रूस का इतिहास: जब करोड़ों रूसी गुलामों को मिली आज़ादी और रूस में भड़क उठी बगावत (भाग 11)

3 मार्च 1861 को ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय ने ढाई करोड़ रूसी गुलामों (सर्फ़) को आज़ाद कर इतिहास रच दिया। लेकिन इस आज़ादी की खबर सुनकर किसानों ने जश्न मनाने के बजाय दंगे शुरू कर दिए। जानिए कैसे ज़मीन की 49 साल की किश्तों ने इस मुक्ति को एक नए आर्थिक शिकंजे में बदल दिया।

सर्फडम का अंत रूस 1861 (Emancipation of Serfs Russia 1861): 3 मार्च 1861, रूस भर के हज़ारों गाँवों के चर्च चौकों में एक शाही दस्तावेज़ पढ़ा जा रहा था। कहीं पादरी इसे ऊँची आवाज़ में पढ़ रहे थे, तो कहीं लोग सिर्फ कानों में फुसफुसा रहे थे। इस फरमान में लिखा था कि रूस के करोड़ों सर्फ़ यानि भूदास, जो सदियों से ज़मीन और मालिक की निजी जागीर माने जाते थे, जिन्हें मवेशियों की तरह खरीदा-बेचा जाता था और ताश के पत्तों पर दांव पर लगा दिया जाता था… वे सब आज से आज़ाद नागरिक हैं।

पर हैरानी की बात यह है कि इस “आज़ादी” की ख़बर सुनकर, कई जगहों पर किसानों ने ख़ुशी नहीं, बल्कि दंगे शुरू कर दिए।  कई जगहों पर अधिकारियों को पीटा गया, ज़मींदारों के दफ्तर फूंक दिए। एक ऐतिहासिक क़ानून, जो लाखों इंसानों को ग़ुलामी से मुक्त कर रहा था… फिर भी वही लोग सड़कों पर उतरकर विरोध क्यों कर रहे थे?

यही है 1861 के इस तथाकथित “मुक्ति सुधार” का सबसे बड़ा विरोधाभास।

ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय ने इसे रूसी इतिहास का सबसे महान कदम बताया। पूरी दुनिया ने ज़ार को “द लिबरेटर” यानि मुक्तिदाता का खिताब दिया। पर अगर यह सच में इतना बड़ा वरदान था, तो फिर उन्हीं किसानों में इतना ग़ुस्सा और निराशा क्यों फैली, जिन्हें यह “आज़ादी” दी गई थी? क्या यह आज़ादी असली थी, या सिर्फ़ काग़ज़ पर?

सर्फडम का अंत रूस 1861 (Emancipation of Serfs Russia 1861)

ज़ार अलेक्जेंडर द्वितीय की राजनीतिक मजबूरी और रईसों का दबाव

19वीं सदी के मध्य तक, रूस यूरोप का लगभग आख़िरी बड़ा देश था जहां सर्फ़डम यानि भूदास प्रथा अब भी क़ायम थी। रूस में लगभग आधी आबादी, क़रीब 2 करोड़ 30 लाख किसान, सीधे ज़मींदारों की “संपत्ति” थे, और जो बाक़ी बचे थे वो सरकारी ज़मीन पर बंधुआ मज़दूर की तरह काम करते थे।

1853 से 1856 के बीच लड़े गए क्रीमियाई युद्ध में ब्रिटेन, फ्रांस और ऑटोमन साम्राज्य ने रूस को उसकी अपनी ही ज़मीन पर पराजित कर चुका था। रूस की विशाल सेना, जो कभी नेपोलियन को हरा चुकी थी, इस हार ने रूस के खोखलेपन को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया। यूरोप में औद्योगीकरण हो चुका था, रेलगाड़ियाँ दौड़ रही थीं, फैक्ट्रियां चल रही थीं।

वही औद्योगिक सेनाओं के सामने रूस बुरी तरह पिछड़ रही थी, क्योंकि पिछड़ी हुई सर्फ़-आधारित अर्थव्यवस्था आधुनिक हथियार, रेलवे, या औद्योगिक उत्पादन नहीं दे पा रही थी। नए ज़ार अलेक्ज़ेंडर द्वितीय को साफ़ दिखने लगा, अगर रूस को महाशक्ति बने रहना है, तो सर्फ़डम को ख़त्म करना ही होगा।

वही दूसरी तरफ ज़ार को डर सता रहा था कि अगर उसने खुद गुलामी खत्म नहीं की, तो रूस में दूसरा विद्रोह भड़केगा और ज़ारशाही का नामोनिशान मिट जाएगा। इस डर का अंदाजा आप इससे लगा सकते है 1856 में ज़ार ने मॉस्को के रईसों को यहाँ तक कह दिया था कि “बेहतर यही है कि हम दासता को ऊपर से खत्म कर दें, इससे पहले कि वह नीचे से खुद-ब-खुद फूटे और हमें उखाड़ फेंके।

