पेटे रीज जो विभाजन के दौरान पंजाब में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए गठित की गई ‘पंजाब बाउंड्री फोर्स’ के कमांडर थे, उनके आंकड़ों के मुताबिक मार्च से लेकर जुलाई के अंत तक पंजाब में मरनेवालों की तादाद 4,500 और घायलों की तादाद 2,500 तक पहुंच चुकी थी। लेकिन सिर्फ अगस्त 1947 महीने में ही सेना के आंकड़ों के मुताबिक मरने वालों की संख्या 15,000 आंकी गई। जबकि इसके अलावा रीज ने यह भी स्वीकार किया था कि इसकी वास्तविक संख्या इससे ‘दो या तीन गुना ज्यादा हो सकती है।
लेकिन सच्चाई यह है कि इस कत्लेआम की चेतावनी महीनों पहले से दी जा रही थी। 1947 की गर्मियों में जो इंसान सबसे ज्यादा संवेदनशील जिम्मेदारी निभा रहा था, उसका नाम था सर एवेन जेनकिंस—अविभाजित पंजाब का गवर्नर।
एक तरफ जब दिल्ली के वाइसरी लॉज में आज़ादी के जश्न और सत्ता के बंटवारे की मेज सज रही थी तब लाहौर में बैठा यही अंग्रेज़ अफ़सर भारत के तत्काल अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को 1 नहीं 2 नहीं बल्कि 3-3 बार बार चिट्ठी लिखकर आगाह कर रहा था। लेकिन दिल्ली ने इन सभी चेतावनियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। आखिर क्या लिखा था उन तीन चिट्ठियों में? और माउंटबेटन की किस ज़िद ने पंजाब को श्मशान में तब्दील कर दिया?
जब पंजाब के गवर्नर ने मई 1947 की शुरुआत में चिट्ठी लिखकर लॉर्ड माउंटबेटन को किया था आगाह
मई की शुरुआत में जेनकिंस अपनी पहली चिट्ठी में माउंटबेटन को लिखा कि भारत के राजनीतिक समस्या के समाधान की दिशा में कोई भी घोषणा हड़बड़ी में न की जाए। पंजाब में हमें दोनों समुदायों की तरफ से किसी भी तरह के सहयोग की जरा भी उम्मीद नहीं हैं। इसलिए पंजाब के विभाजन की घोषणा करना बिल्कुल ही निर्रचक कदम होगा, क्योंकि इसे कोई भी समुदाय स्वीकार नहीं करेगा।” लेकिन फिर भी बंटवारे का फैसला ले ही लिया गया और पंजाब का बंटवारा कर दिया गया। अब वहां के गवर्नर को कानून और व्यवस्था की स्थिति संभालनी थी।

98 साल पुरानी इकाई को 6 हफ़्तों में कैसे बाँटें?
30 जुलाई को उसने फिर से माउंटबेटन को दूसरी चिट्ठी लिखते है जिसमे बताते है कि विभाजन के साथ आजादी की घोषणा ने लोगों में उत्साह पैदा करने की जगह पर उन्हें उत्तेजित कर दिया है। मुसलमानों ने उम्मीद लगा रखी थी कि उन्हें पूरा पंजाब मिलेगा, जबकि हिंदुओं और सिखों को ये भय सता रहा है कि वे लाहौर को खो बैठेंगे।
इसके साथ ही गवर्नर ने बहुत खिन्न होकर टिप्पणी भी की कि ‘
तीन करोड़ लोगों से बसे इलाके को जो 98 साल से एक प्रशासनिक इकाई के रूप में शासित रहे हैं, महज छह सप्ताहों में दो अलग-अलग मुल्कों में बांट देना बहुत कठिन काम होगा। अगर वे बहुत भाईचारे के माहौल में रहते हैं और बंटवारे को स्वीकार कर आगे बढ़ना चाहते हैं तो भी इस काम को अंजाम तक पहुंचाना काफी कठिन है।
जेनकिंस ने पंजाब के बिगड़ते हालात को संभालने के लिए कई बार ज्यादा सैनिक टुकड़ियों की मांग की। उसने एक टैक्टिकल रिकानसंस स्क्वाड्रन’ (सेना की एक ऐसी टुकड़ी जो दुश्मन की स्थिति, गतिविधि, संसाधनों और योजनाओं के बारे में पहले से सर्वेक्षण करती है) की भी मांग की। इसके बावजूद पंजाब में पर्याप्त सैनिक नहीं भेजे गए। इसका मुख्य कारण यह था कि फ़ौज के एक बड़े हिस्से को घबराए हुए अंग्रेज़ शासक वर्ग की सुरक्षा में तैनात कर दिया गया था।
सेना की कमी के वजह था सेना को अंग्रेजों की सुरक्षा मे लगाना
ब्रिटिश हुकूमत को यह भय सता रहा था कि जिस क्षण हिंदुस्तान छोड़ने का फ़ैसला सार्वजनिक होगा, अंग्रेज़ों पर हमले शुरू हो जाएँगे। भय का यह वातावरण भारत में रहने वाले सभी तबकों के यूरोपियनों में फैला था। यूरोपीय अधिकारी, पादरी, चाय-कॉफ़ी बागानों के मालिक और कारोबारी बुरी तरह डरे हुए थे। सन् 1946 की गर्मियों में एक नौजवान अंग्रेज अधिकारी ने अपने परिवार वालों को खत लिखा जिससे उसकी भयग्रस्त मानसिकता का पता चलता है। उसने लिखा,
