भारत के प्रमुख पर्यावरणविद्: मिलिए उन 20 जमीनी नायकों से, जिन्होंने प्रकृति के लिए जिंदगी लगा दी

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भारत के प्रमुख पर्यावरणविद् (Environmentalists of India in Hindi) अक्सर जब पर्यावरण बचाने की बात आती है, तो बड़े-बड़े सम्मेलनों, सरकारी फाइलों, भारी-भरकम बजट दे दिया जाता है, या इन नारों और कामों को विज्ञापन के जरिए लोगों को जागरूक करने का काम किया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि लेकिन कड़वी सच्चाई यह […]

भारत के प्रमुख पर्यावरणविद् (Environmentalists of India in Hindi) अक्सर जब पर्यावरण बचाने की बात आती है, तो बड़े-बड़े सम्मेलनों, सरकारी फाइलों, भारी-भरकम बजट दे दिया जाता है, या इन नारों और कामों को विज्ञापन के जरिए लोगों को जागरूक करने का काम किया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि ज्यादातर वादे कागजों में ही दफन होकर रह जाते हैं और जमीन पर काम न के बराबर दिखता है।

हालांकि, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस देश में प्रकृति की फिक्र करने वाले लोग नहीं हैं। हमारे ही बीच ऐसे कई सीधे-सादे लोग रहे हैं, जिनके पास न तो कोई बड़ा बैंक बैलेंस था और न ही कोई आधुनिक संसाधन। किसी ने कुम्हार का काम करते-करते सड़क किनारे दम तोड़ते पौधों को जीवनदान दिया, तो किसी ने अकेले दम पर बंजर रेतीली जमीन को घने जंगल में बदल दिया। कहीं महिलाओं ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए लड़ाई लड़ी तो, तो किसी ने सूखे से बेहाल गांवों में पुराने जोहड़ खोदकर पानी लौटा लाए।

भारत के प्रमुख पर्यावरणविद् (Environmentalists of India in Hindi) और उनके जमीनी संघर्षों

इन गुमनाम नायकों की कहानियां मुख्यधारा की चर्चाओं में कम ही जगह पाती हैं। इस लेख में हमने भारत के प्रमुख पर्यावरणविद् (Environmentalists of India in Hindi) और उनके जमीनी संघर्षों को विस्तार से समझा है, जो यह साबित करते हैं कि अगर नीयत साफ और इरादा पक्का हो, तो एक अकेला इंसान भी धरती को फिर से हरा-भरा बना सकता है।

1. गोपाल जी उर्फ ऑक्सीजन बाबा

वाराणसी के 52 वर्षीय गोपाल जी को लोग प्यार से “ऑक्सीजन बाबा” कहते हैं। गोपाल जी ने देखा कि लोग और संस्थाएं बड़ी संख्या में पौधे तो लगाते हैं, लेकिन पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। पानी के अभाव में कई छोटे पौधे सूख जाते हैं। यही देखकर उन्होंने नए पौधे लगाने के बजाय पहले से लगे इन बेसहारा पौधों को बचाने का संकल्प लिया।

शुरुआत में गोपाल जी बाल्टी से पानी ढोकर पौधों को सींचते थे। बाद में उन्होंने हाथ से खींचने वाली ट्रॉली बनाई। समय के साथ लोगों के सहयोग से उन्हें 500 लीटर की पानी की टंकी भी मिली, जिसे ठेले पर रखकर वे वाराणसी और भदोही के रास्तों पर निकलते हैं। कभी कुएं से तो कभी सरकारी नल से पानी भरकर वे सड़क किनारे लगे पौधों की प्यास बुझाते हैं।

इस काम के दौरान कई लोगों ने उनका मजाक उड़ाया और उन्हें पागल तक कहा। कई बार पानी भरने से भी रोका गया, लेकिन गोपाल जी ने कभी हार नहीं मानी। उनका मानना है कि एक पौधे को बचाना भी आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन और स्वच्छ हवा बचाने जैसा है।

पेशे से कुम्हार गोपाल जी मिट्टी के बर्तन बनाकर अपनी पत्नी और तीन बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। लेकिन पिछले करीब 12 वर्षों से उन्होंने प्रकृति की सेवा को भी अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। वे रोज सुबह सड़क किनारे सूख रहे और बेसहारा पौधों को पानी देने के लिए निकल पड़ते हैं।

