30 जनवरी 1948, नई दिल्ली के बिड़ला भवन के लॉन में तीन गोलियां चलीं और उस शख़्स की ज़िंदगी ख़त्म हो गई जिसने क़रीब आधी सदी तक भारत की राजनीति और स्वाधीनता संग्राम की दिशा तय की थी।
हत्या के तुरंत बाद नाथूराम गोडसे ने आत्मसमर्पण किया। अदालत में जब उसे सजा सुनाई जा रही थी, तो उसने अपने इस फ़ैसले के पीछे एक लंबी दलील दी। उसने दावा किया कि महात्मा गांधी का अंतिम आमरण अनशन और पाकिस्तान को दिए गए 55 करोड़ रुपये का विवाद ही वो आख़िरी बिंदु था जिसने उसे यह कदम उठाने पर मजबूर किया।
लेकिन इतिहास जब भी किसी एक बयान पर रुकता है, तो सच्चाई आधी रह जाती है। 30 जनवरी से ठीक दो हफ़्ते पहले दिल्ली के शरणार्थी शिविरों में क्या घट रहा था? वो 55 करोड़ रुपये असल में क्या थे? और सबसे बड़ा सवाल, 78 साल के गांधी ने अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ वो अंतिम अनशन आख़िर क्यों शुरू किया था?
दिल्ली का संकट और मस्जिदों पर कब्जे
सितंबर 1947, जब महात्मा गांधी कलकत्ता में दंगों को शांत कराकर दिल्ली पहुंचे, उन्हे देखा दिल्ली मानवीय त्रासदी का सबसे बड़ा गवाह बन चुकी थी। विभाजन की विभीषिका झेलकर पंजाब से लाखों हिंदू और सिख शरणार्थी दिल्ली की सड़कों पर आ चुके थे। उनके पास न घर था, न खेत, और अपनों को खोने का दर्द सीने में जल रहा था।

इस भारी गुस्से का शिकार दिल्ली के स्थानीय मुसलमान बन रहे थे। दिल्ली की तक़रीबन 137 मस्जिदों को या तो तोड़ दिया गया था या उन पर शरणार्थियों ने कब्ज़ा कर लिया था। शहर के करीब 60,000 मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए ऐतिहासिक पुराना किला और हुमायूं के मकबरे के भीतर शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर थे। गांधी जब इन शिविरों में पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि बदला लेने की यह प्रवृत्ति देश को एक अंतहीन गृहयुद्ध की ओर धकेल रही है।
वही मुल्क के दूसरी तरफ पाकिस्तान में अल्पसंख्यक की स्तिथि काफी खराब थी। जब लोग उनसे पूछते कि आप पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों की रक्षा क्यों नहीं करवा पा रहे? गांधीजी का जवाब सीधा लेकिन बेहद असहज करने वाला था। उन्होंने कहना था कि ‘जब तक मैं अपनी खुद की राजधानी दिल्ली के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा नहीं दिला सकता, तब तक मेरे पास पाकिस्तान जाकर वहां के बहुसंख्यकों से शांति की अपील करने का कोई नैतिक आधार नहीं बचता।’ गांधी पर आरोप लगने लगे कि वे एकतरफा बातें कर रहे हैं।
55 करोड़ रुपये का विवाद क्या था?
इसी बीच एक ऐसा फ़ैसला आया जिसने आग में घी का काम किया “55 करोड़ रुपये की अदायगी का विवाद“। आम जनमानस में आज भी यह धारणा फैलाई जाती है कि गांधी ने पाकिस्तान को भारत के ख़ज़ाने से 55 करोड़ रुपये जबरन दान दिलवाए थे। लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ कुछ और ही कहती है?