‘जब तक यह तमाशा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच में सांप्रदायिक खूनखराबे का रूप लेगा, तब तक शायद पूरा हिंदुस्तान हम लोगों के खिलाफ हो जाएगा। उतना वक्त पूरे देश में फैली यूरोपियन आबादी के सफाए के लिए काफी होगा। यानि इस पूरे समय काल को देखे तो हिंदुस्तान में रह रहे अंग्रेजों की जानोमाल की सुरक्षा अंग्रेजी सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर थी।
लेकिन इसके विपरीत, हकीकत तो यह थी कि 1947 की गर्मियों में गोरे औरत और मर्द हिंदुस्तान में सबसे सुरक्षित लोग थे। कोई भी उन्हें मारने की नहीं सोच रहा था। लेकिन उनके मन में बैठी असुरक्षा की भावना की वजह से दंगों पर काबू करने के लिए तैनात किए जाने की बजाय सेना की बहुत सारी टुकड़ियां यूरोपियन कॉलोनियों के आसपास तैनात कर दी गईं।
गवर्नर की तीसरी मांग थी जल्द से जल्द बंटवारे का ऐलान
अपने आपको बचाने की भावना ही इस कदर हावी था कि पंजाब के बंटवारे का ऐलान आजादी के दिन तक टाल दिया गया था। जबकि 22 जुलाई को लाहौर का दौरा करने के बाद, लॉर्ड माउंटबेटन ने सर सिरिल रेडक्लिफ को लिखा कि वे अपना काम तेज करें, क्योंकि हरेक ‘अतिरिक्त’ दिन उथल-पुथल को थोड़ा कम करने में मददगार होगा। पंजाब के बंटवारे का ऐलान अगर आजादी मिलने से पहले कर दिया जाता तो फिर फौजी टुकड़ियों को सत्ता हस्तांतरण से पहले ही उन इलाकों में तैनात किया जा सकता था।

पंजाब का गवर्नर भी इस पर जोर दे रहा था कि ज्योंही सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाए, जल्द से जल्द इसका ऐलान कर दिया जाना चाहिए। रेडक्लिफ 9 अगस्त को ही अपना काम पूरा कर चुके थे। लेकिन माउंटबेटन ने आखरी घड़ी में अपना इरादा बदल लिया और 15 अगस्त के दिन ही इसे सार्वजनिक तौर पर घोषित करने का फैसला किया।
इस देरी के पीछे माउंटबेटन ने जो तर्क दिया, वह बेहद विचित्र और चौंकाने वाला था। माउंटबेटन के अनुसार:
“इसकी घोषणा जितनी पहले कर दी जाती, उतना ही ज़्यादा उपद्रव के लिए अंग्रेज़ों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता, जो अनिवार्य रूप से होना ही था। उसी तरह सीमा निर्धारण की घोषणा में हमने जितनी देरी की, उतना ही असंतुष्ट लोगों ने अंग्रेज़ों को इस बात के लिए कम ज़िम्मेदार ठहराया।”
भारत से वापसी के बाद कैसे गढ़ी गई माउंटबेटन की छवि?
जब माउंटबेटन हिंदुस्तान से वापस अपने मुल्क जाते है तो उसने अपने कार्यकाल की बेहतरीन तस्वीर पूरी दुनिया के सामने रखने की कोशिश की। उसने अपनी कामयाबियों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने वाली और अपने नाकामयाबियों को ढंकने वाली कई किताबें लिखवाई या इस विषय पर लिखने वालों को प्रभावित किया। इन विवरणों में माउंटबेटन की छवि एक ऐसे कुशल और निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में गढ़ी गई, जिसने भारत और पाकिस्तान, कांग्रेस और मुस्लिम लीग, महात्मा गांधी और मोहम्मद अली जिन्ना, तथा जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के बीच के गहरे विवादों को किसी परिपक्व भद्रपुरुष की तरह सुलझाया हो।
हालाँकि, ज़मीनी रिकॉर्ड और गवर्नर सर एवेन जेनकिंस की उपेक्षित चिट्ठियाँ इस बात की गवाही देती हैं कि प्रशासनिक हड़बड़ी, प्राथमिकताओं में यूरोपीय सुरक्षा को ऊपर रखने और सीमा निर्धारण के ऐलान में की गई जानबूझकर देरी ने 1947 के रक्तपात को रोकने के सभी मौक़े गँवा दिए थे।
संदर्भ व प्राथमिक स्रोत:
- रामचंद्र गुहा — India After Gandhi: The History of the World’s Largest Democracy
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