नेपोलियन का रूस पर आक्रमण (Napoleon Invasion of Russia 1812): 14 सितंबर 1812, मॉस्को के आसमान में आग की लपटें उठ रही हैं। नेपोलियन बोनापार्ट, जिसने यूरोप के लगभग हर बड़े साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया था, क्रेमलिन की खिड़की से बाहर देख रहा था। उसकी 6 लाख से ज्यादा सैनिकों वाली अजेय सेना, ‘ला ग्रांदे आर्मे’ ने बिना किसी बड़ी रुकावट के मॉस्को पर कब्ज़ा कर लिया था। यह नेपोलियन के जीवन की सबसे बड़ी जीत होनी चाहिए थी।
लेकिन शहर पूरी तरह वीरान था। न कोई आत्मसमर्पण करने वाला रूसी गवर्नर, न शहर की चाबियां लेकर घुटनों पर झुका कोई प्रतिनिधिमंडल। और अब… मॉस्को के चारों कोनों से आग की लपटें आसमान छू रही थीं। क्रेमलिन में खड़ा नेपोलियन हैरान था, यह आग किसने लगाई? क्या रूसियों ने यूरोप के सबसे बड़े विजेता को रोकने के लिए खुद अपनी ही ऐतिहासिक राजधानी को आग के हवाले कर दिया था?

यही है 1812 के युद्ध का सबसे गहरा रहस्य।
नेपोलियन, जिसने कभी हार नहीं मानी, रूस से बिना किसी बड़े निर्णायक युद्ध के हार गया। उसकी छह लाख की विशाल सेना में से मुश्किल से कुछ हज़ार सैनिक ज़िंदा वापस लौटे। रूसियों ने उसे किसी एक बड़ी लड़ाई में नहीं हराया, तो फिर किस चीज़ ने यूरोप के सबसे बड़े सैन्य जीनियस कहा जाने वाले नेपोलियन को इतनी बुरी तरह तोड़ दिया कि उसका पूरा साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया?
टिलसिट की संधि से नेपोलियन और ज़ार के टकराव तक
इस ऐतिहासिक टकराव की नींव पड़ी थी 1807 में—टिलसिट की संधि के साथ।
इ1800 के दशक की शुरुआत तक, नेपोलियन लगभग पूरे महाद्वीपीय यूरोप पर हावी हो चुका था। रूस के ज़ार अलेक्ज़ेंडर प्रथम ने शुरुवात में नेपोलियन से संधि की थी, जिसके तहत रूस को इंग्लैंड के साथ व्यापार बंद करना पड़ा जिसे कॉन्टिनेंटल सिस्टम कहा जाता था।
पर यह संधि रूस की अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हुई, ब्रिटेन रूसी अनाज, लकड़ी और लोहे का सबसे बड़ा खरीदार था। व्यापार रुकते ही रूस की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी। जिसके बाद 1810 में ज़ार अलेक्जेंडर ने चुपचाप ब्रिटिश जहाजों के लिए अपने बंदरगाह दोबारा खोल दिए। नेपोलियन के लिए यह सीधी बगावत थी। उसने ऐलान किया:
“रूस को उसके भाग्य से कोई नहीं बचा सकता। उसे सबक सिखाना ही होगा।”
24 जून 1812, नेपोलियन ने इतिहास की उस समय तक की सबसे बड़ी सेना जिसकी संख्या लगभग 6-6.5 लाख सैनिक बताई जाती है, ने कई अलग-अलग यूरोपीय देशों से जुटाई, और रूस की सीमा पार की। नेपोलियन को लगा था कि जंग एक महीने में खत्म हो जाएगी।
जब रूसी सेना ने अपनाई स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी की रणनीति
लेकिन रूसी सेना, जो संख्या में काफ़ी कमज़ोर थी, सीधी लड़ाई से बचती रही और पीछे हटती चली गई, ज़मीन ख़ाली करती गई, यह रणनीति जान-बूझकर अपनाई गई या मजबूरी में, यह इतिहासकारों में आज भी बहस का विषय है। इतिहास में इसे कहा गया—“स्कॉर्च्ड अर्थ पॉलिसी” (Scorched Earth Policy) यानी जली हुई ज़मीन की रणनीति।
पीछे हटते हुए रूसियों ने अपने ही खेत जला दिए, अपने ही अनाज के गोदाम राख कर दिए और कुओं को पाट दिया। नेपोलियन की सेना मीलों तक केवल खाली राख पर चलती रही। न सैनिकों के लिए खाना था, न घोड़ों के लिए चारा। नेपोलियन की सेना में अगर कुछ बचा था, तो सिर्फ बीमारी, पेचिश और अंतहीन थकान।
