हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हैं, जो किसी एक पहचान का मोहताज नहीं होता है। टॉम ऑल्टर उन्हीं में से एक थे। उनका चेहरा देखकर पहली नज़र में लोग उन्हें विदेशी समझ लेते थे, पर जब वे हिंदी या उर्दू बोलते, तो यह भ्रम तुरंत टूट जाता था, उनके शब्दों में भारतीय मिट्टी की खुशबू थी।
टॉम ऑल्टर ने सिर्फ फिल्मों में अभिनय नहीं किया, बल्कि इतिहास, साहित्य, क्रिकेट और रंगमंच को भी बेहद करीब से देखा। एक तरफ वे सत्यजीत रे और रिचर्ड एटनबरो जैसे फिल्मकारों की फिल्मों में दिखे, दूसरी तरफ एक खेल पत्रकार के तौर पर एक ऐसे युवा क्रिकेटर से मिले, जिसका नाम आगे चलकर दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट सितारों में शुमार होने वाला था, सचिन तेंदुलकर। दिलचस्प बात यह है कि सचिन के अंतरराष्ट्रीय डेब्यू से पहले ही टॉम ऑल्टर ने उनका वीडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड कर लिया था।
विदेशी होने के बावजूद भारत से जुड़ाव
22 जून 1950 को मसूरी में जन्मे टॉम ऑल्टर का पारिवारिक इतिहास भारत और अमेरिका, दोनों से जुड़ा था। उनके दादा-दादी अमेरिकी मिशनरी पृष्ठभूमि से भारत आए थे, और बाद में परिवार का जीवन भारतीय उपमहाद्वीप से गहराई से जुड़ गया। बंटवारे ने उनके परिवार को भी छुआ, कुछ सदस्य पाकिस्तान में रहे, तो माता-पिता भारत में। इस तरह टॉम ने बचपन से ही ऐसी दुनिया देखी, जिसमें सीमाओं से ज़्यादा अहम इंसानी रिश्ते थे, भारत उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, पहचान का हिस्सा बन चुका था।
पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजे जाने पर भी टॉम का मन वहां ज़्यादा नहीं लगा। वे भारत लौट आए, कुछ समय स्कूल में पढ़ाया, फिर अमेरिका में अस्पताल में भी काम किया, पर ज़िंदगी उन्हें बार-बार भारत की तरफ खींच रही थी। उन दिनों वे क्रिकेट के भी बेहद शौकीन थे, उनके लिए क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, भारतीय समाज को समझने का ज़रिया भी था।
फिल्मों मे कदम रखने के बाद पत्रकारिता मे कदम रखे
1970 के आसपास टॉम ऑल्टर ने राजेश खन्ना की फिल्म ‘आराधना’ देखी। उस दौर में राजेश खन्ना का स्टारडम चरम पर था, और उनकी स्क्रीन मौजूदगी ने टॉम को इतना प्रभावित किया कि उनके भीतर अभिनेता बनने की चाह जाग उठी। इसके बाद उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) का रुख किया, जहां अभिनय की औपचारिक ट्रेनिंग ली। दिलचस्प बात यह भी है कि वे संस्थान की क्रिकेट टीम के कप्तान भी रहे।

फिल्मों में काम मिलने लगा, पर उनका विदेशी चेहरा अक्सर उन्हें ब्रिटिश अधिकारी या विदेशी किरदारों तक ले जाता था। रंगमंच पर उन्होंने मिर्ज़ा गालिब, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, बहादुर शाह ज़फर, मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी जैसे किरदार जीवंत किए। इसी बीच वे खेल पत्रकारिता से भी जुड़ गए, 1980-90 के दशक में उन्होंने खेलों पर लिखा और खिलाड़ियों के इंटरव्यू किए, और फिर 1988 में उनके सामने एक ऐसा मौका आया, जिसकी अहमियत शायद उस वक्त उन्हें भी पूरी तरह समझ नहीं आई थी।
16 साल के सचिन तेंदुलकर का यादगार इंटरव्यू
मुंबई में एक युवा क्रिकेटर तेज़ी से चर्चा में आ रहा था, नाम था सचिन तेंदुलकर। उस वक्त सचिन का अंतरराष्ट्रीय डेब्यू नहीं हुआ था, उम्र महज़ 15-16 साल थी, पर घरेलू क्रिकेट में उनके प्रदर्शन ने अनुभवी लोगों का ध्यान खींच लिया था। टॉम ऑल्टर को इस प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ के बारे में पता चला, और उन्होंने उससे मिलने का फैसला किया, यह मुलाकात एक सामान्य बातचीत नहीं थी, टॉम ने सचिन का वीडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड किया। आज जब सचिन क्रिकेट इतिहास के सबसे बड़े नामों में गिने जाते हैं, तब उस पुराने इंटरव्यू की अहमियत और बढ़ जाती है।