असलियत यह थी कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अविभाजित भारत ने ब्रिटिश साम्राज्य को अनाज, सेना और साजो-सामान के रूप में भारी आर्थिक मदद दी थी। इसके बदले ब्रिटिश हुकूमत ने भारत को एक बड़ा वित्तीय कर्ज़ चुकाना था, जिसे ‘स्टर्लिंग बैलेंस’ कहा जाता था।
आज़ादी और विभाजन के बाद यह तय हुआ कि इस कुल संपत्ति और देनदारियों में से पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ रुपये बनता है। इसमें से 20 करोड़ रुपये अंतरिम तौर पर पहले ही दिए जा चुके थे और 55 करोड़ की शेष किश्त दी जानी बाक़ी थी।
लेकिन इसी दौरान अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान की शह पर कबायलियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया। भारत की कैबिनेट, जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू और उप-प्रधानमंत्री वल्लभभाई पटेल शामिल थे, ने एक कड़ा रणनीतिक फ़ैसला लिया। सरकार का तर्क था कि जब तक कश्मीर का मुद्दा सुलझ नहीं जाता, हम यह 55 करोड़ रुपये जारी नहीं करेंगे; क्योंकि यह पैसा सीधे तौर पर भारतीय सेना के ख़िलाफ़ हथियारों और गोला बारूद में इस्तेमाल होगा।

रणनीतिक तौर पर भारत सरकार का रुख व्यावहारिक लग रहा था। लेकिन महात्मा गांधी का नज़रिया पूरी तरह अलग था। गांधी का मानना था कि एक नवजात राष्ट्र की बुनियाद अंतरराष्ट्रीय संधियों के उल्लंघन पर नहीं रखी जा सकती। अगर किसी संप्रभु समझौते पर दस्तख़त हुए हैं, तो युद्ध की स्थिति में भी अपने वादे से मुकरना नैतिक दिवालियापन होगा। इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख हमेशा के लिए संदिग्ध हो जाएगी।
गांधी के अंतिम अनशन के तीन प्रमुख लक्ष्य
13 जनवरी 1948 को गांधीजी ने घोषणा की कि वे अंतिम अनशन करेंगे। रामचंद्र गुहा अपनी किताब में लिखते हैं कि गांधीजी का यह अनशन किसी एक व्यक्ति या सिर्फ़ पैसों के लिए नहीं था। इसके तीन बिल्कुल साफ़ और कड़े लक्ष्य थे:
पहला लक्ष्य थी भारत की जनता: गांधी उनसे कह रहे थे कि अगर वे सच में द्विराष्ट्र सिद्धांत को ग़लत मानते हैं, तो उन्हें दिल्ली में यह साबित करके दिखाना होगा कि हिंदू और मुसलमान एक साथ अमन से रह सकते हैं।
दूसरा लक्ष्य था पाकिस्तान की हुकूमत: गांधी ने खुले तौर पर चेतावनी दी कि पाकिस्तान को अपने यहाँ हिंदुओं और सिखों पर हो रहे क़त्लेआम को रोकना होगा; अन्यथा भारत के लोगों को लंबे समय तक शांत रखना नामुमकिन होगा।
और तीसरा लक्ष्य थी भारत सरकार: गांधी चाहते थे कि भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय वादों का सम्मान करे और स्टर्लिंग बैलेंस का रुका हुआ 55 करोड़ रुपये तुरंत जारी करे।
अनशन के तीसरे ही दिन, 15 जनवरी की रात को भारत सरकार ने दबाव में आकर 55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को सौंपने का आधिकारिक ऐलान कर दिया। लेकिन क्या 55 करोड़ रुपये मिलने के बाद गांधी ने उपवास तोड़ दिया? तो जवाब है; नहीं। गांधी 15 जनवरी के बाद भी भूखे रहे। क्योंकि उनका मुख्य मक़सद सिर्फ़ वो रकम नहीं थी, बल्कि दिल्ली की ज़मीन पर अमन की बहाली थी। उनका मुख्य लक्ष्य दिल्ली की जमीन पर शांति और सुरक्षा का लिखित व वास्तविक आश्वासन था।
आम मिथक बनाम प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य
| विषय | सोशल मीडिया मिथक | ऐतिहासिक दस्तावेज एवं तथ्य (India After Gandhi) |