गोपाल जी की कहानी हमें सिखाती है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। अगर इरादा मजबूत हो, तो एक साधारण इंसान भी बड़ा बदलाव ला सकता है। पौधा लगाना जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा जरूरी है उसे पेड़ बनने तक संभालना और यही जिम्मेदारी “ऑक्सीजन बाबा” पिछले 12 वर्षों से निभा रहे हैं।

2. जादव मोलाई पायेंग

असम के रहने वाले जादव पायेंग की कहानी इस बात की मिसाल है कि एक इंसान का छोटा-सा संकल्प भी प्रकृति में बड़ा बदलाव ला सकता है। उन्हें आज “फॉरेस्ट मैन ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है। उनकी कहानी की शुरुआत तब हुई, जब उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के एक रेतीले इलाके में बड़ी संख्या में सांपों को मृत पड़ा देखा। पेड़ों की कमी और तेज गर्मी के कारण हुई इस घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।

इसके बाद उन्होंने तय किया कि वह इस बंजर जमीन पर पेड़ लगाएंगे। शुरुआत में उनके पास न कोई बड़ी टीम थी और न ही आधुनिक साधन। उन्होंने खुद पौधे लगाए, उन्हें पानी दिया और वर्षों तक उनकी देखभाल करते रहे। धीरे-धीरे उनकी मेहनत का असर दिखाई देने लगा और जहां कभी सिर्फ रेत और सूखी जमीन थी, वहां हरियाली फैलने लगी।

जादव पायेंग ने दशकों तक लगातार मेहनत करके असम के माजुली क्षेत्र में एक विशाल वन क्षेत्र विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह जंगल आज अलग-अलग तरह के पेड़-पौधों के साथ कई वन्यजीवों का भी घर है। हाथी, हिरण, पक्षी और अन्य जीव इस हरियाली से लाभान्वित होते हैं।

सबसे खास बात यह है कि जादव पायेंग ने यह काम किसी बड़े अभियान या प्रसिद्धि के लिए नहीं शुरू किया था। उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि जिस जमीन पर कभी जीवन मुश्किल था, वहां फिर से पेड़-पौधे और जीव-जंतु पनप सकें। अक्टूबर 2013 में, उन्हें भारतीय वन प्रबंधन संस्थान में उनके वार्षिक कार्यक्रम कोएलिशंस के दौरान सम्मानित किया गया।

2015 में, उन्हें भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। उन्होंने इसी योगदान के लिए असम कृषि विश्वविद्यालय और काजीरंगा विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि दिया गया।

उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति को बदलने के लिए हमेशा बड़ी ताकत की जरूरत नहीं होती। एक व्यक्ति, एक पौधा और वर्षों की लगातार मेहनत भी एक बंजर जमीन को जंगल में बदल सकती है। जादव पायेंग का जीवन आज उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो पर्यावरण संरक्षण के लिए कुछ करना चाहते हैं।

3. सुंदरलाल बहुगुणा

उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में पेड़ों और जंगलों को बचाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले सुंदरलाल बहुगुणा को भारत के प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ताओं में गिना जाता है। उन्हें खास तौर पर चिपको आंदोलन को देशभर में पहचान दिलाने के लिए जाना जाता है। उनका मानना था कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि मिट्टी, पानी, हवा और इंसानी जीवन का आधार हैं।

जब पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से पेड़ों की कटाई होने लगी, तो इसका असर स्थानीय लोगों की जिंदगी पर भी पड़ने लगा। जंगल कम होने से पानी के स्रोत प्रभावित हुए, मिट्टी का कटाव बढ़ा और पहाड़ों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा। बहुगुणा ने इस समस्या को गंभीरता से समझा और लोगों को जंगलों की रक्षा के लिए जागरूक करना शुरू किया।

इसी दौर में चिपको आंदोलन ने जोर पकड़ा। इस आंदोलन में ग्रामीण, खासकर महिलाएं, पेड़ों से चिपककर खड़े हो जाते थे, ताकि उन्हें काटने से रोका जा सके। सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया और लोगों को समझाया कि जंगलों की रक्षा करना उनके भविष्य की रक्षा करना है।

बहुगुणा ने पर्यावरण के मुद्दों को देशभर तक पहुंचाने के लिए लंबे पैदल यात्राएं कीं और लगातार लोगों के बीच जाकर जागरूकता फैलाई। उन्होंने हिमालय बचाओ जैसे अभियानों के जरिए जंगल, नदियों और पहाड़ों के संरक्षण की आवाज उठाई। टिहरी बांध परियोजना का भी उन्होंने लंबे समय तक विरोध किया और इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर चिंता जताई।

