अटल बिहारी वाजपेयी भारत के इकलौते ऐसे नेता थे, जिनके मुरीद सिर्फ उनके समर्थक ही नहीं, बल्कि उनके धुर विरोधी भी थे। पंडित नेहरू उनमें ‘भविष्य का प्रधानमंत्री’ देखते थे, तो इंदिरा गांधी भी संसद में उनकी भाषण शैली की कायल थीं। कहा जाता है कि जब वो बोलते थे, तो सत्ता पक्ष भी सांसें थामकर सुनता था। उनकी शालीनता और शब्दों की पूरी दुनिया दीवानी थी। लेकिन 1973 की एक सुबह, दिल्ली की सड़कों पर एक ऐसा नजारा दिखा जिसने सबको चौंका दिया। हमेशा अपनी कार और सुरक्षा के तामझाम के साथ चलने वाला यह कद्दावर नेता, उस दिन एक ‘बैलगाड़ी’ पर सवार होकर संसद (Atal Bihari Vajpayee Bullock Cart Protest 1973) पहुंचा था, जिसने न सिर्फ दिल्ली के सत्ता के गलियारों में हलचल मचाया था, बल्कि पूरी दुनिया की नजरें अपनी ओर खींच ली थीं।

जब ‘चवन्नी-अठन्नी’ के हिसाब से बढ़ा पेट्रोल का दाम
यह नवंबर 1973 का समय था। उस दौर में पेट्रोल की कीमत महज 0.90 पैसे के आसपास हुआ करती थी। और उस दौर में पेट्रोल की कीमतें चवन्नी-अठन्नी के हिसाब से बढ़ा करती थीं। भारत में उस समय इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की सरकार थी, अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते सरकार ने पेट्रोल और मिट्टी के तेल (Kerosene) की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की घोषणा कर दी। जो अब 1.50 रुपये के आस पास यानि 80% की बढ़ोतरी की गई थी। जिसका नतीजा ये हुआ कि बस और टैक्सी के किरायों में तुरंत उछाल आ गया, उस समय कई घरों में खाना पकाने के लिए मिट्टी के तेल (Kerosene) का इस्तेमाल होता था, उसके दाम बढ़ने से रसोइयों का बजट बिगड़ गया। और वही जो मध्यम वर्गीय परिवार स्कूटर या मोटरसाइकिल खरीदने का सपना देख रहे थे, उन्हें डर सताने लगा कि अगर सरकार ने ऐसे ही दाम बढ़ाए, तो गाड़ियां चलाना सिर्फ रईसों का शौक बनकर रह जाएगा।
क्यों बढ़ाई थी इंदिरा गांधी ने कीमत?
हालांकि इंदिरा गांधी सरकार द्वारा दाम बढ़ाने का फैसला अचानक नहीं लिया गया था। अक्टूबर 1973 में अरब देशों और इजरायल के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ गया था, जिसे ‘योम किप्पुर युद्ध’ (Yom Kippur War) कहते हैं। इस युद्ध में अमेरिका और पश्चिमी देश खुलकर इजरायल का साथ दे रहे थे। इससे नाराज होकर अरब देशों के संगठन OPEC (जिसमें सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश शामिल थे) ने एक़ा फैसला लिया कि वे उन देशों को तेल नहीं बेचेंगे जो इजरायल की मदद कर रहे हैं, और बाकी दुनिया के लिए भी तेल का उत्पादन कम कर देंगे। जिसका परिणाम ये हुआ कि रातों-रात अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं और दुनिया भर में तेल के दाम 400% तक बढ़ गए।

भारत उस समय भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात (Import) करता था। जिससे तेल खरीदने के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता था। दाम बढ़ने से भारत का खजाना (Foreign Exchange Reserves) तेजी से खाली होने लगा। इंदिरा गांधी सरकार को लगा कि अगर देश में पेट्रोल-डीजल सस्ता रहा, तो लोग इसका इस्तेमाल कम नहीं करेंगे और देश का पैसा विदेश जाता रहेगा। इसलिए, खपत (Consumption) को घटाने के लिए सरकार ने जानबूझकर कीमतों में भारी बढ़ोतरी कर दी। इसी बात ने विपक्ष को सरकार को घेरने का एक बड़ा मौका दे दिया।
