जो व्यक्ति अपनी निजी ज़िंदगी में मजहब के किसी भी पारंपरिक नियम को नहीं मानता था, जिसे अपनी पसंदीदा व्हिस्की और हैम-सैंडविच से गहरा लगाव था, और जो हमेशा अंग्रेज़ी में संवाद करता था, उस व्यक्ति ने अचानक ऐसी मजहबी आग भड़का दी कि सदियों पुराना हिंदुस्तान दो टुकड़ों में बँट गया। वही मोहम्मद अली जिन्ना जिन्हें कभी सरोजिनी नायडू और गोपाल कृष्ण गोखले ने ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत’ कहा था, आगे चलकर ऐसी ज़िद पर अड़ गए कि 10 लाख से अधिक बेगुनाहों की जान चली गई।
आखिर 1920 और 1930 के दशक में ऐसा क्या घटा? महात्मा गांधी की ऐसी कौन-सी रणनीति थी जिससे जिन्ना किनारे हो गए, और जवाहरलाल नेहरू के किस दंभ ने जिन्ना को अंतिम रास्ते पर ला खड़ा किया?
जब 1920 के खिलाफ़त आंदोलन को लेकर हुई गांधीजी से असहमति
1920 से पहले तक मोहम्मद अली जिन्ना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सफल नेता माने जाते थे। वे कानून और संविधान के दायरे में रहकर स्वायत्तता और अधिकारों की मांग करने वाले राजनेता थे। लेकिन 1920 के दशक में महात्मा गांधी ने आज़ादी के संघर्ष को व्यापक जन-आंदोलन बनाने के लिए खिलाफ़त आंदोलन का समर्थन किया और उलेमाओं व मुल्ला-मौलवियों के साथ साझा मंच तैयार किया।

उस समय जिन्ना ने इसका खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि राजनीति में धार्मिक भावनाओं और रूढ़िवादी तत्वों को लाना भविष्य में खतरनाक साबित होगा। गांधीजी ने उस दौर में जिन्ना के संवैधानिक दृष्टिकोण की उपेक्षा की। अपनी ही पार्टी में दरकिनार होकर जिन्ना ने कांग्रेस छोड़ दी और कुछ समय के लिए लंदन जाकर वकालत करने लगे। यहीं से उनके मन में कांग्रेस के नेतृत्व के प्रति एक गहरी खटास पैदा हुई।
नेहरू का दृष्टिकोण और लीग की बेदखली
लेकिन जब एक दशक बीतने के बाद 1930 में जिन्ना भारत लौटे, तो वे कांग्रेस के साथ एक राजनीतिक समझौता करने के लिए इकच्छुक थे। लेकिन उस समय तक जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस का सबसे प्रभावशाली चेहरा बन चुके थे। रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि नेहरू ने उस समय आत्मविश्वास और कुछ हद तक दंभ में आकर यह दावा किया कि आम मुस्लिम जनता उनके समाजवादी दर्शन का समर्थन करेगी, न कि किसी धर्म-आधारित दल का।
1937 के प्रांतीय चुनावों में सामान्य सीटों पर कांग्रेस को भारी जीत मिली। संयुक्त प्रांत में मुस्लिम लीग ने कांग्रेस के साथ मिलकर साझा सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा। लेकिन नेहरू और कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और कड़ी शर्तें रख दीं। इस राजनीतिक अलगाव ने जिन्ना को अंदर तक हिला दिया। वे समझ चुके थे धर्मनिरपेक्ष चुनावी राजनीति में मुस्लिम लीग का कोई स्वतंत्र वजूद नहीं बचेगा, जब तक कि वे अपने समुदाय को पूरी तरह अपने पीछे लामबंद न कर लें।
‘इस्लाम खतरे में है’ का नैरेटिव
1937 के बाद जिन्ना ने अपनी राजनीतिक दिशा पूरी तरह बदल दी। जिस नेता ने अपने निजी जीवन में कभी मजहब को स्थान नहीं दिया, उसने राजनीति में धर्म को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया। साल 1927 तक मुस्लिम लीग में केवल 1,300 सदस्य थे। लेकिन जिन्ना ने सघन प्रचार शुरू किया कि एक अखंड भारत में मुसलमानों को ‘ब्राह्मण-बनिया राज’ के अधीन रहना पड़ेगा और उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।
