देश बदलने वाले 10 IAS अधिकारियों (Top 10 Inspiring Stories of IAS Officers) की कहानियां: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) को देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवाओं में गिना जाता है और लाखों छात्र UPSC परीक्षा पास करके इस मुकाम तक पहुंचने का सपना देखते हैं। लेकिन असली चुनौती कुर्सी मिलने के बाद शुरू होती है। कुछ अधिकारी ऐसे होते हैं जो केवल फाइलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जमीन पर उतरकर जनता की समस्याओं का समाधान करते हैं और समाज के लिए एक मिसाल बन जाते हैं।
देश बदलने वाले IAS अधिकारियों (Top 10 Inspiring Stories of IAS Officers) की कहानियां
आज हम आपको ऐसे ही 10 शानदार IAS अधिकारियों की कहानियां बताने जा रहे हैं, जिन्होंने अपने काम के जरिए यह साबित कर दिया कि अगर प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी बदलाव नामुमकिन नहीं है।
1. आर्मस्ट्रॉन्ग पामे

मणिपुर के तामेंगलोंग जिले का तौसेम इलाका पहाड़ों और घने जंगलों से घिरा था। यहां कई गांव ऐसे थे जहां पहुंचने के लिए लोगों को घंटों पैदल चलना पड़ता था। सड़क न होने की वजह से मरीजों को बांस की स्ट्रेचर पर ले जाना पड़ता था और बाजार, स्कूल या अस्पताल तक पहुंचना भी बेहद मुश्किल था। साल 2012 में IAS अधिकारी आर्मस्ट्रॉन्ग पामे तौसेम के SDM बने। उन्होंने जब गांवों का दौरा किया तो लोगों से पूछा कि वे सबसे ज्यादा क्या चाहते हैं तो लोगों ने कहा की “हमें सड़क चाहिए।”
पामे ने सड़क के लिए सरकार से मदद मांगी, लेकिन पर्याप्त सरकारी फंड उपलब्ध नहीं हो सका। इसके बाद उन्होंने इंतजार करने के बजाय लोगों को साथ लेकर कुछ अलग करने का फैसला किया।उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए लोगों से सड़क बनाने के लिए आर्थिक मदद मांगी। देश-विदेश से लोगों ने योगदान देना शुरू किया। पामे ने खुद ₹5 लाख दिए और उनके भाई ने भी योगदान किया। इस अभियान से करीब ₹40 लाख जुटाए गए, जो बुलडोजर और अर्थमूवर किराए पर लेने के लिए पर्याप्त थे, लेकिन श्रम के भुगतान के लिए नहीं।
इसके बाद स्थानीय ग्रामीण भी इस काम में जुट गए। निर्माण कार्य शुरू होने के दिन लगभग 250 ग्रामीण, जिनमें 100 से अधिक महिलाएं थीं, फावड़े लेकर पहुंचे। करीब 100 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण शुरू हुआ, जो तौसेम को तामेंगलोंग और आगे असम व नागालैंड से जोड़ने में मदद करती थी। 2013 में इसे “People’s Road” के नाम से जाना जाने लगा।
इस कहानी की खास बात सिर्फ सड़क बनना नहीं थी। यह दिखाती है कि एक अधिकारी अगर लोगों की समस्या को समझकर उन्हें साथ लेकर काम करे, तो प्रशासन और समाज मिलकर बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
2. डी. रूपा मौदगिल

