भारत के सर्विस सेक्टर में लॉन्ड्री एक ऐसा वर्टिकल था जिसे दशकों तक ‘लो-मार्जिन’, ‘श्रम-साध्य’ और पूरी तरह से ‘हाइपर-लोकल’ मानकर संगठित कॉर्पोरेट बिज़नेस ने नजरअंदाज किया। लेकिन, इसी असंगठित ढांचे के बीच IIT बॉम्बे का एक छात्र ने मानकीकरण और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर इसे 160 करोड़ रुपये सालाना कमाई करने वाला एक कंपनी खड़ी कर दी। मिलिए अरुणाभ सिन्हा से, जिन्होंने 50-60 निवेशकों के “NO” सुनने के बाद भी हार नहीं मानी और UClean जैसी कंपनी खड़ी कर दी। UClean Succees Story की यह कहानी बताती है कि कैसे एक बुनियादी, रोजमर्रा की ज़रूरत को स्केलेबल और फ्रेंचाइजी-आधारित बिज़नेस मॉडल में ढाला जा सकता है।

गंदे तौलिये से मिला ‘करोड़ों’ का आइडिया
साल 2015 के आसपास भारत में OYO और Treebo जैसे बजट होटल्स का दौर शुरू हो रहा था। अरुणाभ सिन्हा उस वक्त ट्रीबो होटल्स में काम कर रहे थे। ट्रीबो होटल्स के साथ काम करते हुए अरुणाभ सिन्हा के सामने लिनेन की गुणवत्ता को लेकर बड़ी समस्या आ रही थी, ग्राहक कमरों से खुश थे, लेकिन गंदे तौलिये, बेडशीट और पर्दों के कारण होटल्स की रेटिंग गिर रही थी।
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जब उन्होंने मार्केट रिसर्च किया, तो पाया कि भारत का 99% लॉन्ड्री बाज़ार पूरी तरह असंगठित है। यह सेक्टर पारंपरिक धोबियों या स्थानीय प्रेस वालों पर निर्भर था, और जिसमे कई सारी खामियों थी जैसे कि कपड़ा धोते समय पानी और डिटर्जेंट की गुणवत्ता का कोई मानक नहीं था, समय की भी अनिश्चितता बनी रहती थी जिससे डिलीवरी का समय तय नहीं होता था और ना ही सेवायों का मूल्य निधारित रहती थी। कंपनी के संस्थापक अरुणाभ सिन्हा की पृष्ठभूमि ने उन्हें इस समस्या को एक बिज़नेस अवसर के रूप में देखने की क्षमता दी।
IIT से लॉन्ड्री तक का सफर
अरुणाभ की पृष्ठभूमि बहुत मजबूत थी। भागलपुर के एक मध्यम वर्गीय परिवार से निकले अरुणाभ ने IIT बॉम्बे से मेटलर्जी में डिग्री ली थी। टाटा स्टील और ZS Associates में काम करने के बाद, उन्होंने अपनी पहली कंपनी ‘फ्रैनग्लोबल’ (Franglobal) बेची और बाद में ट्रीबो में काम किया जिसके उनके पास कॉर्पोरेट संरचना और फ्रैंचाइज़िंग की समझ ने ही यूक्लीन के विस्तार की नींव रखी।
2016 में, उन्होंने जॉब छोड़ी और यूक्लीन का ब्लूप्रिंट तैयार किया। उन्होंने तय किया कि वे खुद की बड़ी फैक्ट्रियां लगाने के बजाय ‘एसेट लाइट’ फ्रैंचाइज़ी मॉडल अपनाएंगे। लेकिन रास्ता आसान नहीं था। जब वे फंडिंग के लिए निवेशकों के पास गए, तो 50 से 60 निवेशकों ने उनके प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि “लॉन्ड्री कोई स्केलेबल बिज़नेस नहीं है, इसमें पैसा नहीं बनेगा, और खुद के बड़े प्रोसेसिंग यूनिट्स (Centralized Hubs) लगाने में भारी पूंजी (Capex) लगती, जो उनके पास नहीं थी।
अरुणाभ ने तय किया कि वे इंफ्रास्ट्रक्चर खुद खड़ा करने के बजाय ऐसे भागीदारों को ढूंढेंगे जो निवेश करें, और यूक्लीन उन्हें ब्रांडिंग, टेक्नोलॉजी और मशीनरी सपोर्ट देगा। दिल्ली-एनसीआर के एक निवेशक, जो पहले से ड्राई-क्लीनिंग बिज़नेस में थे, ने 25 लाख रुपये का शुरुआती निवेश किया और मशीनें उपलब्ध कराईं। यह ‘प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट’ कंपनी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।
