सोवियत रूस और द्वितीय विश्व युद्ध (Soviet Union in WWII): 22 जून 1941 सुबह के लगभग साढ़े तीन बजे रहे थे। सोवियत-जर्मन सीमा पर तैनात सैनिक अचानक आसमान में गूंजते इंजनों की आवाज़ सुनते हैं, हजारों जर्मन लड़ाकू विमानों ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सोवियत हवाई अड्डों पर बमबारी शुरू कर दी। ज़मीन पर… 30 लाख से ज़्यादा जर्मन और सहयोगी सैनिक, 3,300 टैंकों और 7,000 तोपों के साथ तीन अलग-अलग दिशाओं से सोवियत सीमा में घुस पड़े, यह इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आक्रमण है, जिसका नाम दिया गया ऑपरेशन “बारबारोसा।
लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह नहीं थी कि हिटलर ने हमला किया। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि स्टालिन को हफ्तों पहले से अपने जासूसों और जनरलों से चेतावनी मिल चुकी थी कि जर्मनी हमला करने वाला है। यहाँ तक कि हमले की सटीक तारीख भी बता दी गई थी!
फिर भी, हमले के पहले कुछ घंटों तक, स्टालिन को लगा कि यह कोई गलतफहमी है। उसने अपनी सेना को जवाबी फायर करने तक की इजाज़त नहीं दी। जिस तानाशाह ने शक के आधार पर अपने ही लाखों लोगों को मरवा दिया था… वह अपने सबसे बड़े दुश्मन पर अंधा भरोसा क्यों कर बैठा? और इससे भी सवाल था जिस, सोवियत संघ, जो शुरुआती महीनों में लगभग तबाह होने की कगार पर पहुंच गया था, आख़िर कैसे पलटवार करके इतिहास के सबसे बड़े युद्ध को जीत गया?

तबाही के शुरुआती महीने और लेनिनग्राद की घेराबंदी
1939 में, युद्ध शुरू होने से पहले ही, स्टालिन और हिटलर ने एक चौंकाने वाला समझौता किया था, मोलोतोव-रिबेनट्रॉप पैक्ट यानि एक Non-Aggression संधि, जिसके गुप्त प्रावधानों के तहत दोनों ने पूर्वी यूरोप को आपस में बांट लिया। इसी के तहत सोवियत संघ ने पोलैंड के पूर्वी हिस्से, बाल्टिक राज्यों, और फ़िनलैंड के कुछ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा किया।
स्टालिन को यक़ीन था कि यह संधि उसे कुछ सालों की मोहलत देगी, जिसमे सबसे बड़ा काम था सेना को आधुनिक बनाना, क्योंकि 1930 के दशक के “ग्रेट पर्ज” में सेना के आधे से ज़्यादा वरिष्ठ अफ़सर मार डाले गए थे या हटाए गए थे। स्टालिन का मानना था कि हिटलर कभी भी पूर्व की तरफ मुड़ने से पहले ब्रिटेन को पूरी तरह हराएगा। लेकिन हिटलर रूस को अपना सबसे बड़ा वैचारिक दुश्मन मानता था।
हमले के शुरुआती महीने सोवियत संघ के लिए विनाशकारी साबित हुए। जर्मन सेनाएं बेहद तेज़ी से आगे बढ़ीं, कुछ ही हफ्तों में जर्मनों ने पूरे यूक्रेन, बेलारूस और पश्चिमी रूस पर कब्ज़ा कर लिया गया और लाखों सोवियत सैनिक घिरकर बंदी बना लिए गए एक अनुमान के मुताबिक सेना की संख्या 6 लाख से ज़्यादा हो सकती है। सितंबर 1941 तक, जर्मन सेना ने लेनिनग्राद शहर को चारों तरफ से घेर लिया, जो लगभग 900 दिनों तक चली, जिसमें भूख से लाखों नागरिक मारे गए। कुछ जगहों पर नरभक्षण तक की ख़बरें दर्ज हुईं।