डी. रूपा मौदगिल IAS नहीं, बल्कि 2000 बैच की IPS अधिकारी हैं। उन्होंने कर्नाटक पुलिस में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।
साल 2017 में डी. रूपा मौदगिल उस समय सुर्खियों में आईं, जब वह बेंगलुरु की Parappana Agrahara Central Prison में DIG (Prisons) के पद पर तैनात थीं। जेल का निरीक्षण करने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट में कुछ कैदियों को कथित तौर पर मिलने वाली विशेष सुविधाओं और जेल नियमों के उल्लंघन पर सवाल उठाए। उनकी रिपोर्ट में प्रभावशाली कैदियों को कथित VIP सुविधाएं मिलने और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों का भी उल्लेख था।
इस रिपोर्ट में एक हाई-प्रोफाइल कैदी को कथित तौर पर विशेष सुविधाएं दिए जाने का मुद्दा भी सामने आया। इन आरोपों के बाद कर्नाटक सरकार ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए। हालांकि, उस समय जेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने Roopa की रिपोर्ट में लगाए गए कुछ आरोपों और उसकी प्रक्रिया पर सवाल भी उठाए थे। इसलिए इन आरोपों को आरोप के रूप में ही देखना चाहिए, अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं। रिपोर्ट के कुछ ही समय बाद Roopa का तबादला कर दिया गया और उन्हें ट्रैफिक एवं रोड सेफ्टी से जुड़ी जिम्मेदारी दी गई।
उनकी कहानी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उन्होंने जेल व्यवस्था में नियम, समानता और जवाबदेही जैसे मुद्दों को सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनाया। बाद में उन्होंने जेल व्यवस्था और सुधारों पर TEDx में भी बात की।
3. तुकाराम मुंढे

तुकाराम मुंढे 2005 बैच के महाराष्ट्र कैडर के IAS अधिकारी हैं। अपने लंबे प्रशासनिक करियर में उन्होंने ग्रामीण विकास, जिला प्रशासन, स्वास्थ्य, शहरी प्रशासन और अन्य महत्वपूर्ण विभागों में काम किया है।
उनकी कहानी की शुरुआत ही एक ऐसे अधिकारी के रूप में हुई जो सरकारी व्यवस्था को सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर बदलना चाहते थे। नांदेड के देगलूर में Assistant Collector रहते हुए उन्होंने देखा कि शहर में लोगों को गंदा पानी मिल रहा है। उन्होंने नगर परिषद को नोटिस जारी कर पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए समय दिया। रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद कुछ ही समय में पानी की समस्या में सुधार हुआ।
बाद में सोलापुर के कलेक्टर के रूप में उन्होंने स्वच्छता अभियान पर विशेष ध्यान दिया। महाराष्ट्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार, उनके कार्यकाल में कुर्डूवाड़ी और करमाला नगर परिषदों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया गया। लोगों को शौचालय बनाने और इस्तेमाल करने और जागरूक करने के लिए स्थानीय स्तर पर अनोखे तरीके भी अपनाए गए।
नासिक नगर निगम के आयुक्त रहते हुए भी उन्होंने अवैध निर्माण, अनधिकृत गतिविधियों और प्रशासनिक नियमों के पालन पर कार्रवाई की। उनके फैसलों को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और राजनीतिक विवाद भी हुए, और उनका कई बार तबादला हुआ।
तुकाराम मुंढे की कहानी का मुख्य संदेश यही है कि प्रशासन का काम सिर्फ आदेश जारी करना नहीं, बल्कि नागरिकों की रोजमर्रा की समस्याओं को समझकर उन पर कार्रवाई करना भी है।
4. दुर्गा शक्ति नागपाल

दुर्गा शक्ति नागपाल उत्तर प्रदेश कैडर की 2010 बैच की IAS अधिकारी हैं। उनका नाम वर्ष 2013 में उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, जब वह गौतम बुद्ध नगर में SDM के पद पर तैनात थीं। इस दौरान उन्होंने जिले में अवैध बालू खनन के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की। उस समय उत्तर प्रदेश में अवैध खनन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे थे। बाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में राज्य सरकार ने भी माना था कि नोएडा में बालू खनन के लिए अनुमति नहीं दी गई थी और कुछ स्थानों पर अवैध खनन जारी था।
जुलाई 2013 में दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित कर दिया गया। सरकार की ओर से उस समय बताया गया कि कार्रवाई का कारण कादलपुर गांव में निर्माणाधीन धार्मिक स्थल की दीवार गिराने के मामले में उचित प्रक्रिया का पालन न करना था। वहीं, उनके निलंबन को लेकर मीडिया और IAS अधिकारियों के बीच यह चर्चा भी हुई कि उनके खिलाफ कार्रवाई का संबंध अवैध खनन पर उनकी सख्ती से था। सरकार ने इस संबंध से इनकार किया था।
करीब दो महीने बाद, सितंबर 2013 में उत्तर प्रदेश सरकार ने उनका निलंबन वापस लेकर उन्हें सेवा में बहाल कर दिया। इसके बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच भी बंद कर दी गई।
दुर्गा शक्ति नागपाल की कहानी प्रशासन में लिए गए फैसलों, सरकारी कार्रवाई और एक अधिकारी के काम को लेकर उठे सार्वजनिक विवाद का उदाहरण बन गई। बाद के वर्षों में उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र में अलग-अलग प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वह 2023 से बांदा की जिलाधिकारी के रूप में कार्यरत रहीं।
5. स्मिता सभरवाल