उनका जीवन सादगी, संघर्ष और प्रकृति के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। सुंदरलाल बहुगुणा ने यह संदेश दिया कि विकास तभी सार्थक है, जब उसमें प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के हितों का भी ध्यान रखा जाए।

सुंदरलाल बहुगुणा की कहानी हमें सिखाती है कि जंगलों को बचाना सिर्फ पेड़ों को बचाना नहीं है, बल्कि पानी, मिट्टी, पर्यावरण और इंसानी जीवन को सुरक्षित रखना है। उनका संघर्ष आज भी पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले लोगों को प्रेरणा देता है।

4. गौरा देवी

गौरा देवी

उत्तराखंड की रहने वाली गौरा देवी का नाम भारत के पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें खास तौर पर चिपको आंदोलन की उस ऐतिहासिक घटना के लिए जाना जाता है, जिसमें उन्होंने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर जंगल के पेड़ों को कटने से बचाया था।

वर्ष 1974 में उत्तराखंड के चमोली जिले के रेणी गांव के जंगलों में पेड़ों की कटाई का आदेश दिया गया था। जब गांव के पुरुष वहां मौजूद नहीं थे, तब लकड़ी काटने वाले मजदूर जंगल पहुंच गए। इसकी जानकारी मिलते ही गौरा देवी ने गांव की महिलाओं को इकट्ठा किया और जंगल की ओर निकल पड़ीं। उन्होंने मजदूरों के सामने खड़े होकर पेड़ों को काटने का विरोध किया और महिलाओं से कहा कि जंगल उनके लिए सिर्फ लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। 

महिलाएं पेड़ों से चिपककर खड़ी हो गईं और उन्हें काटने से रोक दिया। इस साहसिक कदम के कारण उस समय जंगल की कटाई रोकनी पड़ी। गौरा देवी का यह प्रयास आगे चलकर रेणी आंदोलन और चिपको आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल हुआ।

उन्होंने बिना किसी बड़े संसाधन या ताकत के यह दिखाया कि एकजुट होकर आम लोग भी प्रकृति की रक्षा कर सकते हैं। गौरा देवी की कहानी आज भी हमें सिखाती है कि जंगल बचाना यानी पानी, मिट्टी, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाना है।

5.चंडी प्रसाद भट्ट

चंडी प्रसाद भट्ट

उत्तराखंड के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता चंडी प्रसाद भट्ट ने अपना जीवन पहाड़ों, जंगलों और वहां रहने वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित किया। उन्हें चिपको आंदोलन के प्रमुख संस्थापकों और नेताओं में गिना जाता है। 

वर्ष 1964 में उन्होंने दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल की स्थापना की, जिसका उद्देश्य स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर देना और जंगलों के संसाधनों पर उनकी भागीदारी को मजबूत करना था। उस समय उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हो रही थी, जिससे पर्यावरण के साथ-साथ स्थानीय लोगों का जीवन भी प्रभावित हो रहा था। 

भट्ट ने ग्रामीणों को संगठित किया और उन्हें जंगलों के महत्व के बारे में जागरूक किया। उनके प्रयासों से चिपको आंदोलन को मजबूत आधार मिला, जिसमें ग्रामीण पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाते थे। चंडी प्रसाद भट्ट का मानना था कि जंगलों का संरक्षण तभी संभव है, जब स्थानीय समुदायों को उनके साथ जोड़ा जाए और उन्हें जंगलों से जुड़ी आजीविका का सम्मानजनक अवसर मिले। 

उन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लिए लगातार काम किया। उनके योगदान के लिए उन्हें रमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्मश्री सहित कई सम्मान मिले। चंडी प्रसाद भट्ट की कहानी बताती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ बचाने का अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति और इंसान के बीच संतुलन बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है।

6. जमूना टुडू

जमूना टुडू

झारखंड की रहने वाली जमूना टुडू ने जंगलों और पर्यावरण की रक्षा के लिए अपने साहस और मेहनत से एक अलग पहचान बनाई है। उन्हें प्यार से “लेडी टार्जन” भी कहा जाता है। एक समय उनके गांव के आसपास के जंगलों में पेड़ों की अवैध कटाई तेजी से बढ़ रही थी। जंगलों के खत्म होने से न केवल पर्यावरण प्रभावित हो रहा था, बल्कि गांव के लोगों का जीवन और उनकी आजीविका भी खतरे में पड़ रही थी। यह देखकर जमूना टुडू ने जंगलों को बचाने का फैसला किया।