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वो 3 फैसले जिन्होंने बाजी पलट दी
फंडिंग और पहले रणनीतिक साझीदार के मिलने के बाद, 2017 में अरुणाभ ने अपनी पत्नी गुंजन तनेजा के साथ मिलकर ऑपरेशन्स शुरू किए। एग्जीक्यूशन में तीन प्रमुख पिलर्स पर फोकस किया गया:
- मूल्य निर्धारण में बदलाव: पारंपरिक ड्राई क्लीनर्स ‘प्रति कपडा’ (Per Piece) चार्ज करते थे, जो महंगा पड़ता था। यूक्लीन ने ‘प्रति किलो’ (Per Kg) का मॉडल अपनाया, जिससे मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह सेवा किफायती हो गई।
- टेक्नोलॉजी एकीकरण: एक मोबाइल ऐप लॉन्च किया गया जिससे ग्राहक पिक-अप और ड्रॉप शेड्यूल कर सकें। इसमें ‘लाइव ट्रैकिंग’ की सुविधा दी गई, जिससे भरोसे की समस्या हल हुई।
- तेज़ विस्तार (Rapid Expansion): कंपनी ने टियर-1 शहरों तक सीमित रहने के बजाय टियर-2 और टियर-3 शहरों में आक्रामक रूप से फ्रैंचाइज़ी बांटी। इससे कंपनी का नेटवर्क तेज़ी से फैला, बिना कंपनी की बैलेंस शीट पर भारी कर्ज या अचल संपत्ति का बोझ डाले।
आज यूक्लीन भारत की सबसे बड़ी लॉन्ड्री और ड्राई-क्लीनिंग चेन्स में से एक बन चुकी है। यूक्लीन की वृद्धि केवल एक कंपनी की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत में बदल रहे सामाजिक और आर्थिक ढांचे का भी संकेत है। कंपनी के पास 800 से अधिक आउटलेट्स का नेटवर्क है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, कंपनी का सालाना टर्नओवर 160 करोड़ रुपये के पार पहुँच चुका है, वही 24 घंटे के भीतर डिलीवरी के वादे ने ग्राहक प्रतिधारण (Customer Retention) में मदद की है। लॉन्ड्री जैसे कम मार्जिन वाले बिज़नेस में इतना बड़ा वॉल्यूम और नेटवर्क खड़ा करना यह साबित करता है कि ऑपरेशनल एफिशिएंसी से इस सेक्टर में भी पैसा बनाया जा सकता है।

U-Clean की इतनी तेजी से बढ़ने के कारण
यूक्लीन की सफलता केवल एक कंपनी की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत में बदल रहे सामाजिक और आर्थिक ढांचे का भी संकेत है।शहरों में छोटे होते घर और सूखने की जगह की कमी ने लॉन्ड्री सर्विस की मांग बढ़ाई है। मेट्रो जैसे शहरों में घरेलू कामगारों की बढ़ती लागत और उनकी अनुपलब्धता ने मध्यम वर्ग को इस प्रोफेशनल सेवाओं की ओर ध्यान खींचा है। वही भारत सरकार का डिजिटल इंडिया मिशन ने तहत UPI और ऐप-आधारित सेवाओं के प्रति उपभोक्ताओं की सहजता ने इस मॉडल को स्वीकार्य बनाया है।
U-Clean के सामने चुनौतियां
वर्तमान में, यूक्लीन एक स्थापित ब्रांड है, लेकिन चुनौतियां अब भी बरकरार हैं। फ्रैंचाइज़ी मॉडल में सबसे बड़ा जोखिम ‘गुणवत्ता नियंत्रण’ का होता है। जैसे-जैसे आउटलेट्स की संख्या बढ़ती है, हर स्टोर पर समान सर्विस स्टैंडर्ड बनाए रखना कठिन हो जाता है। इसके अलावा, बाजार मे तेजी से हो रहे बदलाव, कई नए स्थानीय एग्रीगेटर्स और हाइपर-लोकल स्टार्टअप्स आ गए हैं, जिससे मूल्य प्रतियोगिता बढ़ रही है जिससे कंपनी को भविष्य मे काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। कंपनी के लिए अगला चरण केवल नए स्टोर खोलना नहीं, बल्कि अपने मौजूदा फ्रैंचाइज़ी नेटवर्क की प्रॉफिटेबिलिटी बनाए रखना और बदलती तकनीक के साथ मशीनों को अपग्रेड करना होगा।
यह कहानी दिखाती है कि इनोवेशन का मतलब हमेशा कोई नया आविष्कार करना नहीं होता। कई बार एक सदियों पुरानी, अस्त-व्यस्त व्यवस्था को व्यवस्थित करना ही सबसे बड़ा बिज़नेस अवसर होता है।