स्मिता सभरवाल भारतीय प्रशासनिक सेवा की उन अधिकारियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने प्रशासनिक कार्यों के जरिए स्वास्थ्य, शिक्षा और सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया। उनका जन्म 19 जून 1977 को दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल में हुआ। उनके पिता सेना में कर्नल थे। परिवार के साथ हैदराबाद आने के बाद उन्होंने वहीं अपनी पढ़ाई पूरी की और सेंट फ्रांसिस कॉलेज फॉर वुमेन से कॉमर्स में स्नातक किया।
स्मिता ने 2001 बैच की IAS अधिकारी के रूप में सेवा शुरू की और UPSC सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 4 हासिल की। शुरुआती प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बाद उन्होंने ग्रामीण विकास और नगर प्रशासन के क्षेत्रों में भी काम किया। वारंगल की नगर आयुक्त रहते हुए उन्होंने ‘Fund Your City’ जैसी पहल शुरू की, जिसमें सार्वजनिक सुविधाओं के विकास के लिए पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का इस्तेमाल किया गया।
उनके करियर का महत्वपूर्ण दौर करीमनगर की जिला कलेक्टर के रूप में रहा। वहां उन्होंने स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। ‘अम्माललाना’ कार्यक्रम के माध्यम से सरकारी अस्पतालों में प्रसव को बढ़ावा देने और गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने पर काम किया गया। सरकारी अस्पतालों की साफ-सफाई, डॉक्टरों की उपलब्धता और तकनीक के जरिए निगरानी पर भी जोर दिया गया।
शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने सरकारी स्कूलों और छात्रावासों की निगरानी के लिए तकनीक का इस्तेमाल किया। बाद में वह तेलंगाना मुख्यमंत्री कार्यालय में नियुक्त होने वाली पहली महिला IAS अधिकारी बनीं।
उनका प्रशासनिक सफर दिखाता है कि तकनीक, निगरानी और जनता से सीधे जुड़ाव के जरिए सरकारी योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने की कोशिश कैसे की जा सकती है।
6. प्रशांत नायर

प्रशांत नायर, जिन्हें लोग प्यार से “Collector Bro” के नाम से भी जानते हैं, 2007 बैच के केरल कैडर के IAS अधिकारी हैं। फरवरी 2015 में उन्होंने कोझिकोड के जिला कलेक्टर का पद संभाला। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने पारंपरिक प्रशासन के साथ सोशल मीडिया और जनभागीदारी का इस्तेमाल करते हुए कई सामाजिक पहल शुरू कीं।
उनकी सबसे चर्चित पहल “Operation Sulaimani” थी। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों तक सम्मान के साथ भोजन पहुंचाना था, जो आर्थिक कारणों से खाना नहीं खरीद पाते थे। जिला प्रशासन और Kerala Hotel and Restaurants Association की साझेदारी से जरूरतमंद लोगों को भोजन के कूपन दिए जाते थे, जिन्हें संबंधित होटल और रेस्टोरेंट में भोजन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता था।
Nair ने “Compassionate Kozhikode” के जरिए लोगों को सामाजिक कामों से जोड़ने की कोशिश की। इसमें स्वयंसेवकों ने बच्चों के घरों, वृद्धाश्रमों, पालीएटिव केयर सेंटर और अन्य संस्थानों के लिए मदद उपलब्ध कराने में योगदान दिया।
उन्होंने पर्यावरण से जुड़ी गतिविधियों में भी लोगों की भागीदारी बढ़ाई। “Tere Mere Beach Mein” के जरिए कोझिकोड बीच की सफाई और कचरा प्रबंधन पर ध्यान दिया गया। बुजुर्गों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए “Yo Appooppa” जैसी पहल भी शुरू की गई।
उनका कार्यकाल इस बात का उदाहरण बना कि प्रशासन केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित न रहकर नागरिकों, स्वयंसेवकों और स्थानीय संस्थाओं के साथ मिलकर भी सामाजिक समस्याओं पर काम कर सकता है।
7. अवनीश शरण

