रूस का इतिहास: खूनी रविवार, 22 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में क्या हुआ था? (भाग 14)

22 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में 1.4 लाख निहत्थे मजदूर अपने बच्चों के साथ ज़ार से सिर्फ 8 घंटे का काम और रोटी मांगने विंटर पैलेस पहुंचे। लेकिन ज़ार की सेना ने उन पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। जानिए कैसे 'खूनी रविवार' ने ज़ारशाही के प्रति सदियों पुरानी आस्था को हमेशा के लिए कत्ल कर दिया।

1905 की रूसी क्रांति खूनी रविवार (1905 Russian Revolution Bloody Sunday): 22 जनवरी 1905 की सुबह, सेंट पीटर्सबर्ग की बर्फ़ीली सड़कों परहज़ारों मजदूर अपने बीवी-बच्चों के साथ विंटर पैलेस की तरफ बढ़ रहे थे। उन्होंने अपने सबसे अच्छे कपड़े पहन रखे थे। कुछ के हाथों में चर्च के प्रतीक-चिह्न हैं,तो कुछ ज़ार निकोलस द्वितीय और उसके परिवार की तस्वीरें लिए, गा रहे थे “गॉड सेव द ज़ार”, यानि रूस का राष्ट्रगान।

ये कोई क्रांतिकारी भीड़ नहीं बल्कि विंटर पैलेस की तरफ़ एक शांतिपूर्ण जुलूस में चल रहे थे, अपने “पिता” समान ज़ार से सीधी विनती करने, थोड़ी सी बेहतर मजदूरी, आठ घंटे का कार्य-दिवस, थोड़ी इंसानी गरिमा मांगने के लिए। उनके साथ चल रहा है एक पादरी, फ़ादर गेपॉन, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था। पर जैसे ही जुलूस विंटर पैलेस के क़रीब पहुंचता है, कुछ ऐसा होता है जो पूरे रूस की आत्मा को झकझोर देगा।

यही 1905 की पहली क्रांति का सबसे गहरा विरोधाभास है, ये मज़दूर ज़ार के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे वफ़ादार समर्थक थे, जो सदियों पुरानी रूसी धारणा में विश्वास रखते थे कि ज़ार अच्छा और पवित्र है, सारी बुराई सिर्फ उसके भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों में होता है। तो फिर उस एक रविवार की दोपहर को ऐसा क्या हुआ जिसने सदियों पुरानी उस आस्था को एक झटके में राख कर दिया? कैसे ज़ार के लिए जयकारे लगाने वाली भीड़, उसी रात ज़ारशाही की गर्दन काटने के लिए तैयार हो गई? देखेंगे इस एपिसोड में ।

रूस का इतिहास खूनी रविवार, 22 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में क्या हुआ था (भाग 14)

22 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में क्या हुआ था?

1904 के आख़िर तक, रूस-जापान युद्ध की शर्मनाक हार, महंगाई और भुखमरी ने मज़दूर वर्ग में गहरा असंतोष भर दिया था। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र का एक चेहरा फ़ादर गेपॉन, जो ख़ुद गुप्त पुलिस के इशारे पर बनाए गए एक “सरकार-समर्थित” मज़दूर संगठन का नेता था ।

यहाँ इतिहास मे एक शब्द आता है पुलिस समाजवाद यानि मजदूरों को मार्क्सवादियों और क्रांतिकारियों से दूर रखने के लिए सरकार खुद अपने वफादार संगठन बनाया, ताकि मजदूरों का गुस्सा ज़ार के खिलाफ न भड़के। फादर गेपॉन इसी सरकारी यूनियन का नेता था। मज़दूरों की शिकायतों को फादर गेपॉन ने एक याचिका में बदला।

यह याचिका बेहद विनम्र भाषा में लिखी गई थी, जिसमे ज़ार को “प्रभु” कहकर संबोधित करते हुए, उससे विनती की गई कि वो अपनी “बुद्धिमान सत्ता” से मज़दूरों की तकलीफ़ें सुने। जिसमे मजदूरों की मांग थी 8 घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मज़दूरी, और कुछ बुनियादी नागरिक अधिकार।

लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उस दिन ज़ार निकोलस द्वितीय विंटर पैलेस में मौजूद ही नहीं था! कुछ इतिहासकर बताते है कि वह शहर से 25 किलोमीटर दूर, अपने निजी महल सार्सकोए सेलो में आराम फरमा रहा था और शायद उसे इस विशाल जुलूस की गंभीरता का सही अंदाज़ा नहीं था।

1905 की रूसी क्रांति खूनी रविवार

शहर की कमान पूरी तरह सैन्य कमांडरों के हाथ में छोड़ दी गई थी। सैन्य कमांडरों को, बिना ज़ार के सीधे आदेश के, यह डर सताने लगा कि इतनी बड़ी भीड़, अनुमानतः 1 लाख 40 हज़ार से ज़्यादा लोग, महल पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर सकती है। जब कमांडरों ने देखा कि 1 लाख 40 हज़ार से ज्यादा लोगों का अंतहीन जुलुस अलग-अलग दिशाओं से महल की ओर बढ़ रहा है… तो उन्हें लगा कि यह महल पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर सकती है। 

