भारत के वन्यजीव संरक्षक (Wildlife Conservationists of India) जिन्होंने पलट दी वन्यजीव संरक्षण की तस्वीर। हमारी पृथ्वी पर जीवों का अस्तित्व प्रकृति के संतुलन से बंधा है, और इस संतुलन में जंगल और वन्यजीवों का योगदान सबसे ज्यादा है। लेकिन इंसानी लालच, अंधाधुंध शिकार और बस्तियों के विस्तार ने जंगलों के पेड़ों बेजुबानों के आशियाने उजाड़ने शुरू किए, लेकिन कुछ जुनूनी लोग भी थे जो जंगल और कुल्हाड़ियों के बीच दीवार बनकर खड़े हो गए।
किसी ने सरकारी कुर्सी और सुविधाएं छोड़कर बंजर जमीन पर बाघों के लिए सुरक्षित ठिकाना तैयार किया, तो किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर आदमखोर प्रथाओं और शिकारियों के नेटवर्क को तोड़ा।
भारत के वन्यजीव संरक्षक (Wildlife Conservationists of India) और उनके संघर्ष की कहानी
आज के लेख उन भारत के वन्यजीव संरक्षक (Wildlife Conservationists of India), वैज्ञानिकों और वन प्रहरियों के अदम्य साहस की दास्तान है, जिन्होंने भारत की जैव-विविधता और वन्यजीवों को बचाने के लिए अपना पूरा जीवन दांव पर लगा दिया।
1. जिम कॉर्बेट

जिम कॉर्बेट का नाम भारत के जंगलों और बाघों के संरक्षण के लिए मशहूर है। उनका जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने कुमाऊं के जंगलों, वहां के वन्यजीवों और स्थानीय लोगों के जीवन को करीब से देखा।
ब्रिटिश शासन के दौर में कॉर्बेट एक जाने-माने शिकारी थे। उन्होंने ऐसे कई आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार किया, जिनसे गांवों में लोगों की जान को खतरा था। लेकिन समय के साथ जंगल और वन्यजीवों को करीब से समझने के कारण उनकी सोच बदलने लगी। उन्हें एहसास हुआ कि बाघ इंसानों के दुश्मन नहीं, बल्कि जंगल के बेहद महत्वपूर्ण जीव हैं।
इसके बाद कॉर्बेट ने वन्यजीवों की रक्षा और जंगलों के संरक्षण के लिए आवाज उठानी शुरू की। उन्होंने लोगों को प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति जागरूक किया और बाघों के संरक्षण की जरूरत पर जोर दिया।
उनकी याद में उत्तराखंड के हैली नेशनल पार्क का नाम 1957 में बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रखा गया जो आज यह भारत के सबसे प्रसिद्ध बाघ अभयारण्यों में से एक है।
जिम कॉर्बेट की कहानी इसलिए खास है क्योंकि एक समय जानवरों का शिकार करने वाला व्यक्ति आगे चलकर वन्यजीव संरक्षण का समर्थक बन गया। उनकी जिंदगी यह दिखाती है कि प्रकृति को समझने के साथ इंसान की सोच भी बदल सकती है।
2. कैलाश सांखला

कैलाश सांखला का नाम भारत में बाघों के संरक्षण के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। उनका जन्म 30 जनवरी 1925 को जोधपुर, राजस्थान में हुआ था। उन्होंने भारतीय वन सेवा में काम करते हुए जंगलों और वन्यजीवों को करीब से समझा। इसी दौरान उन्होंने महसूस किया कि देश में बाघों की संख्या तेजी से कम हो रही है और अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह शानदार जीव विलुप्त होने की कगार पर पहुंच सकता है।
कैलाश सांखला ने अपना पूरा जीवन बाघों के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। उन्हें अक्सर “भारत के टाइगर मैन” के नाम से याद किया जाता है। वर्ष 1973 में शुरू हुए प्रोजेक्ट टाइगर के पहले निदेशक के रूप में उन्होंने भारत में बाघ संरक्षण की मजबूत नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने सिर्फ जंगलों में बाघों की सुरक्षा पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि लोगों को भी वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक किया। उनके प्रयासों से भारत में बाघों को बचाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए।
कैलाश सांखला का मानना था कि जंगल और वन्यजीवों की रक्षा सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है। 9 अगस्त 1994 को उनका निधन हो गया, लेकिन बाघों के संरक्षण के लिए उनका योगदान आज भी भारत के वन्यजीव संरक्षण की कहानी का अहम हिस्सा है।
3. आदित्य “डिकी” सिंह

