अलेक्जेंडर द्वितीय की हत्या नरोदनाया वोल्या (Assassination of Alexander II Narodnaya Volya): 1 मार्च 1881, सेंट पीटर्सबर्ग की कैथरीन नहर। ज़ार अलेक्ज़ेंडर द्वितीय अपनी बख्तरबंद घोड़े-गाड़ी में गुज़र रहे होते है। तभी एक युवक भीड़ से निकलकर गाड़ी के नीचे एक बम फेंकता है। जोरदार धमाका होता है, गाड़ी क्षतिग्रस्त होती है, पर ज़ार बाल-बाल बच जाता है। वो गाड़ी से बाहर निकलकर घायल सैनिकों की मदद करने जाता है, और तभी, भीड़ में छुपा एक दूसरा हमलावर, ठीक उसके पैरों के पास एक दूसरा बम फेंकता है। सफेद बर्फ पर खून का लाल फव्वारा फूट चुका था।
रूस के सबसे शक्तिशाली सम्राट ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय के दोनों पैर चिथड़े बनकर उड़ चुके थे। और यह हत्या ठीक उसी दिन हुई, जब वे एक नए, सीमित संवैधानिक सुधार के मसौदे—“लोरिस-मेलिकोव संविधान” पर दस्तखत करने वाले थे! अगर वह हस्ताक्षर हो जाते, तो शायद रूस को पहली बार संसद मिल जाती और इतिहास की पूरी दिशा ही बदल जाती।
इतिहास की सबसे खौफनाक विडंबना देखिए:
जिस ज़ार ने सर्फडम यानी दास प्रथा खत्म की, न्यायपालिका में जूरी ट्रायल शुरू किया और स्थानीय स्वशासन की नींव रखी… उसी को क्रांतिकारियों ने अपना सबसे बड़ा दुश्मन क्यों माना? उसे मारने के लिए सात बार जानलेवा हमले क्यों किए गए? आख़िर ऐसे कौन से लोग थे जो सुधार से भी संतुष्ट नहीं थे, बल्कि सुधारक को ही मिटाना चाहते थे?

जब गाँव वालों ने ही मसीहाओं को जेल भिजवा दिया
पिछले एपिसोड में हमने देखा 1861 के अधूरे और धोखे भरे मुक्ति-सुधारों ने पढ़े-लिखे युवाओं यानी रूस के “इंटेलिजेंसिया” में गहरी निराशा पैदा कर चुका था। 1860-70 के दशक में एक नया आंदोलन उभरा, नरोदनिज़्म (Narodism), यानी “जनता की तरफ़ जाओ।” हज़ारों शहरी, पढ़े-लिखे युवा, कई तो अमीर घरानों से, गांव-गांव गए, ताकि वे किसानों को उनके अधिकारों और क्रांति के लिए जगा सकें।
लेकिन यह आंदोलन बुरी तरह नाकाम रहा।
किसान इन बाहरी शहरी युवाओं पर भरोसा नहीं करते थे, कई जगह तो उन्हें ख़ुद पुलिस को सौंप दिया गया। गाँवों से मिले इस अपमान और नाकामी से एक नई कट्टरपंथी सोच ने जन्म लिया,
“अगर जनता खुद जागने को तैयार नहीं है, तो हमें गोलियों और धमाकों की गूंज से इस सोए हुए मुल्क को जगाना होगा”
‘नरोदनाया वोल्या’ का गठन
इसी सोच से 1879 में जन्म हुआ पहले अराजकतावादी संगठन का, जिसका मतलब था जनता की इच्छा। उनका तर्क सीधा था, रूस की पूरी निरंकुश व्यवस्था की धुरी खुद ज़ार है। अगर उस धुरी को ही उड़ा दिया जाए, तो पूरा तंत्र हिल जाएगा और जनता बगावत कर देगी और इससे आम जनता में क्रांतिकारी चेतना जागेगी।
