कहते हैं अगर हौसलों में जान हो, तो साधनों की कमी कभी आड़े नहीं आती। हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर की रहने वाली सुनीता देवी (Sunita devi Himachal Success Story) ने इस कहावत को हकीकत में बदल कर दिखाया है। अक्सर हम और आप शिकायत करते हैं कि हमारे पास खेती के लिए ज़मीन नहीं है या बिज़नेस के लिए पैसे नहीं हैं, लेकिन 5वीं पास सुनीता देवी ने एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसने न केवल उनकी गरीबी दूर की, बल्कि आज वे देश भर की महिला किसानों के लिए एक प्रेरणा बन गई हैं। आज के इस लेख में हम जानेंगे एक साधारण गृहणी की असाधारण कहानी, जिसने अपनी घर की छत (Terrace) को ही अपना खेत बना लिया और आज लाखों रुपये कमा रही हैं।

जब मुसीबत बनी अवसर: पति की बीमारी और ज़मीन की तंगी
ऐसा नहीं तो सुनीता देवी की जीवन आसान रही थी। इस कहानी की शुरुआत हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर स्थित भरज्वाणु गाँव से होती है। सुनीता देवी एक बेहद साधारण परिवार से आती थीं, लेकिन उनके सामने खड़ी चुनौतियां भी पहाड़ जैसी बड़ी थीं। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनके पास खेती करने के लिए अपनी कोई ज़मीन नहीं थी। ऊपर से उनके पति लगातार बीमार रहते थे, जिसके कारण घर की जमा-पूंजी इलाज में खर्च हो रही थी और आर्थिक स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी।
बीमार पति की देखभाल की जिम्मेदारी के चलते सुनीता के लिए घर से बाहर जाकर नौकरी करना भी मुमकिन नहीं था। ऐसे मुश्किल वक्त में अक्सर लोग टूट जाते हैं, लेकिन सुनीता ने हार मानने के बजाय समाधान खोजने का फैसला किया। उन्होंने सोचा कि क्यों न घर पर रहकर ही कुछ ऐसा किया जाए जिससे आमदनी भी हो जाए और पति की सेवा भी जारी रहे।
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छत बनी खेत: लकड़ी के बक्सों में शुरू हुई खेती
सुनीता देवी के पास ज़मीन का टुकड़ा भले ही नहीं था, लेकिन उनके पास अपने घर की एक पक्की छत थी। यहीं से उनके दिमाग में एक क्रांतिकारी विचार आया—अपनी छत को ही ‘मिनी-फार्म’ बनाने का। उन्होंने घर की छत पर लकड़ी के बक्से (Boxes) बनाए, उनमें मिट्टी भरी और सब्जियों की पनीरी (Nursery) तैयार करना शुरू कर दिया।
सीमित संसाधन कभी बड़े सपनों को रोक नहीं सकते। सुनीता देवी ने 5वीं पास होने के बावजूद, अपनी छत को ही अपनी किस्मत बदलने का जरिया बना लिया।
सीमित संसाधन कभी बड़े सपनों को रोक नहीं सकते। सुनीता देवी ने 5वीं पास होने के बावजूद, अपनी छत को ही अपनी किस्मत बदलने का जरिया बना लिया।
यह प्रयोग छोटा था, लेकिन उनकी मेहनत और लगन ने इसे बड़ा बना दिया। उन्होंने छत पर गोभी, ब्रोकली, बंद गोभी, करेला, खीरा, प्याज और घीया जैसी सब्जियों की बेहतरीन गुणवत्ता वाली पौध तैयार की। गाँव के लोग, जो पहले पनीरी खरीदने बाज़ार जाते थे, अब सुनीता देवी के पास आने लगे क्योंकि उनकी पौध की क्वालिटी बहुत अच्छी थी। देखते ही देखते, केवल छत की नर्सरी बेचकर उनकी सालाना आय 1 लाख रुपये तक पहुँच गई।
सफलता की उड़ान: ₹1 लाख से ₹3.5 लाख तक का सफर
सफलता का पहला स्वाद चखने के बाद सुनीता का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर था। पनीरी से हुई कमाई और सरकारी सहायता का उपयोग करके उन्होंने थोड़ी ज़मीन लीज (किराये) पर ली। यहाँ उन्होंने रसायनों वाली खेती को त्यागकर ‘प्राकृतिक खेती’ (Natural Farming) की शुरुआत की।
आज की तारीख में, अपनी छत की नर्सरी और लीज पर ली गई ज़मीन को मिलाकर, सुनीता देवी की सालाना आय 3.5 लाख रुपये तक पहुँच चुकी है। जो महिला कभी पाई-पाई के लिए मोहताज थी, आज वह अपने परिवार को एक खुशहाल और सम्मानजनक जीवन दे रही है।
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एक किसान से बनीं ‘मास्टर ट्रेनर’
सुनीता देवी की सफलता अब सिर्फ उनके गाँव तक सीमित नहीं है। वह अब एक ‘रोल मॉडल’ बन चुकी हैं। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) सुंदरनगर के माध्यम से, हिमाचल प्रदेश के विभिन्न कृषि संस्थानों के 300 से अधिक छात्र उनसे ‘टेरेस गार्डनिंग’ और पनीरी उगाने के गुर सीखने आते हैं।
सुनीता अब सिर्फ एक सफल किसान नहीं, बल्कि एक प्रशिक्षक (Trainer) हैं जो नई पीढ़ी को आत्मनिर्भर बनना सिखा रही हैं। उनका यह सफर बताता है कि डिग्री से ज्यादा अनुभव और इच्छाशक्ति मायने रखती है।

जब सरकार और मंत्रियों ने किया सलाम
सुनीता देवी के इस जज्बे को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है, उन्हे कई बार और उन्हें सम्मानित भी किया गया। जैसे ‘महिला किसान दिवस’ के मौके पर केंद्रीय मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने उनसे वर्चुअली बातचीत की और उनके मॉडल की खुलकर तारीफ की। वही कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कुलपति (VC) ने खुद उनके घर जाकर उन्हें सम्मानित किया, जो किसी भी किसान के लिए गर्व की बात है। इसके अलावा वहाँ के स्थानीय प्रशासन नाचन जनकल्याण सेवा समिति और सुंदरनगर प्रशासन ने भी उन्हें कई बार पुरस्कृत किया है।
अपनी इस सफलता का श्रेय सुनीता देवी प्रदेश सरकार और कृषि विभाग को देती हैं, जिन्होंने समय-समय पर उन्हें तकनीकी जानकारी और मदद दी। सुंदरनगर के उपायुक्त अरिंदम चौधरी का भी कहना है कि प्रशासन ऐसी मेहनती महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
सुनीता देवी की कहानी हमें यह सबसे बड़ा सबक देती है कि शुरुआत करने के लिए आपको बहुत सारी ज़मीन या करोड़ों रुपयों की ज़रूरत नहीं है। ज़रूरत है तो बस एक सही विचार (Idea) और कभी न हार मानने वाले जज्बे की। सीमित संसाधन कभी भी बड़े सपनों को रोक नहीं सकते।