आदित्य “डिकी” सिंह का जीवन एक सामान्य सरकारी करियर से शुरू हुआ, लेकिन उनका मन जंगल और वन्यजीवों में बसता था। उन्होंने सिविल सर्विस की नौकरी छोड़कर 1998 में अपनी पत्नी पूनम सिंह के साथ रणथंभौर के पास सवाई माधोपुर में रहने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन वन्यजीव फोटोग्राफी और संरक्षण को समर्पित कर दिया।
रणथंभौर में रहते हुए उन्होंने देखा कि जंगल के आसपास की कई जमीनें बंजर और खराब हो चुकी थीं। वन्यजीव भोजन और पानी की तलाश में खेतों की ओर आते थे, जिससे किसानों और जानवरों के बीच टकराव की स्थिति बनती थी। इसी बीच डिकी सिंह की नजर भादलाव इलाके की ऐसी जमीन पर पड़ी, जहां कभी खेती होती थी, लेकिन वन्यजीवों के कारण किसान वहां खेती करने से परेशान थे।
डिकी और पूनम ने धीरे-धीरे इस इलाके में जमीन खरीदनी शुरू की। करीब दो दशकों में उन्होंने 35 एकड़ से अधिक जमीन अपने संरक्षण प्रयास के लिए जुटाई। लेकिन इस कहानी की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने वहां पारंपरिक तरीके से पेड़ लगाने या कोई बड़ा कृत्रिम जंगल बनाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने जमीन को प्रकृति के भरोसे छोड़ दिया, उसे चराई और पेड़ों की कटाई से बचाया और केवल कुछ जरूरी हस्तक्षेप किए।
समय के साथ वहां स्थानीय पेड़-पौधे और झाड़ियां अपने आप वापस आने लगीं। बारिश के पानी को रोकने के लिए प्राकृतिक गड्ढों में छोटे चेक डैम बनाए गए, जिससे पानी लंबे समय तक उपलब्ध रहने लगा। धीरे-धीरे वह सूखी जमीन घने हरे क्षेत्र में बदलने लगी।
फिर इस छोटी-सी पुनर्जीवित होती जंगल की दुनिया में चीतल, नीलगाय, जंगली सूअर, तेंदुए और बाघ आने लगे। कैमरा ट्रैप से भी कई वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की गई। खास बात यह थी कि बाघ सिर्फ इस इलाके से गुजरते नहीं थे, बल्कि कई बार यहां रुकते, आराम करते और शिकार भी करते थे।इस जमीन ने आसपास
के किसानों के लिए भी एक तरह से राहत पैदा की। जब वन्यजीवों को जंगल के बाहर ही भोजन, पानी और सुरक्षित जगह मिलने लगी, तो खेतों में बाघों और दूसरे शिकारी जानवरों के आने का दबाव कुछ कम हुआ।
डिकी सिंह सिर्फ जमीन को जंगल में बदलने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे एक जाने-माने वन्यजीव फोटोग्राफर और संरक्षणवादी भी थे। उन्होंने रणथंभौर के बाघों और वन्यजीवों को करीब से देखा, उनकी तस्वीरें खींचीं और संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर लगातार लिखा। उन्हें Sanctuary Wildlife Photographer of the Year 2011 और Carl Zeiss Award for Conservation 2012 जैसे सम्मान भी मिले।
2023 में डिकी सिंह का निधन हो गया, लेकिन उनके द्वारा शुरू किया गया भादलाव का यह प्रयोग आज भी उनकी सोच को जीवित रखे हुए है।
उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है, कभी-कभी प्रकृति को बचाने के लिए हमें उसे बदलने की नहीं, बल्कि उसे थोड़ा सुरक्षित छोड़ देने की जरूरत होती है। एक समय की बंजर जमीन को उन्होंने जंगल बनाने की कोशिश नहीं की; उन्होंने बस उसे फिर से जंगल बनने का मौका दिया।
आदित्य सिंह की कहानी हमें यह समझाती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल बाघों या जंगलों को बचाने तक सीमित नहीं है। इसमें उन लोगों को साथ लेकर चलना भी जरूरी है, जिनका जीवन जंगलों से जुड़ा हुआ है। उनका काम इसी सोच का उदाहरण है कि प्रकृति की रक्षा तब ज्यादा प्रभावी होती है, जब इंसान और जंगल दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए।
4. कार्तिक सत्यनारायण

कार्तिक सत्यनारायण भारत के प्रसिद्ध वन्यजीव संरक्षणकर्ताओं में से एक हैं। उन्हें अक्सर “Bear Man of India” कहा जाता है। उनका सबसे बड़ा योगदान भारत में स्लॉथ भालुओं के साथ होने वाली सदियों पुरानी ‘डांसिंग बियर’ प्रथा को खत्म करने और बचाए गए भालू के लिए पुनर्वास करने में रहा है।
कार्तिक का बचपन से ही प्रकृति और जानवरों के प्रति गहरा लगाव था। वे जंगलों में घूमते और घायल या मुसीबत में फंसे जानवरों की मदद करने की कोशिश करते थे। आगे चलकर उन्होंने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में काम शुरू किया और बाघों पर काफी रिसर्च भी की।
उस समय भारत में स्लॉथ भालुओं के बच्चों को जंगल से पकड़कर उन्हें ‘नाचने वाला भालू’ बनाया जाता था। उनके मालिक सड़क किनारे लोगों के मनोरंजन के लिए उन्हें नचाते थे। इस प्रक्रिया में भालुओं को बेहद दर्दनाक यातना से गुजरना पड़ता था। उनके मुंह में छेद करके रस्सी डाली जाती और उन्हें नियंत्रित किया जाता था।
कार्तिक सत्यनारायण और गीता शेषमणि ने 1995 के बाद इस समस्या को गंभीरता से समझना शुरू किया। उन्होंने केवल भालुओं को बचाने के बजाय यह जानने की कोशिश की कि आखिर लोग इस काम पर निर्भर क्यों हैं। इसके लिए उन्होंने करीब 68 कलंदर समुदाय के गांवों में जाकर समुदाय की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझा।
यहीं से उनके संरक्षण मॉडल की सबसे बड़ी खासियत सामने आई। उन्हें समझ आया कि अगर कलंदर समुदाय को वैकल्पिक रोजगार नहीं मिला, तो केवल भालुओं को जब्त करने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। इसलिए Wildlife SOS ने समुदाय के साथ मिलकर Kalandar Rehabilitation Project शुरू किया।
परिवारों को दूसरे व्यवसाय शुरू करने के लिए सहायता और vocational training दी गई, महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया गया और बच्चों को शिक्षा से जोड़ा गया। Wildlife SOS के अनुसार, 5,000 से अधिक कलंदर समुदाय के परिवारों को वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराने और 17,000 से अधिक बच्चों को शिक्षा तक पहुंच दिलाने में मदद की गई।
भालुओं को बचाने के बाद अगली चुनौती थी, उन्हें कहां रखा जाए और उनकी जिंदगी कैसे बेहतर बनाई जाए इसी उद्देश्य से Wildlife SOS ने Agra Bear Rescue Facility विकसित की। यह दुनिया की सबसे बड़ी स्लॉथ-बियर बचाव सुविधाएं में से एक है। यहां बचाए गए भालू को जंगल जैसे बड़े घेरे, पानी के तालाब, छायादार पेड़, पशु चिकित्सा और लंबे समय तक देखभाल की सुविधा दी जाती है।
हर रेस्क्यू किये गए भालू को तुरंत दूसरे भालुओं के बीच नहीं छोड़ा जाता। पहले उसका स्वास्थ्य परीक्षण और करीब 90 दिनों का क्वारंटाइन किया जाता है। उसके बाद उसके व्यवहार को देखकर उसे उपयुक्त समूह में छोड़ दिया जाता है।
इस कहानी में रानी नाम की स्लॉथ भालू का खास स्थान है। Wildlife SOS के अनुसार, रानी 2002 में संगठन द्वारा बचाया गया पहला ‘dancing bear’ थी। उस समय वह सिर्फ पांच साल की थी और उसे बेहद अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया था। उसके बचाव ने आगे चलकर सैकड़ों दूसरे भालुओं के बचाव और पुनर्वास की नींव रखी।
सबसे बड़ी सफलता 2009 में मिली, जब भारत का आखिरी ‘डांसिंग बियर’ भी इस प्रथा से बाहर आया। Wildlife SOS के अनुसार, इस अभियान के दौरान 600 से अधिक करतब दिखाने वाले स्लॉथ भालू को बचाकर अभयारण्य में सुरक्षित जीवन दिया गया।
कार्तिक सत्यनारायण की कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने सिर्फ एक जानवर को बचाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पूरी समस्या की जड़ को समझा भालुओं का शोषण, समुदाय की गरीबी और आजीविका की मजबूरी और इन तीनों को साथ लेकर समाधान तैयार किया।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्चा वन्यजीव संरक्षण सिर्फ जानवरों को बचाना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां बनाना भी है जहां इंसान की आजीविका और जानवरों की आजादी दोनों सुरक्षित रह सकें।
5. गीता शेषमणि

