकाल में कभी संसद की सीढ़ियां नहीं चढ़ सके। उनकी सरकार इंदिरा गांधी की कांग्रेस (I) के समर्थन पर टिकी थी। लेकिन फ्लोर टेस्ट वाले दिन से ठीक एक दिन पहले 19 अगस्त को इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया। चौधरी चरण सिंह जानते थे कि उनके पास बहुमत का नंबर नहीं हैं। उन्होंने संसद जाकर हारने के बजाय, संसद जाने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद वे 20 अगस्त 1979 से 14 जनवरी 1980 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे और इस दौरान भी संसद में नहीं गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन उस छोटे से कार्यकाल में ‘सुशासन’ के ऐसे किस्से (Chaudhary Charan Singh Story) मशहूर हैं जिसके आज भी मिसाल दिए जाते हैं। और ऐसा ही एक मशहूर किस्सा है साल 1979 का… जब देश का प्रधानमंत्री अपनी एसी गाड़ी और सुरक्षा छोड़कर, भेष बदलकर एक थाने में जा पहुंचा।
किस्सा अगस्त 1979 की है। चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बने कुछ ही दिन हुए थे। उनके पास लगातार शिकायतें आ रही थीं कि उत्तर प्रदेश के थानों में गरीबों की सुनवाई नहीं होती और पुलिसवाले रिश्वतखोरी में लिप्त हैं। किसान नेता होने के नाते चौधरी साहब को यह बात चुभ गई। बार-बार शिकायत मिलने के बाद चरण सिंह खुद ही हकीकत भांपने के लिए किसान का भेष धारण कर थाने पहुँच गए थे। कई पूर्व नेता बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह कभी भी भेष बदलकर पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों का निरीक्षण करने पहुंच जाते थे।
Chaudhary Charan Singh Story: PM attend a political rally
जब जेब कटने की रिपोर्ट लिखवाने पहुँचे प्रधानमंत्री
शाम के करीब 6 बज रहे थे। एक 75 साल का बुजुर्ग, जिसने मैला-कुचैला कुर्ता-धोती पहन रखा था और जिसके कपड़ों पर धूल जमी थी, उत्तर प्रदेश के इटावा के ऊसराहार थाने के गेट पर पहुंचा। अंदर घुसते ही सिपाही ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और कड़क आवाज़ में पूछा, “कौन हो? यहां क्यों आए हो?” उस बूढ़े किसान (चरण सिंह) ने दबी और डरी हुई आवाज़ में कहा, “दरोगा बाबू हैं? मुझे रपट लिखवानी है।” जवाब मिला, “साहब नहीं हैं। बताओ क्या हुआ?”
चरण सिंह ने एक कहानी गढ़ते हुए कहा:
“साहब, मैं मेरठ का रहने वाला हूं। खेती-किसानी करता हूं। सुना था यहां इटावा में बैलों की जोड़ी सस्ती मिलती है, इसलिए बैल खरीदने आया था। लेकिन रास्ते में किसी ने मेरी जेब काट ली। अब मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं बची, मैं घर कैसे जाऊंगा? मेरी रपट लिख लो।”
हेड कांस्टेबल ने नजरें टेढ़ी करते हुए पूछा, ‘तुम मेरठ से यहां आ गए और तुम्हें पता नहीं चला? चलो भागो यहां से, हम ऐसी झूठी रिपोर्ट नहीं लिखते। हमारा समय बर्बाद मत करो।” चरण सिंह ने बहुत कोशिश किये कि उनकी रपट लिख जाए लेकिन पुलिसवाले अपनी अकड़ में थे। अंत में कांस्टेबल ने कहा, ‘जाओ शिकायत नहीं लिखी जाएगी।
निराश होकर चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh Story) थाने के बाहर आकर खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद थानेदार साहब आए, लेकिन उन्होंने भी उस ‘गरीब किसान’ की बात अनसुनी कर दी। तभी एक सिपाही ने उसे बुलाया और धीरे से बोला अगर किसान कुछ पैसे (घूस) का जुगाड़ कर ले तो उसकी रिपोर्ट लिखी जाएगी। परेशान किसान ने पुलिस के इस ऑफर को मान लिया। इसके बाद मुंशी ने शिकायत लिखनी शुरू कर दी। रिपोर्ट लिखने के बाद मुंशी ने पूछा, “बाबा, अंगूठा लगाओगे या दस्तखत करोगे?” बूढ़े किसान ने कहा, “मैं दस्तखत करूंगा।”
Chaudhary Charan Singh Story: Asked for a bribe at the police station, the entire police station was suspended.
जब मैले कुर्ते की जेब से निकाले प्रधानमंत्री की मुहर
उन्होंने पेन उठाया और कागज पर साफ-साफ अक्षरों में लिखा— ‘चौधरी चरण सिंह’। मुंशी अभी नाम पढ़ ही रहा था कि उस किसान ने अपने मैले कुर्ते की जेब से एक मुहर निकाली और कागज पर जोर से ठोंक दी। जिस पर लिखा था— ‘प्रधानमंत्री, भारत सरकार’।
वह मुहर देखते ही थाने में मानो सांप सूंघ गया। मुंशी के हाथ से कलम छूट गई। थानेदार और सिपाहियों के चेहरों का रंग उड़ गया। तभी बाहर सायरन की आवाज आई। कुछ देर में प्रधानमंत्री का काफिला भी वहां पहुंच गया। सभी आला अधिकारी भी वहां पहुंच गए।
चौधरी चरण सिंह ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने वहीं खड़े-खड़े पूरे थाने को सस्पेंड करने का आदेश दिया और अपनी गाड़ी में बैठकर चले गए। 1979 का यह किस्सा (Chaudhary Charan Singh Story) बताता है कि चौधरी चरण सिंह संसद भले ही न जा पाए हों, लेकिन जनता के बीच उनकी पकड़ कितनी मजबूत थी। उन्होंने उस दिन साबित कर दिया कि सत्ता दिल्ली के एसी कमरों से नहीं, बल्कि धूल भरे रास्तों और थानों की हकीकत जानकर चलाई जाती है। वह मुहर की आवाज आज भी उस थाने के इतिहास में गूंजती है।
स्वामी विवेकानन्द का जन्म कोलकाता के एक सम्पन्न परिवार में 1863 में हुआ। वे बहुत अधिक बुद्धिमान थे तथा सहजात आध्यात्मिक शक्तियों से युक्त थे। कोलकाता विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए उन्होंने पश्चिमी दर्शन और इतिहास का गहन अध्ययन कर उसमें प्रवीणता प्राप्त कर ली थी। वे लड़कपन से ही ध्यान योग किया करते थे और कुछ समय तक ब्रह्मो आन्दोलन से जुड़े रहे।
स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय (Swami Vivekananda Biography)
अपनी युवावस्था के आरम्भ में ईश्वर के अस्तित्व के बारे में मन में संदेहों के साथ उन्होंने आध्यात्मिक संकट का अनुभव किया। अपने अंग्रेजी के प्रोफैसरों में से एक से श्री रामकृष्ण के बारे में सुनकर वे उनसे मिले जो उस समय दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में रहते थे।
उन्होंने गुरु (मास्टर) से सीधे ही पूछा— ‘श्रीमन, क्या आपने ईश्वर के दर्शन किए हैं?’
