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वह लेखक जिसने कलम को हथियार बनाकर समाज और सिनेमा दोनों बदल दिए

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सिर्फ तलवार उठाने वालों की कहानी नहीं है। इसमें ऐसे योद्धा भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया, जिनके शब्दों ने समाज को झकझोरा और युवाओं को जगाया। नारायण हरी आपटे, जिन्हें पूरा महाराष्ट्र प्यार से नानासाहेब आपटे कहता है, ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थे। 11 […]

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सिर्फ तलवार उठाने वालों की कहानी नहीं है। इसमें ऐसे योद्धा भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कलम को हथियार बनाया, जिनके शब्दों ने समाज को झकझोरा और युवाओं को जगाया। नारायण हरी आपटे, जिन्हें पूरा महाराष्ट्र प्यार से नानासाहेब आपटे कहता है, ऐसे ही एक विलक्षण व्यक्तित्व थे। 11 जुलाई 1889 को जन्मे नानासाहेब सिर्फ एक उपन्यासकार नहीं थे, वे स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, प्रकाशक, पटकथा लेखक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने साहित्य से लेकर सिनेमा तक, हर क्षेत्र में गहरी छाप छोड़ी। अफसोस बस इतना है कि देशभर में उनके योगदान को बहुत कम लोग जानते हैं।

15 साल की उम्र में लिया वो फैसला, जिसने ज़िंदगी बदल दी

ज़रा सोचिए, एक 15 साल का किशोर, जिस उम्र में ज़्यादातर बच्चे पढ़ाई और खेल में उलझे रहते हैं। नानासाहेब आपटे ने उसी उम्र में एक ऐसा फैसला लिया, जिसने उनकी पूरी दिशा बदल दी। सांगली जिले के सामडोली गांव में जन्मे नानासाहेब ने शुरुआती पढ़ाई सामडोली और सतारा में की, फिर आगे की पढ़ाई के लिए सतारा के न्यू इंग्लिश स्कूल पहुंचे। उसी दौर में देश में अंग्रेज़ों के खिलाफ क्रांति की लहर तेज़ हो रही थी, और युवा विनायक दामोदर सावरकर के विचारों ने हज़ारों युवाओं की तरह नानासाहेब को भी झकझोर दिया।

1904-05 के आसपास उन्होंने घर छोड़ दिया और सावरकर द्वारा बनाए गए अभिनव भारत संगठन से जुड़ गए। यह सिर्फ किसी संगठन में शामिल होना नहीं था, यह अपनी पूरी ज़िंदगी राष्ट्रसेवा को सौंपने की प्रतिज्ञा थी। यहीं से उनके भीतर लेखक और क्रांतिकारी, दोनों एक साथ जन्म ले रहे थे।

लेखक बनने से पहले भारत की झलक

नानासाहेब आपटे की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने सिर्फ किताबें नहीं पढ़ीं, पूरे भारत को पढ़ा। उत्तर भारत, राजस्थान, बंगाल और नेपाल तक की लंबी यात्राओं ने उनकी सोच को व्यापक बना दिया। इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्होंने हिंदी, बंगाली, गुजराती और नेपाली जैसी कई भाषाओं का गहरा ज्ञान भी हासिल किया, और अलग-अलग संस्कृतियों-समस्याओं को बेहद करीब से देखा। जयपुर में उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी अर्जुनलाल सेठी के स्कूल में पढ़ाया भी यह अनुभव उनके व्यक्तित्व को और परिपक्व बना गया। शायद इसीलिए उनके उपन्यासों में सिर्फ कल्पना नहीं, असली भारतीय समाज की झलक दिखती है।

इतिहास के दस्तावेज़ों को दी नई ज़िंदगी

1913 में नानासाहेब आपटे सतारा लौटे, जहां उनकी मुलाकात मशहूर इतिहासकार दत्तात्रेय बळवंत पारसनीस से हुई, यह मुलाकात उनके साहित्यिक जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई। उस दौर में मराठा इतिहास के कई ज़रूरी दस्तावेज़ मोदी लिपि में थे, जिन्हें पढ़ना हर किसी के बस की बात नहीं थी। नानासाहेब आपटे ने इन दस्तावेज़ों का मानक मराठी और अंग्रेज़ी में अनुवाद करने का मुश्किल काम अपने हाथ में लिया। इसी काम ने उन्हें मराठा इतिहास की गहराई से रूबरू कराया, यही वजह है कि उनके ऐतिहासिक उपन्यासों में सिर्फ कहानी नहीं, शोध और इतिहास की सजीवता भी दिखती है।

जब साहित्य सिर्फ मनोरंजन नहीं, बदलाव का ज़रिया बना

नानासाहेब आपटे उन लेखकों में नहीं थे जो सिर्फ लोकप्रियता के लिए लिखते हैं। उनके लिए साहित्य समाज को दिशा देने का माध्यम था। उनकी कहानियों में मराठी मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन, सामाजिक संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की गहरी छाप दिखाई देती है। उनकी पहली कहानी मशहूर पत्रिका ‘करमणूक’ में छपी, जिसके संपादक खुद प्रसिद्ध साहित्यकार हरिनारायण आपटे थे। 1909 में उनका पहला उपन्यास ‘अजिंक्यतारा’ प्रकाशित हुआ, जिसने उन्हें मराठी साहित्य में नई पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने आधी सदी से भी ज़्यादा समय तक लगातार लिखा, उनकी आखिरी बड़ी कृति ‘जवानांचा जीवनधर्म’ 1962 में आई।