गीता शेषमणि भारत की प्रमुख पशु एवं वन्यजीव संरक्षण कार्यकर्ताओं में से एक हैं। उन्होंने अपना जीवन घायल और संकट में पड़े जानवरों की मदद के लिए समर्पित किया। वर्ष 1995 में उन्होंने कार्तिक सत्यनारायण के साथ मिलकर Wildlife SOS की स्थापना की। इसकी शुरुआत दिल्ली में एक छोटे से गैराज से हुई थी।
गीता की जिंदगी में एक घटना ने बड़ा बदलाव लाया। उन्होंने दिल्ली-आगरा मार्ग पर एक स्लॉथ भालू को रस्सी से बांधकर सड़क पर तमाशा दिखाते हुए देखा। भालू की हालत देखकर उन्हें समझ आया कि यह सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि जानवर के साथ क्रूरता है। इसके बाद उन्होंने कार्तिक सत्यनारायण के साथ मिलकर भारत में ‘डांसिंग बियर’ की समस्या की जड़ तक पहुंचने का फैसला किया।
गीता शेषमणि की कहानी बताती है कि सच्चा संरक्षण सिर्फ जानवरों को बचाना नहीं, बल्कि उन इंसानों के लिए भी सम्मानजनक विकल्प बनाना है जिनकी जिंदगी वन्यजीवों से जुड़ी रही है।
6. कृति करंथ

कृति करंथ भारत की जानी-मानी वन्यजीव संरक्षण वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने इंसानों और जंगली जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के लिए विज्ञान और समुदाय की भागीदारी को साथ जोड़ा। बचपन से ही उनका झुकाव जंगल और वन्यजीवों की ओर था। आगे चलकर उन्होंने वन्यजीव संरक्षण पर शोध किया और भारत लौटकर मानव-वन्यजीव संघर्ष को अपनी प्रमुख कार्यक्षेत्र बनाया।
कृति ने हजारों गांवों में शोध कर यह समझने की कोशिश की कि हाथियों, तेंदुओं, बाघों जैसे जानवरों और स्थानीय लोगों के बीच संघर्ष क्यों होता है और इसे कम करने के व्यावहारिक तरीके क्या हो सकते हैं। इसी सोच से उन्होंने Wild Shaale शुरू किया, इसके तहत वन्यजीवों से फसल, पशु या संपत्ति को नुकसान होने पर ग्रामीण एक टोल-फ्री हेल्पलाइन के जरिए सहायता ले सकते हैं। टीम मौके पर जाकर नुकसान दर्ज करती और सरकारी मुआवजे का दावा करने में उनकी मदद करती है।
इस मॉडल ने सिर्फ मुआवजे तक काम सीमित नहीं रखा। जरूरत के अनुसार पशुओं की सुरक्षा के लिए शिकारी-रोधी शेड जैसे उपाय भी किए गए। साथ ही Wild Shaale के माध्यम से बच्चों में वन्यजीवों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
आज कृति करंथ का काम इस विचार पर आधारित है कि वन्यजीवों को बचाने के लिए जंगलों की रक्षा के साथ उन लोगों का भरोसा जीतना भी जरूरी है, जो जंगलों के आसपास रहते हैं। उनका मॉडल संरक्षण को टकराव से निकालकर सह-अस्तित्व की दिशा में ले जाने की कोशिश है।
7. उल्लास करंथ

के. उल्लास करंथ भारत के उन प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिकों में से हैं, जिन्होंने बाघ संरक्षण को आधुनिक विज्ञान और आंकड़ों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शुरुआत में वे मैकेनिकल इंजीनियर थे, लेकिन जंगल और बाघों के प्रति गहरे लगाव ने उन्हें अपना करियर बदलने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने आगे चलकर वन्यजीव जीवविज्ञान की पढ़ाई की और 1986 से बाघों पर वैज्ञानिक शोध शुरू किया।
उनके काम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा था बाघों की संख्या का अधिक विश्वसनीय तरीके से पता लगाना। उस समय बाघों की गिनती के लिए मुख्य रूप से उनके पैरों के निशान यानी pugmark census पर निर्भरता थी। करंथ ने इस तरीके की सीमाओं को सामने रखा और कैमरा ट्रैप तथा सांख्यिकीय मॉडलिंग जैसे वैज्ञानिक तरीकों को आगे बढ़ाया।
कैमरा ट्रैप से जंगल में गुजरने वाले बाघों की तस्वीरें ली जाती हैं। हर बाघ की धारियां अलग होती हैं, इसलिए तस्वीरों की मदद से अलग-अलग बाघों की पहचान की जा सकती है। इसके बाद capture-recapture जैसे सांख्यिकीय तरीकों से उनकी आबादी और घनत्व का अनुमान लगाया जाता है।
उनका लंबे समय तक चलने वाला शोध नागरहोल और कर्नाटक के दूसरे जंगलों से शुरू होकर भारत के कई क्षेत्रों तक पहुंचा। उनके शोध और सहयोगियों के काम ने भारत में बाघों की वैज्ञानिक निगरानी के तरीकों को प्रभावित किया और 2012 में NTCA द्वारा अपनाए गए नए निगरानी प्रोटोकॉल में भी उनके शोध की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
उल्लास करंथ की कहानी बताती है कि वन्यजीव संरक्षण सिर्फ जंगल में जानवरों की रक्षा करना नहीं, बल्कि सही आंकड़ों और विज्ञान के आधार पर उनके भविष्य की योजना बनाना भी है। उनका काम आज भी भारत में आधुनिक बाघ संरक्षण की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।
8. रमन सुकुमार

