डिसेम्ब्रिस्ट विद्रोह रूस का इतिहास (Decembrist Revolt Russian History): 14 दिसंबर 1825 की सुबह, सेंट पीटर्सबर्ग का सेनेट स्क्वायर। बर्फ की गिरती चादर के बीच तीन हज़ार हथियारबंद सैनिक चौकोर घेरा बनाकर खड़े थे। लेकिन यह कोई आम सैन्य परेड नहीं थी। ये सैनिक नए ज़ार—निकोलस प्रथम के प्रति वफादारी की शपथ लेने से खुला इनकार कर चुके थे।
वो नारे लगा रहे हैं, “कॉन्स्टिट्यूत्सिया ज़िंदाबाद!” यानी संविधान ज़िंदाबाद, लेकिन इस ऐतिहासिक बगावत के पीछे एक ऐसी अजीब और हास्यास्पद सच्चाई छुपी थी, जो आज भी इतिहासकारों को हैरान करती है।
कतार में खड़े ज्यादातर आम सैनिकों को पता ही नहीं था कि “संविधान” असल में क्या बला है! वे सोच रहे थे कि ‘कॉन्स्टिट्यूत्सिया’ शायद ग्रैंड ड्यूक कॉन्स्टेंटिन की पत्नी का नाम है, और वे उसी महारानी के हक के लिए नारे लगा रहे हैं!
एक ऐसी बगावत, जिसे खुद उसमें खड़े सिपाही पूरी तरह नहीं समझ पाए… फिर भी यह रूस के एक हज़ार साल के इतिहास में ज़ारशाही की जड़ों को हिलाने वाली पहली सबसे बड़ी चिंगारी बन गई।

पर सवाल यह है कि ये विद्रोही थे कौन?
ये कोई भूखे, फटेहाल किसान या मजदूर नहीं थे, बल्कि रूस के सबसे अमीर, सबसे प्रभावशाली और सबसे कुलीन खानदानों के वारिस थे। उनके पास अकूत दौलत थी, जागीरें थीं, महलों की विलासिता थी और सेना में सबसे ऊंचे ओहदे थे।
तो फिर वे अपनी ही ऐशो-आराम की ज़िंदगी, अपने ही परिवार और अपने ही ज़ार के खिलाफ बगावत पर क्यों उतर आए… जबकि इसमें उनकी जान जाने का खतरा साफ था?
1812 के नेपोलियन युद्ध और पश्चिमी उदारवाद का प्रभाव
जैसा पिछले एपिसोड में देखा, 1812 से 1814 में नेपोलियन के साथ युद्धों में रूसी सेना पेरिस तक पहुंच चुकी थी। इन युवा अफ़सरों ने, जो ज़्यादातर उच्च रईस-परिवारों से थे, पश्चिमी यूरोप में संवैधानिक सरकारें, नागरिक स्वतंत्रता, और क़ानून के राज को अपनी आंखों से देखा। जब वो वापस रूस लौटे, तो उन्होंने पाया कि उनका अपना देश अब भी ज़ार की अंधी तानाशाही में जकड़ा था।
सर्फ़डम यानि दासत्व की क्रूर व्यवस्था, निरंकुश ज़ार, कोई संविधान नहीं, कोई प्रतिनिधि सभा नहीं। यह विरोधाभास उनके लिए असहनीय था। इन अफसरों ने गुप्त राजनीतिक संगठन बनाने शुरू किए। उत्तर में बनी “नॉर्दर्न सोसाइटी” जो ब्रिटेन की तरह एक संवैधानिक राजतंत्र और संसद चाहती थी वही दक्षिण में बनी “सदर्न सोसाइटी”, जिसका नेता कर्नल पावेल पेस्टेल पूरे ज़ार-परिवार का खात्मा करके रूस को एक क्रांतिकारी गणराज्य बनाना चाहता था।
ज़ार अलेक्जेंडर प्रथम की रहस्यमयी मौत और उत्तराधिकार का संकट
नवंबर 1825 में मौका अचानक उनके सामने आ गया।
दक्षिणी रूस के दूरदराज शहर तगानरोग में ज़ार अलेक्जेंडर प्रथम की रहस्यमयी हालात में अचानक मौत हो गई। यह मौत इतनी अस्पष्ट थी कि अफवाहें फैल गईं कि ज़ार मरा नहीं, बल्कि संन्यासी बनकर साइबेरिया भाग गया है। लेकिन सबसे बड़ी आफत गद्दी के वारिस को लेकर खड़ी हो गई।