उन्होंने गांव की महिलाओं को एकजुट किया और उनके साथ मिलकर जंगलों की निगरानी शुरू कर दी। महिलाएं हाथों में डंडे लेकर जंगलों में गश्त करती थीं और पेड़ों की अवैध कटाई करने वालों को रोकती थीं। शुरुआत में इस काम में उन्हें कई मुश्किलों और विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी। धीरे-धीरे गांव के अन्य लोग भी उनके अभियान से जुड़ने लगे।

जमूना टुडू और उनकी टीम ने सिर्फ पेड़ों को कटने से रोकने का काम नहीं किया, बल्कि नए पौधे लगाने और जंगल को फिर से हरा-भरा बनाने पर भी ध्यान दिया। उनके प्रयासों ने स्थानीय समुदाय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाई और जंगलों की सुरक्षा को एक सामूहिक जिम्मेदारी बनाया।

जमूना टुडू की कहानी बताती है कि अगर एक इंसान ठान ले और लोगों को साथ जोड़ ले, तो जंगलों और प्रकृति की रक्षा के लिए बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

7. सालूमरदा थिम्मक्का

सालूमरदा थिम्मक्का कर्नाटक की एक ऐसी पर्यावरण कार्यकर्ता थीं, जिन्होंने पेड़ों को अपने बच्चों की तरह पाला और प्रकृति संरक्षण की मिसाल कायम की। उनका जन्म कर्नाटक के तुमकुरु जिले के एक गरीब परिवार में हुआ था। आर्थिक परेशानियों के कारण उन्हें औपचारिक शिक्षा का अवसर नहीं मिल सका। शादी के बाद भी उनका जीवन आसान नहीं रहा, लेकिन उन्होंने पेड़ों की सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

थिम्मक्का और उनके पति ने सड़क किनारे बरगद के पौधे लगाना शुरू किया। शुरुआत में उनके पास पौधों की देखभाल के लिए ज्यादा साधन नहीं थे, फिर भी वे कई किलोमीटर दूर से पानी लाकर पौधों को सींचती थीं। वे पौधों को जानवरों से बचाने के लिए उनके चारों ओर कांटेदार झाड़ियां लगाती थीं और लगातार उनकी देखभाल करती रहीं। धीरे-धीरे ये छोटे पौधे बड़े पेड़ों में बदल गए और सड़क के किनारे हरियाली की एक लंबी कतार बन गई।

पेड़ों को संतान की तरह पालने के कारण उन्हें “पेड़ों की मां” के रूप में पहचान मिली। उनके पर्यावरण संरक्षण के काम को देश-विदेश में सम्मान मिला और भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया। सालूमरदा थिम्मक्का की कहानी यह दिखाती है कि बिना बड़े संसाधनों के भी दृढ़ संकल्प और प्रकृति के प्रति प्रेम से समाज में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

8. देवकी अम्मा

देवकी अम्मा

देवकी अम्मा, जिन्हें प्यार से ‘वनमुथस्सी’ यानी ‘जंगल की दादी’ कहा जाता है, केरल की एक प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षक हैं। उन्होंने अपना जीवन पेड़ों और प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। उनका मानना था कि पेड़ केवल पर्यावरण का हिस्सा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन का आधार हैं।

देवकी अम्मा ने अपने आसपास पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का काम शुरू किया। उन्होंने कई वर्षों तक पेड़ों को अपने परिवार के सदस्यों की तरह संभाला और स्थानीय जैव विविधता को बचाने में योगदान दिया। खासतौर पर उन्होंने देशी पौधों और पेड़-पौधों को संरक्षित करने पर जोर दिया, ताकि प्राकृतिक वातावरण और स्थानीय पारिस्थितिकी बनी रहे।

उनका काम सिर्फ पौधे लगाने तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने लोगों को प्रकृति के महत्व के बारे में जागरूक किया और यह संदेश दिया कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक व्यक्ति या संस्था की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

देवकी अम्मा की कहानी हमें बताती है कि प्रकृति के लिए किया गया छोटा-सा प्रयास भी समय के साथ बड़ा बदलाव ला सकता है। बिना किसी बड़े संसाधन या प्रसिद्धि की चाह के उन्होंने पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई और लोगों के लिए प्रेरणा बन गईं।

