देव आनंद… हिंदी सिनेमा का एक ऐसा नाम जो अपनी तिरछी चाल, अलग ‘स्टाइल’ और सदाबहार रोमांस के लिए जाना जाता था। उनकी दीवानगी का आलम यह था कि एक दौर में यह अफवाह भी उड़ गई थी कि देव आनंद के काले कोट पहनने पर पाबंदी लगा दी है, क्योंकि उन्हें देखकर लड़कियां बेसुध हो जाती थीं। हालांकि ये पूरी तरह से एक अफवाह थी लेकिन वो एक ऐसे सितारे थे जो पर्दे पर सिर्फ प्यार, खूबसूरती और जीने की कला की बात करते थे। लेकिन 1975 में, जब देश में इमरजेंसी लगी और बड़े-बड़े नेताओं को जेल में डाला जा रहा था,फिल्म जगत के दिग्गज कलाकार सत्ता के सामने घुटने टेक रहे थे, तब देव आनंद ने न सिर्फ इंदिरा गांधी सरकार के आदेश को ठुकराया, बल्कि अपनी खुद (Dev anand political Party) की ‘National Party of India’ बनाकर दिल्ली की सत्ता को सीधी चुनौती दे दी थी।
जब देव आनंद ने ‘जी हुजूरी’ करने से मना कर दिया
यह 1975 का दौर था। देश में आपातकाल लागू था और प्रेस पर सेंसरशिप थी और अदालतों के हाथ बंधे थे। उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री थे विद्या चरण शुक्ल, जो संजय गांधी के बेहद करीबी थे जिनका काम था सरकार की छवि को सुधारना। इस छवि को सुधारने के लिए इमरजेंसी की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद, इंदिरा गांधी ने देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ’20-सूत्रीय कार्यक्रम’ कार्यक्रम का ऐलान किया था।

जिसमे बढ़ती महंगाई और कीमतों पर रोक लगाना, जमाखोरों और तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई, भूमिहीनों को जमीन देना और बंधुआ मजदूरी खत्म करना, छात्रों के लिए सस्ती किताबें और हॉस्टल का इंतजाम जैसे मुद्दे शामिल थे। सरकार का तर्क था कि इमरजेंसी इसलिए लगाई गई है ताकि इन 20 कामों को बिना किसी रुकावट के पूरा किया जा सके। सरकार चाहती थी कि फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारे रेडियो और टेलीविजन पर आकर सरकार की नीतियों और ’20-सूत्रीय कार्यक्रम’ की तारीफ करें।
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जब देव आनंद के फिल्मों और गानों पर लगे बैन
फिल्मी जगत के कई दिग्गजों ने दबाव में आकर सरकार का समर्थन किया। अधिकारियों ने देव आनंद से भी संपर्क किया, उनसे कहा गया कि वे टीवी और रेडियो पर आकर इस 20-सूत्रीय कार्यक्रम की तारीफ करें और जनता से इसका समर्थन करने की अपील करें, साथ ही यूथ कांग्रेस की रैली में शामिल हों और इमरजेंसी के पक्ष में बोलें। उनका कहना था, “मैं एक कलाकार हूं, मेरा काम अभिनय करना है। मैं किसी राजनीतिक एजेंडे का प्रोपेगेंडा टूल नहीं बन सकता।”
देव आनंद का वह ‘इंकार’ सूचना और प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ल को नागवार गुजरा। उस समय हालत ऐसे थे कि सत्ता को ‘ना’ सुनने की आदत नहीं थी। इसका खामियाजा देव आनंद को तुरंत भुगतना पड़ा। दूरदर्शन, जो उस समय मनोरंजन का एकमात्र साधन था, वहां से देव आनंद की फिल्में गायब हो गईं। आकाशवाणी (AIR) पर उनके इंटरव्यू और कार्यक्रमों के प्रसारण पर रोक लगा दी गई। इसी समय देव आनंद की ‘आवाज’ माने जाने वाले महान गायक किशोर कुमार ने भी सरकार के लिए गाने से मना कर दिया था। नतीजा यह हुआ कि ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर किशोर कुमार के गानों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
यह वह दौर था जब सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत कम ही लोग जुटा पाते थे। लेकिन इस दबाव ने देव आनंद एक एक्टिविस्ट के रूप मे उभरे। इमरजेंसी हटने के बाद 1977 के चुनावों में उन्होंने खुलकर जनता पार्टी का प्रचार किया और इंदिरा गांधी की हार में एक अहम भूमिका निभाई।

जब देव आनंद ने बनाई अपनी पार्टी: National Party of India
कहानी में असली मोड़ तब आया जब 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार—जिसके लिए देव आनंद ने जी-जान से प्रचार किया था—महज दो साल के भीतर आपसी कलह के कारण गिर गई। 1979 आते-आते देश में फिर से चुनाव की आहट सुनाई देने लगी। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम थी कि इंदिरा गांधी की वापसी अब तय है। यह देव आनंद के लिए एक बड़ा झटका था। उन्हें महसूस हुआ कि जिन नेताओं पर उन्होंने भरोसा किया था, वे देश की सेवा करने के बजाय कुर्सी की लड़ाई में उलझे हुए हैं।
देव आनंद ने तय किया कि अब वे किसी नेता का समर्थन नहीं करेंगे, बल्कि खुद विकल्प (Dev anand political Party) बनेंगे। 1979 में उन्होंने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी ‘National Party of India’ (NPI) लॉन्च की। उनके इस फैसले में फिल्म इंडस्ट्री के कई दिग्गज, बुद्धिजीवी और समाज के प्रबुद्ध लोग उनके साथ जुड़ गए। उनका लक्ष्य साफ था, पेशेवर राजनेताओं को हटाकर ईमानदार और गैर-राजनीतिक लोगों को संसद में भेजना। मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क में पहली रैली आयोजित की गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस दिन पार्क में पैर रखने की जगह नहीं थी। लाखों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। उस विशाल जनसभा में देव आनंद ने माइक थामते हुए जनता से जो अपील की, उन्होंने कहा था: “मैं यहां सत्ता पाने नहीं, व्यवस्था बदलने आया हूं।”
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जब देव आनंद को भंग करना पड़ा अपनी पार्टी
हालांकि, ‘नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया’ का यह सफर बहुत लंबा नहीं चला। देव आनंद एक भावुक कलाकार थे, उन्हें जल्द ही एहसास हो गया कि रैलियों में उमड़ने वाली वह लाखों की भीड़ उनके ‘विचारों’ को सुनने नहीं, बल्कि उनके झलक पाने आती है। कुछ समय बाद उन्होंने पार्टी भंग कर दी और यह कहते हुए पीछे हट गए कि “मैं अपनी फिल्मों के जरिए ही लोगों के दिलों में रहना पसंद करूंगा।”
देव आनंद अक्सर कहा करते थे, “मैं अतीत में नहीं जीता, मैं भविष्य की सोचता हूं।” उनका राजनीतिक सफर भारतीय इतिहास का एक छोटा अध्याय जरूर था, लेकिन वह बेहद दमदार था। 1975 के उस अंधेरे दौर में, जब जुबानें खामोश थीं और ‘जी हुजूरी’ का दौर था, देव आनंद का वह ‘इंकार’ किसी भी फिल्मी डायलॉग से ज्यादा वजनदार था। उनकी ‘नैशनल पार्टी ऑफ इंडिया‘ भले ही इतिहास के पन्नों में खो गई हो, लेकिन उनका वह साहस और ‘व्यवस्था बदलने’ की वह कोशिश आज भी भारतीय लोकतंत्र की एक मिसाल है।