35 से ज़्यादा उपन्यास लिखे

आज के लेखक अक्सर प्रकाशकों के पीछे भागते हैं। नानासाहेब ने उल्टा रास्ता चुना, उन्होंने 1913 में अजिंक्यतारा पुस्तकालय की स्थापना की, फिर 1915 में ‘आल्हाद’ नाम की पत्रिका शुरू की और बाद में ‘मधुकर’ पत्रिका भी निकाली। 1920 में उन्होंने अपना श्रीनिवास मुद्रणालय बनाया, और 1924 में Apte & Co. नाम की प्रकाशन संस्था शुरू की। यह सिर्फ व्यवसाय नहीं था, उनका मकसद था अच्छे साहित्य को आम लोगों तक पहुंचाना, और इस काम में उन्होंने कई और लेखकों के लिए भी मंच तैयार किया।

1942 का वह फैसला, जिसने सबको चौंकाया

1932 में नानासाहेब आपटे की मुलाकात RSS संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई और वे संघ से जुड़ गए। लेकिन इतिहास का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जब 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तब संघ ने आधिकारिक तौर पर इसमें हिस्सा नहीं लिया, फिर भी नानासाहेब आपटे ने व्यक्तिगत तौर पर इस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। यह फैसला बताता है कि उनके लिए सबसे बड़ा धर्म राष्ट्र था, वे किसी संगठन की सीमा से ऊपर उठकर भारत की आज़ादी को सर्वोच्च मानते थे।

मराठी सिनेमा का एक महान कथाकार

बहुत कम लोग जानते हैं कि नानासाहेब आपटे ने मराठी सिनेमा को भी समृद्ध किया। 1922 में मशहूर फिल्मकार बाबूराव पेंटर उन्हें फिल्म जगत में लाए, और उन्होंने अपनी कहानियों को पटकथाओं में ढालना शुरू किया। बाद में उनका जुड़ाव प्रभात फिल्म कंपनी और महान निर्देशक वि. शांताराम से भी हुआ। दत्ता धर्माधिकारी और दिनकर पाटिल जैसे निर्देशकों के साथ भी उन्होंने काम किया — उस दौर में जब भारतीय सिनेमा खुद को तलाश रहा था, नानासाहेब जैसे लेखक उसकी मज़बूत नींव तैयार कर रहे थे।

दादासाहेब फाल्के के मुश्किल दौर में साथ

इतिहास सिर्फ उपलब्धियों का नहीं, इंसानियत का भी होता है। जब भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहेब फाल्के अपनी ज़िंदगी के सबसे कठिन दौर से गुज़र रहे थे, तब नानासाहेब आपटे ने उनका साथ नहीं छोड़ा, फाल्के करीब एक साल तक कोरेगांव स्थित आपटे परिवार के घर में रहे। यह वाकया बताता है कि नानासाहेब सिर्फ बड़े लेखक नहीं, बड़े इंसान भी थे।

उनके उपन्यास आज भी पढ़े जाते हैं

नानासाहेब आपटे ने कुल मिलाकर 35 से ज़्यादा उपन्यास लिखे — अजिंक्यतारा, भाग्यश्री, हृदयाची श्रीमंती, वेटिंग रूम, राजपुताचे भीष्म जैसी कई चर्चित रचनाएं इसमें शामिल हैं। इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ-साथ जीवन-दर्शन भी मिलता है। उनके किरदार आम लोग हैं, पर उनके संघर्ष असाधारण हैं, शायद इसीलिए दशकों बाद भी उनके उपन्यास आज उतने ही प्रासंगिक लगते हैं।

साहित्य जगत का अनोखा सम्मान

जब नानासाहेब ने अपनी ज़िंदगी के 80 साल पूरे किए, तो कोरेगांव में उनका सम्मान समारोह हुआ, जिसमें पुणे से कई नामी कवि और साहित्यकार पहुंचे। यह सम्मान सिर्फ उनकी उम्र का नहीं था, यह उस इंसान के प्रति कृतज्ञता थी, जिसने पूरी ज़िंदगी साहित्य और राष्ट्र को समर्पित कर दी थी।

उनकी विरासत आज भी ज़िंदा है

14 नवंबर 1971 को नानासाहेब आपटे इस दुनिया से विदा हो गए, पर उनकी कलम आज भी ज़िंदा है। उन्होंने साबित किया कि लेखक सिर्फ कहानीकार नहीं होता, वह समाज का मार्गदर्शक, इतिहास का संरक्षक और आने वाली पीढ़ियों का शिक्षक भी होता है। उनकी ज़िंदगी आज भी यह याद दिलाती है कि शब्दों की ताकत किसी भी तलवार से कम नहीं होती।

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