9. पांडुरंग हेगड़े

पांडुरंग हेगड़े कर्नाटक के एक प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने पश्चिमी घाट के जंगलों और पर्यावरण को बचाने के लिए लंबे समय तक काम किया। वे ‘अप्पिको आंदोलन’ से जुड़े प्रमुख लोगों में रहे। यह आंदोलन 1980 के दशक में कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के खिलाफ शुरू हुआ था और इसे चिपको आंदोलन से प्रेरणा मिली थी।

पांडुरंग हेगड़े ने गांवों के लोगों, खासकर युवाओं और स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का काम किया। उनका मानना था कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे पानी, मिट्टी, वन्यजीव और स्थानीय लोगों के जीवन का आधार हैं। उन्होंने लोगों को जंगलों की अंधाधुंध कटाई के नुकसान समझाए और पेड़ों को बचाने के लिए जन-जागरूकता अभियान चलाए।

उनके प्रयासों में केवल पेड़ों को बचाना ही नहीं, बल्कि जंगलों का संरक्षण, जल स्रोतों की सुरक्षा और टिकाऊ जीवनशैली को बढ़ावा देना भी शामिल रहा। उन्होंने प्रकृति और स्थानीय समुदायों के बीच संबंध को मजबूत करने पर जोर दिया।

पांडुरंग हेगड़े की कहानी यह सिखाती है कि पर्यावरण की रक्षा सिर्फ सरकार या संस्थाओं का काम नहीं है। जब स्थानीय लोग एकजुट होकर अपनी प्राकृतिक संपदा की रक्षा करते हैं, तो एक मजबूत जनआंदोलन खड़ा हो सकता है।

10. सरला बहन

सरला बहन का असली नाम कैथरीन मैरी हिलमन था। वह मूल रूप से इंग्लैंड की रहने वाली थीं, लेकिन महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर भारत आईं और अपना पूरा जीवन ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। गांधीजी उन्हें प्यार से ‘सरला बहन’ कहते थे।

सरला बहन ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में महिलाओं के बीच रहकर काम किया। उन्होंने महसूस किया कि पहाड़ों में जंगलों पर सबसे ज्यादा निर्भरता महिलाओं की है। लकड़ी, चारा और पानी जुटाने की जिम्मेदारी अक्सर उन्हीं पर होती थी। इसलिए जंगलों का नष्ट होना उनके जीवन को सीधे प्रभावित करता था।

उन्होंने महिलाओं को संगठित किया और उन्हें शिक्षा, आत्मनिर्भरता तथा पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा। उन्होंने कौसानी में लक्ष्मी आश्रम की स्थापना की, जहां लड़कियों और महिलाओं को शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए तैयार किया गया। उनके विचारों और कार्यों ने आगे चलकर उत्तराखंड के पर्यावरण आंदोलनों को भी प्रेरणा दी।

सरला बहन की कहानी यह बताती है कि प्रकृति की रक्षा और महिला सशक्तिकरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपना देश छोड़कर भारत को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और पहाड़ों के लोगों के बीच रहकर ऐसा काम किया, जिसकी छाप आज भी दिखाई देती है।

11. वंदना शिवा 

वंदना शिवा भारत की प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने जैव विविधता, पारंपरिक खेती, किसानों के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण के लिए लंबे समय से काम किया है। उनका जन्म देहरादून में हुआ और उन्होंने भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की। बाद में उनका ध्यान पर्यावरण और कृषि से जुड़े मुद्दों की ओर गया।

वंदना शिवा ने भारत में पारंपरिक बीजों और जैव विविधता को बचाने के लिए महत्वपूर्ण काम किया। उन्होंने ‘नवदान्य’ नामक पहल की शुरुआत की, जिसके माध्यम से देशी बीजों के संरक्षण, जैविक खेती और किसानों को अपने बीजों पर अधिकार बनाए रखने के लिए अभियान चलाया गया। उनका मानना है कि बीज केवल खेती का साधन नहीं, बल्कि किसानों की स्वतंत्रता और खाद्य सुरक्षा का आधार हैं।

उन्होंने रासायनिक खेती, जैव विविधता के नुकसान और कृषि में बड़े कॉरपोरेट नियंत्रण जैसे मुद्दों पर भी आवाज उठाई। किसानों और स्थानीय समुदायों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जागरूक करना उनके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

वंदना शिवा की कहानी पर्यावरण और खेती के बीच गहरे संबंध को समझाती है। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि प्रकृति, किसान और खाद्य व्यवस्था को बचाने के लिए स्थानीय ज्ञान और जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है।

