रूस का इतिहास: जब लेनिन की बोल्शेविक पार्टी ने दुनिया का सबसे बड़ा तख्तापलट किया (भाग 16)

1917 में ज़ार के पतन के बाद रूस में दोहरी सत्ता बन गई थी। लेकिन जब लेनिन एक 'सीलबंद ट्रेन' से रूस लौटे, तो उन्होंने 'रोटी, ज़मीन और शांति' का नारा देकर महज़ 8 महीनों में अस्थायी सरकार को उखाड़ फेंका। जानिए दुनिया को बदलने वाली अक्टूबर की बोल्शेविक क्रांति की दास्तान।

1917 की रूसी क्रांति (1917 Russian Revolution): 3 अप्रैल 1917, पेट्रोग्राद के फ़िनलैंड स्टेशन धुएं और भाप के बीच ट्रेन से एक ऐसा आदमी उतरा, जिसे जर्मन सरकार ने खुद उसे एक “सीलबंद ट्रेन” में स्विट्ज़रलैंड से यहां तक भेजा है, इस उम्मीद में कि वो रूस को अंदर से अस्थिर कर उसे पहले विश्व युद्ध से बाहर निकाल देगा। हज़ारों समर्थक स्टेशन पर उसका इंतज़ार कर रहे हैं, मशालें और लाल झंडे लिए हुए। यह आदमी है व्लादिमीर लेनिन, जो पूरे 17 साल के निर्वासन के बाद वापस रूस लौटा था।

स्टेशन पर पैर रखते ही लेनिन ने एक भाषण देता है जो रूस की अभी अभी बनी अस्थायी सरकार पैरों तले ज़मीन खिसका दी। वो समझौते की नहीं, बल्कि पूर्ण क्रांति की बात करता है। और यही इतिहास की सबसे बड़ी पहेली भी सामने आती है।

पर पहेली यह है, फरवरी 1917 में ज़ार की गद्दी छिन चुकी थी। रूस में एक ऐसी सरकार थी, जिसमें समाजवादी और उदारवादी दोनों शामिल थे। तो फिर महज़ आठ महीनों के भीतर… वह सरकार भी कैसे गिर गई? और सत्ता उस ‘बोल्शेविक पार्टी’ के हाथ में कैसे आ गई, जिसे शुरुआत में रूस की सबसे छोटी और कमजोर ताकत माना जाता था? आख़िर लेनिन और इतनी तेज़ी से, इतने कम समर्थन के बावजूद, सत्ता पर कैसे क़ाबिज़ हो गए? जानेंगे इस एपिसोड में 

रूस का इतिहास जब लेनिन की बोल्शेविक पार्टी ने दुनिया का सबसे बड़ा तख्तापलट किया (भाग 16)

लेनिन का नारा: रोटी, ज़मीन, और शांति

फ़रवरी क्रांति के बाद, रूस में एक अजीब, अस्थिर व्यवस्था बनी गई थी, इतिहासकार इसे “दोहरी सत्ता” कहते हैं। एक तरफ़ थी अस्थायी सरकार, जिसमें उदारवादी और मध्यमार्गी समाजवादी शामिल थे, जिसके पास सत्ता तो थी लेकिन ताकत नहीं। दूसरी तरफ़ थी पेट्रोग्राद सोवियत, यानि मज़दूरों और सैनिकों की परिषद, जिसके पास सत्ता का कोई मुहर नहीं थी लेकिन कारखानों, रेलवे और सेना पर असली नियंत्रण उसी का था।

अस्थायी सरकार ने इस वक्त सबसे बड़ी, लेकिन आत्मघाती गलती की। उन्होंने फैसला किया कि रूस प्रथम विश्व युद्ध लड़ता रहेगा, यह सोचकर कि सहयोगियों देश फ़्रांस और ब्रिटेन के प्रति वफ़ादारी और राष्ट्रीय सम्मान ज़रूरी है। पर जनता, जो पहले से भूख, थकान, और लाखों मौतों से तंग आ चुकी थी, बस एक ही चीज़ चाहती थी, युद्ध का अंत।

