वह भारतीय क्रांतिकारी जिसने विदेशों में रहकर अंग्रेज़ी साम्राज्य को चुनौती दी

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भारत की आज़ादी का इतिहास केवल दिल्ली, लाहौर, कोलकाता, मुंबई या अंडमान की जेलों तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसकी गूंज लंदन, न्यूयॉर्क, टोक्यो, सैन फ्रांसिस्को, काबुल, ताशकंद और मॉस्को तक सुनाई देती है। इस कहानी के केंद्र में हैं मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली— एक ऐसे क्रांतिकारी, जिन्होंने भारत […]

भारत की आज़ादी का इतिहास केवल दिल्ली, लाहौर, कोलकाता, मुंबई या अंडमान की जेलों तक सीमित नहीं है। इस संघर्ष का एक ऐसा अध्याय भी है, जिसकी गूंज लंदन, न्यूयॉर्क, टोक्यो, सैन फ्रांसिस्को, काबुल, ताशकंद और मॉस्को तक सुनाई देती है। इस कहानी के केंद्र में हैं मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली— एक ऐसे क्रांतिकारी, जिन्होंने भारत से हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी अंग्रेज़ी साम्राज्य के खिलाफ आज़ादी की मशाल जलाए रखी।

उन्होंने न केवल लेख और भाषणों के माध्यम से ब्रिटिश शासन का विरोध किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे राजनीतिक संबंध बनाने की कोशिश की, जो भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को वैश्विक समर्थन दिला सकें। यही वजह थी कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां उन्हें बेहद खतरनाक राष्ट्रवादी मानती थीं।

भोपाल का वह युवक, जिसने दुनिया को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया

मौलाना अब्दुल हाफ़िज़ मोहम्मद बरकतुल्लाह का जन्म 7 जुलाई 1854 को भोपाल के इटवारा मोहल्ले में हुआ था। शुरुआती शिक्षा के दौरान ही उन्होंने अरबी, फ़ारसी और उर्दू पर असाधारण पकड़ बना ली। आगे चलकर उन्होंने अंग्रेज़ी भी सीखी और बाद में जापानी भाषा का भी अध्ययन किया। बहुभाषी होने का सबसे बड़ा लाभ उन्हें यह मिला कि वे अलग-अलग देशों के बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं से सीधे संवाद कर सके। उनकी सोच उस दौर के अधिकांश नेताओं से अलग थी। वे मानते थे कि भारत की लड़ाई केवल भारत के भीतर नहीं जीती जा सकती। यदि अंग्रेज़ी साम्राज्य पूरी दुनिया में फैला है, तो उसके खिलाफ संघर्ष भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए।

अंग्रेज़ भी उनसे इतना डरते थे

बरकतुल्लाह केवल भाषण देने वाले नेता नहीं थे। वे विचारों के ऐसे योद्धा थे, जो अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी नीति “फूट डालो और राज करो” को अच्छी तरह समझ चुके थे। वे लगातार हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करते थे। उनका मानना था कि जब तक भारतीय समाज धार्मिक आधार पर बंटा रहेगा, तब तक अंग्रेज़ों के लिए भारत पर शासन करना आसान रहेगा। इसके साथ ही वे एशिया और मुस्लिम देशों में भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत तैयार करने में जुटे थे। यही वजह थी कि ब्रिटिश सरकार उनके हर लेख, हर भाषण और हर यात्रा पर नजर रखती थी।

लंदन में क्रांतिकारियों का नया साथी मिला

भारत छोड़ने के बाद बरकतुल्लाह सबसे पहले इंग्लैंड पहुंचे। उस समय लंदन भारतीय राष्ट्रवादियों और क्रांतिकारियों की गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन चुका था। यहीं उनकी मुलाकात श्यामजी कृष्ण वर्मा, लाला हरदयाल, राजा महेंद्र प्रताप और अन्य प्रवासी भारतीय क्रांतिकारियों से हुई। इंडिया हाउस जैसे केंद्रों में बैठकर अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ रणनीतियां बनाई जाती थीं। बरकतुल्लाह ने यहां कई लेख लिखे और सार्वजनिक मंचों पर ब्रिटिश शासन की तीखी आलोचना की। लेकिन जल्द ही उन्हें महसूस हुआ कि इंग्लैंड में रहकर खुलकर काम करना आसान नहीं है। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां हर गतिविधि पर नजर रख रही थीं। इसी कारण उन्होंने आगे अमेरिका का रुख किया।

