कैसे बने लाल बहादुर शास्त्री PM? 1964 में मोरारजी को पछाड़ने की इनसाइड स्टोरी

नेहरू के निधन के बाद जब देश में नए नेतृत्व को लेकर चर्चा तेज़ थी, तब कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज ने 200 सांसदों और 12 मुख्यमंत्रियों से बात करके शास्त्री जी को आगे किया। पढ़िए लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री बनने की पूरी इनसाइड स्टोरी।

27 मई, 1964 की सुबह पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हो गई और ठीक इसके 2 घंटे बाद तत्कालीन गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया। साथ ही पंडित नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज भी शुरू कर दी गई। नेहरू के बाद देश की कमान किसके हाथ में जाएगी, इसका पूरा दारोमदार उस वक्त कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. कामराज के कंधों पर था।

जब ‘पारक्कलम’ कहकर कामराज ने पर्दे के पीछे से पलट दी पूरी बाज़ी

तमिलनाडु में एक निचली जाति से ताल्लुक रखने वाले कामराज आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए अपनी स्कूली पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। अंग्रेज़ों ने उन्हें छह मामलों में सजाएं सुनाई थीं और करीब आठ साल जेल में काटे थे। कहते है जितना उनका कद और उनकी छवि काफी मजबूत थी उतने ही उनकी जीवन शैली सादगी भरी थी। उन्होंने ताजिंदगी शादी नहीं की और अपनी जिंदगी देश और कांग्रेस को मजबूत करने में लगा दी। उनके बारे में कहा जाता है किं लगभग सवालों का एक ही जवाब देते थे पारक्कलम…। तमिल के इस शब्द का मतलब था कि—’हम देखते हैं कि क्या हो सकता है!’ कम बोलने और दूसरों को गहराई से सुनने की इसी खूबी ने उन्हें उत्तराधिकारी चुनने की प्रक्रिया में सबसे असरदार मध्यस्थ बना दिया।

मोरारजी देसाई पीएम बनते-बनते रह गए? 200 सांसदों की वो इनसाइड स्टोरी

जवाहरलाल नेहरू की मौत के ठीक अगले ही दिन यानी 28 मई 1964 से कामराज ने एक व्यापक और सघन राजनीतिक परामर्श अभियान शुरू किया। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्रियों और सिंडिकेट के नाम से मशहूर दूसरे कद्दावर नेताओं से राय एक-एक कर बात कर रहे थे पंडितजी का योग्य उत्तराधिकारी कौन हो सकता है। शुरुआत में प्रधानमंत्री पद की रेस में दो नाम सबसे आगे थे उनमे से सबसे पहला नाम उभरकर जो सामने आ रहा था वो था मोरारजी देसाई का। देसाई, गुजरात से आते थे और सरकार में अपनी बेहतरीन प्रशासकीय प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे।

मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का खुलकर इजहार भी किया था। चार दिनों के दरम्यान कामराज, करीब दर्जन भर मुख्यमंत्रियों से मिले और लगभग 200 सांसदों से बातचीत की। इतने नेताओं से बातचीत के बाद जो निष्कर्ष सामने आ रही थी वो ये कि मोरारजी देसाई एक विवादास्पद पसंद हो सकते थे। हालांकि, बातचीत में सांसदों ने उनके अड़ियल रवैये, आक्रामक कार्यशैली और मनमर्जी फैसले लेने की प्रवृत्ति पर आपत्तियां दर्ज कराईं, यानि मोरारजी देसाई के नाम पर आमसहमति नहीं बन पा रही थी।

मोरारजी देसाई पीएम बनते-बनते रह गए 200 सांसदों की वो इनसाइड स्टोरी

लेकिन इस बीच एक और नाम निकल कर आ रहा था और ज्यादातर सांसदों ने जिस नेता पर अपनी सहमति व्यक्त की थी वे थे लालबहादुर शास्त्री। शास्त्री भी एक काबिल प्रशासक थे और पार्टी नेताओं के लिए आसानी से उपलब्ध भी थे। चुकी वे हिंदी पट्टी से आते थे, ये बात भी उनके पक्ष में जाती थी। इसके अलावा जीवन के अंतिम दिनों में पंडित नेहरू उन पर ज्यादा से ज्यादा निर्भर रहने लगे थे, इस बात का भी पार्टी नेताओं में अपना अलग असर था। इन तमाम वजहों ने कामराज के फैसले को प्रभावित किया जो खुद भी चाहते थे कि नेतृत्व परिवर्तन में एक निरंतरता दिखनी चाहिए। पलड़ा, शास्त्री जी के पक्ष में झुक चुका था। 31 मई 1964 को कांग्रेस कार्यसमिति ने औपचारिक रूप से लालबहादुर शास्त्री के नाम पर मुहर लगा दी और 9 जून 1964 को उन्होंने देश के दूसरे प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