रमन सुकुमार भारत के प्रसिद्ध वन्यजीव वैज्ञानिकों में से एक हैं, जिन्होंने अपना जीवन खास तौर पर एशियाई हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष को समझने और कम करने के लिए समर्पित किया। उनका जन्म 1955 में चेन्नई में हुआ। बचपन में प्रकृति में उनकी रुचि बढ़ी और उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से वनस्पति विज्ञान की पढ़ाई करने के बाद भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु से पीएचडी की।
1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने दक्षिण भारत की बिलिगिरिरंगन पहाड़ियों में जंगली हाथियों पर अपना शोध शुरू किया। उस समय हाथियों के खेतों में घुसने और फसलों को नुकसान पहुंचाने की समस्या को लेकर वैज्ञानिक जानकारी बहुत कम थी। सुकुमार ने वर्षों तक जंगलों और खेतों के बीच हाथियों की गतिविधियों का अध्ययन किया और यह समझने की कोशिश की कि हाथी इंसानी बस्तियों की ओर क्यों जाते हैं।
उनके शोध से पता चला कि समस्या केवल जंगलों के खत्म होने की नहीं है। जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंट जाने से हाथियों के पुराने रास्ते खेतों से होकर गुजरने लगे। कई बार खेती की फसलें हाथियों के लिए जंगल की तुलना में ज्यादा पौष्टिक और आसानी से उपलब्ध भोजन बन जाती हैं।
सुकुमार ने हाथी कॉरिडोर, बेहतर भूमि-प्रबंधन और वैज्ञानिक निगरानी जैसे उपायों पर जोर दिया, ताकि हाथियों और किसानों के बीच टकराव कम हो सके। 1992 में उन्होंने भारत सरकार के Project Elephant की स्थापना में भी योगदान दिया और बाद में Asian Nature Conservation Foundation की स्थापना की।
उनकी कहानी बताती है कि वन्यजीव संरक्षण का समाधान हमेशा जानवरों को इंसानों से दूर करना नहीं होता। सही वैज्ञानिक समझ और बेहतर योजना के जरिए दोनों के लिए जगह बनाई जा सकती है।
9. ए. जे. टी. जॉनसिंघ

ए. जे. टी. जॉनसिंघ यानी असिर जवाहर थॉमस जॉनसिंघ भारत के प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 1945 में तमिलनाडु के नागुनेरी में हुआ था। बचपन से ही उनके माता-पिता उन्हें पश्चिमी घाट के जंगलों में ले जाते थे। इन्हीं यात्राओं ने उनके भीतर प्रकृति और वन्यजीवों के प्रति गहरा लगाव पैदा किया।
उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से जूलॉजी में पढ़ाई की और बाद में अपना जीवन जंगलों में वन्यजीवों के अध्ययन को समर्पित कर दिया। 1970 के दशक के अंत में उन्होंने बांदीपुर में धोल (जंगली कुत्ते) पर लंबे समय तक फील्ड रिसर्च किया। यह भारत में किसी भारतीय वैज्ञानिक द्वारा किसी स्वतंत्र रूप से विचरण करने वाले बड़े स्तनधारी पर किए गए शुरुआती महत्वपूर्ण अध्ययनों में से एक था।
इसके बाद उनका शोध केवल धोल तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने हाथी, बाघ, तेंदुआ, एशियाई शेर, स्लॉथ भालू, नीलगिरि तहर, गोरल और महसीर जैसी कई प्रजातियों और उनके आवासों का अध्ययन किया। वे जंगलों को किताबों से नहीं, बल्कि घंटों पैदल चलकर और जानवरों को उनके प्राकृतिक वातावरण में देखकर समझने के लिए जाने जाते थे।
जॉनसिंघ ने Wildlife Institute of India में लंबे समय तक काम किया और सैकड़ों वन्यजीव अधिकारियों, शोधकर्ताओं और छात्रों को प्रशिक्षित किया। उन्होंने हाथी कॉरिडोर और महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों के संरक्षण की भी जोरदार वकालत की।
7 जून 2024 को 78 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन भारतीय वन्यजीव विज्ञान में उनका योगदान आज भी याद किया जाता है। उनकी जिंदगी का संदेश साफ था जंगल को समझना है तो उसके बीच जाकर, उसे महसूस करके और लगातार सीखकर काम करना होगा।
10. एम. के. रंजीतसिंह

