रूस का इतिहास: जब रासपुतिन के साये और रूसी क्रांति ने खत्म किया रोमानोव साम्राज्य (भाग 15)

दिसंबर 1916 में 'पागल साधु' रासपुतिन की हत्या और प्रथम विश्व युद्ध की भुखमरी ने रूसी साम्राज्य की जड़ें खोखली कर दीं। 1917 की फरवरी क्रांति में जब महिलाओं ने 'रोटी' के लिए मार्च किया और सेना ने बगावत की, तो 300 साल पुराना रोमानोव साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

रूसी क्रांति 1917 ज़ार निकोलस का अंत (Russian Revolution 1917 Fall of Tsar Nicholas): दिसंबर 1916 की एक ठंडी रात। सेंट पीटर्सबर्ग के एक महल के तहख़ाने में रूस के सबसे ऊंचे रईस घरानों के राजकुमारों ने एक मोंक को खाने पर बुलाया गया। खाने में केक और शराब परोसी गई। लेकिन वहाँ किसी को पता नहीं था कि उस खाने में इतना जहर मिला था कि आदमी तुरंत मर जाए, लेकिन वह आदमी बच निकलता है। हैरान और खौफ मे आकर साजिशकर्ता ने उस पर पिस्तौल से गोलियां दाग दीं। वह ज़मीन पर गिर पड़ा… लेकिन कुछ देर बाद वह फिर उठ खड़ा हुआ और भागने की कोशिश करने लगा!

आखिरकार उसे कई गोलियां मारी गईं, उसके हाथ-पैर बांधे गए और नेवा नदी में डाल दिया जाता है। वह आदमी था- ग्रिगोरी रासपुतिन और उसकी हत्या ख़ुद रूस के सबसे ऊंचे रईस-घरानों ने की थी, क्योंकि उन्हें लग रहा था कि यह एक तांत्रिक पूरे साम्राज्य को बर्बाद कर रहा है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है जिस तांत्रिक ने जार इकलौते बेटे को जानलेवा बीमारी का उपचार कर सही कर दिया, जिसे महारानी ‘ईश्वर का दूत’ मानने लगीं थी, वो आखिर वो कैसे साम्राज्य को बर्बाद कर रहा था और क्यों रासपुतिन की मौत के कुछ ही महीनों बाद… 300 साल पुराना रोमानोव साम्राज्य जिसने कभी नेपोलियन तक को पराजित किया था, पूरी तरह ढह गया। जानेंगे इस एपिसोड में…

ज़ार की ऐतिहासिक भूल और रासपुतिन का साया

अगस्त 1914 में, यूरोप प्रथम विश्व युद्ध की आग में कूद पड़ा और रूस अपने सहयोगी देशों—फ्रांस और सर्बिया के साथ, जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी के खिलाफ युद्ध में उतर गया। शुरुआत में रूस में देशभक्ति की लहर ऐसी थी कि लोगों ने जर्मन नामों से नफरत के चलते राजधानी ‘सेंट पीटर्सबर्ग’ का नाम बदलकर ‘पेट्रोग्राद’ रख दिया। लेकिन यह उत्साह चंद हफ्तों में ही मातम में बदल गया, जब 1914 के अंत तक टैनेनबर्ग की लड़ाई (Battle of Tannenberg) में रूस बुरी तरह पराजित हो गया। और रूसी सेना लगभग नष्ट हो गई।

रूसी क्रांति 1917 ज़ार निकोलस का अंत (Russian Revolution 1917 Fall of Tsar Nicholas)

और फिर 1915 में ज़ार निकोलस द्वितीय ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उसके ताबूत में आखिरी कील ठोक दी। उसने सेना की सीधी कमान अपने हाथों में ले ली और राजधानी छोड़कर सीधे युद्ध के मोर्चे पर चला गया।

और उससे भी बुरा हुआ रूस की राजधानी में। ज़ार के जाने के बाद सत्ता की बागडोर उसकी पत्नी महारानी अलेक्जेंड्रा के हाथ में आ गई, जो खुद एक जर्मन राजकुमारी थी। युद्ध के वक्त एक जर्मन महारानी का रूस पर राज करना… जनता की नजर में देशद्रोह जैसा था।