यह भी पढ़ें: कैसे एक स्कूल मास्टर का बेटा बना देश का सबसे चहेता प्रधानमंत्री? अटल बिहारी वाजपेयी की कहानी
जब संसद के बाहर खड़ी हो गई बैलगाड़ी
12 नवंबर 1973 को संसद का शीतकालीन सत्र (Winter Session) शुरू होने वाला था। दिल्ली का विजय चौक और संसद भवन का इलाका, जो आमतौर पर काले रंग की सरकारी एम्बेसडर कारों और सुरक्षा सायरनों से गूंजता था, उस दिन वह सड़क खामोश था। लेकिन कुछ ही देर बाद यह खामोशीनारों में बदल गई। लोगों ने देखा कि संसद भवन की तरफ एक बैलगाड़ी (Bullock Cart Protest) चली आ रही है। बैलगाड़ी पर जनसंघ के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी और उनके साथी नानाजी देशमुख (Nanaji Deshmukh) सवार थे और उनके पीछे जनसंघ के सैकड़ों कार्यकर्ता साइकिलों पर चल रहे थे। यह दृश्य अपने आप में एक तंज था—कि सरकार ने पेट्रोल इतना महंगा कर दिया है कि अब देश वापस बैलगाड़ी और साइकिल के युग में पहुंच गया है।
अटल जी का वो व्यंग्य जिसने सरकार को निरुत्तर कर दिया
जैसे ही यह काफिला संसद भवन के मुख्य गेट पर पहुंचा, वहां तैनात सुरक्षाकर्मी और पुलिसवाले भी हक्के-बक्के रह गए। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा, तो अटल जी ने मुस्कुराते हुए अपनी वाकपटुता (Wit) का परिचय दिया। उन्होंने कहा,
“इंदिरा जी के राज में पेट्रोल और मिट्टी का तेल इतना महंगा हो गया है कि एक आम आदमी के लिए कार तो छोड़िए, स्कूटर चलाना भी मुश्किल है। इसलिए, मैं बैलगाड़ी से संसद आया हूं ताकि सरकार को जमीनी हकीकत दिखा सकूं।”
अटल जी का बैलगाड़ी पर बैठकर संसद जाना महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि इंदिरा गांधी की सरकार पर कसा गया सबसे बड़ा व्यंग्य (Atal Bihari Vajpayee Bullock Cart Protest 1973) था।
यह घटना भारतीय राजनीति में विरोध प्रदर्शन के तरीके में एक ‘टर्निंग पॉइंट’ साबित हुई। इससे पहले विरोध का मतलब अक्सर रैलियां या भाषण होते थे। लेकिन अटल जी ने ‘सिम्बॉलिक प्रोटेस्ट’ (प्रतीकात्मक विरोध) की ताकत दिखाई। अगले दिन अखबारों के पहले पन्ने पर अटल जी की बैलगाड़ी वाली तस्वीर (Atal Bihari Vajpayee Bullock Cart Protest 1973) छपी। इस एक तस्वीर ने इंदिरा गांधी सरकार को बैकफुट पर ला दिया। इसने जनता को यह महसूस कराया कि विपक्ष उनकी तकलीफ को समझता है। हालांकि कीमतें तुरंत कम नहीं हुईं, लेकिन इस घटना ने अटल बिहारी वाजपेयी की छवि एक ऐसे नेता के रूप में मजबूत की, जो जमीन से जुड़ा है और जिसका विरोध करने का तरीका भी बेहद रचनात्मक (Creative) था ।
कहानी को विडिओ मे देखें:
आज की राजनीति में जहां विरोध अक्सर निजी हमलों और सोशल मीडिया तक सिमट गया है, 1973 का वह दिन याद दिलाता है कि हास्य और व्यंग्य भी राजनीति के शक्तिशाली हथियार हो सकते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी ने बैलगाड़ी पर बैठकर जो संदेश दिया, वह संसद की किसी भी लंबी बहस से ज्यादा असरदार था। वह तस्वीर आज भी भारतीय लोकतंत्र की सबसे यादगार तस्वीरों में से एक है।