एम. के. रंजीतसिंह भारत के उन प्रमुख वन्यजीव संरक्षणवादियों में से हैं, जिन्होंने देश की wildlife conservation policy और protected areas की नींव मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जन्म 19 फरवरी 1938 को वांकानेर के राजघराने में हुआ। वर्ष 1961 में वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में शामिल हुए।
मध्य प्रदेश के मंडला के कलेक्टर रहते हुए उन्होंने गंभीर संकट में पहुंच चुके बारहसिंगा के संरक्षण के लिए काम किया। इसके बाद 1971 में उन्हें केंद्र में वन और वन्यजीव से जुड़ी जिम्मेदारी मिली। यहीं उन्होंने भारत के पहले व्यापक केंद्रीय वन्यजीव कानून Wildlife (Protection) Act, 1972 को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाई। यह कानून भारत में वन्यजीवों और उनके संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बना।
1973 में वे भारत के पहले Director of Wildlife Preservation बने। उन्होंने राज्यों को राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य बनाने के लिए केंद्रीय सहायता की योजनाएं तैयार कीं। मध्य प्रदेश में वन सचिव रहते हुए उन्होंने 14 नए अभयारण्य और 8 राष्ट्रीय उद्यान स्थापित कराने में भूमिका निभाई तथा तीन मौजूदा राष्ट्रीय उद्यानों का क्षेत्र भी काफी बढ़ाया।
रंजीतसिंह Project Tiger शुरू करने वाली टास्क फोर्स के सदस्य-सचिव भी रहे और शुरुआती टाइगर रिजर्व की पहचान में योगदान दिया। उन्होंने Project Snow Leopard, मगरमच्छ संरक्षण और कई संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण में भी काम किया। बाद के वर्षों में वे भारत में चीता पुनर्स्थापना की योजना से भी जुड़े।
उनकी कहानी बताती है कि वन्यजीव संरक्षण केवल जंगल में जानवरों की रक्षा करना नहीं, बल्कि मजबूत कानून, सुरक्षित आवास और दूरदर्शी नीतियां बनाना भी है।
11. वाल्मीकि थापर

वाल्मीकि थापर भारत के सबसे प्रभावशाली बाघ संरक्षणवादियों, लेखकों और वन्यजीव कथाकारों में से एक थे। उनका जीवन बदलने वाली घटना 1976 में रणथंभौर की यात्रा के दौरान हुई। वहां उनकी मुलाकात रणथंभौर के तत्कालीन निदेशक और प्रसिद्ध संरक्षणवादी फतेह सिंह राठौड़ से हुई। राठौड़ उनके मार्गदर्शक बने और थापर ने अगले कई दशकों तक रणथंभौर के बाघों को करीब से समझने और उनकी रक्षा करने का काम किया।
थापर ने जंगल में लंबे समय तक बाघों के व्यवहार, उनके शिकार और उनके आवास को देखा और दर्ज किया। वे केवल शोध तक सीमित नहीं रहे, बल्कि किताबों, लेखों और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के जरिए बाघों की कहानी देश-दुनिया तक पहुंचाई। उनकी चर्चित BBC सीरीज ‘Land of the Tiger’ ने भारत के जंगलों और बाघों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनका मानना था कि बाघों को बचाने के लिए केवल जंगल की सीमा सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं है। आसपास रहने वाले लोगों की जिंदगी और जरूरतों को भी संरक्षण से जोड़ना जरूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने 1988 में Ranthambhore Foundation की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संस्था ने आसपास के गांवों में स्वास्थ्य, आजीविका और पर्यावरण से जुड़े काम किए।
थापर ने सरकार की कई वन्यजीव समितियों में भी काम किया और बाघ संरक्षण से जुड़ी नीतियों पर अपनी मजबूत आवाज उठाई। उन्होंने दो दर्जन से अधिक किताबें लिखीं और पांच दशकों तक बाघों के संरक्षण के लिए लगातार आवाज उठाते रहे।
31 मई 2025 को उनका निधन हुआ, लेकिन रणथंभौर के बाघों और भारत के वन्यजीव संरक्षण को लेकर उनकी आवाज आज भी उनकी किताबों, फिल्मों और संरक्षण कार्यों में जीवित है। उनकी कहानी बताती है कि एक व्यक्ति जंगल को समझकर और उसकी कहानी दुनिया तक पहुंचाकर संरक्षण की पूरी सोच को प्रभावित कर सकता है।
12. रोमुलस व्हिटेकर

रोमुलस व्हिटेकर भारत में सांपों, मगरमच्छों और दूसरे सरीसृपों के संरक्षण के लिए काम करने वाले सबसे प्रसिद्ध नामों में से एक हैं। उन्हें अक्सर “Snake Man of India” कहा जाता है। उनका जन्म 1943 में अमेरिका में हुआ, लेकिन बचपन में भारत आने के बाद जंगलों और वन्यजीवों से उनका गहरा रिश्ता बन गया। छोटी उम्र से ही उन्हें सांपों में खास दिलचस्पी थी।
भारत लौटने के बाद उन्होंने देखा कि सांपों को लेकर लोगों में डर और कई तरह की गलत धारणाएं थीं। इसी सोच के साथ उन्होंने 1969 में मद्रास स्नेक पार्क की शुरुआत की, जो बाद में चेन्नई के गिंडी क्षेत्र में विकसित हुआ। यहां लोगों को सांपों के बारे में जानकारी देने और उनके प्रति डर कम करने पर जोर दिया गया। पार्क को शुरुआती वर्षों में ही बड़ी संख्या में लोग देखने पहुंचे।
इसके बाद व्हिटेकर ने अपना ध्यान मगरमच्छों की ओर भी बढ़ाया। 1970 के दशक में उन्होंने Madras Crocodile Bank Trust की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह केंद्र मगरमच्छों के संरक्षण, प्रजनन, शोध और लोगों में जागरूकता फैलाने का प्रमुख केंद्र बना।
उन्होंने इरुला समुदाय के पारंपरिक सांप पकड़ने के कौशल को भी संरक्षण और वैज्ञानिक काम से जोड़ा। आगे चलकर उनका काम किंग कोबरा, घड़ियाल, समुद्री कछुओं और वर्षावनों तक पहुंचा। उन्होंने अगुम्बे में किंग कोबरा और उसके आवास पर शोध के लिए Rainforest Research Station की स्थापना में भी योगदान दिया।
2018 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उनकी कहानी बताती है कि जिस जीव से इंसान डरता है, उसे समझने और उसके महत्व को बताने से डर की जगह संरक्षण की भावना पैदा की जा सकती है।
13. सलीम अली