12. मेधा पाटकर

मेधा पाटकर भारत की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने अपना जीवन विस्थापित लोगों, आदिवासियों, किसानों और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के लिए समर्पित किया। उन्हें सबसे ज्यादा पहचान नर्मदा बचाओ आंदोलन से मिली, जो नर्मदा घाटी में बड़े बांधों के निर्माण से प्रभावित होने वाले लोगों के अधिकारों और पुनर्वास के सवालों को लेकर चलाया गया।

मेधा पाटकर ने नर्मदा घाटी के गांवों में जाकर वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं को समझा। उनका कहना था कि विकास जरूरी है, लेकिन विकास की कीमत लोगों के घर, जमीन और आजीविका छीनकर नहीं चुकाई जानी चाहिए। उन्होंने प्रभावित परिवारों के उचित पुनर्वास और मुआवजे की मांग को लेकर लंबे समय तक शांतिपूर्ण आंदोलन किए।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान उन्होंने पदयात्राओं, धरनों और जनसभाओं के माध्यम से लोगों को संगठित किया। उनके संघर्ष ने बड़े विकास परियोजनाओं के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर देशभर में बहस को जन्म दिया।

मेधा पाटकर की कहानी सिर्फ एक आंदोलन की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें विकास, पर्यावरण और लोगों के अधिकारों के बीच संतुलन की मांग उठाई गई। उन्होंने यह सवाल लगातार सामने रखा कि विकास का लाभ किसे मिलता है और उसकी कीमत कौन चुकाता है।

13. अनिल प्रकाश जोशी 

अनिल प्रकाश जोशी भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने हिमालयी क्षेत्रों के पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और ग्रामीण समुदायों के विकास के लिए लंबे समय तक काम किया है। उन्हें प्यार से ‘पानी वाले बाबा’ के नाम से भी जाना जाता है। उनका मानना है कि प्रकृति और गांवों की अर्थव्यवस्था को साथ लेकर चलना ही टिकाऊ विकास का रास्ता है।

अनिल प्रकाश जोशी ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय लोगों के साथ मिलकर जंगल, पानी और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर काम किया। उन्होंने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि पहाड़ों की असली ताकत उनके जंगल और प्राकृतिक संसाधन हैं। यदि इनका संरक्षण किया जाए, तो गांवों में रोजगार और आजीविका के बेहतर अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं।

उन्होंने HESCO (Himalayan Environmental Studies and Conservation Organization) की स्थापना की, जिसके माध्यम से ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग पर काम किया गया। उनके प्रयासों में जल संरक्षण, पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देना और ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने जैसे कई पहलू शामिल रहे।

पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। अनिल प्रकाश जोशी की कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति को बचाने के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका और विकास को मजबूत करना भी जरूरी है।

14. राजेंद्र सिंह

 

राजेंद्र सिंह भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और जल संरक्षण कार्यकर्ता हैं, जिन्हें “भारत के वाटरमैन” के नाम से जाना जाता है। उन्होंने राजस्थान जैसे सूखे क्षेत्रों में पानी की समस्या को दूर करने के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनका काम खास तौर पर वर्षा जल संरक्षण और पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने के लिए जाना जाता है।

राजेंद्र सिंह ने 1980 के दशक में राजस्थान के अलवर जिले के गांवों में काम शुरू किया। उस समय कई गांवों में पानी की भारी कमी थी और पुराने तालाब तथा जलस्रोत सूख चुके थे। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर जोहड़ जैसे पारंपरिक जल-संचयन ढांचे बनवाने और पुराने जलस्रोतों को फिर से जीवित करने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे इन प्रयासों से भूजल स्तर बढ़ने लगा और कई सूखी नदियों में दोबारा पानी दिखाई देने लगा।

उनका मानना था कि पानी की समस्या का समाधान केवल बड़े बांधों में नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर वर्षा के पानी को बचाने और समुदाय की भागीदारी में भी छिपा है। उन्होंने लोगों को जल संरक्षण के लिए संगठित किया और पारंपरिक ज्ञान को फिर से अपनाने पर जोर दिया।

जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें रैमोन मैग्सेसे पुरस्कार सहित कई सम्मान मिले। राजेंद्र सिंह की कहानी बताती है कि यदि समाज मिलकर अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करे, तो सूखे और पानी की कमी जैसी बड़ी समस्याओं का समाधान भी संभव है।

