शीत युद्ध अमेरिका और सोवियत संघ (Cold War America vs USSR): 4 अक्टूबर 1957 की रात, दुनिया भर के रेडियो स्टेशनों पर एक अजीब और लगातार “बीप-बीप-बीप” की आवाज़ सुनाई देने लगती है, यह आवाज़ आ रही थी स्पुतनिक-1 से, दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह, जिसे सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में भेजा है। इस एक परीक्षण से अमेरिका में अफरा तफरी मच जाती है और यही वह पल था जब विचारधाराओं की लड़ाई अचानक एक ठंडी, तकनीकी और खौफनाक ‘हथियारों की दौड़’ में बदल गई।
लेकिन यहाँ इतिहास की सबसे बड़ी पहेली सामने आती है: जो अमेरिका और सोवियत संघ कुछ ही साल पहले हिटलर के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे… वे अचानक एक-दूसरे के सबसे बड़े दुश्मन कैसे बन गए? और यह दुश्मनी लगभग पूरी दुनिया को दो हिस्सों में क्यों बांट बैठी?
और जब दोनों के पास इतने परमाणु बम जमा हो गए कि वे पूरी धरती को कई बार तबाह कर सकते थे… तो फिर दोनों ने कभी सीधे एक-दूसरे पर गोलियां क्यों नहीं चलाईं? तो फिर 45 साल तक चला यह “शीत युद्ध” (Cold War) आखिर लड़ा कैसे गया?

आयरन कर्टेन (लौह पर्दा) और यूरोप का बंटवारा
द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होते-होते दोनों देश के रिश्ते में दरारें दिखने लगी थीं। याल्टा और पॉट्सडैम सम्मेलनों में, जहां स्टालिन, अमेरिकी राष्ट्रपति और ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने युद्धोत्तर यूरोप का भविष्य तय करने की कोशिश की, उसमे अविश्वास साफ़ झलकने लगा था। स्टालिन को डर था कि पश्चिम कभी भी रूस पर दोबारा हमला कर सकता है। इसलिए, उसने अपनी सुरक्षा के लिए पूर्वी यूरोप के देशों पोलैंड, हंगरी, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी जर्मनी पर ज़बरदस्ती अपनी कठपुतली कम्युनिस्ट सरकारें बिठा दीं।
1946 में ब्रिटिश नेता विंस्टन चर्चिल ने एक मशहूर भाषण में इसे नाम दिया गया, “आयरन कर्टन” जो यूरोप को कम्युनिस्ट पूर्व और लोकतांत्रिक पश्चिम में बांट रहा था। अमेरिका ने जवाब में “ट्रूमैन डॉक्ट्रिन” और “मार्शल प्लान” के ज़रिए पश्चिमी यूरोप को आर्थिक और सैन्य मदद देकर कम्युनिज़्म को रोकने की नीति अपनाई।
लेकिन 1949 में दो ऐसी घटनाएं हुईं, जिसने वाशिंगटन की नींद उड़ा दी। सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु बम टेस्ट कर लिया। अमेरिका की उम्मीद से बहुत पहले, यह कैसे हुआ किसी को पता नहीं लेकिन कुछ रिपोर्ट बताते है कि सोवियत के जासूस ने अमेरिकी ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ से परमाणु ब्लूप्रिंट चुराये थे। और उसी साल, चीन में माओ त्से-तुंग की कम्युनिस्ट क्रांति सफल हो गई। अमेरिका में ‘डोमिनो थ्योरी’ का डर फैल गया कि एक के बाद एक सारे देश कम्युनिस्ट हो जाएंगे।
MAD थ्योरी: परमाणु महाविनाश का खौफ
यही से शुरू हुई इतिहास की सबसे पागलपन भरी दौड़। दोनों महाशक्तियों ने अपनी-अपनी गुटबाजी शुरू कर दी, पश्चिम ने बनाया NATO (नाटो), और सोवियत संघ ने जवाब में बनाया वारसॉ पैक्ट (Warsaw Pact)।
परमाणु बम से हाइड्रोजन बम, और फिर ऐसी बैलिस्टिक मिसाइलें जो सिर्फ 30 मिनट में दुनिया के दूसरे छोर तक पहुँच सकती थीं। दोनों तरफ इतने हथियार जमा हो गए कि एक नया, डरावना सिद्धांत पैदा हुआ: MAD (Mutually Assured Destruction) यानी पारस्परिक निश्चित विनाश। यानी अगर एक ने हमला किया, तो दोनों तबाह हो जाएंगे, यही वह खौफ था, जिसने अमेरिका और सोवियत संघ को कभी सीधे युद्ध के मैदान में उतरने नहीं दिया!