डॉ. सलीम अली भारत के सबसे प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिकों और प्रकृति संरक्षणवादियों में से एक थे। उन्हें प्यार से “Birdman of India” कहा जाता है। उनका जन्म 12 नवंबर 1896 को मुंबई में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने अपने आसपास के पक्षियों में रुचि लेना शुरू कर दिया था। एक बार उन्होंने एक गौरैया को देखा, जिसके गले पर पीला निशान था। इसी पक्षी को लेकर उनकी जिज्ञासा उन्हें Bombay Natural History Society (BNHS) तक ले गई, जहां डब्ल्यू. एस. मिलार्ड ने उन्हें पक्षियों की वैज्ञानिक दुनिया से परिचित कराया।
आगे चलकर सलीम अली ने भारत के अलग-अलग हिस्सों में जाकर व्यवस्थित रूप से पक्षियों का अध्ययन और सर्वेक्षण किया। उन्होंने जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तानों और आर्द्रभूमियों में वर्षों तक पक्षियों के व्यवहार, आवास और वितरण को दर्ज किया। 1930 में उनका बया पक्षी के व्यवहार पर किया गया अध्ययन भारत में पक्षी व्यवहार के शुरुआती महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययनों में माना जाता है।
उनकी सबसे प्रसिद्ध किताब The Book of Indian Birds ने आम लोगों के बीच पक्षी-अवलोकन को लोकप्रिय बनाया। अमेरिकी वैज्ञानिक एस. डिलन रिप्ले के साथ मिलकर उन्होंने Handbook of the Birds of India and Pakistan जैसी महत्वपूर्ण कृति भी तैयार की, जो भारतीय उपमहाद्वीप के पक्षियों के अध्ययन की प्रमुख संदर्भ पुस्तकों में बनी।
सलीम अली सिर्फ पक्षियों के वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की मजबूत आवाज भी थे। उन्होंने भरतपुर, साइलेंट वैली और कई महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण के लिए प्रयास किए। उन्हें पद्म भूषण (1958) और पद्म विभूषण (1976) से सम्मानित किया गया।
20 जून 1987 को उनका निधन हुआ, लेकिन भारत में पक्षियों को समझने और बचाने की उनकी विरासत आज भी जीवित है। उनकी कहानी बताती है कि एक छोटी-सी जिज्ञासा भी पूरी जिंदगी को प्रकृति के संरक्षण के लिए समर्पित कर सकती है।
14. बेलिंडा राइट

बेलिंडा राइट भारत की प्रमुख वन्यजीव फोटोग्राफर, डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और संरक्षणवादियों में से एक हैं। उनका जन्म 1953 में कोलकाता में हुआ और उनका बचपन भारत के जंगलों, खासकर बिहार और मध्य भारत के वन क्षेत्रों में बीता। छोटी उम्र से ही बाघों और जंगलों के प्रति उनका गहरा लगाव था। उन्होंने किशोरावस्था में ही तय कर लिया था कि वे वन्यजीवों के साथ काम करेंगी।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वन्यजीव फोटोग्राफी से की और आगे चलकर National Geographic के लिए काम किया। उन्होंने कई वन्यजीव फिल्मों का निर्माण किया। उनकी चर्चित फिल्म ‘Land of the Tiger’ ने दो Emmy Awards सहित कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते। इस काम के दौरान उन्होंने भारत के बाघों को बेहद करीब से देखा और उनकी जिंदगी को कैमरे के जरिए दुनिया तक पहुंचाया।
लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ तस्वीरें और फिल्में बनाना पर्याप्त नहीं है। 1994 में उन्होंने Wildlife Protection Society of India (WPSI) की स्थापना की और अपना पूरा ध्यान वन्यजीव संरक्षण पर लगा दिया। WPSI ने बाघों के अवैध शिकार और उनके अंगों के गैरकानूनी व्यापार के खिलाफ खुफिया जानकारी जुटाने, जांच और सरकारी एजेंसियों को सहयोग देने का काम शुरू किया।
बेलिंडा ने कई मामलों में पुलिस और वन विभाग के साथ मिलकर अवैध शिकार और वन्यजीव अपराध के खिलाफ कार्रवाई में मदद की। उनकी संस्था ने वन्यजीव अपराधों का बड़ा डेटाबेस भी तैयार किया और अधिकारियों के प्रशिक्षण में योगदान दिया।
उनके योगदान के लिए उन्हें 2003 में OBE से सम्मानित किया गया। बेलिंडा राइट की कहानी बताती है कि कैमरे से दिखाई गई जंगल की खूबसूरती को संरक्षण की मजबूत आवाज में बदला जा सकता है।
15. बिट्टू सहगल

बिट्टू सहगल भारत के प्रसिद्ध पर्यावरण लेखक, पत्रकार और वन्यजीव संरक्षणवादी हैं। उन्होंने जंगलों और वन्यजीवों को केवल वैज्ञानिकों या विशेषज्ञों तक सीमित रखने के बजाय आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया। उनका मानना रहा कि जब लोग प्रकृति को समझेंगे और उससे जुड़ाव महसूस करेंगे, तभी उसके संरक्षण के लिए आवाज उठाएंगे।
उनके जीवन में रणथंभौर के प्रसिद्ध संरक्षणवादी फतेह सिंह राठौड़ का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा। 1980 के आसपास राठौड़ ने उन्हें एक ऐसी पत्रिका शुरू करने के लिए प्रेरित किया, जो आम भारतीयों को वन्यजीव संरक्षण के महत्व के बारे में बताए। इसके परिणामस्वरूप अक्टूबर 1981 में सेंक्चुरी एशिया का पहला अंक प्रकाशित हुआ।
इसके बाद बिट्टू सहगल ने लेखन, पत्रकारिता, फोटोग्राफी और फिल्म निर्माण को संरक्षण का माध्यम बनाया। अभयारण्य ने वन्यजीवों से जुड़े लेखों और लगभग 30 वन्यजीव फिल्मों के जरिए देशभर के लोगों तक जंगलों की कहानियां पहुंचाईं।
उन्होंने 1984 में सेंक्चुरी कऊब शुरू किया, ताकि बच्चों में भी प्रकृति के प्रति रुचि और जिम्मेदारी पैदा हो। वर्ष 1999 में Kids for Tigers अभियान शुरू किया गया, जिसने स्कूलों के बच्चों को बाघ और जंगलों के महत्व से जोड़ने का प्रयास किया।
बाद में उनका काम केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने Mud on Boots जैसे कार्यक्रमों के जरिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले संरक्षणवादियों को समर्थन दिया और Sanctuary Nature Foundation के माध्यम से वन्यजीव, जलवायु और समुदायों से जुड़े संरक्षण प्रयासों को आगे बढ़ाया।
बिट्टू सहगल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने लेखनी को संरक्षण की आवाज बना दिया। उनकी कहानी बताती है कि सही कहानी लाखों लोगों को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बना सकती है।
16. राधेश्याम बिश्नोई