नतीजा यह हुआ कि 1944 तक केवल बंगाल में मुस्लिम लीग के सक्रिय सदस्यों की संख्या 5 लाख से ऊपर पहुँच गई और पंजाब में यह 2 लाख पार कर गई! बुनकर, दस्तकार, पेशेवर और व्यापारी—सभी लीग के मुस्लिम लीग के झंडे तले एकजुट होने लगे। मार्च 1940 के लाहौर अधिवेशन में जिन्ना ने औपचारिक रूप से द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (Two-Nation Theory) का ऐलान किया और एक अलग राष्ट्र ‘पाकिस्तान’ की मांग रख दी।
डायरेक्ट एक्शन डे और 800 मील लंबे गलियारे की मांग
1946 में जब कैबिनेट मिशन ने अखंड भारत के तहत सत्ता सौंपने की प्रस्ताव लाया, तो जिन्ना ने ऐसी कड़ी शर्तें रखीं जिन्हें मानना असंभव था। यहाँ तक कि बातचीत के एक दौर में जिन्ना ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को जोड़ने के लिए भारत के बीच से 800 मील लंबे ज़मीनी गलियारे की मांग तक कर दी और जब बात नहीं बनी, तो 29 जुलाई 1946 को मुस्लिम लीग ने घोषणा की कि अब पाकिस्तान हासिल करने के लिए ‘डायरेक्ट एक्शन’ की घोषणा कर दी। 16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में शुरू हुई भीषण सांप्रदायिक हिंसा ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया, जिसके बाद ब्रिटिश सत्ता और कांग्रेस दोनों के सामने विभाजन के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं बचा।

1940 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने आगाह किया था कि ग्यारह सदियों का साझा इतिहास और साझी संस्कृति एक अविभाज्य राष्ट्र बन चुकी है। लेकिन जिन्ना की निजी महत्वाकांक्षा, कांग्रेस की रणनीतिक चूकें और अंग्रेजों की फूट डालो-राज करो की नीति ने मिलकर देश के दो टुकड़े कर दिए। जिन्ना ने पाकिस्तान तो बना लिया, लेकिन उसकी कीमत लाखों बेगुनाह इंसानों ने अपने खून और विस्थापन से चुकाई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
Q1: क्या जिन्ना शुरू से ही एक अलग देश पाकिस्तान चाहते थे?
नहीं, 1930 के दशक तक जिन्ना एकीकृत भारत के भीतर मुसलमानों के लिए वैधानिक सुरक्षा और स्वायत्तता चाहते थे। 1937 के चुनावों के बाद की परिस्थितियों और राजनीतिक अलगाव के बाद उन्होंने 1940 में औपचारिक रूप से पाकिस्तान की मांग उठाई।
Q2: जिन्ना को ‘हिंदू-मुस्लिम एकता का दूत’ किसने कहा था?
सरोजिनी नायडू और गोपाल कृष्ण गोखले ने उनके शुरुआती धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक दृष्टिकोण को देखकर उन्हें यह उपाधि दी थी।
Q3: क्या जिन्ना ने सचमुच 800 मील लंबा गलियारा माँगा था?
हाँ, विभाजन की वार्ताओं के दौरान पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को जोड़ने के लिए जिन्ना ने भारत के बीच से 800 मील लंबे ज़मीनी गलियारे की मांग रखी थी, जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया था।
संदर्भ व प्राथमिक स्रोत:
- रामचंद्र गुहा — India After Gandhi: The History of the World’s Largest Democracy
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