अवनीश शरण 2009 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के IAS अधिकारी हैं। उनका प्रशासनिक सफर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लोगों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। उनकी कहानी इसलिए भी प्रेरक रही है क्योंकि उन्होंने अपनी पढ़ाई में साधारण प्रदर्शन के बावजूद लगातार मेहनत करके UPSC में सफलता हासिल की। उन्होंने 10वीं में 44.7% अंक प्राप्त किए थे और राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षा में कई बार असफल हुए, लेकिन UPSC के दूसरे प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 77 हासिल की।
छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के कलेक्टर के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान दूरदराज के आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच एक बड़ी चुनौती थी। कई गांवों तक सामान्य चार-पहिया एंबुलेंस पहुंचना मुश्किल था। इसी समस्या को देखते हुए उन्होंने ‘Sangi Express’ बाइक एंबुलेंस पहल शुरू की। इसमें मोटरसाइकिल और साइड-कार की मदद से मरीजों, खासकर गर्भवती महिलाओं और जरूरतमंद लोगों को स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई।
शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने लोगों से सीधा संपर्क बढ़ाने की कोशिश की। उनके बारे में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने जिले के स्कूलों, कॉलेजों और अस्पतालों में अपना व्यक्तिगत संपर्क नंबर उपलब्ध कराया, ताकि विद्यार्थी और आम नागरिक अपनी समस्याएं सीधे प्रशासन तक पहुंचा सकें। इसके बाद उन्होंने स्कूलों का निरीक्षण कर वहां की व्यवस्थाओं से जुड़ी समस्याओं को समझने का प्रयास किया।
अवनीश शरण की कहानी प्रशासन में सीधे जनसंपर्क, स्थानीय समस्याओं की समझ और व्यावहारिक समाधान के महत्व को दिखाती है।
8. राज कुमार यादव

राज कुमार यादव 2009 बैच के सिक्किम कैडर के IAS अधिकारी हैं। दक्षिण सिक्किम के जिला कलेक्टर रहते हुए उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए District Administration’s Adopted Village (DAAV) पहल शुरू की।
2015 में शुरू किए गए इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत Rong-Bul Gram Panchayat Unit के छह गांवों को प्रशासन ने अपनाया। यहां प्रशासन ने सबसे पहले ग्राम सभा के जरिए स्थानीय लोगों से उनकी समस्याएं समझीं। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बैंकिंग जैसी जरूरतों को प्राथमिकता दी गई।
इस पहल का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा व्यवस्था में सुधार था। छह स्कूलों और एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की सुविधाओं को बेहतर किया गया। स्कूलों में स्मार्ट क्लास शुरू की गईं, मिड-डे मील की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया और विद्यार्थियों को स्कूल परिसर को बेहतर बनाने की गतिविधियों में शामिल किया गया। स्थानीय लोगों को इन संस्थानों के रखरखाव की जिम्मेदारी के लिए भी प्रशिक्षित किया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रम शुरू होने के बाद इन स्कूलों में ड्रॉपआउट दर 2014 के 36 प्रतिशत से घटकर शून्य हो गई और विद्यार्थियों की उपस्थिति में भी सुधार देखा गया। गांवों में बिजली, पानी और बेहतर सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं पर भी काम हुआ।
राज कुमार यादव को उनके प्रशासनिक कार्य के लिए Indian Express Excellence in Governance Awards में भी सम्मानित किया गया। उनकी कहानी दिखाती है कि जब प्रशासन स्थानीय लोगों को साथ लेकर काम करता है, तो गांवों में विकास की योजनाएं ज्यादा प्रभावी ढंग से जमीन तक पहुंच सकती हैं।
9. सुप्रिया साहू