राधेश्याम पेमानी बिश्नोई राजस्थान के उन युवा वन्यजीव संरक्षणकर्ताओं में से थे, जिन्होंने बहुत कम उम्र में थार के वन्यजीवों की रक्षा को अपना जीवन बना लिया। जैसलमेर के धोलिया गांव में जन्मे राधेश्याम का संबंध बिश्नोई समुदाय से था, जिसकी परंपरा सदियों से प्रकृति और वन्यजीवों की रक्षा से जुड़ी रही है। बचपन से ही वे घायल हिरणों और पक्षियों की मदद करते थे।
वन्यजीवों की बेहतर देखभाल सीखने के लिए उन्होंने जोधपुर के रेस्क्यू सेंटर में प्रशिक्षण लिया। यहीं उन्हें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) की गंभीर स्थिति के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद वे अपने गांव लौटे और गोडावण के साथ-साथ चिंकारा, ब्लैकबक और गिद्धों के संरक्षण में जुट गए। उन्होंने स्थानीय युवाओं के साथ मिलकर निगरानी नेटवर्क बनाया और बिजली की लाइनों, सड़कों तथा अवैध शिकार जैसे खतरों को दर्ज किया।
राधेश्याम ने थार के कठिन इलाकों में 100 से अधिक जल-स्रोत/जल कुंड तैयार कराने और वन्यजीवों के लिए पानी उपलब्ध कराने में योगदान दिया। वे घायल वन्यजीवों का रेस्क्यू करते और अपनी फोटोग्राफी के जरिए थार की जैव-विविधता तथा उसके सामने मौजूद खतरों को दुनिया तक पहुंचाते थे। उनके पास गोडावण की तस्वीरों का बड़ा संग्रह भी था।
उनके प्रयासों को 2021 में Sanctuary Nature Foundation के Young Naturalist Award से सम्मानित किया गया। दुर्भाग्य से मई 2025 में एक एंटी-पोचिंग अभियान के दौरान सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। वे सिर्फ 28 वर्ष के थे। आज उन्हें “Godawan Man of India” के नाम से याद किया जाता है।
उनकी कहानी बताती है कि संरक्षण के लिए हमेशा बड़े संस्थान नहीं, बल्कि अपने जंगल और समुदाय के लिए खड़ा होने वाला एक समर्पित इंसान भी बड़ा बदलाव ला सकता है।
17. माधव गाडगिल

माधव गाडगिल भारत के सबसे प्रभावशाली पारिस्थितिकी वैज्ञानिकों में से एक थे। उनका जन्म 24 मई 1942 को पुणे में हुआ था। बचपन में ही पक्षियों और प्रकृति में उनकी रुचि बढ़ी। प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सलीम अली से उनके संपर्क ने भी उनके भीतर प्रकृति को वैज्ञानिक तरीके से समझने की इच्छा मजबूत की। आगे चलकर उन्होंने प्राणी विज्ञान की पढ़ाई की और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से 1969 में पीएचडी पूरी की।
भारत लौटने के बाद उन्होंने 1973 में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में काम शुरू किया और बाद में वहां Centre for Ecological Sciences की स्थापना की। उन्होंने पश्चिमी घाट की जैव विविधता, जंगलों, नदियों और इंसानी गतिविधियों के पर्यावरण पर प्रभाव का लंबे समय तक अध्ययन किया। उनका मानना था कि संरक्षण की नीतियों में स्थानीय लोगों और उनके पारंपरिक ज्ञान को भी महत्व मिलना चाहिए।
गाडगिल ने स्थानीय समुदायों को जैव विविधता की निगरानी और दस्तावेजीकरण से जोड़ने के लिए People’s Biodiversity Registers जैसे प्रयासों को बढ़ावा दिया। वे मानते थे कि गांवों में रहने वाले लोगों के पास अपने पर्यावरण का महत्वपूर्ण पारंपरिक ज्ञान है।
उनके जीवन का सबसे चर्चित अध्याय Western Ghats Ecology Expert Panel की अध्यक्षता रहा। 2010 में गठित इस पैनल ने पश्चिमी घाट के संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन किया और 2011 में रिपोर्ट दी, जिसे “गाडगिल रिपोर्ट” के नाम से जाना गया। रिपोर्ट ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तथा स्थानीय भागीदारी पर जोर दिया और देशभर में बड़ी बहस छेड़ दी।
माधव गाडगिल को पद्म श्री, पद्म भूषण और 2024 में UN Champions of the Earth जैसे सम्मान मिले। 7 जनवरी 2026 को 83 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
उनकी कहानी का संदेश साफ था प्रकृति को बचाने के लिए विज्ञान के साथ स्थानीय लोगों की आवाज को भी संरक्षण का हिस्सा बनाना जरूरी है।
18. फतेह सिंह राठौड़