लेकिन मॉस्को से ठीक 120 किलोमीटर पहले, रूसियों को रुकना पड़ा। और फिर 7 सितंबर 1812 को शुरुवात हुई बोरोदिनो की लड़ाई, जिसे आज भी नेपोलियन युग की सबसे ख़ूनी लड़ाइयों में से एक कहा जाता है, लगभग एक ही दिन में क़रीब 70,000 से ज़्यादा सैनिक मारे गए या घायल हुए। इस युद्ध का कोई साफ विजेता नहीं निकला, लेकिन रूसी सेनापति मिखाइल कुतुज़ोव ने इतिहास का सबसे कठिन और साहसिक फैसला लिया:
“मॉस्को को गंवाकर सेना को बचाया जा सकता है, लेकिन अगर सेना खत्म हो गई… तो मॉस्को और रूस दोनों हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे।”
कुतुज़ोव ने मॉस्को को खाली कर सेना को पीछे हटा लिया।
नेपोलियन का इंतज़ार और जार का इनकार
14 सितंबर को नेपोलियन मॉस्को में दाखिल हुआ। लेकिन रूसी गवर्नर रोस्तोपचिन के आदेश पर शहर को आग लगा दी गई और तीन-चौथाई मॉस्को जलकर राख हो गया। नेपोलियन पूरे एक महीने तक क्रेमलिन में बैठकर इंतज़ार करता रहा, लेकिन न तो आत्मसमर्पण का कोई प्रस्ताव आया, न ही कोई संधि की चिट्ठी।
ज़ार अलेक्जेंडर ने साफ संदेश भेज दिया था: I would let my beard grow and eat potatoes in Siberia before making peace with Napoleon while a single French soldier remained on Russian soil. यानि
“जब तक एक भी विदेशी सैनिक रूस की ज़मीन पर है, तब तक कोई बात नहीं होगी। मैं अपने बाल बढ़ा लूंगा, साइबेरिया के जंगलों में आलू खाकर जी लूंगा, लेकिन नेपोलियन से कभी संधि नहीं करूंगा।
तब तक अक्टूबर आ चुका था, और पहली बर्फ गिरते ही नेपोलियन समझ गया कि वह एक जानलेवा जाल में फंस चुका है। उसने वापसी का आदेश दिया।

और यहीं से शुरू हुआ असली नर्क जैसे यात्रा। तापमान -30 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे गिर गया। सैनिक भूख, ठंड, और बीमारी से मरते चले गए। बेरेज़िना नदी पार करते समय बर्फ टूटी और हज़ारों फ्रांसीसी सिपाही ठंडे पानी में जिंदा जम गए। जो कतार से भटकते, उन्हें जंगलों में छिपे रूसी कोसैक्स और हथियारबंद किसान कुल्हाड़ियों से काट डालते।
बेरेज़िना नदी का संहार
दिसंबर 1812 तक, जब बची-खुची सेना रूस की सीमा से बाहर निकली… तो छह लाख की सेना में से मुश्किल से 20,000-40,000 सैनिक ही जीवित बचे थे, यह इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य तबाहियों में से एक मानी जाती है। इसके साथ ही नेपोलियन का “अजेय” होने का मिथक हमेशा के लिए टूट गया, और यह हार उसके अंतिम पतन की शुरुआत बनी, यह नेपोलियन के अंत की शुरुआत थी।
दो साल बाद रूसी सेना ने पेरिस में कदम रखा और नेपोलियन को सत्ता गंवानी पड़ी। रूस के लिए यह जीत गौरव की पराकाष्ठा थी इसके साथ ही ज़ार अलेक्जेंडर को “यूरोप का मुक्तिदाता” कहा जाने लगा।
लेकिन इस जीत ने रूस के भीतर एक ऐसी चिंगारी बो दी जो साम्राज्य की नींव हिलाने वाली थी। जो युवा रूसी सैन्य अफसर नेपोलियन का पीछा करते हुए पेरिस तक गए… उन्होंने वहाँ पश्चिमी यूरोप की आज़ादी देखी, संविधान देखा, और नागरिकों के अधिकार देखे।
जब वे वापस रूस लौटे, तो उन्हें अपने ही देश की निरंकुश ज़ारशाही और किसानों की गुलामी एक घिनौना अभिशाप लगने लगी। और फिर… ज़ार के अपने ही सबसे वफादार सैन्य अफसरों ने तख्तापलट का ऐलान कर दिया…रूस की ज़मीन पर पहली बार संविधान और आज़ादी के लिए खून बहने वाला था। और यही था, द डिसेम्ब्रिस्ट रिवोल्ट, जिसने रूस की तकदीर हमेशा के लिए बदल दी।
