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रूस का इतिहास: कबीलाई झगड़ों से लेकर ईसाई साम्राज्य बनने की पूरी कहानी (भाग 1)

रूस का इतिहास (History of Russia) कहाँ से शुरू हुआ था? जानिए सन 862 ईस्वी की वो रहस्यमयी कहानी जब स्लाविक कबीलों ने अपनी आपसी लड़ाई से तंग आकर खुद अपने दुश्मनों (वाइकिंग्स) को राज करने के लिए बुलाया। राजा व्लादिमीर के एक फैसले और 'कीवन रुस' साम्राज्य के जन्म की पूरी कहानी, अब एपिसोड वाइज ऑडियो-रेडी स्क्रिप्ट के साथ!

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रूस का इतिहास (History of Russia): सन 862 ईस्वी। बाल्टिक सागर का एक ठंडा और कोहरे से ढका किनारा। यहाँ सदियों से स्लाविक कबीले आपस में लड़ रहे थे। ज़मीन के लिए, पानी के रास्तों के लिए, और अपनी पहचान के लिए। वो एक-दूसरे का खून बहाते-बहाते इतना थक चुके थे कि उन्होंने इतिहास का सबसे अजीब फैसला लिया। उन्होंने समुद्र पार एक संदेश भेजा। उन लोगों के पास, जो उनके सबसे बेरहम दुश्मन, समुद्री लुटेरे और लड़ाके थे। संदेश में लिखा था:

“हमारी भूमि विशाल और समृद्ध है, लेकिन इसमें कोई व्यवस्था नहीं। आओ, और आकर हम पर राज करो।”

एक ऐसी कौम… जिसने खुद अपने दुश्मनों को बुलाकर अपना राजा बना दिया। यही रूस की शुरुआत की पहली कहानी है। और यहीं से शुरू होता है वो एक हज़ार साल का सफर, जो ज़ारों की क्रूरता, लाल क्रांतियों और महाशक्तियों के टकराव तक जाएगा।

नॉर्मनिस्ट विवाद: आखिर ‘रुस’ शब्द कहाँ से आया?

लेकिन इस कहानी को सौ फीसदी सच मानने से पहले ये भी जान लेते है रूस का नाम आया कहां से?

यह एक ऐसा सवाल है जो सदियों से पश्चिमी और रूसी इतिहासकारों को दो गुटों में बांटता रहा है। पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि ‘रुस’ शब्द पुरानी नॉर्स भाषा के शब्द ‘रोथ्स’ (Rōþs) से आया है, जिसका अर्थ होता है ‘चप्पू चलाने वाले नाविक’। यानी वो स्वीडिश वाइकिंग्स, जिन्हें पूर्वी यूरोप में ‘वारंजियन्स’ कहा जाता था। लेकिन दूसरी तरफ, सोवियत और कई स्लाविक इतिहासकार कहते हैं कि यह उनके पूर्वजों का अपमान है। उनके अनुसार, ‘रुस’ नाम नीपर की सहायक नदी ‘रोस’ (Ros) से आया, जो विशुद्ध स्लाविक इलाका था।

सच्चाई शायद इन दोनों के बीच में है। ये वारंजियन्स सिर्फ लुटेरे नहीं थे। वो बेहद चालाक व्यापारी-योद्धा थे। उनके एक हाथ में तलवार होती थी, और दूसरे हाथ में रेशम, मोम और गुलामों का बहीखाता।

रुरिक राजवंश की स्थापना और नोवगोरोद का उदय

रूसी ऐतिहासिक ग्रंथ द प्राइमरी क्रॉनिकल के मुताबिक, उस विदेशी योद्धा का नाम था रुरिक। रुरिक अपने भाइयों के साथ आया और उसने 862 ईस्वी में लेक इलमेन के पास ‘नोवगोरोद’ को अपना केंद्र बनाया। रुरिक ने उस बिखरी हुई ज़मीन पर पहली बार एक प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रखी। एक ऐसा राजवंश शुरू हुआ, जो अगले 700 सालों तक रूस की तकदीर तय करने वाला था—रुरिक वंश (Rurik Dynasty)।

कीवन रुस का उदय

लेकिन कहानी का सबसे बड़ा परेन शुरू होता है 879 में जब रुरिक की मौत के बाद, सत्ता आई उसके रिश्तेदार और सेनापति ओलेग के हाथों में।