लेनिन ने इस निराशा को बिल्कुल सही ढंग से भांप लिया। अस्थायी सरकार जब कानून, नियम और धीमी प्रक्रिया की बात कर रही थी… तब लेनिन ने एक सीधा, सरल और मारक नारा दिया: “रोटी, ज़मीन, और शांति! जो कही न कही हर वर्ग को कुछ न कुछ वादा करता था: जैसे कि भूखे मज़दूरों को रोटी, ज़मीन विहीन किसानों को ज़मीन, और थके सैनिकों को युद्ध से मुक्ति।

जुलाई डेज़ और कोर्निलोव का तख्तापलट

लेकिन क्रांति रातों-रात नहीं होती। जुलाई 1917 में बोल्शेविकों ने जल्दबाजी में एक विद्रोह की कोशिश की, जिसे ‘जुलाई डेज़‘ कहा जाता है।  जिसके बाद लेनिन को छुपकर फ़िनलैंड भागना पड़ा और पार्टी पर दमन बढ़ा।लेकिन उसी साल सितंबर में, रूसी सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल कोर्निलोव ने अस्थायी सरकार के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश कर दी।

रूस का इतिहास जब लेनिन की बोल्शेविक पार्टी ने दुनिया का सबसे बड़ा तख्तापलट किया (भाग 16)
The Russian Revolution of 1917: The photograph captures a large group of revolutionary soldiers standing in a line, many of them holding rifles with bayonets fixed. Soldiers of the Bolshevik uprising are dressed in long coats and fur-lined hats, and several are holding swords or sabers.

सरकार के मुखिया केरेन्स्की को मजबूरन बोल्शेविकों से मदद मांगनी पड़ी, उन्हें हथियार तक दिए गए, ताकि वो पेट्रोग्राद की रक्षा कर सकें। विडंबना देखिए… जनरल कोर्निलोव का विद्रोह तो बिना लड़े ही हार गया, लेकिन इस चक्कर में बोल्शेविकों को हथियार, ट्रेनिंग और जनता की नजर में “क्रांति के रक्षक” होने की वैधता मिल गई।

अक्टूबर क्रांति (1917): दुनिया का सबसे शांत तख्तापलट

अक्टूबर आते-आते, बोल्शेविक पेट्रोग्राद सोवियत में बहुमत हासिल कर चुके थे। और अब वक्त आ चुका था पलटवार का। 24-25 अक्टूबर की रात, बोल्शेविक “रेड गार्ड्स” ने बेहद योजनाबद्ध तरीक़े से पेट्रोग्राद के पुल, टेलीग्राफ़ दफ़्तर, रेलवे स्टेशन, बिजलीघर, हर महत्वपूर्ण जगह पर बिना किसी बड़े ख़ूनी संघर्ष के क़ब्ज़ा कर लिया। विंटर पैलेस, जहां अस्थायी सरकार बैठी थी, को घेर लिया गया और लगभग बिना किसी गंभीर लड़ाई के गिरा दिया गया। लगभग मंत्री गिरफ्तार कर लिए गए, और केरेन्स्की अमेरिकी दूतावास की कार में बैठकर देश से भाग गया।

अगली सुबह, लेनिन ने ऐलान किया कि सत्ता अब सोवियतों के हाथ में है, और हम अब एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण शुरू करेंगे। उन्होंने तुरंत दो बड़े फ़ैसले लिए जो उनके वादों को पूरा करते थे, जर्मनी के साथ शांति-वार्ता शुरू की, और ज़मींदारों की ज़मीन किसानों में बांटने का आदेश जारी किया। एक ही रात में, रूस दुनिया का पहला कम्युनिस्ट (मजदूरों का) देश बन चुका था।

लेकिन यह जीत आखिरी नहीं थी। बोल्शेविकों का कब्जा सिर्फ बड़े शहरों पर था। रूस के बाक़ी हिस्सों जैसे साइबेरिया, दक्षिण, और यूक्रेन में पुरानी शाही सेना के अफसर, जमींदार और विदेशी ताकतें जैसे ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस देश बोल्शेविकों को कुचलने के लिए संगठित हो रही थीं। रूस अब एक नए, और भी ख़ूनी अध्याय की तरफ़ बढ़ रहा था, एक ऐसा गृहयुद्ध जिसमें लाखों लोग मारे जाएंगे, और जो तय करेगा कि क्या लेनिन की यह लाल क्रांति ज़िंदा बच पाएगी? जानने के लिए देखे अगले एपिसोड, गृह युद्ध और लेनिन: लाल बनाम सफेद।

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