विवेकानन्द ने यह प्रश्न अन्य अनेकों से किया था पर उन्हें कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। किन्तु श्री रामकृष्ण ने एक क्षण भी संकोच किए बिना उत्तर दिया— “हाँ, मैंने देखा है। मैंने ईश्वर को उसी प्रकार साफ-साफ देखा है जैसे कि मैं आपको देख रहा हूँ, केवल उसे और अधिक गहन अनुभूति के साथ।”
इस प्रकार आधुनिक काल का गुरु-शिष्य का महान सम्बन्ध शुरू हुआ। विवेकानन्द ने श्री रामकृष्ण के मार्ग दर्शन में तेजी से आध्यात्मिक प्रगति की।
Swami Vivekananda Biography: Swami image London 1896
कुछ समय बाद स्वामी विवेकानन्द को दो दुर्भाग्यों को सहन करना पड़ा। सन् 1884 में उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया। विवेकानन्द को अपनी माता, भाइयों व बहनों के पालन-पोषण का भार वहन करना पड़ा। दूसरी दुःखद घटना श्री रामकृष्ण की बीमारी और मृत्यु थी। विवेकानन्द ने इन आपदाओं का मजबूती से मुकाबला किया। उन्होंने रामकृष्ण के अन्य शिष्यों के मिलकर मठकरणीय प्रात संघ (ब्रदरहुड) की स्थापना की और अपने गुरु के उपदेशों को फैलाने का मिशन स्थापित किया। इस प्रकार 1890 के मध्य में विवेकानन्द भारत को देखने और खोजने की लम्बी यात्रा पर निकल पड़े।
वास्तविक भारत की खोज (Discovery of Real India)
अपनी भारत यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानन्द लोगों की भयानक गरीबी एवं पिछड़ेपन से अत्यन्त द्रवित हुए। वे भारत के पहले धार्मिक नेता थे जिन्होंने समझा और खुले तौर पर कहा कि भारत के पतन का वास्तविक कारण जनता (लोगों) की उपेक्षा करना था। अतः तत्काल आवश्यकता इस बात की थी कि कृषि के परिष्कृत ढंग का ज्ञान देकर ग्राम्य उद्योग का विकास कर तथा अन्य इसी प्रकार की गतिविधियों को बढ़ाकर भोजन व जीवन को न्यूनतम जरूरतों को पूरा किया जाए।
विवेकानन्द ने समस्याओं को दो स्तरों पर देखा:
सदियों की दासता (दलन) के कारण दलित लोगों ने आत्मविश्वास खो दिया था। इसे एक जीवनदायी और प्रेरक संदेश के माध्यम से पुनः स्थापित करना था। विवेकानन्द ने इसे ‘आत्मन्’ के सिद्धान में पाया जो भारत के धार्मिक दर्शन की प्राचीन प्रणाली वेदान्त में पढ़ाया जाने वाला आत्मा का संभावित दैवत्त्व का सिद्धान्त है।
लोगों को वेदान्त के जीवनदायी और परिष्कार करने वाले सिद्धान्तों की तथा व्यावहारिक जीवन में उन्हें लागू करने की शिक्षा देनी होगी।
इसके अतिरिक्त, उन्हें अपनी आर्थिक दशा सुधारने के लिए दुनिया की जानकारी भी आवश्यक होगी। विवेकानन्द का विचार था कि शिक्षा ही उन्हें दोनों प्रकार का ज्ञान देने का साधन है।
विवेकानन्द ने शिक्षा का प्रसार करने एवं गरीबों व स्त्रियों की दशा सुधारने की जरूरत को भी देखा। वे चाहते थे निर्धनतम और निम्नतम के दरवाजे तक सर्वोत्तम विचारों को लाया जाय। उन्होंने इसी लक्ष्य को सामने रखकर रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी।
स्वामी विवेकानन्द का देशवासियों को उद्बोधन (Awakening his Countrymen)
अपने प्रवास के दौरान विवेकानन्द को जानकारी मिली कि 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद (World’s Parliament of Religions) की बैठक होने वाली है। अपने मित्रों एवं प्रशंसकों के प्रोत्साहित करने पर उन्होंने अपने गुरु का संदेश को देने के लिए इस संसद में भाग लेने का निश्चय किया।
विश्व धर्म संसद में उनके भाषणों ने उन्हें ‘दैवी धार्मिक वक्ता’ (Orator by divine right) तथा पश्चिमी जगत को ‘भारतीय ज्ञान का दूत’ (Messenger of Indian wisdom to the Western World) के रूप में प्रसिद्ध कर दिया। संसद के बाद उन्होंने लगभग साढ़े तीन साल का समय अमरीका के पूर्वी भागों एवं लंदन में श्री रामकृष्ण द्वारा यापित (अनुभूत) तथा प्रचारित वेदान्त का प्रचार करने में व्यतीत किया।
Swami Vivekananda at Parliament of Religions
वे जनवरी 1897 में भारत लौट आए। उन्होंने भारत के विभिन्न भागों में अनेक भाषण दिए। भाषणों में उन्होंने निम्नलिखित प्रयास किए-
लोगों की धार्मिक चेतना जगाने तथा अपनी सांस्कृतिक परम्परा पर गर्व का भाव पैदा करना।
हिन्दुत्व के सामान्य आधारों को उभारकर हिन्दू जाति में एकता लाना।
शिक्षित लोगों का ध्यान दलितों के कष्टों की ओर केन्द्रित करना।
व्यावहारिक वेदान्त के सिद्धान्तों को लागू कर उनकी उन्नति के लिए अपनी योजना का प्रतिपादन करना।
कोलकाता लौट आने के तुरन्त बाद स्वामी विवेकानन्द ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना (1897) की। मिशन का उद्देश्य संन्यासियों व आम आदमियों को व्यावहारिक वेदान्त का संयुक्त रूप से प्रचार करने, अनेक प्रकार की समाज सेवाएँ करने जैसे अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, होस्टल, ग्रामीण विकास केन्द्र आदि को चलाने योग्य बनाना तथा एकल प्राकृतिक आपदाओं के शिकारों को राहत तथा पुनर्वास देना था। सन् 1898 के आरम्भ में स्वामी विवेकानन्द ने बेलूर में गंगा के तट पर रामकृष्ण मठ की स्थापना की।
स्वामी विवेकानन्द के आध्यात्मिक विचार (His Spiritual Thoughts)
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार धर्म का नया अर्थ
