रूस का इतिहास: रूस-जापान युद्ध, जब एक छोटे देश ने रूसी नौसेना को तबाह कर दिया? (भाग 13)

1905 में कोरियाई जलडमरूमध्य में जापान ने रूस के बाल्टिक बेड़े को चंद घंटों में समंदर में डुबो दिया। आधुनिक इतिहास में पहली बार किसी एशियाई शक्ति ने यूरोपीय साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया था। जानिए कैसे इस शर्मनाक हार ने ज़ारशाही के ताबूत में पहली कील ठोक कर 1905 की क्रांति की आग भड़काई।

रूस-जापान युद्ध 1904-1905 (Russo-Japanese War 1904-1905): 27 मई 1905, कोरिया और जापान के बीच त्सुशिमा स्ट्रैट। रूसी बाल्टिक फ्लीट जिसने बाल्टिक सागर से अफ्रीका होते हुए एशिया तक, दुनिया का आधा चक्कर काटकर सात महीने में 33,000 किलोमीटर की यात्रा पूरी की थी… आखिरकार जापानी सागर में दाखिल हुआ। लेकिन अगले कुछ ही घंटों में जो हुआ, उसने दुनिया के नेवी के इतिहास के पन्नों में सबसे बड़ी तबाहियों में गिना जाने लगा।

जापानी एडमिरल तोगो हेइहाचिरो की तेज और आधुनिक नौसेना ने रूसी बेड़े को चारों तरफ से घेर लेती है। जब लड़ाई ख़त्म होती है, रूस के 38 जहाज़ों में से लगभग सारे डूब चुके थे या बंदी बना लिए गए थेवहीं दूसरी तरफ, जापान की सिर्फ तीन छोटी टॉरपीडो नावों का नुकसान हुआ था। रूस के लिए यह सिर्फ एक सैन्य पराजय नहीं थी, यह एक गहरा सभ्यतागत सदमा (Civilizational Shock) था।

आधुनिक इतिहास में पहली बार यूरोप की एक गोरी साम्राज्यवादी महाशक्ति किसी एशियाई देश के हाथों इतनी बुरी तरह पराजित हुई थी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है, जिस रूस ने नेपोलियन की छह लाख की फौज को बर्फ में दफना दिया था, जो यूरोप की सबसे विशाल थलसेना का मालिक था… वह एशिया के एक ऐसे छोटे से द्वीप-देश से इतनी बुरी तरह कैसे हार गया, जिसे खुद यूरोपीय नस्लवादी अहंकार में “पिछड़ा और असभ्य” समझते थे?

और इससे भी बड़ा सवाल, इस हार ने रूस के अंदर ऐसा क्या किया कि कुछ ही महीनों में पूरे साम्राज्य में बगावत की ऐसी आग भड़क दी कि जिसने जार को उनके महलों मे ही कैद तक कर दिया।

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जब पोर्ट आर्थर पर जापान ने किया सरप्राइज अटैक’

इस टकराव की जड़ें 1890 के दशक में रूस के पूर्वी विस्तारवाद में छुपी थीं।

रूस के पास दुनिया की कुल ज़मीन का छठा हिस्सा था, लेकिन उसके पास एक भारी कमजोरी थी—उसके ज्यादातर बंदरगाह सर्दियों में बर्फ से जम जाते थे। रूस को एक ऐसा नौसैनिक अड्डा चाहिए था, जो साल के 365 दिन खुला रहे। इसी तलाश में ज़ार निकोलस द्वितीय की नज़रें मंचूरिया और कोरिया की तरफ गई। उसने ट्रांस-साइबेरियन रेलवे का निर्माण शुरू कराया और 1898 में चीन से रणनीतिक पोर्ट आर्थर (आज का ल्युशुनकोउ) पट्टे पर ले लिया।

लेकिन ठीक उसी समय, जापान 1868 की ‘मेइजी बहाली’ के बाद खुद को तेजी से एक आधुनिक औद्योगिक और सैन्य शक्ति में तब्दील कर चुका था। वह कोरिया और मंचूरिया को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता था। रूसी दरबार में कई अधिकारी जापान को गंभीरता से लेने को तैयार ही नहीं थे। ज़ार निकोलस द्वितीय खुद जापानियों के लिए अपमानजनक नस्लीय शब्द इस्तेमाल करता था और उन्हें एक छोटा, नजरअंदाज करने लायक खतरा समझता था।

