आज भले ही कॉमेडी में कई महिलाएं हैं, लेकिन 1950 के दशक में अकेले दम पर पूरे बॉलीवुड को हँसाने वाली इकलौती महिला थीं—टुनटुन मासी!”
टुनटुन कौन थीं?
उमा देवी खत्री, जिन्हें दुनिया “टुनटुन” के नाम से जानती है, भारतीय सिनेमा की पहली महिला कॉमेडियन थीं। लेकिन उनका टुनटुन बनने का सफर जितना हंसाने वाला था, उनका शुरुआती जीवन उतना ही दर्दनाक और संघर्षों से भरा था। उमा देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में हुआ था।
जब वे महज़ 4-5 साल की थीं, तब ज़मीन के एक मामूली विवाद में उनके माता-पिता और भाई की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। अनाथ होने के बाद, वे अपने चाचा के यहाँ पली-बढ़ीं, जहाँ उन्हें दो वक्त की रोटी के बदले घर का सारा काम करना पड़ता था।बचपन के उस अंधेरे में उमा देवी के पास सिर्फ एक ही सहारा था—संगीत।
सिंगर से बॉलीवुड स्टार बनने तक का सफर
वे रेडियो पर गाने सुनकर गुनगुनाती थीं। उन्हें बचपन से ही सिंगर बनना था। जब वे थोड़ी बड़ी हुईं, तो उन्होंने ठान लिया कि उन्हें मुंबई (तब बॉम्बे) जाना है। वे अपने एक दोस्त की मदद से घर से भागकर मुंबई आ गईं। साल 1947 में आई फिल्म दर्द का गाना “अफ़साना लिख रही हूँ…” उमा देवी ने गाया, जो ब्लॉकबस्टर साबित हुआ।
इसके बाद उन्होंने नूरजहाँ और सुरैया जैसे दिग्गजों के दौर में अपनी एक अलग पहचान बनाई। समय के साथ जब प्लेबैक सिंगिंग में लता मंगेशकर और आशा भोसले का दौर शुरू हुआ, तो उमा देवी को काम मिलना कम हो गया। तब नौशाद साहब ने ही उन्हें अभिनय (Acting) में हाथ आजमाने की सलाह दी।
बॉलीवुड की पहली महिला कॉमेडियन बनने की कहानी
नौशाद साहब ने उन्हें फिल्म बाबुल (1950) के लिए साइन करवाया, जिसमें दिलीप कुमार और नरगिस मुख्य भूमिका में थे।टुनटुन ने लगभग पांच दशकों तक दर्शकों को हँसाया। उन्होंने अमिताभ बच्चन, गुरु दत्त, और देव आनंद जैसे सुपरस्टार्स के साथ काम किया। इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके गोल-मटोल और चुलबुले अंदाज़ को देखकर दिलीप कुमार ने उन्हें प्यार से “टुनटुन” नाम दिया। इ
सके बाद उमा देवी हमेशा के लिए बॉलीवुड की ‘टुनटुन’ बन गईं।स दौर में जब महिलाओं को फिल्मों में सिर्फ रोने-धोने या ग्लैमरस रोल दिए जाते थे, टुनटुन ने अपनी बॉडी इमेज और कमाल की कॉमिक टाइमिंग से स्क्रीन पर कब्ज़ा कर लिया।उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में काम किया। उनका स्क्रीन पर आना ही दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ला देता था।
24 नवंबर 2003 को 80 वर्ष की आयु में टुनटुन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उमा देवी खत्री उर्फ टुनटुन की कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी चाहे कितने भी गहरे ज़ख्म क्यों न दे, अगर आपके भीतर हौसला है, तो आप पूरी दुनिया को हंसाने की ताकत रख सकते हैं।
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