| 55 करोड़ की प्रकृति | भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान को दी गई मुफ्त ‘खैरात’। | द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत द्वारा दिए गए संसाधनों का ‘स्टर्लिंग बैलेंस’, जो पाकिस्तान का कानूनी हिस्सा था। |
| अनशन का एकमात्र कारण | केवल पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाना। | दिल्ली में जारी कत्लेआम रोकना, 137 मस्जिदों की सुरक्षा, और दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा। |
| उपवास का समय | 55 करोड़ मिलते ही तुरंत अनशन तोड़ दिया गया। | 15 जनवरी को कैबिनेट के फैसले के बाद भी उपवास जारी रहा; 18 जनवरी को सर्वदलीय शांति समझौते के बाद तोड़ा गया। |
| आरएसएस और हिंदू संगठनों की भूमिका | अनशन का पूरी तरह बहिष्कार किया। | डॉ. राजेंद्र प्रसाद की शांति समिति में आरएसएस और हिंदू महासभा के प्रतिनिधियों ने भी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। |
18 जनवरी का शांति घोषणापत्र और गोडसे का बयान
गांधी का स्वास्थ्य तेज़ी से बिगड़ रहा था। डॉक्टरों ने चेतावनी दी कि उनकी किडनियां जवाब दे रही हैं और कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है।17 जनवरी को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक केंद्रीय शांति समिति बनाई गई। 18 जनवरी की सुबह इस समिति के प्रतिनिधि बिड़ला भवन पहुंचे। इस समझौते पर कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ हिंदू महासभा, आरएसएस, ज़मायत-उल-उलेमा और प्रमुख सिख संगठनों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए थे।
उन्होंने गाँधी जी को लिखित गारंटी दी गई कि:
- दिल्ली में किसी निर्दोष मुस्लिम पर हमला नहीं होगा।
- ज़बर्दस्ती कब्ज़ा की गई मस्जिदों को खाली किया जाएगा।
- और शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों को उनके घरों तक सुरक्षित लौटने दिया जाएगा।
इस वादे के बाद 18 जनवरी को गांधी ने संतरों का रस पीकर अपना 6 दिन लंबा उपवास समाप्त किया। लेकिन देश मे कुछ विचारधारा ऐसे भी थे जो इस समझौते को ‘कायरता’ मान रही थी। उपवास टूटने के केवल 48 घंटे बाद, 20 जनवरी को, जब गांधी प्रार्थना सभा में बोल रहे थे, मदनलाल पाहवा नामक एक पंजाबी शरणार्थी ने उन पर बम फेंका। बम कुछ दूरी पर फटा और कोई हताहत नहीं हुआ।
जब पुलिस ने गांधी से सुरक्षा घेरा कड़ा करने को कहा, तो गांधी ने दो टूक इनकार कर दिया। उन्होंने कहा ‘अगर मुझे किसी गोली या बम से मरना है, तो मैं ईश्वर का नाम लेते हुए मुस्कुराते हुए मरना पसंद करूँगा।’
और इसके ठीक दस दिन बाद, 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने बिड़ला भवन के उसी लॉन में तीन गोलियां दाग दीं। गांधी की हत्या के बाद ऑल इंडिया रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने एक बेहद मार्मिक बात कही थी। उन्होंने कहा था ‘यह हमारे लिए गहरे शर्म का विषय है कि दुनिया के सबसे महान इंसान को उस पाप की क़ीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी, जो पाप हमने किया था। जब वे ज़िंदा थे, हमने उनकी बात नहीं मानी।

नाथूराम गोडसे ने मुकदमे की सुनवाई के दौरान अदालत में स्वीकार किया था कि उसने जानबूझकर गांधी को निशाना बनाया। गोडसे के शब्दों में:
“मेरे गुस्से का मुख्य कारण यह था कि एक सिद्धांत के रूप में महात्मा लगातार मुसलमानों का पक्ष ले रहे थे। मुसलमानों के समर्थन में किए गए उनके अंतिम उपवास ने ही आखिरकार मुझे इस नतीजे पर पहुंचाया कि महात्मा के वजूद को तुरंत खत्म कर देना चाहिए।”
— स्रोत: India After Gandhi
क्या 55 करोड़ ही गाँधीजी की हत्या की एकमात्र वजह थी?