बड़ा भाई, ग्रैंड ड्यूक कॉन्स्टेंटिन, गद्दी का पहला हकदार था। लेकिन उसने एक गैर-शाही पोलिश महिला से शादी के चक्कर में सालों पहले गुप्त रूप से गद्दी त्याग दी थी। यह त्याग-पत्र सेना और जनता से छुपाकर रखा गया था।
नतीजा यह हुआ कि तीन हफ्तों तक पूरा साम्राज्य भारी असमंजस में रहा कि असली ज़ार कौन है कॉन्स्टेंटिन या उसका छोटा भाई निकोलस। तीन हफ्तों तक रूस का कोई ज़ार ही नहीं था। 14 दिसंबर 1825, निकोलस ने आखिरकार खुद को ज़ार घोषित किया और सेना से नई शपथ मांगी… तो इन विद्रोही अफसरों ने तय किया कि वार करने का यही सही वक्त है। इतिहास में इन विद्रोहियों को दिसंबर के महीने की वजह से “डिसेम्ब्रिस्ट” कहा गया।
विद्रोही अफसरों ने सैनिकों को यह कहकर सेनेट स्क्वायर पर उतारा कि वे “असली ज़ार कॉन्स्टेंटिन” और संविधान के समर्थन में खड़े हो रहे हैं।
सुबह तक 3,000 सैनिक मैदान में डट गए। लेकिन ठीक इसी निर्णायक मोड़ पर पूरी साजिश ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। तख्तापलट का मुख्य नेता—प्रिंस सर्गेई त्रुबेत्सकोय, जिसे इस विद्रोह का कमांडर चुना गया था—ऐन वक्त पर हिम्मत हार गया और स्क्वायर पर पहुंचा ही नहीं! बिना किसी स्पष्ट नेतृत्व के, विद्रोही सैनिक घंटों तक सेनेट स्क्वायर पर बस खड़े रहे, ठंड में कांपते हुए, कोई अगला क़दम तय नहीं कर पा रहे थे।
फांसी का फंदा, साइबेरिया और डिसेम्ब्रिस्टों की अमर विरासत
निकोलस प्रथम ने बातचीत के लिए सेंट पीटर्सबर्ग के लोकप्रिय मिलिट्री गवर्नर काउंट मिलोरादोविच को भेजा। लेकिन एक विद्रोही अफसर काखोव्स्की ने मिलोरादोविच को गोली मार दी।
सुलह का हर दरवाजा बंद हो चुका था।
शाम होते-होते निकोलस प्रथम ने तोपों से गोलाबारी का आदेश दे दिया। कुछ ही मिनटों में सैकड़ों सैनिक मारे गए, बर्फ पर खून की लाल लकीरें बिछ गईं। जो सैनिक भागकर जमी हुई नेवा नदी पर पहुंचे, तोपों के गोलों से बर्फ टूट गई और वे बर्फीले पानी में डूबकर मर गए। विद्रोह बुरी तरह कुचल दिया गया, बिना किसी लड़ाई के, निकोलस प्रथम ने बड़ी क्रूरता से बदला लिया।

पावेल पेस्टेल सहित पांच प्रमुख नेताओं को फांसी दे दी गई। सैकड़ों कुलीन अफसरों की उपाधियां, दौलत और जागीरें छीन ली गईं। उन्हें बेड़ियों में जकड़कर साइबेरिया की बर्फीली खदानों में उम्रकैद के लिए भेज दिया गया। उनकी रईस पत्नियों ने अपने महलों और बच्चों को छोड़कर अपने पतियों के साथ साइबेरिया के नर्क में जाना चुना जो रूसी इतिहास में अमर प्रेम और त्याग की मिसाल बन गया। लेकिन डिसेम्ब्रिस्टों की असली जीत उनकी हार के बाद शुरू हुई।
वे रूस के पहले ऐसे बागी थे जिन्होंने किसी महल की साजिश के लिए नहीं… बल्कि एक विचार, एक संविधान और जनता की आजादी के लिए अपनी जान दी।
लेकिन बगावत की यह चिंगारी बुझी नहीं, बल्कि सुलगती रही। और यह चिंगारी तब एक महाविस्फोट बनने वाली थी… जब रूस के करोड़ों गुलाम किसान अपनी बेड़ियों को तोड़ने के लिए उठ खड़े होने वाले थे। रूस के इतिहास का वह मोड़ जहाँ 2 करोड़ इंसानों की गुलामी का अंत होगा.. जानने के लिए देखिए अगला एपिसोड: सर्फडम का अंत और असंतोष का नया तूफान।
