रूस का इतिहास: बिना लड़े इवान द ग्रेट ने कैसे खत्म की 240 साल की मंगोल राज? (भाग 3)

1480 की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में उग्रा नदी के दोनों किनारों पर दो विशाल सेनाएं हफ्तों तक आमने-सामने खड़ी रहीं, लेकिन एक भी तीर नहीं चला। जानिए कैसे इवान द ग्रेट ने अपनी कूटनीति और धैर्य से 240 साल पुराने मंगोल जुए को तोड़कर मॉस्को को "तीसरा रोम" बना दिया।

इवान द ग्रेट रूस का इतिहास (Ivan The Great Russia History in Hindi): 1480 की शरद ऋतु। एक बार फिर रूस की सीमा पर हाड़ कंपा देने वाली ठंड में उग्रा नदी के दोनों किनारों पर दो विशाल सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। एक तरफ मॉस्को के ग्रैंड प्रिंस इवान तृतीय की सेना, और दूसरी तरफ गोल्डन होर्ड के सबसे ताकतवर ख़ान अख़मत की सेना। दिन बीते, फिर हफ्ते बीत गए। दोनों सेनाएं सिर्फ एक-दूसरे को घूरती रहीं। न कोई आमने-सामने का हमला हुआ, न तलवारें टकराईं। 

और फिर अचानक, बिना किसी बड़ी लड़ाई के, अख़मत की सेना पीछे हट गई। 240 साल की वो भयानक गुलामी, जो रियाज़ान और कीव की राख से शुरू हुई थी, एक ऐसे पल में खत्म हो गई जब किसी ने तलवार तक नहीं उठाई।  पर सवाल यह उठता है, अगर मंगोल सेना अब भी इतनी बड़ी थी, तो वो पीछे क्यों हटी? क्या यह सिर्फ मौसम और सर्दी की वजह से था, या मॉस्को इतना ताकतवर हो चुका था कि मंगोल ख़ुद डर गए? और शायद इससे भी बड़ा रहस्य, इवान III, जिसे इतिहास में “इवान द ग्रेट” कहा जाता है, आख़िर किस चालाकी से एक मामूली रियासत को इतना ताकतवर बना पाया कि वो सदियों पुराने मंगोल शासन को चुनौती दे सका?

बिखरी हुई ज़मीनों का एकीकरण: ‘सोबिरानिए ज़ेमेल’ और नोवगोरोद का पतन

15वीं सदी के मध्य तक, गोल्डन होर्ड ख़ुद कमज़ोर पड़ने लगा था, आंतरिक लड़ाइयों से टूटकर कई छोटे खानतों में बंट गया: कज़ान, क्रीमिया, अस्त्राख़ान। वहीं दूसरी तरफ मॉस्को, जो कभी टैक्स वसूलने वाली एक छोटी रियासत थी, धीरे-धीरे आस-पास की रियासतों को निगलने लगा, कभी शादी के गठजोड़ से, कभी पैसों से ख़रीदकर, कभी सीधी सैन्य ताक़त से। 

1462 में गद्दी पर बैठा 22 साल का एक शांत, दूरदर्शी और कठोर शासक इवान तृतीय, जिसे इतिहास “इवान द ग्रेट” कहेगा। इवान की नीति को रूसी में कहा गया “सोबिरानिए ज़ेमेल” यानी बिखरी हुई रूसी ज़मीनों को इकट्ठा करना।

उसने शादी के गठजोड़ों से, पैसों से ज़मीनें खरीदकर और जहाँ ज़रूरत पड़ी, वहाँ सीधी सैन्य ताक़त से रियासतों को निगलना शुरू किया। उसकी सबसे बड़ी जीत थी 1478 में नोवगोरोद गणराज्य का पतन। नोवगोरोद उस दौर का एक बेहद अमीर, लोकतांत्रिक और स्वतंत्र व्यापारिक शहर था। इवान ने नोवगोरोद की संसद का मशहूर घंटा उखड़वा कर मॉस्को मंगवा लिया, यह संदेश था कि रूस में अब जनता का नहीं, सिर्फ एक शासक का हुक्म चलेगा। इवान सिर्फ ज़मीन नहीं जोड़ रहा था, वो एक नई पहचान भी गढ़ रहा था। 

रूस का इतिहास बिना लड़े इवान द ग्रेट ने कैसे खत्म की 240 साल की मंगोल राज (भाग 3)

सोफ़िया पेलियोलोगिना से शादी और ‘तीसरा रोम’ की परिकल्पना

1453 में कॉन्स्टेंटिनोपल, ऑर्थोडॉक्स ईसाई दुनिया की राजधानी, ऑटोमन तुर्कों के हाथों गिर चुका था। इवान ने बाइज़ेंटाइन साम्राज्य की आख़िरी राजकुमारी, सोफ़िया पेलियोलोगिना से शादी की, और ख़ुद को बाइज़ेंटाइन विरासत का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उसने दो सिर वाले ईगल को रूस का राष्ट्रीय प्रतीक बनाया जो आज भी रूस के कोट ऑफ आर्म्स पर दिखता है। यहीं से जन्म हुआ एक अमर विचार का “तीसरा रोम” ।

