सरस्वती गोरा एक ऐसी असाधारण महिलाओं में से एक थीं, जिन्होंने आजादी के पहले अंग्रेज़ों के खिलाफ आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, जेल गईं, सत्याग्रह का नेतृत्व किया, लेकिन आज़ादी मिलने के बाद उनकी जिंदगी में संघर्ष खत्म नहीं हुआ। आजादी के बाद उनके सामने अब एक दूसरी लड़ाई थी, छुआछूत, जातिगत भेदभाव और महिलाओं की हालत के खिलाफ। उनके लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था, असली आज़ादी तब थी, जब इंसान को उसकी जाति से नहीं, इंसान होने की वजह से सम्मान मिले।
सरस्वती गोरा जब अंग्रेज़ों के खिलाफ युवा महिला का मोर्चा संभाली
सरस्वती गोरा का जन्म 28 सितंबर 1912 को हुआ था, ऐसे दौर में, जब भारत सामाजिक रूढ़ियों और औपनिवेशिक शासन दोनों से जूझ रहा था। स्वतंत्रता आंदोलन ने उन्हें भी प्रभावित किया, और उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेकर महिलाओं के सत्याग्रही दल का नेतृत्व किया।
इस संघर्ष की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी, उन्हें गिरफ्तार कर वेल्लोर सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां उन्होंने करीब छह महीने बिताए। खास बात यह है कि जेल जाते वक्त उनका छोटा बेटा भी उनके साथ था। उनके लिए स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक आंदोलन नहीं थी, यह सामाजिक बदलाव की शुरुआत भी थी।
आज़ादी के बाद अपना संघर्ष जारी रखी
1947 में देश आज़ाद हुआ, पर सरस्वती गोरा के लिए संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उनके सामने अब वह व्यवस्था थी, जिसमें इंसान को जन्म के आधार पर ऊंचा-नीचा समझा जाता था। छुआछूत उनके लिए सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं, इंसानी गरिमा के खिलाफ एक व्यवस्था थी।
उन्होंने जातिगत भेदभाव के खिलाफ लगातार काम किया, और महिलाओं-बच्चों के अधिकारों को अपने काम का केंद्र बनाया। उनके पति गोपाराजू रामचंद्र राव, जिन्हें ‘गोरा’ कहा जाता था, भी सामाजिक सुधार और तर्कवादी सोच से जुड़े थे। दोनों ने मिलकर 1940 में एथीस्ट सेंटर की स्थापना की, जिसका मकसद था तर्कवाद और मानवतावाद के विचारों को असल ज़िंदगी में उतारना।
जाति की दीवार तोड़ बदलाव की शुरुआत
सामाजिक सुधार की बातें करना आसान था, पर उन्हें अपनी ज़िंदगी में लागू करना कहीं ज़्यादा मुश्किल। सरस्वती गोरा ने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों को बढ़ावा दिया, सिर्फ भाषणों में नहीं, अपने परिवार और आसपास के माहौल में भी। 1930 के दशक में उन्होंने देवदासियों के विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में भी काम किया, उस दौर में जब महिलाओं के लिए ऐसी परंपराओं को चुनौती देना बेहद मुश्किल माना जाता था। उनका संदेश साफ था, अगर समाज में बराबरी चाहिए, तो बदलाव घर से शुरू करना होगा।
60 महिलाओं के साथ की आंदोलन की शुरुवात
सरस्वती गोरा का संघर्ष सिर्फ जाति और महिलाओं तक सीमित नहीं था। 1954 में उन्होंने ज़मींदारी व्यवस्था के खिलाफ भी आंदोलन किया, करिवेना में उन्होंने करीब 60 अशिक्षित महिलाओं के एक समूह की अगुवाई की, जिसकी वजह से उन्हें पांच महीने की जेल हुई। पर सबसे अहम बात यह रही कि जब यह व्यवस्था खत्म हुई, तो किसानों को ज़मीन मिली, यह साबित करता है कि उनका काम सिर्फ प्रतीकात्मक विरोध तक सीमित नहीं था।
जब आजादी के बाद विनोबा भावे और भूदान आंदोलन से जुड़ी
एथीस्ट सेंटर ने सर्वोदय और भूदान आंदोलन से भी जुड़कर काम किया। सरस्वती गोरा ने आचार्य विनोबा भावे की भूदान पदयात्रा में आंध्र प्रदेश में सक्रिय भागीदारी की, उनके लिए सामाजिक बदलाव का मतलब सिर्फ कानून बदलना नहीं, लोगों की ज़िंदगी बदलना भी था। इसी सोच की वजह से उनका काम ग्रामीण विकास, महिलाओं की आर्थिक आज़ादी, शिक्षा और स्वास्थ्य तक फैलता गया।

संकट में फंसी महिलाओं को सहारा दिया