सुप्रिया साहू 1991 बैच की तमिलनाडु कैडर की IAS अधिकारी हैं। पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण और जलवायु से जुड़े कामों में उनका लंबा प्रशासनिक अनुभव रहा है। उनके करियर का एक महत्वपूर्ण अध्याय नीलगिरि की जिला कलेक्टर के रूप में रहा, जहां उन्होंने पर्यावरण से जुड़ी कई जमीनी पहल शुरू कीं।
साल 2000 में उन्होंने ‘Operation Blue Mountain’ नाम से सिंगल-यूज प्लास्टिक के खिलाफ अभियान शुरू किया। उस समय प्लास्टिक प्रदूषण आज की तरह बड़ा सार्वजनिक मुद्दा नहीं था। जिला प्रशासन, स्वयंसेवकों और स्थानीय लोगों को साथ लेकर चलाए गए इस अभियान का उद्देश्य नीलगिरि के संवेदनशील पर्यावरण को प्लास्टिक कचरे से बचाना था।
इसी कार्यकाल में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण भी किया गया। कुरुथुकुली गांव में एक दिन में 42,182 पेड़ लगाए गए, जिसके लिए Guinness World Record दर्ज किया गया। इस अनुभव ने साहू के प्रशासनिक काम में पर्यावरण और सामुदायिक भागीदारी को और मजबूत किया।
बाद में उन्होंने तमिलनाडु में पर्यावरण और जलवायु से जुड़े बड़े कार्यक्रमों पर काम किया। ‘Meendum Manjapai’ अभियान के जरिए पारंपरिक पीले कपड़े के थैले को सिंगल-यूज प्लास्टिक के विकल्प के रूप में बढ़ावा दिया गया। उन्होंने वन्यजीव संरक्षण, मैंग्रोव बहाली और जलवायु अनुकूलन से जुड़े कार्यक्रमों में भी भूमिका निभाई।
2025 में उन्हें UNEP Champions of the Earth सम्मान से नवाजा गया, जो पर्यावरण नेतृत्व के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम का प्रमुख सम्मान है।
10. अक्षत वर्मा

अक्षत वर्मा 2017 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के IAS अधिकारी हैं। वाराणसी में नगर आयुक्त के रूप में काम करते हुए उन्होंने गंगा घाटों पर छोड़े जाने वाले पुराने कपड़ों की समस्या को एक उपयोगी पहल में बदलने की कोशिश की।
वाराणसी के घाटों पर धार्मिक परंपराओं के कारण श्रद्धालु अक्सर पुराने या चढ़ाए गए कपड़े छोड़ जाते हैं। इससे घाटों की सफाई मुश्किल होती थी और कपड़ा कचरा नदी तथा आसपास के पर्यावरण के लिए भी समस्या बन रहा था। अक्षत वर्मा ने इस समस्या को केवल कचरे के रूप में देखने के बजाय दोबारा इस्तेमाल करने का रास्ता खोजा।
दिसंबर 2023 में Hope Welfare Foundation के सहयोग से इस पहल की शुरुआत हुई। ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूह ‘Green Army’ ने इन पुराने कपड़ों को इकट्ठा करके, साफ करके और सिलाई के जरिए उपयोगी कपड़े के बैग में बदलना शुरू किया।
इस पहल से एक साथ कई फायदे हुए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 50 से अधिक महिलाओं को काम मिला और करीब 1 लाख कपड़े के बैग तैयार करके दुकानदारों और आम लोगों को वितरित किए गए। इससे पुराने कपड़ों का दोबारा उपयोग हुआ और प्लास्टिक बैग के विकल्प को बढ़ावा मिला।
अक्षत वर्मा की यह पहल दिखाती है कि प्रशासनिक समस्या का समाधान हमेशा बड़ी मशीनों या बड़े बजट से ही नहीं होता। कभी-कभी कचरे को संसाधन और स्थानीय लोगों को समाधान का हिस्सा बनाना भी प्रभावी तरीका हो सकता है।
इन 10 IAS अधिकारियों (Inspiring Stories of IAS Officers)की कहानियां हमें यह सिखाती हैं कि सिर्फ परीक्षा पास कर लेना ही सफलता नहीं है, बल्कि उस पद का उपयोग समाज के आखिरी व्यक्ति तक राहत पहुंचाने के लिए करना असली सफलता है। चाहे वह जनभागीदारी से सड़क बनाना हो, महिलाओं को रोजगार देना हो, या फिर पर्यावरण और शिक्षा के स्तर में सुधार लाना हो, इन अधिकारियों ने साबित किया है कि सकारात्मक सोच और मजबूत इरादों से सिस्टम में रहकर भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं।
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