क्या था क्यूबा मिसाइल संकट?
लेकिन अक्टूबर 1962 में, यह खौफनाक सिद्धांत लगभग फेल हो गया। दुनिया परमाणु युद्ध के सबसे करीब पहुँच गई। इतिहास में इसे “क्यूबा मिसाइल संकट” (Cuban Missile Crisis) कहा जाता है।

अमेरिकी जासूसी विमानों ने पाया कि सोवियत संघ ने क्यूबा में जो अमेरिका से सिर्फ़ 90 मील दूर थी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी हैं। तेरह दिनों तक दुनिया परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी रही, अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी और सोवियत नेता ख्रुश्चेव के बीच तनावपूर्ण गुप्त बातचीत चलती रही, जबकि दोनों देशों की सेनाएं पूरी तरह सतर्क थीं।
आखिरी पल में, एक गुप्त समझौता हुआ। सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने का वादा किया। बदले में कैनेडी ने वादा किया कि अमेरिका कभी क्यूबा पर हमला नहीं करेगा, और चुपचाप तुर्की से अपनी मिसाइलें भी हटा लेगा।
यह पल इतना खौफनाक था कि इसके बाद दोनों देशों के बीच सीधी “हॉटलाइन” बनाई गई, ताकि भविष्य में ऐसी ग़लतफ़हमी से बचा जा सके।
प्रॉक्सी युद्ध का जाल
पर यह युद्ध सिर्फ़ हथियारों तक सीमित नहीं था, यह “प्रॉक्सी युद्धों” के ज़रिए भी लड़ा गया, जहां दोनों महाशक्तियां सीधे नहीं, बल्कि दूसरे देशों में समर्थित गुटों के ज़रिए भिड़ती थीं, कोरियाई युद्ध, वियतनाम की बर्बादी, लैटिन अमेरिका के तख्तापलट… हर जगह एक तरफ अमेरिकी हथियार थे, तो दूसरी तरफ सोवियत समर्थन। यह होड़ सिर्फ ज़मीन तक नहीं रुकी।
आगे बढ़ने के यह होड अंतरिक्ष तक पहुची जहाँ सोवियत संघ ने पहला सैटेलाइट भेजा, अंतरिक्ष में पहला इंसान (यूरी गागरिन) भेजा… लेकिन अमेरिका ने 1969 में सीधे चांद पर इंसान उतारकर सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली।
लेकिन 1979 में सोवियत संघ ने वह गलती कर दी, जो उसके लिए ताबूत की कील साबित हुई। उसने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेज दी। अमेरिका ने बदला लेने के लिए पाकिस्तान के रास्ते अफगान मुजाहिदीन को गुप्त रूप से हथियार और ‘स्टिंगर मिसाइलें’ देना शुरू कर दिया।
अफगानिस्तान सोवियत संघ के लिए वही साबित हुआ, जो कभी वियतनाम अमेरिका के लिए था एक अंतहीन दलदल। दस साल तक चले इस युद्ध ने सोवियत सेना का मनोबल तोड़ दिया। 1980 के दशक तक, हथियारों की होड़, अफगानिस्तान युद्ध और भ्रष्टाचार ने सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया था।
हालत ये होने लगे कि रूस के नागरिक अब ब्रेड और टॉयलेट पेपर के लिए घंटों लाइन में लग रहे थे। तब पार्टी ने एक युवा नेता को सत्ता सौंपी, जिसे इस डूबते जहाज को बचाना था। उसने साहसिक सुधारों की कोशिश की…लेकिन उसे नहीं पता था कि उसके यही सुधार, अनजाने में उस विशाल साम्राज्य के अंत की शुरुआत बन जाएंगे। जिसके बाद आखिर ऐसा क्या हुआ कि सोवियत संघ 17 भाग में टूट गया देखेंगे अगले एपिसोड सोवियत संघ का पतन में।
Russian History Series:
पिछला भाग: हिटलर के ऑपरेशन बारब्रोसा से स्तालिनग्राद की जंग तक सोवियत रूस कैसे जीता?