स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को लोकातीत वास्तविकता (सत्ता) (Reality) और सभी के लिए समान बताया है। उन्होंने विज्ञान व धर्म के बीच किसी द्विभाजकता से इंकार किया तथा धर्म को चेतना का विज्ञान बताया है। यह सार्वभौमिक अवधारणा अंध विश्वासों, मतान्धतावाद, पुजारी कौशल (चालाकी) एवं असहनशीलता के चंगुल से धर्म को मुक्त करती है तथा इसे स्वतन्त्रता, ज्ञान व आनन्द का सर्वोच्च व श्रेष्ठतम लक्ष्य बना देती है।
स्वामी विवेकानन्द कामानव के प्रति दृष्टिकोण
विवेकानन्द की ‘आत्मा का संभावित दैवत्व’ की अवधारणा नई है तथा मानव को उदात्त बनाती है। मानवतावाद के वर्तमान समय में वैज्ञानिक प्रगति ने मानवीय भौतिक कल्याण में बहुत सुधार ला दिया है। सम्प्रेषण क्रांति ने विश्व को ‘वैश्विक गाँव’ बना दिया है। लेकिन नैतिकता में गिरावट आई है जैसाकि घरों के टूटने, अनैतिकता हिंसा और अपराधों के बढ़ने से सिद्ध होता है। विवेकानन्द की आत्मा के संभावित दैवत्व की अवधारणा गिरावट को रोकती है, मानव सम्बन्धों में देवत्व भावना लाती है और जीवन को सार्थक और जीने लायक बनाती है। उन्होंने ‘आध्यात्मिक मानवतावाद’ की नींव डाली है।
विवेकानन्द का नैतिक और आचार शास्त्रीय नियम सिद्धान्त
व्यक्तिगत जीवन तथा सामाजिक जीवन, दोनों में वर्तमान नैतिकता अधिकतर भय पर टिकी है—पुलिस का डर, जनता के द्वारा अपमान का डर, भगवान द्वारा सजा दिए जाने का डर तथा कर्मों का डर। नीति शास्त्र के वर्तमान सिद्धान्त यह बताते हैं कि व्यक्ति को नैतिक क्यों होना चाहिए और क्यों उसे दूसरों के लिए अच्छा होना चाहिए।
विवेकानन्द ने नैतिक-शास्त्र के नए सिद्धान्त दिए हैं और आचार-शास्त्र के नए सिद्धान्त भी निर्धारित किए हैं जो ‘आत्मन’ की अन्तर्भूत शुचिता व एकात्मता (अखण्डता) पर आधारित हैं।
हमें शुचिता वाला होना चाहिए क्योंकि शुचिता हमारी वास्तविक प्रकृति है, हमारा सच्चा दैविक आत्मा या आत्मन् है।
इसी प्रकार, हमें अपने पड़ोसियों से प्यार करना और उनकी सेवा करनी चाहिए क्योंकि हम सभी सर्वोच्च आत्मा-परमात्मा या ब्रह्म में एक ही हैं।
विवेकानंद जी ने पूर्व तथा पश्चिम के बीच सेतु स्थापित किया
स्वामी विवेकानन्द ने भारतीय और पश्चिमी संस्कृति के बीच सेतु स्थापित किया। ऐसा उन्होंने पश्चिमीवासियों के लिए हिन्दू धर्म ग्रन्थों, दर्शन, संस्थाओं (सम्प्रदाय मत आदि) तथा भारतीय जीवन शैली के बारे में सरल बोधगम्य भाषा में जानकारी दी। उन्होंने उन्हें अहसास करा दिया कि वे भारतीय आध्यात्मिकता से बहुत लाभान्वित हो सकते हैं। भारत के शेष विश्व से अलग-थलग रहने को समाप्त करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। वे पश्चिम के लिए भारत के प्रथम महान सांस्कृतिक राजदूत थे।
दूसरी ओर प्राचीन भारतीय धर्म ग्रन्थों, दर्शन तथा संस्थाओं को विवेकानन्द द्वारा की गई व्याख्या ने भारतीयों को पश्चिमी विज्ञान, प्रौद्योगिकी और मानवतावाद के प्रति ग्रहणशील बनाया। उन्होंने भारतीयों को सिखाया कि किस प्रकार वे अपनी धार्मिक व आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े रहते हुए पश्चिम के विज्ञान और प्रौद्योगिकों में महारत हासिल कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीयों को पश्चिमी मानवतावाद (विशेष रूप से व्यक्ति की स्वतन्त्रता, सामाजिक समानता तथा स्त्रियों के लिए न्याय व सम्मान) को भारतीय लोकाचार में जोड़ लेना चाहिए।
स्वामी विवेकानन्द का भारत को योगदान
अपनी अनेक भाषिक, विचार-शास्त्रीय, ऐतिहासिक एवं धार्मिक विविधताओं के बावजूद भारत में अनन्त काल से सांस्कृतिक एकता की गहरी भावना रही है। तथापि, ये विवेकानन्द ही थे जिन्होंने इस संस्कृति के वास्तविक आधारों को उजागर किया एवं इस प्रकार एक राष्ट्र की एकता के बोध को स्पष्ट किया और मजबूत किया।
उन्होंने भारतीयों को उनकी महान राष्ट्रीय परम्परा की याद दिलाई तथा अपने शानदार विगत पर उनके गौरव को पुनर्जीवित किया। और भी, उन्होंने पश्चिमी संस्कृति की कमजोरियाँ भी बताई और बताया कि किस प्रकार उन्हें दूर करने में भारत उनको मदद कर सकता है। एकता की भावना (बोध), विगत पर गर्व और मिशन की भावना ने जिनकी उदघोषणा विवेकानन्द ने की, भारत के राष्ट्रीयता के आन्दोलन को अत्यधिक सुदृढ़ किया।
जवाहर लाल नेहरू ने लिखा है:
“विगत में जिसकी जड़ें थीं, भारत की प्रतिष्ठा पर जिसको पूरा गर्व था, ऐसा विवेकानन्द जीवन की समस्याओं के प्रति अपनी सोच में आधुनिक था तथा भारत के विगत एवं वर्तमान के बीच एक प्रकार का सेतु था। वह अवनत (दलित) तथा हतोत्साहित हिन्दू सोच के लिए एक टॉनिक के समान आया और इसे आत्म-निर्भरता दी और विगत का कुछ आधार दिया।”
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने लिखा है:
“स्वामी जी ने पूर्व तथा पश्चिम, धर्म तथा विज्ञान, विगत व वर्तमान को सुसंगत किया। इसीलिए वे महान हैं। उनकी शिक्षाओं से हमारे देशवासियों ने अभूतपूर्व आत्म-सम्मान आत्म निर्भरता और आत्माभिमान की भावना प्राप्त की है।”
नए भारत के निर्माण में स्वामी जी का सर्वाधिक अप्रतिम योगदान दलितों के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति भारतीयों की अपनी सोच जगाने का है। कार्ल मार्क्स के विचारों के भारत में आने से काफी पहले ही स्वामी जी ने राष्ट्रीय सम्पत्ति के उत्पादन में श्रमिक वर्ग की भूमिका के बारे में कहा था।
Swami Vivekananda Biography: Swamiji in Chennai with his followers
स्वामी विवेकानन्द के हिन्दूवाद में योगदान (Contributions to Hinduism)