30 जनवरी 1948 की घटना केवल 55 करोड़ रुपयों की नाराज़गी का नतीजा नहीं थी बल्कि यह केवल एक तात्कालिक बहाना बना। असल लड़ाई इस विचार की थी कि आज़ाद भारत का चरित्र कैसा होगा? क्या वह एक ऐसा देश बनेगा जो प्रतिशोध, रक्तपात और धार्मिक कट्टरता की राह पर चलेगा; या फिर एक ऐसा गणराज्य जो क़ानून के शासन, अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं और धर्मनिरपेक्ष नैतिकता पर अपनी पहचान बनाएगा?
गांधी ने अपनी जान देकर उस वक्त देश को गृहयुद्ध की आग में भड़कने से बचा लिया था। इतिहास केवल वो नहीं है जो नारों में सुनाया जाता है, बल्कि वो है जो प्राथमिक दस्तावेजों में दर्ज है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
Q1. क्या गांधीजी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के लिए सरकार को मजबूर किया था?
उत्तर: गांधीजी का मानना था कि भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संपत्ति विभाजन समझौते (स्टर्लिंग बैलेंस) का सम्मान होना चाहिए। हालांकि कैबिनेट कश्मीर युद्ध के कारण इसे रोकना चाहती थी, गांधी का मत था कि संप्रभु राष्ट्र के वादे न निभाने से भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को धक्का पहुंचेगा। सरकार ने 15 जनवरी 1948 को यह राशि जारी की।
Q2. गांधीजी ने 13 जनवरी 1948 का अनशन कब और क्यों तोड़ा?
उत्तर: गांधीजी ने अनशन 55 करोड़ मिलने पर नहीं, बल्कि 18 जनवरी 1948 को तोड़ा। जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता वाली सर्वदलीय शांति समिति (जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख और संघ के प्रतिनिधि शामिल थे) ने दिल्ली में कत्लेआम रोकने और 137 मस्जिदों को सुरक्षित करने का लिखित वचन दिया, तब उन्होंने उपवास समाप्त किया।
Q3. स्टर्लिंग बैलेंस क्या था और इसमें पाकिस्तान का हिस्सा क्यों था?
उत्तर: द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार ने भारत के सैन्य और आर्थिक संसाधनों का उपयोग किया था, जिसका कर्ज ‘स्टर्लिंग बैलेंस’ कहलाता था। स्वतंत्रता के समय कुल संपत्ति के बंटवारे में पाकिस्तान का हिस्सा 75 करोड़ तय हुआ था, जिसमें से 20 करोड़ पहले दिए जा चुके थे और 55 करोड़ बकाया थे।
Q4. क्या नाथूराम गोडसे का संबंध किसी संगठन से था?
उत्तर: नाथूराम गोडसे पुणे का रहने वाला था और हिंदू महासभा से जुड़ा था। वह पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी कार्यकर्ता रहा था। अदालत में उसने दावा किया कि गांधी की नीतियों से हिंदू हितों को नुकसान हो रहा था, इसलिए उसने यह कदम उठाया।
संदर्भ व प्राथमिक स्रोत:
- रामचंद्र गुहा — India After Gandhi: The History of the World’s Largest Democracy (अध्याय 1)
- डी.जी. तेंदुलकर — Mahatma: Life of Mohandas Karamchand Gandhi (खंड 8)
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