8 फरवरी 1904 में, बिना औपचारिक युद्ध-घोषणा के, जापानी नौसेना ने अचानक पोर्ट आर्थर में रूसी बेड़े पर हमला कर दिया, यह आधुनिक इतिहास का पहला ऐसा ‘सरप्राइज अटैक’ था, जिस रणनीति को जापान 37 साल बाद फिर से पर्ल हार्बर में दोहराने वाला था। रूसी कमान हक्की-बक्की रह गई। मंचूरिया के जमीनी मोर्चों पर भी हालात बदतर होते चले गए।

जब आधी दुनिया घूमकर पहुँचा बाल्टिक फ़्लीट

लियाओयांग और मुकडेन की लड़ाइयों में रूसी सेनाएं एक के बाद एक युद्ध हारती चली गईं। इतिहासकार मानते है रूस के सैनिक बहादुर थे, लेकिन उनके सेनापति भ्रष्ट और अक्षम थे। ऊपर से ट्रांस-साइबेरियन रेलवे उस समय तक पूरी नहीं बनी थी, रूस को 8,000 किलोमीटर दूर से गोला-बारूद लाने में हफ्तों लग रहे थे, जबकि जापान अपने घर के आँगन में लड़ रहा था।

जब पोर्ट आर्थर में रूसी सेना घुटने टेकने लगी, तब सेंट पीटर्सबर्ग में बैठे ज़ार निकोलस द्वितीय ने एक बेहद हताश और आत्मघाती फैसला लिया। ज़ार ने बाल्टिक फ़्लीट जो उस समय बाल्टिक सागर में तैनात रूसी नौसेना का प्रमुख बेड़ा था को आधी दुनिया घुमाकर एशिया भेजने का फ़ैसला किया। सात महीने की लंबी यात्रा के बाद जब तक यह बेड़ा त्सुशिमा पहुंचा तो जहाजों की जर्जर हालत के साथ-साथ नाविक बीमारी और थकान से इस कदर टूट चुके थे कि वे लड़ने की स्थिति में ही नहीं थे।

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पोर्ट्समथ की संधि (1905) और वैश्विक प्रभाव

और 27 मई 1905 को जापानी नौसेना ने उन्हें कुछ ही घंटों में तबाह कर दिया। त्सुशिमा की तबाही के बाद सिवाय शांति-समझौते के रूस के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। सितंबर 1905 में अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट की मध्यस्थता में पोर्ट्समथ की संधि हुई। रूस को कोरिया पर जापान का अधिकार स्वीकार करना पड़ा, दक्षिणी सखालिन द्वीप गंवाना पड़ा, और मंचूरिया तथा पोर्ट आर्थर पर अपना पट्टा छोड़ना पड़ा।

1905 के खूनी रविवार की पृष्ठभूमि

यह हार सिर्फ जमीन या जहाजों की हार नहीं थी,यह 300 साल पुराने रोमानोव साम्राज्य की “अजेयता” के भ्रम का खात्मा था। रूसी जनता, जो पहले से ही भुखमरी, महंगाई और कारखानों में 14-14 घंटे की अमानवीय मजदूरी से त्रस्त थी, अब खुलकर सवाल पूछने लगी, अगर ज़ार अपनी सेना को एशिया के एक छोटे देश से भी नहीं बचा सकता, तो वो वह हम पर हुकूमत करने के लायक कैसे है?

युद्ध अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि 9 जनवरी 1905 की एक सर्द सुबह…सेंट पीटर्सबर्ग के हज़ारों निहत्थे मजदूर अपने बीवी-बच्चों के साथ, हाथ में ज़ार की तस्वीरें लिए, अपील करने के इरादे से विंटर पैलेस की तरफ बढ़े। लेकिन उसके आगे जो हुआ उसने रूस के इतिहास की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

रूस-जापान युद्ध की शर्मिंदगी ने देश के भीतर वह चिंगारी सुलगा दी जिसने पूरे साम्राज्य की नींव हिला दी। मजदूर हड़तालें, किसान विद्रोह और नौसैनिक बगावतें एक साथ शुरू हो चुकी थीं। ज़ारशाही को पहली बार यह एहसास हुआ कि उसकी गद्दी उतनी सुरक्षित नहीं है जितनी वह सदियों से समझती आई थी। और आखिर कैसे ज़ार के एक फैसले ने पूरे रूस को हिंसा के आग में झोंक दिया। जानेंगे अगले एपिसोड में: 1905 की क्रांति — खूनी रविवार!

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