प्लास्टर चढ़े हाथ से लड़े थे भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता

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कल्पना कीजिए, एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा हो, डॉक्टर आराम की सलाह दे चुके हों, और तभी खबर आए कि दुश्मन दरवाज़े पर खड़ा है। ज़्यादातर लोग यहां रुक जाते। लेकिन मेजर सोमनाथ शर्मा उन गिने-चुने लोगों में से थे, जिनके लिए देश हमेशा अपनी तकलीफ से बड़ा रहा। यही वजह है कि आज भी […]

कल्पना कीजिए, एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा हो, डॉक्टर आराम की सलाह दे चुके हों, और तभी खबर आए कि दुश्मन दरवाज़े पर खड़ा है। ज़्यादातर लोग यहां रुक जाते। लेकिन मेजर सोमनाथ शर्मा उन गिने-चुने लोगों में से थे, जिनके लिए देश हमेशा अपनी तकलीफ से बड़ा रहा। यही वजह है कि आज भी उनकी कहानी सुनते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

जब घुसपैठ की खबर ने सबको सतर्क कर दिया

मेजर सोमनाथ शर्मा चौथी कुमाऊं रेजीमेंट की डेल्टा कंपनी में तैनात थे। पाकिस्तानी घुसपैठ के दौर में उन्हें श्रीनगर एयरबेस की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। 22 अक्टूबर 1947 को खबर मिली कि पाकिस्तान घुसपैठ की तैयारी में है। अगर उस वक्त एयरबेस दुश्मन के हाथ लग जाता, तो भारतीय सेना कश्मीर तक पहुंच ही नहीं पाती और पाकिस्तान श्रीनगर पर कब्ज़ा कर लेता। पर ऐसा होने नहीं दिया गया।

23 अक्टूबर की सुबह दिल्ली के पालम एयरपोर्ट से सैनिकों और हथियारों को श्रीनगर भेजा गया। 31 अक्टूबर को मेजर शर्मा भी वहां पहुंच गए, उस वक्त उनके दाहिने हाथ में प्लास्टर चढ़ा था, हॉकी खेलते वक्त हाथ फ्रैक्चर हो गया था और डॉक्टरों ने आराम की सलाह दी थी। पर जब दुश्मन सामने हो, तो दर्द कहां याद रहता है? उन्होंने युद्धक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगी, मिली भी, और उन्हें अपनी यूनिट की कमान सौंप दी गई।

मेजर शर्मा ने अनुमान लगाया हमला कहाँ से होगा

बड़े अधिकारियों ने साफ कह दिया था, कश्मीर घाटी को घुसपैठियों से बचाना है। दो दिन बाद, 2 नवंबर 1947 को खबर मिली कि पाकिस्तानी दुश्मन श्रीनगर एयरफील्ड से कुछ किलोमीटर दूर बडगाम तक पहुंच चुका है। ब्रिगेडियर एलपी बोगी सेन के आदेश पर मेजर सोमनाथ शर्मा और उनकी 50 जवानों की कंपनी बडगाम रवाना हुई। 3 नवंबर की अलसुबह वे वहां पहुंचे और तुरंत कंपनी को कई टुकड़ियों में बांटकर मोर्चा संभाल लिया। बडगाम गांव में दुश्मन की हलचल साफ दिख रही थी। मेजर शर्मा ने भांप लिया कि यह सिर्फ ध्यान भटकाने की चाल है, और असली हमला पश्चिम दिशा से होगा। उनका यह अंदाज़ा बिल्कुल सही निकला।