अमेरिका में खुलकर बोलने की आज़ादी मिली

अमेरिका पहुंचने के बाद बरकतुल्लाह को भारतीय प्रवासी समुदाय के बीच काम करने का अवसर मिला। उन्होंने मजदूरों, छात्रों और प्रवासी भारतीयों को संबोधित करना शुरू किया। उनका संदेश स्पष्ट था— भारत केवल भारतीयों का है और अंग्रेज़ी शासन का अंत होना चाहिए। उनके भाषणों में धार्मिक कट्टरता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता का संदेश होता था। धीरे-धीरे वे विदेशों में बसे भारतीयों के बीच एक सम्मानित राष्ट्रवादी नेता के रूप में पहचाने जाने लगे।

टोक्यो में ऐसी पत्रिका निकाली, जिससे अंग्रेज़ घबरा गए

1909 में बरकतुल्लाह जापान पहुंचे। यहां उन्होंने “Islamic Fraternity” नाम से एक पत्रिका शुरू की। हालांकि नाम धार्मिक था, लेकिन इसकी सामग्री केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं थी। इसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद की खुली आलोचना की जाती थी और एशियाई देशों से साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट होने की अपील की जाती थी। पत्रिका भारत तक भी पहुंचने लगी। ब्रिटिश सरकार ने इसे बेहद खतरनाक मानते हुए 1912 में भारत में प्रतिबंधित कर दिया। इसके बाद उन्होंने दूसरे प्रकाशनों के माध्यम से भी अपना अभियान जारी रखा।

ग़दर पार्टी से जुड़कर अंग्रेज़ों के खिलाफ नया अभियान छेड़ा

1913 में अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में ग़दर पार्टी की स्थापना हुई। इस संगठन का उद्देश्य विदेशों में बसे भारतीयों को संगठित कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की तैयारी करना था। बरकतुल्लाह भी इस आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़े। उन्होंने ग़दर पार्टी के मंच से अनेक भाषण दिए। वे भारतीय मजदूरों, किसानों और विद्यार्थियों को यह समझाते थे कि स्वतंत्रता केवल याचना से नहीं मिलेगी, बल्कि उसके लिए संगठित संघर्ष करना होगा। उनके लेख और भाषण ग़दर आंदोलन की विचारधारा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुए।

काबुल में बनी भारत की पहली निर्वासित सरकार

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का यह अध्याय आज भी बहुत कम लोगों को पता है। 1 दिसंबर 1915 को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत की पहली निर्वासित (Provisional) सरकार बनाई गई। इस सरकार के राष्ट्रपति राजा महेंद्र प्रताप बने। जबकि मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली को प्रधानमंत्री बनाया गया। इसके अलावा मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को गृह मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस सरकार का उद्देश्य स्पष्ट था— विदेशी शक्तियों के सहयोग से ब्रिटिश शासन को भारत से हटाना और स्वतंत्र भारत की स्थापना करना। यह पहल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद सरकार से लगभग तीन दशक पहले की थी।

काबुल मिशन… जिसने अंग्रेज़ों की चिंता बढ़ा दी

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन कई मोर्चों पर उलझा हुआ था। बरकतुल्लाह और उनके साथियों ने इस अवसर का लाभ उठाने की कोशिश की। उन्होंने जर्मनी, तुर्की और अफगानिस्तान से संपर्क स्थापित कर भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया। योजना यह थी कि यदि इन देशों का सहयोग मिल जाए, तो भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़ा विद्रोह खड़ा किया जा सकता है। हालांकि अफगानिस्तान की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों और ब्रिटिश दबाव के कारण यह योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकी। फिर भी काबुल की यह निर्वासित सरकार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक बेहद महत्वपूर्ण और साहसिक प्रयोग मानी जाती है।