फतेह सिंह राठौड़ को भारत में “टाइगर गुरु” के नाम से जाना जाता है। राजस्थान के सवाई माधोपुर स्थित रणथंभौर को दुनिया के सबसे प्रमुख बाघ अभयारण्यों में बदलने का सबसे बड़ा श्रेय उन्हीं को जाता है। उन्होंने वन सेवा में एक साधारण गेम वार्डन के रूप में करियर शुरू किया था, लेकिन जंगलों और बाघों के प्रति उनके जुनून ने उन्हें भारतीय वन्यजीव इतिहास का एक अमर किरदार बना दिया।
1970 के दशक में जब रणथंभौर को ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ में शामिल किया गया, तब जंगल के भीतर कई इंसानी बस्तियां मौजूद थीं। इंसानों और वन्यजीवों के बीच लगातार संघर्ष हो रहा था। तब उन्होंने ग्रामीणों से बात की, उनकी चिंताओं को समझा और जंगल के भीतर बसे 12 से अधिक गांवों को शांतिपूर्ण तरीके से बाहर बसाने का काम पूरा किया। इस स्वैच्छिक पुनर्वास ने बाघों को एक खुला, सुरक्षित और तनावमुक्त प्राकृतिक आवास दिया।
राठौड़ सिर्फ एक अधिकारी नहीं थे; वे जंगल को अपनी हथेलियों की तरह पहचानते थे। उन्होंने बिना आधुनिक तकनीक के भी बाघों के व्यवहार, उनकी पारिवारिक संरचना और उनके आपसी संबंधों को बेहद बारीकी से दर्ज किया। जब जंगल माफिया और शिकारियों ने उन पर जानलेवा हमला किया और उन्हें मरा समझकर छोड़ दिया, तब भी वे पीछे नहीं हटे और ठीक होकर फिर से जंगल की सुरक्षा में लौट आए।
रिटायरमेंट के बाद भी वे रणथंभौर के पहरेदार बने रहे और ‘टाइगर वॉच’ जैसी संस्था के जरिए अवैध शिकार के खिलाफ काम करते रहे। 1 मार्च 2011 को उनका निधन हुआ, लेकिन रणथंभौर की हर झाड़ी और वहां बेखौफ घूमता हर बाघ आज भी फतेह सिंह राठौड़ के अडिग समर्पण की गवाही देता है।
19. पूर्णिमा देवी बर्मन

डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन असम की वन्यजीव जीवविज्ञानी और संरक्षणवादी हैं, जिन्होंने दुनिया के सबसे उपेक्षित और बदसूरत माने जाने वाले पक्षी ‘हरगिला’ (Greater Adjutant Stork) को विलुप्त होने की कगार से बचाकर जन-आंदोलन का प्रतीक बना दिया।
हरगिला एक बड़ा सारस पक्षी है, जो मरे हुए जानवरों को खाने और गंदगी में रहने के कारण लंबे समय तक अपशकुन और बीमारी फैलाने वाला पक्षी माना जाता था। ग्रामीण अक्सर इनके घोंसले गिरा देते थे और जिस पेड़ पर ये अंडे देते, उसे काट डालते थे। जिसके कारण पूरी दुनिया में इनकी संख्या घटकर 1,000 से भी कम रह गई थी।
2007 के आसपास जब पूर्णिमा ने एक व्यक्ति को हरगिला के घोंसले वाले पेड़ को काटते और गिरे हुए चूजों को तड़पते देखा, तो उन्होंने अपनी पीएचडी की पढ़ाई बीच में रोककर इस पक्षी को बचाने का बीड़ा उठाया। पूर्णिमा को समझ आ गया था कि कानून बनाकर पक्षी नहीं बचाया जा सकता, लोगों की सोच बदलनी होगी।
उन्होंने असम के गांवों की महिलाओं को संगठित करना शुरू किया और 10,000 से अधिक स्थानीय महिलाओं की एक स्वयंसेवी ब्रिगेड तैयार की, जिसे आज पूरी दुनिया ‘हरगिला आर्मी’ के नाम से जानती है। उन्होंने महिलाओं को हरगिला के पारिस्थितिक महत्व के बारे में समझाया कि कैसे यह पक्षी सड़ी-गली चीजों को खाकर हमारे वातावरण को बीमारियों से मुक्त रखता है।
उन्होंने हरगिला को स्थानीय संस्कृति, त्योहारों, पारंपरिक गमोसा बुनाई और लोकगीतों से जोड़ दिया। जो पक्षी कभी अपशकुन था, वह गांव का ‘पारिवारिक मेहमान’ और गर्व का प्रतीक बन गया। उनके इस सामूहिक प्रयास का नतीजा यह हुआ कि असम के कामरूप जिले में हरगिला के घोंसलों की संख्या कई गुना बढ़ गई और यह प्रजाति आज सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ रही है।
उनके इस असाधारण नेतृत्व के लिए उन्हें 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा सर्वोच्च पर्यावरण सम्मान ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ और ब्रिटिश सरकार के ‘व्हिटली गोल्ड अवार्ड’ (ग्रीन ऑस्कर) से सम्मानित किया गया।
पूर्णिमा देवी बर्मन की कहानी यह साबित करती है कि अगर संरक्षण को महिलाओं के नेतृत्व और सांस्कृतिक गौरव से जोड़ दिया जाए, तो नफरत किए जाने वाले जीव के लिए भी लोगों के दिलों में प्यार जगाया जा सकता है।
वन्यजीव संरक्षण की जमीनी हकीकत और आगे की राह
वन्यजीव संरक्षण केवल राष्ट्रीय उद्यानों की सीमांकन या शिकार पर प्रतिबंधित करने तक सीमित नहीं है। असली संरक्षण तब संभव होता है जब विज्ञान, स्थानीय समुदाय की आजीविका और बेजुबानों के जीने के अधिकार के बीच एक संवेदनशील तालमेल बनता है। उपयुक्त सभी (Wildlife Conservationists of India) भारत के वन्यजीव संरक्षक ने जमीन पर उतरकर दिखाया है कि जंगल और वन्यजीव केवल सरकारों के भरोसे नहीं बच सकते।
जब तक आम नागरिक और प्रकृति के बीच सह-अस्तित्व की यह डोर मजबूत नहीं होगी, तब तक धरती पर जैव-विविधता का सुरक्षित भविष्य सिर्फ एक कागजी उम्मीद बनकर रह जाएगा। इन नायकों का जीवन हमें यही सिखाता है कि जंगल बचाने की शुरुआत किसी बड़े बजट से नहीं, बल्कि बेजुबानों के प्रति सच्ची संवेदना और एक अडिग संकल्प से होती है।
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