अक्टूबर तक, जर्मन सेनाएं मॉस्को के बाहरी इलाकों तक पहुँच गईं। सरकारी दफ़्तर शहर ख़ाली करने की तैयारी करने लगे, यहाँ तक कि स्टालिन की भी स्पेशल ट्रेन भागने के लिए तैयार खड़ी थी। पर कड़ाके की सर्दी, बिगड़ती जर्मन आपूर्ति लाइनें, और सोवियत साइबेरियाई रिज़र्व सेनाओं, जो जापान से ख़तरा टलने के बाद पूर्व से मॉस्को भेजी गईं, की मदद से, दिसंबर 1941 में सोवियत सेना ने पहला बड़ा जवाबी हमला किया और जर्मनों को मॉस्को से पीछे धकेल दिया।
स्तालिनग्राद और कुर्स्क: जहाँ नाज़ी घमंड टूट गया
लेकिन युद्ध का सबसे बड़ा और खूनी मोड़ आया स्तालिनग्राद की लड़ाई (1942–43) में। जर्मन सेना ने शहर के लगभग हर हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था, शहर का 90% हिस्सा मलबे में बदल दिया गया। लेकिन सोवियत जनरल जॉर्जी ज़ुकोव ने एक शानदार रणनीति—‘ऑपरेशन यूरेनस‘ तैयार की। सोवियत सेनाओं ने शहर के इर्द-गिर्द से हमला करके पूरी जर्मन सेना को बाहर से घेर लिया।

फरवरी 1943 में, हिटलर के मना करने के बावजूद भूख और ठंड से टूट चुके जर्मन जनरल पॉलुस ने अपनी 3 लाख की फौज के साथ आत्मसमर्पण कर दिया। यह युद्ध का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक मोड़ था, “अजेय” जर्मन सेना पहली बार इतनी बड़ी हार से टूटी। इसके बाद 1943 में कुर्स्क की लड़ाई जो इतिहास की सबसे बड़ी टैंक-लड़ाई मानी जाती है में भी सोवियत जीत ने आगे का रास्ता साफ़ कर दिया।
बर्लिन पर फहरता लाल झंडा और रूस का विजय दिवस
अगले दो सालों में, सोवियत सेना पीछे हटती जर्मन सेना का पीछा करते हुए, पूर्वी यूरोप से होते हुए, अप्रैल-मई 1945 में ख़ुद बर्लिन तक पहुंच गई। 8-9 मई 1945 को जर्मनी ने सरेंडर कर दिया। रूस आज भी इस दिन को “विजय दिवस” के रूप में मनाता है।
पर यह जीत भयावह क़ीमत पर आई। इस युद्ध में अनुमानित 2.7 करोड़ (27 मिलियन) सोवियत नागरिक और सैनिक मारे गए! यह द्वितीय विश्व युद्ध की कुल मौतों का लगभग आधा हिस्सा था। लगभग हर सोवियत परिवार ने किसी न किसी को खोया। पूरे शहर, स्तालिनग्राद, लेनिनग्राद, हज़ारों गांव, मलबे में बदल गए।
पर इस भारी बलिदान ने सोवियत संघ को एक नई हैसियत भी दी, अब वो दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियों में से एक बन चुका था, पूर्वी यूरोप पर अब उसका सीधा नियंत्रण था। और यही जीत… कुछ ही सालों में एक नए, अलग तरह के युद्ध को जन्म देने वाली थी। एक ऐसा युद्ध जहां तोपें नहीं, बल्कि जासूस, प्रोपेगैंडा, और परमाणु हथियार बनेंगे, और फिर कैसे अमेरिका के ख़िलाफ़, एक ऐसे टकराव में जो दशकों तक पूरी दुनिया को दो हिस्सों में बांटे रखेगा। जानेंगे अगले एपिसोड अगले एपिसोड में, शीत युद्ध: अमेरिका बनाम USSR।
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पिछला भाग: स्टालिन का उदय कैसे हुआ और एक फैसले ने करोड़ों लोगों की जान ले ली?
