Homeएक्सप्लेनरमहाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी को UNESCO की सूची में मिली जगह, जानिए...

महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी को UNESCO की सूची में मिली जगह, जानिए इन तीनों ग्रंथों की खासियत

महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और कश्मीर के इतिहास को दर्ज करने वाली राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को UNESCO के 'मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर' में शामिल किया गया है। यह फैसला 5 नवंबर को इंडोनेशिया के जकार्ता में हुई बैठक के दौरान लिया गया। इसके साथ ही इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।

- Advertisement -

Mahabharata UNESCO Register: भारत की तीन प्राचीन रचनाएं को अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक नई पहचान मिली है। महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और कश्मीर के इतिहास को दर्ज करने वाली राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को UNESCO के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में शामिल किया गया है। यह फैसला 5 नवंबर को इंडोनेशिया के जकार्ता में हुई बैठक के दौरान लिया गया। इसके साथ ही इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है।

इस फैसले की जानकारी संस्कृति मंत्रालय के PIB Culture ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के मुताबिक, इन तीनों पांडुलिपियों को सूची में शामिल कराने के लिए नामांकन दस्तावेज तैयार करने में संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका चयन भारत की साहित्यिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक परंपरा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

खास बात यह है कि इन तीनों ग्रंथों की पहचान अलग-अलग विषयों से जुड़ी है। महाभारत में धर्म, कर्तव्य और मानवीय संबंधों की चर्चा मिलती है, अर्थशास्त्र में शासन और राजनीति की समझ दिखाई देती है, जबकि राजतरंगिणी कश्मीर के राजाओं और उनके समय के इतिहास को दर्ज करती है।

UNESCO की किस सूची में शामिल हुईं ये पांडुलिपियां?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि UNESCO का ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ कार्यक्रम क्या है। इसकी शुरुआत 1992 में हुई थी। इसका उद्देश्य दुनिया की उन महत्वपूर्ण पांडुलिपियों, दस्तावेजों, अभिलेखों और दूसरे ऐतिहासिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना है, जिनका सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है।

इसी कार्यक्रम के तहत एशिया और प्रशांत क्षेत्र के लिए एक अलग क्षेत्रीय रजिस्टर भी है। महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को इसी क्षेत्रीय रजिस्टर में जगह मिली है। इसे UNESCO की विश्व धरोहर स्थलों वाली सूची से अलग समझना चाहिए।

इस बार चयन का फैसला इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर के 11वें सत्र में हुआ। IGNCA ने तीनों पांडुलिपियों के नामांकन की प्रक्रिया में योगदान दिया।

महाभारत की करीब 400 साल पुरानी पांडुलिपि को मिली पहचान

महाभारत भारतीय साहित्य और दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में गिना जाता है। इसकी कहानी केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध तक सीमित नहीं है। इसमें धर्म, न्याय, सत्ता, कर्तव्य, परिवार और मनुष्य के नैतिक संघर्ष जैसे कई विषयों पर विस्तार से चर्चा मिलती है।

UNESCO के क्षेत्रीय रजिस्टर में जिस पांडुलिपि को शामिल किया गया है, वह लगभग 400 साल पुरानी भोजपत्र की पांडुलिपि है। यह शारदा लिपि में लिखी गई है और पुणे स्थित भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है।

महाभारत की यही विशेषता है कि इसकी कहानियां और विचार सदियों बाद भी साहित्य, दर्शन और समाज में चर्चा का विषय बने हुए हैं। अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों में इसके अनेक रूप देखने को मिलते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: प्राचीन भारत में शासन और राजनीति की समझ

इस सूची में शामिल दूसरा महत्वपूर्ण ग्रंथ कौटिल्य का अर्थशास्त्र है। इसे चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है। यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय शासन व्यवस्था, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और कूटनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

अर्थशास्त्र में केवल राजा और राज्य चलाने की बातें नहीं हैं। इसमें कर व्यवस्था, व्यापार, न्याय, प्रशासन, विदेश नीति, सैन्य रणनीति और राज्य की आर्थिक व्यवस्था जैसे विषयों पर भी विचार मिलता है।

इसकी जिस पांडुलिपि को UNESCO के क्षेत्रीय रजिस्टर में जगह मिली है, वह 16वीं शताब्दी की ताड़पत्र पांडुलिपि है। यह ग्रंथ लिपि में लिखी गई है और मैसूर स्थित ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सुरक्षित रखी गई है।