15. तुलसी गौड़ा

तुलसी गौड़ा

तुलसी गौड़ा कर्नाटक की प्रसिद्ध पर्यावरण संरक्षक थीं, जिन्हें प्यार से “जंगलों की इनसाइक्लोपीडिया” कहा जाता था। उन्होंने अपना पूरा जीवन पेड़-पौधों, जंगलों और प्रकृति की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया। साधारण जीवन से आने वाली तुलसी गौड़ा ने बिना किसी औपचारिक बड़ी शिक्षा के प्रकृति के बारे में इतना ज्ञान हासिल किया कि लोग उनसे पौधों और जंगलों की देखभाल के बारे में सलाह लेने लगे।

उन्होंने कर्नाटक के वन विभाग की नर्सरी में काम करते हुए हजारों पौधे तैयार किए और उन्हें रोपने तथा उनकी देखभाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पौधों की पहचान, उनकी जरूरत और उन्हें बचाने के तरीकों का उन्हें गहरा अनुभव था। वह नए पौधों को केवल लगाती ही नहीं थीं, बल्कि उनकी तब तक देखभाल करती थीं जब तक वे मजबूत होकर अपने पैरों पर खड़े न हो जाएं।

तुलसी गौड़ा का जीवन दिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए हमेशा बड़े संसाधनों या ऊंची डिग्री की जरूरत नहीं होती। प्रकृति के प्रति प्रेम, लगातार मेहनत और उसका गहरा ज्ञान भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

पर्यावरण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। तुलसी गौड़ा की कहानी आज भी लोगों को पेड़ लगाने के साथ-साथ उनकी देखभाल और संरक्षण करने की प्रेरणा देती है।

16. मुरलीधर देवीदास आमटे

बाबा आमटे का पूरा नाम मुरलीधर देवीदास आमटे था। वे एक प्रसिद्ध समाजसेवी थे, जिन्होंने अपना जीवन मानव सेवा के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए भी समर्पित किया। उनका मानना था कि इंसान का जीवन प्रकृति से जुड़ा है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर समाज का वास्तविक विकास संभव नहीं है।

बाबा आमटे ने महाराष्ट्र के आनंदवन को अपने काम का प्रमुख केंद्र बनाया। उन्होंने यहां लोगों के साथ मिलकर एक ऐसा समुदाय विकसित किया, जहां प्राकृतिक संसाधनों का समझदारी से उपयोग किया जाता था। आनंदवन में खेती, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और स्थानीय संसाधनों के पुनः उपयोग जैसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया। उनका प्रयास था कि लोग प्रकृति पर अनावश्यक दबाव डाले बिना आत्मनिर्भर जीवन जी सकें।

बाबा आमटे ने नर्मदा घाटी से जुड़े पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दों पर भी आवाज उठाई। उन्होंने बड़े विकास कार्यों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और प्रभावित लोगों की समस्याओं को लेकर आंदोलनकारियों का समर्थन किया। उनका मानना था कि विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें जंगल, नदियां और वहां रहने वाले लोगों के अधिकार सुरक्षित रहें।

बाबा आमटे की पर्यावरण यात्रा हमें यह सिखाती है कि प्रकृति की रक्षा और मानव सेवा अलग-अलग काम नहीं हैं। जब इंसान प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान करते हुए विकास करता है, तभी समाज और पर्यावरण दोनों का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।

17. विपिन चंद्र त्रिपाठी 

विपिन चंद्र त्रिपाठी 

विपिन चंद्र त्रिपाठी उत्तराखंड के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण प्रेमी और जन आंदोलनों से जुड़े नेता थे। उन्होंने पहाड़ों के जंगल, जमीन, पानी और स्थानीय लोगों के अधिकारों के संरक्षण के लिए लंबे समय तक आवाज उठाई। उनका मानना था कि पहाड़ों का विकास वहां की प्रकृति और स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

विपिन चंद्र त्रिपाठी उत्तराखंड में चिपको आंदोलन से भी जुड़े रहे। उन्होंने जंगलों की अंधाधुंध कटाई का विरोध किया और स्थानीय लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए जागरूक किया। उनका मानना था कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि पहाड़ों के पानी, मिट्टी, खेती और ग्रामीण जीवन का आधार हैं।

उन्होंने बड़े विकास कार्यों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और पहाड़ों से लोगों के पलायन जैसे मुद्दों को भी उठाया। वे चाहते थे कि स्थानीय लोगों को अपने जंगल और प्राकृतिक संसाधनों पर उचित अधिकार मिले तथा विकास के नाम पर पहाड़ों की प्रकृति को नुकसान न पहुंचाया जाए।

