रूस का इतिहास: स्टालिन का उदय कैसे हुआ और एक फैसले ने करोड़ों लोगों की जान ले ली? (भाग 18)

स्टालिन का उदय और आतंक (Rise of Stalin and Great Purge): 21 जनवरी 1924, लेनिन की मौत हो चुकी थी। लेकिन लेनिन ने अपने पीछे एक ऐसा गुप्त दस्तावेज़ छोड़ा था, जो रूस का इतिहास पलट सकता था। इतिहास में इसे “लेनिन का वसीयतनामा” कहा जाता है। इसमें लेनिन ने सीधे तौर पर चेतावनी दी […]

स्टालिन का उदय और आतंक (Rise of Stalin and Great Purge): 21 जनवरी 1924, लेनिन की मौत हो चुकी थी। लेकिन लेनिन ने अपने पीछे एक ऐसा गुप्त दस्तावेज़ छोड़ा था, जो रूस का इतिहास पलट सकता था। इतिहास में इसे “लेनिन का वसीयतनामा” कहा जाता है। इसमें लेनिन ने सीधे तौर पर चेतावनी दी थी: “स्टालिन बहुत ज़्यादा सत्ता अपने हाथों में केंद्रित कर चुका है, और मुझे यक़ीन नहीं कि वो हमेशा उसका सावधानी से इस्तेमाल कर पाएगा… मैं सुझाव देता हूं कि उसे इस पद से हटा दिया जाए।”

यह दस्तावेज़ कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के सामने पढ़ा गया। लेकिन स्टालिन के वफादारों ने उसका बचाव किया और लेनिन के इस वसीयतनामे को हमेशा के लिए दबा दिया जाता है। एक आदमी, जिसे ख़ुद लेनिन ने चेतावनी के तौर पर “ख़तरनाक” बताया था, वही आदमी कुछ ही सालों में 15 देशों से मिलकर बने विशाल सोवियत संघ का निर्विवाद, क्रूर तानाशाह बन गया।

लेकिन सवाल यह है: स्टालिन जिसके पास ना तो ट्रॉट्स्की जैसी शानदार भाषण कला थी, ना ही कोई सैन्य प्रतिभा और न ही कोई बड़ा विचारक। स्टालिन ख़ुद को एक “साधारण,” बोरिंग, प्रशासनिक व्यक्ति के तौर पर पेश करता था। तो फिर यह “साधारण” आदमी, इन सब प्रतिभाशाली प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़कर, अकेला, निरंकुश शासक कैसे बन गया?

स्टालिन का उदय और आतंक (Rise of Stalin and Great Purge)

जनरल सेक्रेटरी का पद: स्टालिन का अदृश्य जाल

स्टालिन की असली ताकत एक ऐसे पद में छिपी थी जिसे तब कोई बहुत बड़ा ओहदा नहीं मानता था—“जनरल सेक्रेटरी। 1922 में जब उसे यह पद मिला, तो इसका काम सिर्फ पार्टी के प्रशासनिक काम-काज संभालना था। पर स्टालिन ने इसका इस्तेमाल बेहद चालाकी से किया, उसने पूरे सोवियत संघ के हज़ारों अहम पदों पर उन लोगों को बिठा दिया, जो सिर्फ और सिर्फ उसके वफादार थे। जब ट्रॉट्स्की जैसे बड़े नेता मंच पर भाषण दे रहे थे, तब स्टालिन ज़मीन के नीचे अपनी खुद की ‘अदृश्य फौज’ तैयार कर रहा था।

लेनिन की मौत के बाद, स्टालिन ने चालाकी से गठबंधन बदले, पहले उसने ट्रॉट्स्की को अलग-थलग करने के लिए कामेनेव और ज़िनोवियेव से हाथ मिलाया। ट्रॉट्स्की को पार्टी से निकाला गया और बाद में देश से बाहर निकाला दे दिया गया। फिर उसने ज़िनोवियेव-कामेनेव के ख़िलाफ़ बुखारिन जैसे दक्षिणपंथी नेताओं का साथ लिया। एक-एक करके, उसने हर प्रतिद्वंद्वी गुट को दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल किया और उन्हें मिट्टी में मिला दिया। अब सत्ता पूरी तरह स्टालिन की मुट्ठी में थी।

पंचवर्षीय योजना और ‘होलोदोमोर’ का अकाल

सत्ता पूरी तरह हाथ में आने के बाद, 1928 से स्टालिन ने रूस को एक हिंसक और खौफनाक बदलाव की भट्टी में झोंक दिया गया। उसने देश में पहली बार पहली पंचवर्षीय योजना लागू किया। और लक्ष्य रखा गया रूस को रातों-रात एक औद्योगिक महाशक्ति बनाना। जिसके लिए लाखों किसानों की निजी ज़मीन ज़बरदस्ती छीनकर बड़े सामूहिक खेतों (कोलख़ोज़) में मिला दी गई।