रूस की क्रांति ने उनकी सोच बदल दी

1917 की रूसी क्रांति ने पूरी दुनिया की राजनीति को नई दिशा दी। ज़ारशाही का अंत हुआ और बोल्शेविक नेता व्लादिमीर लेनिन सत्ता में आए। पहली बार किसी बड़ी शक्ति ने खुलकर साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज़ उठाई। मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली इस परिवर्तन को केवल रूस तक सीमित घटना नहीं मानते थे। उन्हें लगा कि यदि दुनिया की बड़ी ताकतें औपनिवेशिक शासन के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं, तो भारत की आज़ादी की लड़ाई को भी नया अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है। यही सोच उन्हें सोवियत रूस तक ले गई।

जब व्लादिमीर लेनिन से मिले मौलाना बरकतुल्लाह

इतिहास में दर्ज उल्लेखों के अनुसार मौलाना बरकतुल्लाह ने सोवियत रूस में व्लादिमीर लेनिन से मुलाकात की। उस समय राजा महेंद्र प्रताप भी उनके साथ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों में सक्रिय थे। बरकतुल्लाह ने लेनिन के सामने भारत की राजनीतिक स्थिति रखी और ब्रिटिश शासन के खिलाफ समर्थन की अपील की। उनका मानना था कि यदि दुनिया की उपनिवेशित जनता एकजुट हो जाए तो साम्राज्यवाद की जड़ें कमजोर हो सकती हैं। यह मुलाकात केवल औपचारिक कूटनीति नहीं थी, बल्कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को वैश्विक मंच पर ले जाने का एक गंभीर प्रयास थी।

इस्लाम और समाजवाद को साथ देखने वाले दुर्लभ विचारक

बरकतुल्लाह किसी राजनीतिक विचारधारा के कट्टर समर्थक नहीं थे। वे स्वयं को सीधे तौर पर कम्युनिस्ट नहीं कहते थे, लेकिन समाजवाद के उन सिद्धांतों से प्रभावित थे जो समानता, न्याय और शोषण के विरोध की बात करते थे। उनका मानना था कि इस्लाम की मूल भावना भी सामाजिक न्याय, समान अवसर और अत्याचार के विरोध पर आधारित है। इसी कारण उन्होंने अनेक अवसरों पर मुस्लिम समाज से अपील की कि वे साम्राज्यवाद के खिलाफ उन ताकतों का साथ दें जो औपनिवेशिक शासन का विरोध कर रही हैं। उस दौर में यह सोच बेहद प्रगतिशील मानी जाती थी।

उनकी अपील, “अंग्रेज़ों के वादों पर भरोसा मत करो”

बरकतुल्लाह का मानना था कि ब्रिटेन और उसके सहयोगी देश एशिया तथा मुस्लिम दुनिया में अपने राजनीतिक हितों के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने कई लेखों और भाषणों में कहा कि ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की और दूसरे देशों को ब्रिटिश नीतियों से सावधान रहना चाहिए। उनका संदेश साफ था— अगर एशिया को स्वतंत्र होना है तो उसे अपनी ताकत पर भरोसा करना होगा, न कि साम्राज्यवादी शक्तियों के वादों पर। यही कारण था कि ब्रिटिश सरकार उनके लेखन को बेहद खतरनाक मानती थी।

ताशकंद और मॉस्को भारतीय क्रांतिकारियों के नए केंद्र बने

प्रथम विश्व युद्ध के बाद मध्य एशिया और रूस भारतीय क्रांतिकारियों की गतिविधियों का नया केंद्र बनने लगे। बरकतुल्लाह भी ताशकंद और मॉस्को में सक्रिय रहे। इन शहरों में भारतीय स्वतंत्रता सेनानी विदेशी नेताओं और संगठनों से संपर्क स्थापित कर रहे थे ताकि भारत की आज़ादी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग मिल सके। ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां लगातार इन गतिविधियों पर नजर रख रही थीं। उन्हें डर था कि यदि विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारी संगठित हो गए, तो भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ नया आंदोलन खड़ा हो सकता है।