विपिन चंद्र त्रिपाठी की कहानी हमें यह सिखाती है कि पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है। जंगल, जल, जमीन और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना भी पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अपने संघर्ष के जरिए पहाड़ और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को समझाने का काम किया।

18. गोविंद सिंह रावत 

गोविंद सिंह रावत उत्तराखंड के उन पर्यावरण प्रेमियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने पहाड़ी क्षेत्रों में प्रकृति और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण के लिए काम किया। उनका काम मुख्य रूप से जंगलों, जलस्रोतों और स्थानीय समुदायों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की सोच से जुड़ा रहा।

गोविंद सिंह रावत का मानना था कि पहाड़ों का जीवन जंगल और पानी पर निर्भर है। जंगलों के कम होने से न केवल हरियाली घटती है, बल्कि जलस्रोत सूखने, मिट्टी का कटाव बढ़ने और ग्रामीणों के जीवन पर भी असर पड़ता है। इसलिए उन्होंने लोगों को अपने आसपास के पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों की देखभाल के लिए जागरूक करने पर जोर दिया।

उन्होंने स्थानीय लोगों की भागीदारी से वृक्षारोपण, जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सही उपयोग जैसे प्रयासों को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि पर्यावरण बचाने का सबसे प्रभावी तरीका वही है, जिसमें स्थानीय लोग स्वयं अपने जंगल और जलस्रोतों की जिम्मेदारी लें।

गोविंद सिंह रावत की कहानी हमें यह समझाती है कि पहाड़ों का पर्यावरण केवल वहां रहने वाले लोगों के लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए महत्वपूर्ण है। यदि जंगल और पानी सुरक्षित रहेंगे, तभी पहाड़ों में जीवन और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रह पाएगा।

19. कंडोनी सोरेन

कंडोनी सोरेन

जमशेदपुर के पास सरकाघाट गांव की कंडोनी सोरेन ने करीब 15 साल पहले अपने आसपास के जंगलों में बढ़ती अवैध पेड़ कटाई को देखा। शिकायत करने के बजाय उन्होंने गांव की महिलाओं को साथ जोड़ना शुरू किया। 2011 में उन्होंने ‘Hariyali Sakaam’ नाम की वन संरक्षण समिति बनाई। शुरुआत कुछ महिलाओं से हुई और धीरे-धीरे यह टीम करीब 40 महिलाओं तक पहुंच गई।

करीब 100 हेक्टेयर यानी लगभग 250 एकड़ जंगल की निगरानी के लिए महिलाओं ने अलग-अलग समूह बनाए। वे दिन-रात जंगल में गश्त करती हैं, अवैध कटाई की सूचना अधिकारियों तक पहुंचाती हैं और जरूरत पड़ने पर लकड़ी काटने वालों को रोकती हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, इस पहल से अवैध पेड़ कटाई में 80–90% तक कमी आई।

2018 में कंडोनी जमशेदपुर पुलिस में Home Guard बनीं। लेकिन नौकरी मिलने के बाद भी जंगल से उनका रिश्ता खत्म नहीं हुआ। ड्यूटी के बाद वह अपनी टीम के साथ फिर जंगल की रखवाली करने पहुंच जाती हैं।

गांव वालों ने उन्हें नाम दिया, ‘जंगल की शेरनी’। क्योंकि उनके लिए जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि उनके पूरे समुदाय की जिंदगी और आजीविका है। झारखंड के एक जंगल की कहानी बताती है कि जब कोई अपने घर और प्रकृति की रक्षा करने का फैसला कर ले, तो एक छोटी-सी पहल भी आंदोलन बन सकती है।

जमीनी हकीकत और पर्यावरण संरक्षण का सच

इन लोगों का संघर्ष नीति-निर्माताओं और समाज के सामने एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है, क्या पर्यावरण संरक्षण केवल अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, वातानुकूलित कमरों और अरबों के बजट का मोहताज है? जमीन की हकीकत बताती है कि असली बदलाव फाइलों में नहीं, बल्कि उन हाथों से लिखा जाता है जो बिना किसी तामझाम के फावड़ा उठाने और सूखते पौधों को सींचने का जोखिम लेते हैं। संरक्षण का दायित्व कागजी अभियानों से निकलकर जब तक हर नागरिक की बुनियादी चेतना और व्यवस्था की जवाबदेही का हिस्सा नहीं बनेगा, तब तक हरी-भरी धरती की कल्पना एक दूर की कौड़ी ही रहेगी।

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