आज़ाद भारत की पहली सरकार बनी। इस मंत्रिमंडल में तीन ऐसे कद्दावर चेहरे शामिल थे, जिनकी राजनीतिक राह कांग्रेस से बिल्कुल अलग थी और जो वैचारिक रूप से कांग्रेस के सबसे प्रखर विरोधी माने जाते थे।
ये तीन नेता थे:
- आर. के. शणमुखम शेट्टी – अर्थशास्त्री
- डॉ. भीमराव आंबेडकर – कानून और संविधान के जानकार
- श्यामा प्रसाद मुखर्जी – बंगाल के अग्रणी नेता

इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘India After Gandhi’ में बताते हैं कि जब स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेता जेलों में बंद थे, तब इन तीनों नेताओं ने ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग किया था।

लेकिन आज़ादी मिलते ही पंडित नेहरू ने पुराने सारे राजनीतिक और वैचारिक मतभेद किनारे कर दिए। इसके पीछे महात्मा गांधी की एक स्पष्ट कथन था—”आज़ादी हिंदुस्तान को मिली है, कांग्रेस को नहीं।

गांधीजी का मानना था कि नए भारत के निर्माण में पार्टी की निष्ठा से कहीं ज़्यादा देश की प्रतिभा और क़ाबिलियत की ज़रूरत है। इसी सोच के चलते नेहरू ने कई महत्वपूर्ण मंत्रालय अपने ही आलोचकों के हाथों में सौंप दिए।

यही कारण है कि आज़ाद हिंदुस्तान की पहली कैबिनेट महज़ एक राजनीतिक सरकार नहीं थी, बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाली एक ‘राष्ट्रीय सरकार’ थी।