हिन्दूवाद को एक स्पष्ट पहचान
स्वामी विवेकानन्द ने हिन्दूवाद को एक सम्पूर्ण स्पष्ट पहचान दी, एक विशिष्ट रूप-रेखा दी। यद्यपि हिन्दुओं को अपने मूल (जहाँ) और पहचान का स्पष्ट बोध था, किन्तु हिन्दूवाद अनेक विभिन्न मतों का असंगठित संघठन माना जाता था। हिन्दूवाद को इसको विशिष्ट पहचान देने में स्वामी जी की भूमिका के बारे में सिस्टर निवेदिता लिखती है— “यह कहा जा सकता है कि जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो यह ‘हिन्दुओं के धार्मिक विचार’ थे, किन्तु जब उन्होंने समाप्त किया तो ‘हिन्दुवाद की स्थापना हो गई।'”
हिन्दूवाद का समग्र एकीकरण
स्वामी जी के उदय से पहले हिन्दुओं के विभिन्न मतों के बीच झगड़े (विवाद) और प्रतिस्पर्द्धा आम बात थी। इसी प्रकार दर्शन की विभिन्न प्रणालियों और वादों के नेता (समर्थक) केवल अपने विचारों को ही सत्यता व वैधता का दावा करते थे। श्री रामकृष्ण की सहिष्णुता (समन्वय) के सिद्धान्त को प्रयोग कर स्वामी जी, विभिन्नता में एकता के सिद्धान्त के आधार पर हिन्दूवाद का समग्र एकीकरण कर सके।
हिन्दूवाद की रक्षा के प्रयास
विवेकानन्द उन लोगों में अग्रणी थे जिन्होंने हिन्दूवाद के पक्ष में अपनी आवाज उठाई। वास्तव में यह उनकी पश्चिम में मुख्य उपलब्धि थी। ईसाइयत मिशनरी प्रचार से हिन्दूवाद व भारतीयों की एक झूठी छवि पश्चिमी लोगों में फैला दी गई थी। विवेकानन्द को हिन्दूवाद की रक्षा के अपने प्रयासों में कठोर विरोध का सामना करना पड़ा।
एकेश्वरवाद का नया आदर्श (New Ideal of Monasticism)
हिन्दूवाद में विवेकानन्द का बड़ा योगदान एकेश्वरवाद का नवीकरण एवं आधुनिकीकरण है। इस नए एकेश्वर आदर्श में रामकृष्ण की व्यवस्था के अनुसार मानते हुए, आत्म-त्याग तथा ईश-प्राप्ति के प्राचीन सिद्धान्तों को मानव में ईश्वर की सेवा (शिव ज्ञान जीव सेवा) के साथ मिला दिया गया है। विवेकानन्द मानव की सेवा को ईश्वर की सेवा के बराबर मानते थे।
हिन्दू दर्शन की आधुनिक व्यवस्था
विवेकानन्द ने प्राचीन हिन्दू धर्म ग्रंथों और दार्शनिक विचारों की व्याख्या आधुनिक सोच के साथ की। उन्होंने अपने लोकातील अनुभवों एवं भविष्य दृष्टि के आधार पर अनेक प्रबोधक मूल (नवीन) अवधारणाएँ भी जोड़ी।
विवेकानंद महानतम हिन्दू संतों में से एक हैं। उन्होंने हिंदुवादी वैदान्तिक आदर्शों को पश्चिमी व मानवतावादी विचारों में मिलाया। उन्होंने हिन्दुओं द्वारा विभिन्न मत-मतान्तरों एवं सिद्धान्तों को मानने के विरूद्ध भी कार्य किया। उन्होंने भारतीयों को उनके गरिमामयी अतीत से अवगत कराया। उन्होंने पश्चिम में वेदान्त दर्शन को लोकप्रिय बनाया। इन सबके अतिरिक्त, उन्होंने लोगों का आहवान किया कि वे निर्धनता व अज्ञान में डूबे जनसमूहों की सहायता करें।
स्वामी विवेकानन्द की कुछ प्रसिद्ध उक्तियाँ (Famous Quotes)
जब तक करोड़ों लोग भूखे और अज्ञानी रहेंगे, मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को विश्वासघाती (देशद्रोही) मानूँगा जो उनकी कीमत पर शिक्षित हुआ है; और उनको और बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता।
आप अपने को जैसा सोचेंगे, आप वैसे ही बन जाएँगे। यदि आप स्वयं को कमजोर मानते हैं तो आप कमजोर ही होंगे; यदि आप स्वयं को मजबूत सोचते हैं तो आप मजबूत हो जाएँगे।
यदि आपको अपने सभी तैतीस करोड़ पौराणिक देवी-देवताओं में आस्था है; और तब भी अपने पर विश्वास (भरोसा) नहीं है तो आपकी मुक्ति नहीं है। अपने आप में विश्वास रखिए, उस विश्वास के सहारे खड़े होइए और मजबूत बनिए; हमें इसी की जरूरत है।
शक्ति, शक्ति ही वह चीज है क्योंकि जो हम जीवन में बहुत अधिक चाहते हैं; जिसे पाप व दुःख कहा जाता है, उनका एक ही कारण है, और वह है हमारी निर्बलता। निर्बलता के साथ अज्ञान आता है और अज्ञान के साथ आता दुर्भाग्य।
जितनी ही मेरी आयु बढ़ती है, उतना ही अधिक मुझे हर चीज पुरुषत्व में स्थित प्रतीत होती है। यह मेरा नया सिद्धान्त है।
सफलता के लिए तीन अनिवार्य तत्त्व हैं शुचिता, धैर्य और अध्यावसाय और सर्वोपरि प्रेम।
धर्म प्राप्ति है (अनुभूति है), वार्ता नहीं है, न सिद्धान्त है और न मत है; चाहे ये सब बातें कितनी ही आकर्षक (लुभावनी) क्यों न हों। यह होने और हो जाने में हैं, सुनना या मानना नहीं है; यह सम्पूर्ण आत्मा का बदलकर वह हो जाना है; जिसमें उसका विश्वास है।
स्वयं को जाग्रत कीजिए, प्रत्येक को उसकी वास्तविक प्रकृति का बोध कराइए सोई आत्मा को जगाइए और देखिए कि यह कैसे जागृत होती है। सुप्त आत्मा के आत्म बोध गतिविधि में लग जाने पर शक्ति आ जाएगी, ख्याति होगी, कल्याण (अच्छाई) होगा और हर वह चीज आएगी जो सर्वोत्तम है।
दुनिया के इतिहास में तख्तापलट बहुत हुए हैं, राजाओं की हत्याएं भी हुई हैं। लेकिन आज से करीब दो दशक पहले, 1 जून 2001 को नेपाल के राजमहल में जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया था। यह इतिहास की वो काली रात थी, जब काठमांडू के राजमहल में चल रही एक फैमिली डिनर पार्टी, चंद मिनटों में श्मशान में बदल गई। यह न तो किसी विदेशी दुश्मन का हमला था और न ही किसी बाहरी विद्रोह की साजिश। यह किस्सा एक देश का इतिहास बदलने का है। इस एक घटना ने नेपाल से 240 साल पुरानी राजशाही (Nepal Royal Massacre Story) को हमेशा के लिए खत्म करने की नींव रख दी थी।
नेपाल में राजा बीरेंद्र की लोकप्रियता कितनी थी?