विचार बिल्कुल साफ था: पहला रोम बर्बर कबीलों के हाथों गिरा, दूसरा रोम तुर्कों के हाथों गिरा और अब मॉस्को असली ईसाई सभ्यता का आख़िरी गढ़ है। 

जब इवान तृतीय ने टैक्स देने से किया इनकार

और अब यहीं वो पल आता है जो सब कुछ बदल देता है। 1476 में इवान ने गोल्डन होर्ड को टैक्स देना बंद कर दिया, एक ऐसा काम जो पिछले 240 सालों में  किसी रूसी राजकुमार ने करने की हिम्मत नहीं की थी। ख़ान अख़मत ने इसे चुनौती माना और 1480 में रूस को कुचलने के लिए एक विशाल सेना लेकर निकल पड़ा। लेकिन इससे पहले ख़ान अख़मत पोलैंड और लिथुआनिया के शक्तिशाली राजा कैसिमिर IV के साथ एक गुप्त समझौता किया जिसमे मॉस्को को दोनो तरफ से घेरने का प्लान बनाया गया। 

इवान III को इस गठबंधन की भनक लग गई थी। उसने मंगोलों के ही एक दुश्मन क्रीमिया के ख़ान से हाथ मिला लिया। इवान के कहने पर क्रीमियाई मंगोलों ने ठीक उसी वक्त लिथुआनिया के दक्षिणी हिस्सों पर हमला कर दिया। नतीजा यह हुआ कि लिथुआनिया का राजा अपनी सेना लेकर ख़ान अख़मत की मदद करने आ ही नहीं सका। अख़मत अकेला पड़ गया। 

पर उग्रा नदी पर जो हुआ, वो शायद इतिहास की सबसे कम-खूनी लेकिन सबसे बड़े असर वाली घटनाओं में से एक थी। दोनों तरफ की सेनाएं हफ़्तों तक रुकी रहीं। मंगोलों की ताकत उनकी घुड़सवार सेना थी, लेकिन भारी बर्फबारी के कारण उनके घोड़ों के लिए चारा खत्म हो रहा था और सेना में रसद की भारी किल्लत हो गई। वहीं दूसरी तरफ, रूसी सेना अपने घर के करीब थी, इसलिए उनके पास गर्म कपड़ों, बारूद और रसद का भरपूर भंडार था।

और तभी इवान तृतीय ने अपना सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला।

जब ख़ान अख़मत अपनी पूरी ताकत झोंककर उग्रा नदी पर खड़ा था, इवान ने अपनी एक चुनिंदा लड़ाकू टुकड़ी को वोल्गा नदी के रास्ते मंगोलों की राजधानी ‘सराय’ पर सीधा हमला करने भेज दिया। जब अख़मत को खबर मिली कि उसकी गैर-मौजूदगी में उसकी खुद की राजधानी और उसके घर तबाह हो रहे हैं, तो उसका हौसला पूरी तरह टूट गया। चारों तरफ से घिरे अख़मत के पास पीछे हटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। और कुछ महीनों बाद अपने ही एक प्रतिद्वंद्वी ख़ान के हाथों मारा गया।

इवान द ग्रेट रूस का इतिहास (Ivan The Great Russia History in Hindi)

निरंकुश सत्ता की नींव: इवान द ग्रेट रूस का इतिहास

240 साल का मंगोल जुआ, जिसने रूस की राजनैतिक आत्मा को गढ़ा था, आख़िरकार टूट गया, बिना किसी बड़े युद्ध के, सिर्फ धैर्य और कमज़ोर पड़ते दुश्मन की वजह से। इवान III अब सिर्फ मॉस्को का राजकुमार नहीं था, वो ख़ुद को “सभी रूस का शासक” कहलाने लगा, एक ऐसा ख़िताब जो निरंकुश सत्ता की नींव रखता था। उसने जो इमारत खड़ी की, उस पर आने वाली पीढ़ी एक ऐसा अध्याय लिखने वाली थी, जो इतिहास में आतंक का दूसरा नाम बन जाएगा।

वह 16 साल का लड़का जिसने खुद को रूस का पहला “ज़ार” घोषित किया। कैसे एक सुधारवादी राजा ने अपनी ही जनता पर खूंखार ‘ब्लैक राइडर्स’ छोड़ दिए और गुस्से में अपने ही सगे बेटे की हत्या कर दी? जानने के लिए देखिए अगला एपिसोड: इवान द टेरिबल—पहला ज़ार और आतंक का राज।

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