अलेक्ज़ेंडर द्वितीय पर 1866 से लेकर 1880 तक कई बार जानलेवा हमले हुए, कभी जार पर गोली गोलियां दागीं गई, तो कभी शाही ट्रेन को उड़ाने के लिए पटरी के नीचे सुरंग खोदकर धमाका किया गया तो कभी डायनामाइट से विंटर पैलेस के डाइनिंग हॉल तक उड़ा दिया गया। लेकिन हर बार जार बाल-बाल बचता रहा, लेकिन संगठन भी हार नहीं मानी।
1 मार्च 1881 की सुबह ज़ार ने “लोरिस-मेलिकोव संविधान” के मसौदे पर हस्ताक्षर करने का मन बना लिया, जो आम नागरिकों को कानून बनाने में भागीदारी देने की पहली शुरुआत बन सकता था। लेकिन कैथरीन नहर के पास हुए बम धमाके ने रूस के संवैधानिक भविष्य को हमेशा के लिए दफन कर दिया। जार सहित कई सैनिक मारे जा चुके थे।

जिस जनता को जगाने के लिए यह विस्फोट किया गया था वह सड़कों पर क्रांति करने नहीं उतरी; उलटा आम जनता अपने ज़ार की मौत पर शोक मनाने लगी।
अलेक्जेंडर तृतीय का ‘लोहे का दौर’: दमन और ‘ओख्राना’ का उदय
अब कुछ ऐसा होने वाला था, जिसने पूरे रूस को दोबारा निरंकुशता की भट्टी में झोंक दिया। ज़ार की मौत के कुछ ही घंटों बाद, उसका बेटा गद्दी पर बैठा- अलेक्ज़ेंडर तृतीय। उसने अपने पिता की हत्या से बिल्कुल उलटा सबक सीखा। उसने उस संवैधानिक प्रस्ताव को कूड़ेदान में फेंक दिया और कसम खाई कि रूस पर सिर्फ ज़ार का अटूट शासन चलेगा, और निरंकुश सत्ता को और मज़बूत करना ही एकमात्र रास्ता है।
अलेक्जेंडर तृतीय ने रूस में भयंकर दमन-चक्र शुरू किया।
गुप्त पुलिस—“ओख्राना” (Okhrana) को असीमित अधिकार दिए गए। सेंसरशिप सख्त कर दी गई, स्थानीय स्वशासन की शक्तियां घटाई गईं, और जनता के गुस्से को भटकाने के लिए यहूदियों के खिलाफ खूनी दंगे—यानी ‘पोग्रोम’ भड़काए गए। नरोदनाया वोल्या के नेताओं को फांसी पर लटका दिया गया और संगठन को कुचल दिया गया।
पर इस दमन ने क्रांतिकारी सोच को मिटाया नहीं, बल्कि उसे और गहरा, और संगठित बना दिया।
आतंकवाद से वैज्ञानिक समाजवाद तक
1887 में जब नरोदनाया वोल्या के बचे-खुचे छात्रों ने नए ज़ार को भी बम से उड़ाने की कोशिश की, तो एक होनहार छात्र अलेक्जेंडर उल्यानोव को फांसी दे दी गई।
फांसी के तख्ते पर लटके उस 21 साल के भाई की लाश देखकर उसके 17 साल के छोटे भाई ने इतिहास बदलने की कसम खाई उस छोटे भाई का नाम था व्लादिमीर उल्यानोव – जिसे आगे चलकर दुनिया ‘लेनिन’ के नाम से जानने वाली थी। अब अगली पीढ़ी के क्रांतिकारियों ने आतंकवाद की जगह विचारधारा पर ज़ोर दिया, ख़ासकर एक नया, यूरोपीय विचार जो रूस में तेज़ी से जड़ें जमा रहा था: मार्क्सवाद
और अब क्रांति का हथियार बम नहीं… बल्कि कार्ल मार्क्स की विचारधारा होने वाली थी। लेकिन दूसरी तरफ रूस एक नई और खतरनाक अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की ओर बढ़ रहा था—सुदूर पूर्व में, एशिया की एक उभरती हुई शक्ति के साथ टकराव की तरफ, जो जल्द ही रूसी साम्राज्य के “अजेय” होने के घमंड को हमेशा के लिए तोड़ने वाला था।
जानने के लिए देखिए अगला एपिसोड: एक साम्राज्य की शर्मिंदगी, रूस-जापान युद्ध और खूनी रविवार।