नेपाल उस समय दुनिया का एकमात्र ‘हिंदू राष्ट्र’ था और वहां के राजा बीरेंद्र बीर बिक्रम शाह एक बेहद लोकप्रिय शासक थे। राजा बीरेंद्र को नेपाल के इतिहास में सबसे सभ्य और जन-हितैषी शासकों में से एक माना जाता है, जो अपने सादे जीवन और विकास-उन्मुख सोच के लिए जाने जाते थे। नेपाल के एकमात्र हिंदू राजा होने के नाते, उन्हें पारंपरिक रूप से भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था। यह उनके राज्याभिषेक के अनुष्ठानों में भी झलकता था, जहाँ उन्हें पृथ्वी और विष्णु के मंदिरों से प्राप्त मिट्टी से अभिषिक्त (तिलक) किया जाता था। उनका पूरा परिवार नेपाल की जनता में काफी लोकप्रिय था। उनके बड़े बेटे, क्राउन प्रिंस दीपेंद्र, गद्दी के वारिस थे और उन्हें भी लोग बहुत पसंद करते थे।
Nepal Royal Massacre Story in Hindi: King Birendra and Queen Aishwarya with Family
दीपेंद्र और देवयानी की ‘अधूरी प्रेम कहानी’ थी झगड़े की जड़
कुछ रिपोर्ट के मुताबिक के मुताबिक, प्रिंस दीपेंद्र देवयानी राणा से बेइंतिहा प्यार करते थे। देवयानी का ताल्लुक नेपाल के राणा वंश और भारत के ग्वालियर के सिंधिया राजघराने से था। देवयानी की माँ उषा राजे सिंधिया, ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया की बेटी थीं।यही रिश्ता झगड़े की जड़ था। दीपेंद्र की मां, महारानी ऐश्वर्या इस शादी के सख्त खिलाफ थीं। इसके दो कारण बताए जाते हैं:
शाही गोत्र और वंश का पेंच।
देवयानी की मां का भारतीय राजघराने से होना।
नफरत इतनी गहरी थी कि राजा और रानी ने राजकुमार दीपेंद्र को अल्टीमेटम दे दिया था— “या तो देवयानी को चुनो, या फिर गद्दी छोड़ दो।”
1 जून 2001 को नेपाल का शाही परिवार एक फैमिली डिनर पार्टी के लिए इकट्ठा हुआ। यह पार्टी आम तौर पर महीने में दो बार शुक्रवार को होती थी। डिनर में राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या, और उनके तीन बच्चे (क्राउन प्रिंस दीपेंद्र, राजकुमारी श्रुति, और प्रिंस निरजन) मौजूद थे। इसके अलावा डिनर टेबल पर राजा के सबसे छोटे भाई अपनी पत्नी और बच्चों के साथ, राजा की तीन बहनें और एक जीजा, राजकुमारी श्रुति के पति, और राजा के दो कज़िन भी मौजूद थे। राजा के अगले छोटे भाई, प्रिंस ज्ञानेंद्र, वहाँ नहीं थे, लेकिन उनकी पत्नी, तीन बेटियाँ, और दामाद भी मौजूद थे।
Nepal Royal Massacre story: Royat family tree of Nepal Royal Family
शुरुआती रिपोर्टों के मुताबिक, प्रिंस दीपेंद्र नशे में डिनर में आए थे। चश्मदीदों के अनुसार, वह लड़खड़ा रहे थे, इसलिए उनके छोटे भाई प्रिंस निरजन और चचेरे भाई पारस ने उन्हें उनके कमरे तक छोड़ दिया। अधिकारियों को बाद में पता चला कि कमरे में जाकर दीपेंद्र ने अपनी गर्लफ्रेंड देवयानी राणा को तीन बार फोन किया। उनकी बोली लड़खड़ा रही थी, लेकिन तीसरी बातचीत में उसने कहा कि वह सोने जा रहा है।
लेकिन वह सोया नहीं। प्रिंस दीपेंद्र आर्मी की वर्दी पहनकर और तीन बंदूकें लेकर अपने बेडरूम से बाहर निकला, जिनमें से एक M16 असॉल्ट राइफल थी। महल के एक असिस्टेंट ने उसे सीढ़ियों पर देखा भी, लेकिन उसने रोका नहीं क्योंकि दीपेंद्र को बंदूकों का शौक था। डिनर पार्टी नारायणहिती पैलेस के बिलियर्ड रूम में चल रही थी। चूंकि यह एक प्राइवेट इवेंट था, इसलिए वहां कोई गार्ड मौजूद नहीं था।
वो रात जब प्रिंस दीपेंद्र ने खत्म कर दिया अपना ही वंश!
कमरे में घुसते ही दीपेंद्र ने सबसे पहले अपने पिता, राजा बीरेंद्र पर गोली चलाई। गोलियों की आवाज़ सुनकर भगदड़ मच गई। महल के साथियों ने कांच का दरवाज़ा तोड़कर दूसरों को बचाने की कोशिश की, लेकिन गोलीबारी नहीं रुकी। पिता और अन्य रिश्तेदारों को मारने के बाद, दीपेंद्र बगीचे में अपनी माँ को ढूंढने निकला। वहां एक दिल दहला देने वाला पल आया। कहा जाता है कि उसके छोटे भाई निरजन ने दीपेंद्र से गुज़ारिश की:
“ऐसा मत करो, प्लीज़। अगर तुम चाहो तो मुझे मार दो।”
दीपेंद्र पर खून सवार था। उसने अपने छोटे भाई को गोली मारी और फिर अपनी माँ, महारानी ऐश्वर्या की भी हत्या कर दी। जब उसने 9 लोगों को मार दिया, तब उसके चाचा ने आगे बढ़कर कहा, “तुमने बहुत नुकसान कर दिया है, अब बंदूक दे दो।” जवाब में दीपेंद्र ने उन्हें भी गोली मारकर घायल कर दिया। चंद मिनटों के अंदर, नेपाल का पूरा शाही वंश खून से लथपथ फर्श पर पड़ा था। अंत में, दीपेंद्र एक छोटे पुल पर गया और खुद को भी गोली मार ली।
इस घटना का सबसे अजीब और विडंबनापूर्ण पहलू इसके तुरंत बाद घटित हुआ। दीपेंद्र ने खुद को गोली मारी थी, लेकिन उनकी मौत तुरंत नहीं हुई। वे कोमा में चले गए। नेपाल के संविधान के मुताबिक, राजा की मौत के बाद क्राउन प्रिंस ही राजा बनता है। अस्पताल के बिस्तर पर कोमा में पड़े दीपेंद्र को नेपाल का नया राजा घोषित किया गया और प्रिंस ज्ञानेंद्र (जो उस वक्त वहां नहीं थे) को रीजेंट (कार्यवाहक) बनाया गया।
Nepal Royal Massacre Story: Narayanhiti Palace Kathmandu Crime Scene
शुरुआत में ज्ञानेंद्र ने बयान दिया कि मौतें “ऑटोमैटिक हथियार के गलती से चले जाने” की वजह से हुईं। बाद में उन्होंने सफाई दी कि यह बयान “कानूनी और संवैधानिक रुकावटों” की वजह से दिया गया था, क्योंकि अगर दीपेंद्र बच जाता तो राजा होने के नाते उस पर हत्या का आरोप नहीं लगाया जा सकता था। जांच में दीपेंद्र को ही दोषी पाया गया। लेकिन उनका राज सिर्फ 56 घंटे चला। 4 जून 2001 को दीपेंद्र की मौत हो गई और उनके चाचा ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह को नया राजा बनाया गया।