1985 में सरस्वती गोरा ने ‘गोरा अभय निवास’ की स्थापना की, पारिवारिक या सामाजिक समस्याओं से जूझ रही महिलाओं के लिए एक शॉर्ट-स्टे होम। 1985 से मार्च 1999 तक यहां 1,053 महिलाओं को मदद मिली। पर सरस्वती का मकसद सिर्फ अस्थायी आश्रय देना नहीं था, वे चाहती थीं कि महिलाएं आर्थिक रूप से भी मज़बूत बनें। उनकी अगुवाई में करीब 350 महिला स्वयं सहायता समूह बने, जिनमें 6,000 से ज़्यादा महिलाएं शामिल हुईं और बचत-ऋण के ज़रिए आय कमाना सीखा।
गांवों में बदलाव की शुरुआत की
एथीस्ट सेंटर से जुड़े कामों ने आंध्र प्रदेश के कई गांवों तक पहुंच बनाई, बच्चों की शिक्षा, महिलाओं के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण, और कमज़ोर परिवारों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं। 1995 में स्थापित एक नेत्र केंद्र के ज़रिए चार सालों में 84 दृष्टिहीन लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद मिली, यह आंकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, उन परिवारों की ज़िंदगी थी, जिनके लिए यह दोबारा जीवन मिलने जैसा था।
उनके काम को दुनिया ने भी पहचाना
1986 में इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट एंड एथिकल यूनियन ने एथीस्ट सेंटर को ओस्लो में इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवॉर्ड दिया। भारत में भी उन्हें 1999 में जमनालाल बजाज पुरस्कार, जी.डी. बिड़ला इंटरनेशनल अवॉर्ड फॉर ह्यूमनिज्म और 2000 में कर्नाटक सरकार का बसव पुरस्कार मिला। दिलचस्प बात यह है कि एक स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद उन्होंने सरकार की स्वतंत्रता सेनानी पेंशन लेने से इनकार कर दिया, उनके लिए सेवा किसी आर्थिक फायदे का ज़रिया नहीं थी।
19 अगस्त 2006 को विजयवाड़ा में, करीब 93 साल की उम्र में सरस्वती गोरा का निधन हुआ। पर उनकी विरासत किसी एक संस्था या पुरस्कार में सिमटी नहीं है। उनकी कहानी यह सवाल हमारे सामने रखती है, क्या राजनीतिक आज़ादी अपने आप सामाजिक बराबरी ले आती है? सरस्वती गोरा का पूरा जीवन इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश जैसा लगता है, पहले विदेशी शासन के खिलाफ, फिर समाज के भीतर की असमानताओं के खिलाफ एक लंबी लड़ाई। आज़ादी सिर्फ सत्ता बदलने का नाम नहीं थी, उसके साथ एक ऐसे समाज का सपना भी जुड़ा था, जहां इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसकी इंसानियत से हो।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
सरस्वती गोरा कौन थीं?
सरस्वती गोरा एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक थीं, जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया और बाद में करीब छह दशकों तक जातिगत भेदभाव, छुआछूत और महिलाओं के अधिकारों के लिए काम किया।
सरस्वती गोरा ने क्या किया था?
उन्होंने अपने पति गोपाराजू रामचंद्र राव के साथ मिलकर 1940 में एथीस्ट सेंटर की स्थापना की, अंतरजातीय विवाहों को बढ़ावा दिया, जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन किया, और 1985 में संकटग्रस्त महिलाओं के लिए ‘गोरा अभय निवास’ बनाया।
सरस्वती गोरा को जेल क्यों जाना पड़ा?
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महिलाओं के सत्याग्रही दल का नेतृत्व करने पर उन्हें गिरफ्तार कर वेल्लोर सेंट्रल जेल भेजा गया। बाद में 1954 में ज़मींदारी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन के लिए भी उन्हें पांच महीने जेल की सज़ा हुई।
एथीस्ट सेंटर कैसे और कब बना?
एथीस्ट सेंटर की स्थापना 1940 में सरस्वती गोरा और उनके पति ‘गोरा’ ने मिलकर की थी, ताकि तर्कवाद, मानवतावाद और सामाजिक सुधार के विचारों को व्यवहार में लाया जा सके।
सरस्वती गोरा को कौन-कौन से सम्मान मिले?
उन्हें 1986 में इंटरनेशनल ह्यूमनिस्ट अवॉर्ड, 1999 में जमनालाल बजाज पुरस्कार, जी.डी. बिड़ला इंटरनेशनल अवॉर्ड फॉर ह्यूमनिज्म और 2000 में कर्नाटक सरकार का बसव पुरस्कार मिला।
सरस्वती गोरा का निधन कब हुआ?
उनका निधन 19 अगस्त 2006 को विजयवाड़ा में, करीब 93 साल की उम्र में हुआ।