जब लालबहादुर शास्त्री ने मोरारजी की कैबिनेट से कर दी छुट्टी

शास्त्री जी को अक्सर सीधा और नरम नेता समझा जाता था, लेकिन शपथ लेते ही उन्होंने अपने कड़े फैसलों से राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही दिन बाद शास्त्री ने मोरारजी देसाई को कैबिनेट से हटा दिया गया क्योंकि वे नंबर-2 की पोजीशन के लिए दबाव दे रहे थे। वही दूसरी तरफ इंदिरा गांधी को कैबिनेट में लाने की मांग उठने लगी। लालबहादुर शास्त्री ने राजनीतिक परिपक्वता और दूरदर्शिता दिखाते हुए इंदिरा गांधी को कैबिनेट में तो शामिल कर लिया, लेकिन उन्हें अपेक्षाकृत कम महत्व वाला सूचना और प्रसारण मंत्रलय ही दिया गया।

जिसके जवाब में इंदिरा गांधी ने शास्त्री के तीनमूर्ति भवन में अपना निवास स्थान बनाने की कोशिशों में अड़ंगा डालना शुरू कर दिया। तीनमूर्ति भवन में पंडित नेहरू बतौर प्रधानमंत्री रहा करते थे। इस जगह का अपना एक प्रतीकात्मक महत्व भी था। इंदिरा गांधी ने प्रस्ताव किया कि उनके पिता के निवास स्थल को स्मारक घोषित कर दिया जाए। अंततः इसे नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय में बदल दिया गया और शास्त्री जी 10, जनपथ में रहने चले गए।

‘रिमोट कंट्रोल’ बनने से जब शास्त्री ने किया इनकार और रखी दी PMO की नींव

लालबहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद के लिए चुन लिए जाने के बाद, कामराज ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया था कि नेहरू के ‘एकछत्र शासन’ के बाद अब देश ‘सामूहिक नेतृत्व के ज़रिये चलेगा। इसका सीधा मतलब यह था कि पार्टी सिंडिकेट पर्दे के पीछे से सरकार के फैसलों को नियंत्रित करेगा। लेकिन शास्त्री कुछ और ही सोच रहे थे, उन्हें सामूहिक नेतृत्व का विचार मंजूर नहीं था।

कुछ ही दिनों में ‘प्रधानमंत्री सचिवालय’ नाम का एक नया कार्यालय बनाया गया, जिसमें बड़े करीने से चुने हुए भरोसेमंद अफसरों को बहाल किया गया। इस सचिवालय का काम नीतिगत मामलों पर सीधे प्रधानमंत्री को सलाह देना था। इस एक साहसिक कदम ने शास्त्री जी को नीतिगत फैसलों के लिए अपने ही मंत्रिमंडल और पार्टी सिंडिकेट की निर्भरता से पूरी तरह आज़ाद कर दिया। अब एक भरोसेमंद अफसरों की टीम तैयार थी जो स्वतंत्र और निष्पक्ष थी। शास्त्री ने इस नए प्रयोग ने सामूहिक नेतृत्व की बात को एक हद तक प्रभावहीन कर दिया।

जब शास्त्री जी के आत्मविश्वास देख दंग रह गया विदेशी मीडिया

गार्जियन के एक पत्रकार जब दिल्ली में लालबहादुर शास्त्री से मुलाकात किये तो उन्होंने शास्त्री जी को ‘आत्मविश्वास से लबरेज़ और एक बेहद मज़बूत नेता’ के रूप में पाया। पत्रकार बताते है शास्त्री जी कम, मगर बेहद नपी-तुली और मतलब की बात करते थे, जिसका एक भी शब्द ‘फ़ालतू’ नहीं होता था।

हालांकि अभी भी सत्तातंत्र में अंग्रेजों के जमाने के पुराने लोग शास्त्री को लेकर उतने आशान्वित नहीं थे। एक आईसीएस अफसर ने दूसरे को पत्र लिखा था कि नेहरू की मौत ने मुल्क के भविष्य को अनिश्चितताओं से भर दिया है। उसने आगे लिखा:

“मुझे नहीं लगता कि शास्त्री चीजों को संभाल पाएंगे। चीन और पाकिस्तान की बात छोड़ भी दी जाए तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक निहित स्वार्थी तत्व सर उठा लेंगे जिसे शायद ही शास्त्री संभाल पाएं। तो क्या बड़े पैमाने पर हिंदुस्तान का हाल साइप्रस जैसा हो जाएगा…? हम किस तरह के अराजक वक्त में रह रहे हैं!“

इतिहास गवाह है कि सादगी की मूरत दिखने वाले लालबहादुर शास्त्री ने आगे चलकर देश को न केवल संभाला, बल्कि आने वाले संकटों में अपनी दृढ़ता का लोहा भी मनवाया।

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