इस ग्रंथ की अहमियत इस बात में भी है कि यह प्राचीन भारत में शासन और राज्य संचालन को लेकर विकसित विचारों की जानकारी देता है।

राजतरंगिणी: कश्मीर के इतिहास को दर्ज करने वाली 12वीं सदी की रचना

तीसरी रचना राजतरंगिणी है, जिसे 12वीं शताब्दी के विद्वान कल्हण ने लिखा था। भारतीय इतिहास लेखन में इस ग्रंथ का एक खास स्थान है।

राजतरंगिणी में कश्मीर के राजाओं, उनके शासनकाल और उस दौर की राजनीतिक घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण मिलता है। इसमें केवल राजाओं के नाम और उनके शासन की जानकारी नहीं है, बल्कि तत्कालीन समाज और सांस्कृतिक जीवन की झलक भी दिखाई देती है।

इतिहास की दृष्टि से इस ग्रंथ की खासियत यह है कि कल्हण ने अलग-अलग ऐतिहासिक परंपराओं, उपलब्ध जानकारियों और घटनाओं के आधार पर अतीत को दर्ज करने का प्रयास किया था।

UNESCO के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल राजतरंगिणी की पांडुलिपि श्रीनगर स्थित ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में संरक्षित है। यह कश्मीर के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजी स्रोतों में से एक है।

भारत की UNESCO क्षेत्रीय सूची में अब कितनी प्रविष्टियां हैं?

इन तीन नई पांडुलिपियों के शामिल होने के बाद एशिया-पैसिफिक क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियां छह हो गई हैं।

इससे पहले 2024 में भारत की तीन अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाओं को इस रजिस्टर में जगह मिली थी। इनमें तुलसीदास की रामचरितमानस की चित्रित पांडुलिपियां, पंचतंत्र की 15वीं शताब्दी की पांडुलिपि और संस्कृत काव्यशास्त्र से जुड़ा सहृदयालोक-लोचन शामिल हैं।

इस बार महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी के शामिल होने से भारतीय साहित्य, इतिहास और शासन संबंधी परंपराओं के तीन अलग-अलग पहलू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने आए हैं।

भारत में हजारों ऐसी पांडुलिपियां मौजूद हैं, जिनमें इतिहास, चिकित्सा, गणित, खगोल विज्ञान, साहित्य और दर्शन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां दर्ज हैं। इनमें से कई दस्तावेज अलग-अलग संस्थानों और पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं।

पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना क्यों जरूरी है?

पुरानी पांडुलिपियां केवल किसी किताब का प्राचीन संस्करण नहीं होतीं। वे उस दौर की भाषा, लेखन शैली, ज्ञान, सामाजिक परिस्थितियों और विचारों को समझने का माध्यम भी होती हैं।

समय के साथ कागज, भोजपत्र और ताड़पत्र जैसी सामग्री खराब होने लगती है। नमी, तापमान, कीड़े और अनुचित रखरखाव के कारण इनमें दर्ज जानकारी हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है। इसलिए इनके संरक्षण के साथ-साथ डिजिटलीकरण भी जरूरी है, ताकि शोधकर्ताओं और आने वाली पीढ़ियों तक इनकी सामग्री पहुंच सके।

UNESCO के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम का उद्देश्य भी इसी तरह की महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत को सुरक्षित रखना और उसकी उपलब्धता बढ़ाना है।

महाभारत, अर्थशास्त्र और राजतरंगिणी की पांडुलिपियों को मिली यह नई पहचान भारत की उस विरासत की ओर ध्यान खींचती है, जिसमें साहित्य, इतिहास और शासन से जुड़े विचार सदियों से सुरक्षित हैं। इन ग्रंथों को समझना केवल अतीत को जानना नहीं, बल्कि उन विचारों और परंपराओं को समझना भी है जिन्होंने भारतीय समाज और ज्ञान की दुनिया को आकार दिया है।

- Advertisement -

Follow on:

- Advertisement -

Stay Connected

280,000FansLike
4,380FollowersFollow
4,000SubscribersSubscribe

Must Read

- Advertisement -

सभी लेख पढ़ें

- Advertisement -