नेपाल शाही नरसंहार की कहानी एक युग का अंत था
इस हत्याकांड ने नेपाल की जनता को झकझोर दिया। लोग मानने को तैयार ही नहीं थे कि उनका चहेता प्रिंस अपने माता-पिता की हत्या कर सकता है। सड़कों पर दंगे भड़क उठे। चूंकि उस डिनर में ज्ञानेंद्र मौजूद नहीं थे और उनका बेटा पारस चमत्कारिक रूप से बच गया था, इसलिए जनता ने इसे ज्ञानेंद्र की साजिश माना। हालांकि, आधिकारिक जांच आयोग ने दीपेंद्र को ही दोषी ठहराया।
लेकिन इस एक घटना से नेपाल मे राजनीतिक अस्थिरता का जन्म हुआ। राजा बीरेंद्र एक उदार राजा थे, जिन्होंने लोकतंत्र को जगह दी थी। लेकिन उनकी मौत के बाद माओवादी आंदोलन तेज हो गया। राजा ज्ञानेंद्र स्थिति को संभाल नहीं पाए और जनता का भरोसा खो बैठे और अंततः 2008 में नेपाल से राजशाही खत्म हो गई और वह एक गणतंत्र बन गया।
नारायणहिती पैलेस आज एक म्यूजियम बन चुका है। जिन दीवारों पर गोलियों के निशान थे, उन्हें रिनोवेट कर दिया गया है, लेकिन नेपाल के इतिहास पर लगा वह घाव आज भी हरा है। 1 जून 2001 की उस रात ने साबित कर दिया कि सत्ता और प्रेम का टकराव जब हद से गुजर जाता है, तो वह न रिश्तों को पहचानता है और न ही राजमुकुट की गरिमा को। एक डिनर टेबल पर शुरू हुई वह बहस, एक पूरे युग के अंत का कारण बन गई।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो सिर्फ पन्नों पर नहीं बल्कि वक्त की सीमाओं को तोड़कर अमर हो जाती हैं। सरोजिनी नायडू (Sarojini Naidu Story) एक ऐसी ही शख्सियत थीं जो एक तरह अपनी कोमल कविताओं से दिलों को छू लेती थीं, तो दूसरी तरफ अपनी दहाड़ से ब्रिटिश हुकूमत को हिला देती थीं। सरोजिनी चट्टोपाध्याय नायडू भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक प्रमुख व्यक्ति थीं। महात्मा गांधी ने एक कवि के रूप में उनकी प्रतिभा को देखकर ही उन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ (भारत की कोकिला) का खिताब दिया था। इसके साथ ही उन्हें महिला मुक्ति, नागरिक अधिकार और उपनिवेशवाद विरोधी गतिविधियों के लिए भी याद किया जाता है ।
13 साल की उम्र में रचा इतिहास
सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक विद्वान थे और उन्होंने हैदराबाद के निज़ाम कॉलेज का प्रशासन संभाला था। उनकी माता बराड़ सुंदरी देवी चट्टोपाध्याय भी एक कवयित्री थीं। तो जाहिर था कि लिखने-पढ़ने का माहौल उन्हें विरासत में मिला था। वह आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी।
सरोजिनी नायडू बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं। उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई की। लेकिन उनकी असली प्रतिभा तब सामने आई जब महज 13 साल की उम्र में उन्होंने ‘झील की रानी’ नामक 1300 पंक्तियों की लंबी कविता और 2000 पंक्तियों का नाटक लिख डाला। उनकी अंग्रेजी भाषा पर पकड़ इतनी अच्छी थी कि उन्हें ‘शब्दों की जादूगरनी’ कहा जाने लगा। 1905 में उनका पहला कविता संग्रह ‘द गोल्डन थ्रेशहोल्ड’ प्रकाशित हुआ, जो आज भी साहित्य प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय है।
Sarojini Naidu Story: Young Sarojini Naidu Early Life
सरोजिनी नायडू का निजी जीवन
सरोजिनी नायडू न सिर्फ राजनीति में, बल्कि निजी जीवन में भी क्रांतिकारी थीं। जिस समय सरोजनी नायडू इंग्लैंड से लौटी उस समय वह डॉ. गोविन्दराजुलु नायडू के साथ विवाह करने के लिए उत्सुक थीं। यह वो दौर था जब अंतरजातीय विवाह की कल्पना करना भी मुश्किल था। डॉ. नायडू एक गैर-ब्राह्मण और फौजी डॉक्टर थे। शुरुआत में सरोजिनी नायडू के पिता इसके खिलाफ थे, लेकिन बेटी के दृढ़ निश्चय के आगे उन्हें झुकना पड़ा। 1898 में सरोजिनी इंग्लैंड से लौटीं और समाज की परवाह किए बिना डॉ. नायडू से विवाह किया। यह उस समय का एक बहुत बड़ा सामाजिक विद्रोह था। सरोजिनी नायडू ने हैदराबाद में अपना सुखमय वैवाहिक जीवन का आरम्भ किया। उन्होंने स्नेह और ममता के साथ अपने चार बच्चों की परवरिश की। उनके हैदराबाद के घर में हमेशा हंसी, प्यार और सुन्दरता का वातावरण छाया रहता था।
1905 में बंगाल के विभाजन के बाद, सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। महात्मा गांधी, गोपाल कृष्ण गोखले और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं के साथ उनकी मुलाकात ने उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ और सामाजिक सुधार की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। 1915 और 1918 के बीच उन्होंने समाज कल्याण, महिलाओं की मुक्ति आदि पर व्याख्यान देने के लिए देश भर की यात्रा की।
1917 में उन्होंने महिला भारतीय संघ के गठन में मदद की। उसी वर्ष संयुक्त चयन समिति के सामने भारत के लिए सार्वभौमिक मताधिकार प्रस्तुत करने के लिए होम रूल लीग की अध्यक्ष एनी बेसेंट के साथ लंदन जाकर महिलाओं के लिए वोट देने के अधिकार की मांग की।
सरोजिनी नायडू ने महात्मा गांधी के साथ नमक मार्च में भाग लिया और 1930 में सभी कांग्रेस नेताओं के साथ ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी ने कांग्रेस को लंदन में होने वाले पहले गोलमेज सम्मेलन से दूर रहने के लिए प्रेरित किया। 1931 में गांधी-इरविन समझौते के बाद सरोजिनी नायडू और अन्य नेता दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिए।