स्टालिन का उदय और आतंक (Rise of Stalin and Great Purge)

जिन किसानों ने विरोध किया, ख़ासकर समृद्ध किसान, जिन्हें “कुलाक” कहा गया, उन्हें या तो बेदख़ल कर दिया गया, या गोली मार दी गई या फिर साइबेरिया के दूर-दराज़ इलाक़ों में निर्वासित कर दिया गया।

इसका सबसे भयानक असर यूक्रेन में हुआ। ज़बरदस्ती अनाज छीनने और सामूहिकीकरण के विरोध को कुचलने की नीतियों ने 1932-33 में एक भीषण अकाल पैदा किया, जिसमें लाखों लोग मारे गए। इतिहास में इसे “होलोदोमोर” (Holodomor) कहा जाता है—जिसका यूक्रेनी भाषा में अर्थ है: भूख से तड़पाकर मारना।

द ग्रेट पर्ज (The Great Purge): 1936–1938

लेकिन स्टालिन का सबसे खौफनाक रूप अभी सामने आना बाकी था। 1936 से 1938 के बीच, स्टालिन ने शुरू किया “द ग्रेट पर्ज, यानि एक ऐसा सामूहिक आतंक जिसने ख़ुद पार्टी, सेना, और आम जनता को अंदर से खा लिया। जिन पुराने बोल्शेविक नेताओं ने क्रांति में स्टालिन का साथ दिया था, कामेनेव, ज़िनोवियेव और बुखारिन उन्हें खुलेआम “मॉस्को ट्रायल्स” में पेश किया गया। लगातार शारीरिक यातनाओं से टूटकर इन नेताओं ने खुद पर ही झूठे आरोप कबूल कर लिए कि वे जासूस हैं।

उन सभी को फाँसी की सजा दी गई। खौफ का यह आलम था लाल सेना को भी नहीं बख़्शा गया, लगभग आधे वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को मार डाला गया या क़ैद किया गया, जिसका ख़ामियाज़ा कुछ ही साल बाद, जब जर्मनी हमला करेगा, बुरी तरह भुगतना पड़ेगा। गुप्त पुलिस NKVD ने रात के अंधेरे में लाखों “साधारण” नागरिकों को भी गिरफ़्तार किया, पड़ोसियों को पड़ोसियों की, बच्चों को माता-पिता की जासूसी करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।

गिरफ़्तार लोगों को भेजा गया गुलाग एक ऐसी जगह जो साइबेरिया और सुदूर उत्तर के बर्फीले इलाकों में फैले ‘जबरन-मजदूरी शिविरों’ का एक विशाल जाल था। ठंड, भूख, और अमानवीय काम की परिस्थितियों में लाखों क़ैदी मारे गए। कैदियों के हाथों से ही सोवियत संघ की नहरें और सड़कें बनवाई गईं, जिनकी नींव में उन कैदियों की हड्डियां दफन हैं।

औद्योगिकीकरण और आने वाले महायुद्ध की आहट

इतिहासकारों के अनुमान के मुताबिक, सामूहिकीकरण, अकाल, पर्जेस और गुलाग को मिलाकर, स्टालिन की नीतियों के कारण 1 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान गई। यह सोवियत इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। जो पार्टी कभी मज़दूरों की मुक्ति का सपना लेकर बनी थी, अब ख़ुद अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ एक आतंक की मशीन बन चुकी थी।

लेकिन एक कड़वा सच यह भी था कि स्टालिन के इस निर्दयी, खून से सने चाबुक ने सोवियत संघ को एक पिछड़े कृषि देश से निकालकर… एक भारी औद्योगिक और सैन्य महाशक्ति में तब्दील कर दिया था। स्टील प्लांट, नए टैंक, और अनगिनत कारखाने बेतहाशा रफ्तार से खड़े हो गए थे।

लेकिन यह क्रूर औद्योगिक ताकत जल्द ही एक ऐसी भयानक परीक्षा में काम आने वाली थी… जिसकी कल्पना खुद स्टालिन ने भी नहीं की थी। फिर से एक तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने इतिहास की सबसे बड़ी सेना लेकर सोवियत संघ के दरवाज़े पर दस्तक दी! कैसे स्टालिन की एक गलती ने रूस को लगभग तबाह कर दिया? और कैसे रूसी जनता ने अपनी ही ज़मीन पर इतिहास की सबसे खूनी जंग लड़ी? जानेंगे अगले एपिसोड में।

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