ओलेग ने पहले ही भाँप लिया था कि असली दौलत उत्तर के ठंडे जंगलों में नहीं, बल्कि दक्षिण के व्यापारिक रास्तों पर है। 882 ईस्वी में, ओलेग ने नीपर नदी के रास्ते आगे बढ़कर कीव पर हमला किया। वहाँ के स्थानीय वारंजियन शासकों को धोखे से मौत के घाट उतारा और शहर पर कब्ज़ा कर लिया। यहीं से दुनिया के नक्शे पर उदय हुआ ‘कीवन रुस’ का।

व्लादिमीर द ग्रेट: जब रूस ने चुना अपना धर्म

कीवन रुस अब एक ताक़तवर साम्राज्य बन चुका था, लेकिन उसकी आत्मा अब भी बिखरी हुई थी। लोग अब भी पेड़ों, पत्थरों और प्रकृति के देवताओं की पूजा करते थे। एक बड़े साम्राज्य को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक साझी सोच, एक साझे धर्म की ज़रूरत थी। 980 के दशक में, कीव की गद्दी पर बैठा व्लादिमीर प्रथम। किंवदंतियों के अनुसार, व्लादिमीर ने दुनिया के चार बड़े धर्मों के प्रतिनिधियों को अपने दरबार में बुलाया।

मुस्लिम दूत: मुस्लिम दूतों ने जब बताया कि उनके धर्म में खतना और शराब पर पाबंदी है, तो व्लादिमीर ने जवाब दिया – ‘शराब पीना तो रूसियों का आनंद है, हम इसके बिना नहीं रह सकते।

यहूदी दूत: जब यहूदियों ने बताया कि ईश्वर के क्रोध के कारण उनका वतन यरुशलम उनसे छिन गया, तो व्लादिमीर ने कहा—‘जो अपने लोगों की रक्षा न कर सके, हम उसका धर्म कैसे अपनाएं?

कैथोलिक दूत: रोम के दूतों की सख्त व्यवस्था और पोप की सर्वोच्चता व्लादिमीर को पसंद नहीं आई।

लेकिन जब व्लादिमीर के राजदूत कॉन्स्टेंटिनोपल के भव्य ‘हागिया सोफिया’ कैथेड्रल से लौटे, तो उनके पास शब्द नहीं थे। उन्होंने राजा से कहा—‘हम नहीं जानते थे कि हम स्वर्ग में खड़े हैं या धरती पर। धरती पर ऐसा कोई सौंदर्य नहीं है।’

सन 988 ईस्वी में व्लादिमीर ने ईसाई धर्म (इस्टर्न ऑर्थोडॉक्स) को अपना लिया। यह सिर्फ एक धार्मिक फैसला नहीं था बल्कि इतिहास का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक मोड़ था। व्लादिमीर ने कैथोलिक पश्चिम (रोम) को छोड़, कॉन्स्टेंटिनोपल से अपना नाता जोड़ा। इस एक फैसले ने रूस को हमेशा के लिए यूरोप से अलग कर दिया। उन्हें मिली सिरिलिक लिपि, धर्म मिला ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स, और सोच मिली बाइज़ेंटाइन सम्राटों जैसी जहाँ धर्म और राजसत्ता एक ही सिक्के के दो पहलू थे।

पूर्व से उठते तूफान की आहट

कीवन रुस कला, कानून और व्यापार का केंद्र बन चुका था। लेकिन इस सोने की चमक के पीछे एक अंदरूनी ज़हर फैल रहा था। रुरिक के वारिसों में गद्दी की भूख बढ़ गई, भाइयों ने भाइयों का कत्ल शुरू किया और साम्राज्य कमज़ोर रियासतों में बंट गया।

वे अपने आपसी झगड़ों में इतने व्यस्त थे कि उन्हें अंदाज़ा भी नहीं था कि पूर्व के मैदानों से एक ऐसा ख़ूनी तूफ़ानन उठ रहा है, जो कीवन रुस की वो सुनहरी दुनिया हमेशा-हमेशा के लिए राख होने वाली थी।1237 की सर्दियां आ रही थीं… और इन बर्फीले जंगलों की ओर बढ़ रहे थे चंगेज खान के वंशज और मंगोल घुड़सवार बातू खान , जो पूरे रूस को राख में मिलाने वाला था।

मंगोलों ने रूस पर कैसे कहर ढाया और इस तबाही के बीच ‘मास्को’ का उदय कैसे हुआ? जानेंगे रूस का इतिहास: भाग 2 (मंगोलों का आक्रमण और इवान द टेरिबल) में।

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