नायडू सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करने वाले महत्वपूर्ण व्यक्तियों में से एक थे । 1930 और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। उन्होंने कुल मिलाकर 21 महीने से ज्यादा समय जेल की सलाखों के पीछे बिताया।
Sarojini Naidu Story: Image of Sarojani Naidu with Mahatma Gandhi
सरोजिनी नायडू को मिले पुरस्कार एवं उपलब्धियां
साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में सरोजिनी नायडू का योगदान अमूल्य रहा है, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनके परिवार का निवास कई सुधारवादी विचारों का केंद्र था। उनके हैदराबाद निवास में विवाह, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रवाद के बारे में विचारों पर विस्तार से चर्चा की गई। यह उल्लेखनीय था कि इस तरह के विचारों ने महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए उस समय आह्वान किया जब भारत में राजनीति में पुरुषों का वर्चस्व था। इसमें महिलाओं को शिक्षा में पूरी तरह से शामिल करने के विचार भी शामिल थे।
सरोजिनी नायडू जी ने स्वतंत्रता संग्राम सैनानी के रूप में महिलाओं एवं बच्चों के लिए बेहद अहम् कार्य किये थे। यही वजह है कि उनका नाम उस दौरान काफी चर्चित रहा था। सरोजिनी नायडू एक महिला होते हुए भी एक राज्य की राज्यपाल बनी थी। इसलिए उनके जन्मदिवस के दिन को महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन आज भी लोग महिलाओं को समर्पित कर मनाते हैं।
वह बहुभाषाविद थीं, वह क्षेत्रानुसार अपना भाषण अंग्रेज़ी, हिन्दी, बंगला या गुजराती भाषा में देती थीं। जिसके लिए उन्हें कई सम्मानों से नवाजा गया। सन् 1928 में उन्हें प्रतिष्ठित ‘हिन्द केसरी’ पदक से सम्मानित किया गया था। उनकी कलम का जादू ‘द गोल्डन थ्रेशहोल्ड‘, ‘द बर्ड ऑफ टाइम‘ और ‘द ब्रोकन विंग्स‘ जैसी कालजयी रचनाओं में देखने को मिलता है। उनकी देशभक्ति का ज्वलंत उदाहरण उनकी कविता ‘भारत का उपहार’ है, जो 1915 के राजनीतिक माहौल और भारतीय सैनिकों के बलिदान का मर्मस्पर्शी वर्णन करती है।
सरोजिनी जी की दृष्टि इतनी व्यापक थी कि उन्होंने मुहम्मद अली जिन्ना की जीवनी को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत’ का शीर्षक दिया था। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी विरासत जीवित रही; 1961 में उनकी बेटी पद्मजा नायडू ने उनकी 1927 में लिखी गई अनछुई कविताओं का संग्रह ‘फेदर ऑफ डॉन’ प्रकाशित करवाया, जो आज भी साहित्य जगत में एक धरोहर है।”
Sarojini Naidu Story: Nightingale of India Portrait
सरोजिनी नायडूको‘भारत की कोकिला’ क्यों कहा जाता था?
सरोजिनी नायडू जी को भारत की कोकिला नाम भारत के लोगों ने ही दिया था और यह नाम उन्हें उनकी सुरीली आवाज में अपनी कविताओं का पाठ पढ़ने के लिए दिया गया था। उनकी कविताओं में एक अलग तरह का भाव होता था जोकि लोगों को काफी प्रभावित करता था। और लोग इसे बेहद पसंद करते थे। महात्मा गांधी ने उन्हें ‘नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ की उपाधि दी।
भारत की पहली महिला राज्यपाल और निधन
1947 में जब देश आजाद हुआ, तो सरोजिनी नायडू की काबिलियत को देखते हुए उन्हें देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश (First Woman Governor) का राज्यपाल बनाया गया। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब कोई महिला इस पद पर बैठी थी। 2 मार्च 1949 को ऑफिस में काम करते हुए उन्हें हार्टअटैक आया और वे चल बसी। सरोजनी जी भारत देश की सभी औरतों के लिए आदर्श का प्रतीक है, वे एक सशक्त महिला थी, जिनसे हमें प्रेरणा मिलती है।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में, सरोजिनी नायडू ने के साथ-साथ महिलाओं को महिलाओं के बारे में पुरातन धारणाओं से ऊपर उठाने की भी मांग की, जिन्होंने परंपरागत रूप से भारतीय समाज को अपने विकास में पीछे रखा था। उसके आदर्श अंततः आकार लेंगे और आने वाले वर्षों में समकालीन भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डालेंगे।
भारत के इतिहास में जब भी ‘महाठग’ का जिक्र होता है, तो सबसे पहले नटवरलाल का नाम याद आता है। जिसने फर्जी हस्ताक्षर करके कभी ताजमहल बेच दिया, तो कभी लाल किला और राष्ट्रपति भवन तक का सौदा कर डाला। लेकिन 1971, एक शख्स ने देश की सबसे ताकतवर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ऐसी आवाज निकाली जिसने न सिर्फ सिर्फ एक ‘फोन कॉल’ के दम पर सरकारी खजाने को खुलवा दिया बल्कि स्टेट बैंक के मैनेजर ने बिना किसी चेक या रसीद के 60 लाख रुपये उसके हवाले कर दिए, उस दौर में 60 लाख की कीमत आज के करोड़ों रुपये के बराबर थी। यह कहानी है नागरवाला कांड (Nagarwala Scandal 1971) की, जिसने 1970 के दशक में प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से लेकर पूरे देश की संसद तक को हिलाकर रख दिया था।
यह किस्सा है 1971 का जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर था और भारत सरकार गुप्त रूप से वहां के विद्रोहियों की मदद कर रही थी। भारत सरकार गुप्त रूप से ‘मुक्ति वाहिनी‘ की मदद कर रही थी।
जब बैंक मैनेजर के पास आया ‘PMO’ से फोन
सरकारी गलियारों और बड़े अधिकारियों के बीच यह बात आम थी कि ‘देशहित’ और ‘गुप्त मिशन’ के नाम पर अक्सर बिना कागजी कार्रवाई के पैसों का लेन-देन होता है। खुफिया एजेंसी R&AW (रॉ) सक्रिय थी और अपने सीक्रेट ऑपरेशन्स मे जुटे थे। बैंक के अधिकारियों को भी शायद आदत रही होगी कि ‘ऊपर’ से फोन आने पर सवाल नहीं किए जाते। इसी नाजुक माहौल का फायदा एक शातिर ठग ने उठाया।