फिल्मों में छोटे किरदार, उनकी सबसे बड़ी यादें
टॉम का फिल्मी सफर भी उतना ही दिलचस्प रहा। सत्यजीत रे की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उन्होंने कैप्टन वेस्टन का किरदार निभाया, रिचर्ड एटनबरो की ‘गांधी’ में उनका छोटा पर अहम रोल रहा। ‘क्रांति’ में ब्रिटिश अधिकारी, ‘परिंदा’ में गैंगस्टर मूसा, ‘आशिकी’ में हॉस्टल वार्डन और ‘वीर-ज़ारा’ में डॉक्टर यूसुफ, हर किरदार में उनकी मौजूदगी दर्शकों को याद रह गई। उनका करियर साबित करता है कि किसी कलाकार की अहमियत हमेशा किरदार की लंबाई से तय नहीं होती।
विदेशी होने के बावजूद तीन विषय में पकड़
टॉम की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ अभिनय नहीं, भाषा पर उनकी असाधारण पकड़ भी थी। वे हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू में सहज थे, उर्दू से उनका रिश्ता बचपन से बना था, क्योंकि पिता धार्मिक सेवा से जुड़े थे और घर में धार्मिक बातें उर्दू में भी होती थीं। शायद इसी वजह से गालिब या जिन्ना जैसे किरदार उनके लिए सिर्फ वेशभूषा बदलने का काम नहीं थे, वे उनके शब्दों और सोच को गहराई से समझने की कोशिश करते थे।
“भारतीय हूं या विदेशी?” – यह सवाल हमेशा साथ रहा
टॉम ऑल्टर को ज़िंदगीभर इस सवाल का सामना करना पड़ा। उनका चेहरा उन्हें विदेशी दिखाता, पर उनकी पूरी ज़िंदगी, कला और भाषा भारत से जुड़ी थी। उनकी कहानी शायद यही बताती है कि भारतीय होने की पहचान सिर्फ चेहरे या जन्मस्थान से तय नहीं होती, किसी संस्कृति से गहरा जुड़ाव भी उतना ही मायने रखता है।

भारतीय कला में योगदान से पद्मश्री से सम्मानित
भारतीय कला में योगदान के लिए 2008 में टॉम ऑल्टर को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने फिल्मों के साथ टीवी और थिएटर में भी काम किया, ‘भारत एक खोज’, ‘शक्तिमान’, ‘कैप्टन व्योम’ और ‘संविधान’ जैसे प्रोजेक्ट्स में उनकी मौजूदगी रही। 29 सितंबर 2017 को 67 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, पर उनकी आवाज़ और किरदार आज भी उनकी कहानी का अहम हिस्सा हैं।
एक तरफ कैमरे के सामने बैठा युवा सचिन तेंदुलकर था, दूसरी तरफ सवाल पूछ रहे थे टॉम ऑल्टर, उस वक्त शायद किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह छोटी-सी मुलाकात आने वाले दशकों में कितनी खास बन जाएगी। टॉम ऑल्टर की असली विरासत सिर्फ उनकी फिल्मों की गिनती नहीं है, वे अभिनेता, रंगकर्मी, लेखक और खेल पत्रकार थे, और सबसे बढ़कर ऐसे कलाकार जिन्होंने भारत को बाहर से नहीं, भीतर से समझने की कोशिश की।
FAQ –
टॉम ऑल्टर कौन थे?
टॉम ऑल्टर एक भारतीय अभिनेता, रंगकर्मी और खेल पत्रकार थे, जिनका जन्म अमेरिकी मूल के परिवार में मसूरी में हुआ था और जिन्होंने हिंदी सिनेमा, थिएटर और टीवी में दशकों तक काम किया।
टॉम ऑल्टर ने सचिन तेंदुलकर का इंटरव्यू कब लिया था?
1988 में, जब सचिन तेंदुलकर का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में डेब्यू भी नहीं हुआ था और उनकी उम्र सिर्फ 15-16 साल थी, टॉम ऑल्टर ने एक खेल पत्रकार के तौर पर उनका वीडियो इंटरव्यू रिकॉर्ड किया था।
टॉम ऑल्टर की मशहूर फिल्में कौन सी हैं?
‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘गांधी’, ‘क्रांति’, ‘परिंदा’, ‘आशिकी’ और ‘वीर-ज़ारा’ उनकी कुछ चर्चित फिल्में हैं, जिनमें उन्होंने यादगार सहायक किरदार निभाए।
टॉम ऑल्टर को कौन सा सम्मान मिला था?
भारतीय कला और सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें 2008 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
टॉम ऑल्टर का निधन कब हुआ?
29 सितंबर 2017 को 67 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
