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Khudiram Bose Story: जब जज को बोले वक्त मिले तो आपको भी बम बनाना सिखा दूं!

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“एक बार बिदाय दे माँ, घुरे आशि… हाशि हाशि पोरबो फांशी, देखबे भारतबाशी।”

ये पंक्तियां बंगाल के मशहूर कवि पीतांबर दास ने एक 18 साल के युवा क्रांतिकारी की शहादत को नमन करते हुए लिखी थीं। जिसका अर्थ है— “माँ, मुझे एक बार विदाई दे, मैं फिर लौटकर आऊंगा… मैं हंसते-हंसते फांसी का फंदा पहन लूंगा और पूरा भारत मुझे देखेगा।”

साल था 1908, अगस्त का महीना और तारीख थी 11। सुबह के 6 बज रहे थे। कुछ अंग्रेज सिपाही एक 18 साल के युवा को फांसी के तख्ते की तरफ ले जा रहे थे। जेल के उस गलियारे की कोठरियों में बंद अन्य सभी साथी नम आंखों से उसे विदाई दे रहे थे। लेकिन 18 साल का वह युवा मुस्कुराते हुए चेहरे के साथ बेखौफ आगे बढ़ रहा था। जब उसे फांसी के तख्ते पर चढ़ाया गया, तो उसके हाथ में भगवद्गीता थी और उसी ऐतिहासिक मुस्कान के साथ उसने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।

और इस तरह, 18 साल के उस युवा— खुदीराम बोस (Khudiram Bose Story) ने हमेशा के लिए भारत के इतिहास के सबसे सुनहरे पन्नों में अपना नाम अमर कर दिया।

खुदीराम बोस कौन थे?

Khudiram Bose Story Young Freedom Fighter Portrait
Khudiram Bose Story:Original photo of Freedom Fighter khudiram bose

खुदीराम बोस को आजादी की लड़ाई में फांसी पर चढ़ने वाला सबसे कम उम्र का क्रांतिकारी माना जाता है। खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में कायस्थ परिवार में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। उनके सिर से बहुत छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उठ गया था। जिसके बाद उनकी बड़ी बहन अपरूपा रॉय ने उनका पालन-पोषण किया।

बचपन से ही आजादी के जुनून में इतना रम गए थे कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। महज 15 साल की उम्र में खुदीराम बोस ‘अनुशीलन समिति’ नाम के एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए।

वे इतनी छोटी उम्र में ही ब्रिटिश राज के खिलाफ पर्चे बांटने, बम बनाने की कला सीखने और पुलिस की नाक के नीचे से हथियार सप्लाई करने के काम में माहिर हो चुके थे। 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर भाग लिया था।

अंग्रेजी हुकूमत की नाक में दम करने वाले वो शुरुआती हमले

फरवरी 1906 के आस-पास खुदीराम बोस अंग्रेजों के नजर मे आने लग गए थे जब पहली बार उसने मिदनापुर में हो रहे एक औद्योगिकऔर कृषि प्रदर्शनी में क्रांतिकारी सत्येंद्रनाथ द्वारा लिखे गए ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पर्चे बांटने शुरू किया। उसी समय एक पुलिस वाले ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी सिपाही के मुंह पर जोरदार घूंसा मारा और बचे हुए पर्चे बगल में दबाकर फरार हो गए। बाद में उन पर राजद्रोह का मुकदमा चला, लेकिन गवाही न मिलने के कारण वे निर्दोष साबित हुए।

इसके बाद से गिरफ़्तारी और हमला का सिलसिला चलता रहा। 6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर बच गया। सन 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले।

किंग्सफोर्ड की हत्या करने का बनाया प्लान

मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रान्तिकारियों की गुप्त संस्था के से खुदीराम पहले ही में जुट चुके थे। लेकिन जब 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया जिससे विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट पद पर आसीन किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। 

इस घटना ने देश्वसियों को विचलित कर दिया जिसके बाद ‘युगान्तर’ समिति कि एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को ही मारने का निश्चय हुआ और इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया।

योजना के अनुसार 18 अप्रैल 1908 को खुदीराम और उनका एक साथी मुजफ्फरपुर के जज किंग्सफोर्ड जिसका तबादला कलकत्ता से मुजफ्फरपुर हुआ था, को मारने के लिए मुजफ्फरपुर निकल पड़े। दोनों ने मिलकर तय किया कि किंग्सफोर्ड जब बग्घी से वापस आएगा, तभी बम फेंक देंगे।

रात में साढ़े आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अँधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बँगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आने वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका। 

यूँ तो खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाड़ी समझकर बम फेंका था परन्तु उस दिन किंग्जफोर्ड थोड़ी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। और जिस बग्गी पर खुदीराम ने बम फेंका उसमें दो महिलाएं सवार थीं, जिनमें से एक की इस हमले में मौत हो गई। 

इसी घटना के चलते खुदीराम बोस को 1 मई 1908 को गिरफ्तार कर लिया गया था। बता दें, हत्या के इस मुकदमे के बाद अदालत ने खुदीराम को फांसी की सजा सुनाई।

Khudiram Bose under guard in1908 for the murder of two Englishwomen with a homemade bomb

जज से बोले- आपको भी बम बनाना सिखा दूं?

गिरफ्तारी के बाद खुदीराम बोस पर हत्या का मुकदमा चला। अदालत खचाखच भरी थी। जब जज ने इस 18 साल के लड़के को फांसी की सजा सुनाई, तो पूरे कोर्ट रूम में मौत का सन्नाटा छा गया। लेकिन कठघरे में खड़ा खुदीराम… वह मुस्कुरा रहा था!

जज को लगा कि शायद इस कम उम्र के लड़के को अपनी सजा की गंभीरता समझ नहीं आई है। हैरान होकर जज ने पूछा, “क्या तुम्हें पता है कि इस सजा का मतलब क्या है?” खुदीराम ने बेखौफ होकर जो जवाब दिया, वो आज भी इतिहास के पन्नों में गूंजता है। उन्होंने कहा:

“इस सजा और मुझे बचाने के लिए मेरे वकील साहब की दलील दोनों का मतलब अच्छी तरह से जानता हूं। मेरे वकील साहब ने कहा है कि मैं अभी कम उम्र का हूं। इस उम्र में बम नहीं बना सकता। जज साहब मेरी आपसे गुजारिश है कि आप खुद मेरे साथ चलें। मैं आपको भी बम बनाना सिखा दूंगा।”

अदालत ने खुदीराम बोस को फांसी की सजा सुनाने के साथ ऊपर की अदालत में अपील का वक्‍त भी दिया। हालांकि, ऊपरी अदालतों ने मुजफ्फरपुर की अदालत के फैसले पर ही मुहर लगाई। ऐसे में, 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दे दी गई।

कैसे पड़ा खुदीराम बोस का नाम?

खुदीराम बोस (Khudiram Bose Story) के जन्म से पहले उनके दो भाइयों की बीमारी की चलते मृत्यु हो गई थी। उस दौर में बंगाल में एक मान्यता थी कि अगर नवजात बच्चे को उसकी बड़ी बहन कुछ मुट्ठी ‘खुदी’ यानि चावल के टूटे हुए दाने या कण के बदले खरीद ले, तो बच्चे पर मंडराता अकाल मृत्यु का साया टल जाता है। उनकी बहन ने उन्हें तीन मुट्ठी ‘खुदी’ देकर खरीदा था, इसीलिए इस बच्चे का नाम ‘खुदीराम’ पड़ गया।

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