24 मई की दोपहर, बैंक में कामकाज सामान्य था तभी SBI के चीफ कैशियर वेद प्रकाश मल्होत्रा के टेबल पर फोन की घंटी बजी। फोन उठाने पर दूसरी तरफ से एक शख्स ने भारी आवाज में कहा— “मैं पीएमओ से प्रधान सचिव पीएन हक्सरबोल रहा हूं।” फोन करने वाले ने कहा, “प्रधानमंत्री को बांग्लादेश में एक गुप्त अभियान के लिए 60 लाख रुपये चाहिए। उन्होंने मल्होत्रा को निर्देश दिए कि वो बैंक से 60 लाख रुपये निकालें और संसद मार्ग पर ही बाइबल भवन के पास खड़े एक शख़्स को पकड़ा दे। मल्होत्रा ये सब सुन कर थोड़े परेशान से हो गए”
मल्होत्रा कुछ समझ पाते, इससे पहले ही उस शख्स ने कहा, “लीजिए, प्रधानमंत्री जी से बात कीजिए। अगले ही पल दूसरे तरफ फोन कॉल पर एक महिला की आवाज आई। आवाज, लहज़ा और वो रौब बिल्कुल इंदिरा गांधी जैसा था। मल्होत्रा को यकीन हो गया कि ‘माताजी’ (इंदिरा गांधी) खुद लाइन पर हैं।
आवाज ने निर्देश दिया:
“मल्होत्रा जी, यह काम बेहद गुप्त है। आप तुरंत 60 लाख रुपये निकालिए और बैंक की गाड़ी से संसद मार्ग पर स्थित ‘बाइबिल भवन’ पहुंचिए। वहां आपको एक आदमी मिलेगा। वो कोड वर्ड बोलेगा— ‘बांग्लादेश का बाबू’। जवाब में आपको कहना है— ‘बार एट लॉ’ (Bar at Law)। पैसे उसे सौंप दीजिए।”
Nagarwala Scandal 1971 in Hindi: SBI Parliament Street Branch 1971 Sketch
बैंक के अंदर की हलचल प्रधानमंत्री का सीधा आदेश मानकर मल्होत्रा ने तुरंत डिप्टी चीफ कैशियर राम प्रकाश बत्रा और एच.आर. खन्ना को बक्से में 60 लाख रुपये भरने को कहा। यह इतनी बड़ी रकम थी, फिर भी डर और दबाव के कारण डिप्टी हेड कैशियर रुहेल सिंह ने रजिस्टर में एंट्री कर दी और मल्होत्रा ने वाउचर पर साइन कर दिए।
‘बांग्लादेश का बाबू’: कोड वर्ड के जरिए हुई पैसों की डिलीवरी
दो चपरासियों ने भारी बक्सा बैंक की गाड़ी में रखवाया और मल्होत्रा खुद गाड़ी चलाकर बाइबिल भवन की ओर निकल पड़े। बाइबिल भवन के पास मल्होत्रा को एक लंबा-चौड़ा, गोरा रुस्तम सोहराब नागरवाला नाम का शख्स खड़ा मिला। उसने पास आते ही वही कोड वर्ड बोला जो फोन कॉल पर बताया गया था “बांग्लादेश का बाबू।” मल्होत्रा ने जवाब दिया— “बार एट लॉ।” कोड मैच होते ही मल्होत्रा का शक खत्म हो गया।
नागरवाला बैंक की गाड़ी में बैठ गया और उन्होंने गाड़ी टैक्सी स्टैंड लेकर चलने को कहा। वहां नागरवाला ने पैसों का बक्से अपनी टैक्सी में रखवाया और मल्होत्रा से कहा: “अब आप सीधे प्रधानमंत्री आवास जाइए और वहां से इस रकम का वाउचर ले लीजिए। नागरवाला वहां से रफूचक्कर हो गया और मल्होत्रा रसीद लेने पीएम हाउस की तरफ मुड़ गए।
Nagarwala Scandal 1971: Indira Gandhi with P.N. Haxer
जब पी.एन. हक्सर ने कहा- ‘मैंने कोई फोन नहीं किया‘
मल्होत्रा जब प्रधानमंत्री आवास पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि इंदिरा गांधी संसद में हैं। वे वहां नहीं मिले, लेकिन उनकी मुलाकात प्रधान सचिव पी.एन. हक्सर से हो गई। मल्होत्रा ने जब हक्सर को बताया कि “माताजी के कहने पर मैंने 60 लाख रुपये दे दिए हैं, मुझे वाउचर चाहिए,” तो पी.एन. हक्सर सन्न रह गए। उन्होंने साफ किया कि ऐसा कोई फोन नहीं किया। न ही प्रधानमंत्री ने पैसे मंगवाए हैं।
मल्होत्रा के होश उड़ गए। उन्होंने तुरंत संसद मार्ग थाने में एफआईआर दर्ज कराई। मामला सीधे प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ा था, इसलिए दिल्ली पुलिस के हाथ-पांव फूल गए। तुरंत शहर भर में नाकेबंदी कर दी गई। यह शायद भारत के इतिहास की सबसे तेज जांच थी। पुलिस ने उसी दिन शाम तक रुस्तम सोहराब नागरवाला को एक पारसी धर्मशाला से गिरफ्तार कर लिया। हैरत की बात यह थी कि उसने भागने की ज्यादा कोशिश भी नहीं की थी और पुलिस ने लगभग पूरे पैसे (59 लाख 95 हजार रुपये) बरामद कर लिए। और नागरवाला ने भी कबूल कर लिया कि उसने ही अपनी आवाज बदलकर इंदिरा गांधी और प्रधान सचिव की नकल की थी।
Nagarwala Scandal 1971 में गिरफ्तारी के बाद क्या हुआ
गिरफ्तारी के महज तीन दिनों के भीतर, नागरवाला को दोषी करार देकर 4 साल की सजा सुना दी गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। सजा काटने के दौरान नागरवाला ने इंटरव्यू देने की इच्छा जताई थी, लेकिन 2 मार्च 1972 को, अपने 51वें जन्मदिन के दिन, जेल के अस्पताल में संदिग्ध परिस्थितियों में दिल का दौरा पड़ने से नागरवाला की मौत हो गई। वही इस मामले की जांच करने वाले और पैसे बरामद करने वाले तेज-तर्रार पुलिस अधिकारी डी.के. कश्यप की भी कुछ समय बाद एक रहस्यमयी सड़क हादसे में मौत हो गई। इन दो मौतों ने इस कांड को हमेशा के लिए साजिशों के घेरे में ला खड़ा किया।
Nagarwala Scandal 1971: Arrest of Rustam Sohrab Nagarwala
नागरवाला कांड (Nagarwala Scandal 1971) भारतीय राजनीति और अपराध जगत का एक ऐसा अध्याय है जिसके पन्ने आज भी धुंधले हैं। नागरवाला कांड आज भी एक पहेली है। 1977 में जनता पार्टी सरकार ने ‘जगनमोहन रेड्डी आयोग’ बनाकर जांच करवाई, लेकिन कोई नया सच सामने नहीं आ सके। सच्चाई चाहे जो हो, लेकिन एक बात तय है उस दिन संसद मार्ग पर जो हुआ, उसने यह साबित कर दिया कि भारत में ‘सत्ता की हनक’ और ‘आवाज का जादू’ बैंक के लॉकर भी खुलवा सकता है। रुस्तम नागरवाला अपनी मौत के साथ इस राज को भी अपने साथ ले गया।