जब अंग्रेज उन्हें अपने पक्ष मे करना चाहा

बरकतुल्लाह के प्रभाव से ब्रिटिश सरकार अच्छी तरह परिचित थी। ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख मिलता है कि कुछ लोगों ने उन्हें समझाने और अपने पक्ष में करने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने हर प्रस्ताव ठुकरा दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया है और वे किसी भी कीमत पर अपने उद्देश्य से समझौता नहीं करेंगे। उनकी यही अडिग निष्ठा उन्हें अपने समय के सबसे सम्मानित क्रांतिकारियों में शामिल करती है।

विदेश में रहकर भी कभी भारत को नहीं भूले

बरकतुल्लाह का अधिकांश जीवन विदेशों में बीता। उन्होंने इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, अफगानिस्तान, रूस और मध्य एशिया के कई देशों में समय बिताया। लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य कभी नहीं बदला। वे जहां भी गए, भारत की आज़ादी की बात करते रहे। उन्होंने विदेशी अखबारों में लेख लिखे, भारतीय प्रवासियों को संगठित किया, अंतरराष्ट्रीय नेताओं से मुलाकात की और हर मंच पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध किया।

सैन फ्रांसिस्को में उनकी आखिरी सांसें

20 सितंबर 1927 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का निधन हो गया। वे भारत की स्वतंत्रता देखने से पहले ही दुनिया से विदा हो गए। उन्हें कैलिफोर्निया के सैक्रामेंटो में दफनाया गया। उनकी मृत्यु पर ग़दर आंदोलन से जुड़े नेताओं ने इसे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की बड़ी क्षति बताया। एक ऐसा क्रांतिकारी, जिसने अपना पूरा जीवन मातृभूमि के नाम कर दिया, आखिर तक निर्वासन में ही रहा।

आज भी उनका नाम उतना प्रसिद्ध क्यों नहीं है?

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक महान नेताओं की तरह मौलाना बरकतुल्लाह भी लंबे समय तक इतिहास की मुख्यधारा से दूर रहे। उन्होंने न जेल यात्राओं के जरिए प्रसिद्धि पाई और न चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया। उनका पूरा संघर्ष भारत की सीमाओं से बाहर लड़ा गया। शायद यही वजह रही कि स्वतंत्रता के बाद भी उनकी भूमिका पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। हालांकि इतिहासकार आज उन्हें भारत के पहले वैश्विक क्रांतिकारियों में गिनते हैं।

भोपाल ने इस महान सपूत को सम्मान दिया

उनके योगदान को देखते हुए 1988 में भोपाल विश्वविद्यालय का नाम बदलकर बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय रखा गया। यह उनके सम्मान में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम था। फिर भी आज भी बड़ी संख्या में लोग उनके जीवन और योगदान से परिचित नहीं हैं। उनकी कहानी केवल भोपाल की नहीं, बल्कि भारत के उस अंतरराष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी है जिसने दुनिया के कई देशों तक अपनी पहुंच बनाई।

मौलाना बरकतुल्लाह हमें क्या सिखाते हैं?

मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली का जीवन इस बात का प्रमाण है कि देशभक्ति की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने कभी बंदूक नहीं उठाई, लेकिन उनके लेख, भाषण और अंतरराष्ट्रीय प्रयास ब्रिटिश साम्राज्य के लिए गंभीर चुनौती बन गए। उन्होंने यह भी साबित किया कि भारत की आज़ादी किसी एक धर्म, क्षेत्र या विचारधारा की देन नहीं थी। इस संघर्ष में अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोगों ने अपने-अपने तरीके से योगदान दिया।

निष्कर्ष

मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली उन दुर्लभ क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने भारत की आज़ादी को वैश्विक आंदोलन बनाने का प्रयास किया। भोपाल से निकलकर उन्होंने लंदन, अमेरिका, जापान, अफगानिस्तान और रूस तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जनमत तैयार किया। ग़दर पार्टी से लेकर काबुल की अस्थायी सरकार तक और लेनिन से मुलाकात से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज़ बुलंद करने तक उनका पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा। आज जरूरत है कि भारत के इस महान क्रांतिकारी को केवल इतिहास की फुटनोट में नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नायकों में वह स्थान दिया जाए जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।

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