एक सैनिक अकेले सात दुश्मनों से भिड़ गया

दोपहर करीब ढाई बजे 700 लश्कर कबिलाइयों ने हमला बोल दिया। भारी मोर्टार गोले दागे गए, और मेजर शर्मा की टुकड़ी तीन तरफ से घिर गई। सैनिक मोर्टार के गोलों से निकलते बारूद और कांच के टुकड़ों से बुरी तरह ज़ख्मी हो रहे थे, फिर भी पूरी ताकत से जवाब दे रहे थे। जब मेजर शर्मा ने हालात का जायज़ा लिया, तो पता चला कि उनका हर एक जवान सात-सात दुश्मनों से जूझ रहा था। उन्होंने तुरंत ब्रिगेडियर सेन को और कुमक भेजने का संदेश भेजा। मेजर शर्मा जानते थे कि बडगाम की यह पोस्ट कितनी अहम है, अगर यह हाथ से निकल गई, तो शायद श्रीनगर और पूरी कश्मीर घाटी भारत से अलग हो जाती।

एक हाथ में प्लास्टर, दूसरे हाथ में मशीन गन

प्लास्टर चढ़े हाथ के बावजूद मेजर सोमनाथ शर्मा हर पोस्ट पर दौड़-दौड़कर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे, और बीच-बीच में खुद भी दुश्मन पर गोलियां बरसाते रहे। उनकी फॉरवर्ड प्लाटून पूरी तरह खत्म हो चुकी थी, पर बाकी सैनिकों ने उनका जज़्बा देखकर लड़ाई जारी रखी। इसी बीच मेजर शर्मा खुद मशीन गनर्स तक मैगज़ीन पहुंचाने में जुट गए, ताकि किसी भी पोस्ट पर गोलियां खत्म न हों।

इसी दौरान उन्होंने मुख्यालय को एक आखिरी संदेश भेजा, हम संख्या में बहुत कम हैं, दुश्मन सिर्फ 45-46 मीटर दूर है, हम भयानक गोलीबारी में घिरे हैं, फिर भी अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हटेंगे, आखिरी गोली और आखिरी सैनिक तक लड़ते रहेंगे। कुछ ही देर बाद एक मोर्टार धमाके में मेजर सोमनाथ शर्मा शहीद हो गए, आखिरी सांस तक लड़ते हुए।

देश के बलिदान दे दिए

उनकी टुकड़ी के 20 से ज़्यादा जवान शहीद हो चुके थे, मेजर सोमनाथ शर्मा भी अब नहीं थे, फिर भी बाकी बचे सैनिकों ने हिम्मत नहीं हारी। मेजर सोमनाथ शर्मा के जाने के बाद भी दुश्मन को छह घंटे तक आगे बढ़ने से रोके रखा गया। यही समय काफी साबित हुआ, जिसमें कुमाऊं रेजीमेंट की पहली बटालियन बतौर रीनफोर्समेंट पहुंच गई और दुश्मन को करारा जवाब दिया गया। मेजर सोमनाथ शर्मा, एक जूनियर कमीशन्ड ऑफिसर और डी कंपनी के 20 सैनिक शहीद हुए पर श्रीनगर और पूरा कश्मीर बच गया।

फौजी परिवार की विरासत

मेजर सोमनाथ शर्मा का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के दाढ़ गांव में हुआ था। उनके पिता अमरनाथ शर्मा खुद भारतीय सेना में मेजर जनरल थे, और बाद में इंडियन आर्म्ड मेडिकल सर्विसेज के पहले डायरेक्टर जनरल भी बने। उनके चाचा कैप्टन केडी वासुदेव भी फौज में थे, और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी हमलावरों से रिवर स्लिम की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे। देश सेवा जैसे उनके खून में ही थी।

निष्कर्ष

मेजर सोमनाथ शर्मा की कहानी सिर्फ एक लड़ाई की कहानी नहीं है, यह उस जज़्बे की मिसाल है जो टूटे हाथ, कम संख्या और भारी नुकसान के बावजूद पीछे नहीं हटता। उनकी शहादत ने न सिर्फ श्रीनगर बचाया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाया कि देश की रक्षा के आगे व्यक्तिगत तकलीफ कितनी छोटी हो जाती है। उनके इसी अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र दिया गया, वे इस सम्मान को पाने वाले पहले भारतीय सैनिक थे।

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