49 वर्षों की किश्तों का वित्तीय जाल और किसानों की नई गुलामी

लेकिन सुधार लागू करना आसान नहीं था, क्योंकि इससे सबसे ज़्यादा नुक़सान रईस ज़मींदार वर्ग को होने वाला था, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था और सामाजिक हैसियत मुफ़्त किसान-मज़दूरी पर टिकी थी। सालों की बहस और योजना के बाद, 1861 में मुक्ति सुधार लागू तो हुआ… लेकिन इसके पीछे एक बहुत बड़ा फरेब छुपा था।

किसानों को को व्यक्तिगत आज़ादी तो मिली, वो अब ख़रीदे-बेचे नहीं जा सकते थे, शादी की इजाज़त ले सकते थे, अपनी संपत्ति रख सकते थे। पर ज़मीन, जिस पर वो पीढ़ियों से खेती करते आए थे, उन्हें मुफ़्त में नहीं मिली। ज़मीन की कीमत असलियत से कहीं ज्यादा तय की गई और किसानों पर सरकारी कर्ज़ लाद दिया।

किसानों को यह कर्ज़ 6% ब्याज के साथ 49 सालों तक सालाना किश्तों में चुकाना था! यानी जो किसान कल तक ज़मींदार का गुलाम था, वह अब ज़िंदगी भर के लिए ज़ार का क़र्ज़दार बन गया। ऊपर से सबसे उपजाऊ ज़मीन, जंगल और पानी के रास्ते रईसों ने अपने पास रख लिए। किसानों के हिस्से केवल बंजर टुकड़े आए।

शारीरिक बंधुआ प्रथा से वित्तीय शिकंजे में तब्दील होता रूस

लेकिन यह तो धोखे की शूरवात थी,

जो जमीन किसान की निजी संपत्ति होनी चाहिए थी उस ज़मीन को “मीर” नाम की सामुदायिक ग्राम-परिषद को दी गई, जो सामूहिक रूप से ज़मीन बांटती और भुगतान की ज़िम्मेदारी तय करती थी, इससे किसान को गांव में लगभग बंधा हुआ रहना तय था, यानि जब तक पूरा गाँव अपना टैक्स और किश्त नहीं चुका देता, कोई भी किसान गाँव छोड़कर शहर नहीं जा सकता था।

नतीजा यह हुआ कि “आज़ादी” के बावजूद, ज़्यादातर किसान क़र्ज़, ग़रीबी, और छोटी-छोटी ज़मीनों में फंसे रह गए, कई जगहों पर तो हालात पहले से भी बदतर होने लगे, क्योंकि अब उन्हें पैसे चुकाने पड़ते थे उस चीज़ के लिए जो वो पहले अपनी समझते थे। मुक्ति के बाद के कुछ ही सालों में सैकड़ों किसान-विद्रोह भड़के, क्योंकि उन्हें लगा कि उन्हें धोखा दिया गया है, असली आज़ादी नहीं, बल्कि एक नया, वित्तीय जाल दिया गया है।

1861 में रूस भर में 1,000 से ज्यादा किसान दंगे भड़क उठे। हज़ारों निहत्थे किसान एक स्थानीय नेता एंटोन पेत्रोव के पीछे जमा हुए यह असंतोष सिर्फ़ किसानों तक सीमित नहीं रहा। शहरों में एक नई पीढ़ी के पढ़े-लिखे युवा, जिन्हें “इंटेलिजेंसिया” कहा गया, इस अधूरे सुधार को देखकर और ज़्यादा कट्टरपंथी हो गए।

उन्हें समझ आ गया कि यह व्यवस्था बातचीत या कागज़ी सुधारों से नहीं सुधरने वाली। छात्रों और बुद्धिजीवियों ने गाँव-गाँव जाकर किसानों को जगाने की कोशिश की, जिसे “नरोदनिक आंदोलन” कहा गया। उन्हें लगने लगा कि ज़ार-तंत्र सुधार करने में असमर्थ है, असली बदलाव सिर्फ़ क्रांति से आ सकता है।

इसी माहौल से जन्म ले रहा था एक नए ख़तरनाक विचार, नरोदनिक आंदोलन, अराजकतावाद, और बम व बंदूक़ से लैस क्रांतिकारी संगठन, जो ख़ुद ज़ार को निशाना बनाने से नहीं हिचकेंगे और अलेक्जेंडर द्वितीय की इस दर्दनाक हत्या के बाद ज़ारशाही प्रतिशोध की आग में हर सुधार को कुचल कर फिर से एक निरंकुश सत्ता की स्थापना करेगा। जानने के लिए जुड़े रहिए अगला एपिसोड – गृहयुद्ध की आग में झुलसता रूस।

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