जैसे ही निहत्थे जुलूस के अलग-अलग हिस्से पैलेस स्क्वायर और शहर के दूसरे केंद्रीय इलाक़ों के क़रीब पहुंचे, बिना किसी चेतावनी के, पहली कतार के सैनिकों ने घुटनों के बल बैठकर निशाना साधा। पहली गोली चली। फिर दूसरी… और फिर लगातार राइफलों की तड़तड़ाहट! पादरी गेपॉन के ठीक बगल में खड़ा आदमी सिर में गोली लगने से गिर पड़ा। क्रॉस और ज़ार की तस्वीरें बर्फ पर बिखर गईं।

नतीजा भयावह था। सटीक मरने वालों की संख्या आज भी विवादित है, सरकारी आंकड़े कुछ सौ बताते हैं, जबकि अन्य अनुमान इसे हज़ार से ज़्यादा तक ले जाते हैं, पर संख्या से ज़्यादा अहम था इसका प्रतीकात्मक असर। निहत्थे, ज़ार के प्रति वफ़ादार, चर्च के आइकॉन और ज़ार की तस्वीरें लिए हुए लोगों पर गोलियां चलाई गई थीं।

रूस का इतिहास खूनी रविवार, 22 जनवरी 1905 को सेंट पीटर्सबर्ग में क्या हुआ था (भाग 14)

अक्टूबर मैनिफेस्टो क्या था?

इतिहास ने इस काले दिन को नाम दिया: खूनी रविवार (Bloody Sunday)। उस एक दिन की गोलियों ने वह कर दिखाया जो पचास साल में क्रांतिकारी प्रचारक नहीं कर पाए थे। साथ ही सदियों पुरानी धारणा भी टूट गई, कि अच्छा ज़ार कभी अपनी जनता को नुक़सान नहीं पहुंचा सकता। ज़ार को अब सीधे तौर पर अपनी ही जनता के ख़ून का ज़िम्मेदार माना जाने लगा।

खूनी रविवार की खबर पूरे साम्राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गई। अगले कुछ महीनों में देशभर में लाखों मजदूर हड़ताल पर चले गए। ट्रेनें थम गईं, बिजली कट गई। किसानों ने भी विद्रोह शुरू कर दिया, सैन्य बग़ावतों की बाढ़ आ गई, जिसमें सबसे मशहूर था बैटलशिप पोतेमकिन पर नाविकों की बग़ावत, जहाँ नाविकों ने अपने ही क्रूर अफसरों को समंदर में फेंककर लाल झंडा फहरा दिया।

लेकिन  सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब हड़ताल को चलाने के लिए मजदूरों ने कारखानों से अपने-अपने प्रतिनिधि चुनकर एक नई लोकतांत्रिक परिषद बनाई, जिसे रूसी में कहा गया सोवियत और यही सेंट पीटर्सबर्ग सोवियत के मंच से एक 26 साल का जोशीला नौजवान पहली बार इतिहास के पन्नों पर उभरा—लियोन ट्रॉट्स्की! यह सोवियत आगे चलकर पूरे रूसी इतिहास का सबसे ताकतवर राजनीतिक ढांचा बनने वाली थी।

अक्टूबर मैनिफेस्टो क्या था?

दबाव इतना बढ़ गया कि अक्टूबर 1905 में, निकोलस द्वितीय को मजबूरन एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ पर दस्तख़त करने पड़े, जिसे इतिहास में कहा गया अक्टूबर मैनिफ़ेस्टो”। रूस के 300 साल के रोमानोव इतिहास में पहली बार नागरिकों को बोलने, संगठन बनाने और प्रेस की बुनियादी आजादी मिली और इस घोषणापत्र में सबसे बड़ी बात थी, रूस की पहली निर्वाचित राष्ट्रीय संसद—“स्टेट ड्यूमा” के गठन का ऐलान हुआ। यानि अब बिना ड्यूमा की मंजूरी के कोई कानून पास नहीं हो सकता था। यह रूसी इतिहास में निरंकुश सत्ता पर पहला बड़ा, औपचारिक अंकुश था।

लेकिन जैसे ही सड़कों से हड़तालें खत्म हुईं, निकोलस द्वितीय फिर से ड्यूमा की शक्तियां सीमित करनी शुरू कर दीं, इसे बार-बार भंग किया, चुनावी नियम बदले गए ताकि संसद में रईस और धनी वर्ग का दबदबा बना रहे। 1905 की क्रांति दबा तो दी गई, पर मिटी नहीं, यह एक पूर्वाभ्यास साबित हुई, एक आने वाले, कहीं बड़े तूफ़ान का, जो सिर्फ़ एक दशक बाद, एक विश्वयुद्ध के दबाव में, ज़ार-तंत्र को हमेशा के लिए निगल जाएगा।

आखिर कैसे ज़ार की नासमझी ने अपने खोखले साम्राज्य को पहले विश्वयुद्ध की भट्टी में झोंक दिया…और कैसे महल में दाखिल हुए एक रहस्यमयी संन्यासी रासपुतिन ने 300 साल पुराने रोमानोव साम्राज्य की कब्र खोद दी? जानंगे अगले एपिसोड में।

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