यहीं रासपुतिन की भूमिका ख़तरनाक हद तक बढ़ी। शाही परिवार का इकलौता बेटा, ज़ारेविच अलेक्सेई, जो हीमोफ़ीलिया यानि एक लाइलाज ख़ून की बीमारी से पीड़ित था, रासपुतिन, जिसकी कोई डॉक्टरी शिक्षा नहीं थी, शायद सम्मोहन या मनोवैज्ञानिक से अलेक्सेई के दौरे शांत करने में कामयाब हो जाता, इसके बाद महारानी को यकीन हो गया कि रासपुतिन ईश्वर का भेजा हुआ मसीहा है।

धीरे-धीरे रासपुतिन ने सरकारी नियुक्तियों तक में दख़ल देना शुरू कर दिया, मंत्रियों की नियुक्तियों, चर्च के पदों और यहाँ तक कि सैन्य फैसलों में दखल देना शुरू कर दिया। वही महारानी उसकी हर सलाह को “गॉड की इच्छा” मानती थी। जनता और रईसों में अफवाहें फैल गईं कि महारानी अलेक्जेंड्रा जर्मनी के लिए जासूसी कर रही हैं और रासपुतिन रूस को चला रहा है। जिससे राजशाही की छवि तेज़ी से गिरने लगी।

1917 की फरवरी क्रांति

इसी बीच, युद्ध का असली बोझ आम जनता पर पड़ रहा था। लाखों सैनिक मारे जा रहे थे, शहरों में रोटी, ईंधन, यहाँ तक कि बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों की भयंकर कमी हो गई, रेलवे व्यवस्था युद्ध और अव्यवस्था के बोझ तले चरमरा गई थी।

दिसंबर 1916 को रासपुतिन की हत्या हो जाती है लेकिन उससे कुछ नहीं बदला, नुक़सान बहुत पहले हो चुका था। फ़रवरी 1917 तक, पेट्रोग्राद की सड़कों पर रोटी की क़तारों में खड़ी महिलाएं ग़ुस्से से भर चुकी थीं। 23 फ़रवरी 1917, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हज़ारों महिला मज़दूर सड़कों पर उतर आईं, और जिन्होंने नारा दिया रोटी दो! धीरे-धीरे यह जुलूस कुछ ही दिनों में एक विशाल, शहर-व्यापी हड़ताल में बदल गया।

रूसी क्रांति 1917 ज़ार निकोलस का अंत (Russian Revolution 1917 Fall of Tsar Nicholas)

सेना की बगावत और 300 साल के साम्राज्य का अंत

सबसे निर्णायक पल तब आया जब ज़ार ने दंगे कुचलने के लिए सैनिकों को हुक्म दिया, और सैनिकों ने, जो ख़ुद भी थके, भूखे, और युद्ध से तंग आ चुके थे, अपने ही अफ़सरों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी, हथियार डाल दिए, या प्रदर्शनकारियों के साथ मिल गए। सेना का साथ खोना ज़ार के लिए अंत की शुरुआत थी, बिना वफादार सेना के, कोई भी निरंकुश सत्ता एक दिन नहीं टिक सकती।

2 मार्च 1917 को, ज़ार निकोलस की शाही ट्रेन बीच रास्ते में ही रोक ली गई। अपने ही जनरलों की सलाह पर, निकोलस द्वितीय बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गद्दी छोड़ने के दस्तावेज़ पर दस्तखत कर दिए। जिस रोमानोव राजवंश ने 300 सालों तक राज किया, जिसने पीटर द ग्रेट और कैथरीन द ग्रेट जैसे महान शासक दिए… वह राजवंश कुछ ही हफ्तों की भूख, थकान और बगावत में ख़त्म हो गया।

ज़ार के पतन के बाद पूरे रूस ने जश्न मनाया। लेकिन यह अंत नहीं बल्कि कहीं अधिक खूनी और भयानक तूफान की शुरुआत थी। सत्ता का खालीपन अब दो प्रतिद्वंद्वी ताकतों के बीच फंस चुका था, एक तरफ अमीरों की ‘अस्थायी सरकार’, और दूसरी तरफ मजदूरों व सैनिकों की ‘सोवियत’।

जल्द ही स्विट्जरलैंड में निर्वासित एक कट्टरपंथी रूसी क्रांतिकारी ‘सीलबंद ट्रेन’ में बैठकर वापस रूस की तरफ़ लौटने वाला था, जो इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल देगा और कैसे इतिहास का सबसे बड़ा तख्तापलट कर दुनिया की पहली कम्युनिस्ट सरकार की स्थापना करेगा। देखिए अगले एपिसोड 1917: फरवरी और अक्टूबर, रूसी क्रांति।

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