हर साल 1 जुलाई को पूरा भारत नेशनल डॉक्टर्स डे (National Doctors’ Day) मनाता है। अस्पतालों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, डॉक्टरों को सम्मानित किया जाता है और सोशल मीडिया पर लाखों लोग उन्हें धन्यवाद देते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस तारीख का संबंध केवल डॉक्टरों से नहीं, बल्कि एक ऐसे महान व्यक्तित्व से है जिसने चिकित्सा, शिक्षा, राजनीति और राष्ट्र निर्माण—चारों क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी।
यह तारीख भारत रत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की स्मृति में चुनी गई है। संयोग ऐसा कि 1 जुलाई 1882 को उनका जन्म हुआ और ठीक 80 वर्ष बाद, 1 जुलाई 1962 को उन्होंने इसी दिन अंतिम सांस ली। शायद इसी कारण उनका जीवन सेवा, कर्तव्य और समर्पण का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया। डॉ. रॉय केवल एक प्रसिद्ध चिकित्सक नहीं थे। वे महात्मा गांधी के निजी चिकित्सक रहे, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने, आधुनिक शहर बसाए, अस्पतालों की स्थापना कराई और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नई दिशा दी। आज भी उन्हें आधुनिक भारत के सबसे महान डॉक्टरों में गिना जाता है।
बचपन से मिले संस्कारों ने तय कर दिया जीवन का लक्ष्य
डॉ. बिधान चंद्र रॉय का जन्म बिहार के पटना (तत्कालीन बांकीपुर) में एक शिक्षित बंगाली परिवार में हुआ था। उनके पिता प्रकाश चंद्र रॉय सरकारी सेवा में एक्साइज इंस्पेक्टर थे, जबकि उनकी माता अघोरकामिनी देवी समाज सेवा के लिए जानी जाती थीं। परिवार ब्रह्म समाज की विचारधारा से प्रभावित था, जहां शिक्षा, अनुशासन और मानव सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। बचपन से ही उन्होंने देखा कि दूसरों की मदद करना केवल एक आदत नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। यही सोच आगे चलकर उनके पूरे व्यक्तित्व की पहचान बन गई।
एक वाक्य जिसने पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी
गणित में स्नातक करने के बाद उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया। यहीं कॉलेज की एक दीवार पर लिखा एक वाक्य उनके जीवन का मूल मंत्र बन गया, “जो भी काम करो, अपनी पूरी शक्ति से करो।” उन्होंने इस एक वाक्य को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जीवनभर उसे अपनाया। बाद में चाहे मरीजों का इलाज हो, चिकित्सा शिक्षा हो या प्रशासनिक जिम्मेदारी—हर जगह यही सिद्धांत उनके काम में दिखाई दिया।
30 बार अस्वीकृति… फिर भी हार नहीं मानी
आज अधिकांश लोग दो-तीन असफलताओं के बाद अपने सपने छोड़ देते हैं। लेकिन डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने दुनिया को धैर्य और दृढ़ संकल्प का ऐसा उदाहरण दिया, जिसे आज भी याद किया जाता है। वे इंग्लैंड के प्रतिष्ठित St. Bartholomew’s Hospital Medical College में उच्च चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। उस समय भारतीय छात्रों को प्रवेश मिलना बेहद कठिन था।
उन्होंने आवेदन भेजा। अस्वीकृत हो गया। फिर भेजा। फिर अस्वीकृत। ऐसा एक-दो नहीं, बल्कि लगभग 30 बार हुआ। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार कॉलेज के डीन उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने प्रवेश देने का निर्णय लिया। यह केवल एक छात्र की जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय आत्मविश्वास की जीत थी।
MRCP और FRCS… एक साथ हासिल करने वाले भारतीयों में शामिल
इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान डॉ. रॉय ने असाधारण मेहनत की। उन्होंने बेहद कम समय में MRCP (Member of the Royal College of Physicians) और FRCS (Fellow of the Royal College of Surgeons) जैसी प्रतिष्ठित चिकित्सकीय योग्यताएं प्राप्त कर लीं। उस दौर में इन दोनों डिग्रियों को साथ हासिल करना अत्यंत कठिन माना जाता था। यही उपलब्धि उन्हें दुनिया के श्रेष्ठ चिकित्सकों की श्रेणी में ले गई।
विदेश में करियर छोड़कर लौट आए भारत
विदेश में उज्ज्वल भविष्य उनका इंतजार कर रहा था। लेकिन उन्होंने वहां बसने के बजाय भारत लौटने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि यदि भारत को आगे बढ़ाना है, तो देश को अच्छे डॉक्टरों, मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की जरूरत है। भारत लौटने के बाद उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज, कारमाइकल मेडिकल कॉलेज सहित कई संस्थानों में अध्यापन किया और हजारों विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा दी।
डॉक्टर ही नहीं, स्वास्थ्य व्यवस्था के निर्माता भी थे
डॉ. रॉय केवल मरीजों का इलाज करके संतुष्ट नहीं थे। वे चाहते थे कि देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार हो। उनके प्रयासों से कई महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना और विकास हुआ, जिनमें—
- चित्तरंजन सेवा सदन
- चित्तरंजन कैंसर अस्पताल
- जादवपुर टीबी अस्पताल
- कमला नेहरू मेमोरियल अस्पताल
- विक्टोरिया इंस्टीट्यूशन
जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं। विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की चिकित्सा सुविधाओं के विकास में उनका योगदान ऐतिहासिक माना जाता है।
महात्मा गांधी के पूछे वो सवाल, जिसका जवाब इतिहास बन गया
डॉ. बिधान चंद्र रॉय महात्मा गांधी के निजी चिकित्सकों में शामिल थे। 1933 में गांधीजी उपवास पर थे और उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी। डॉ. रॉय उनका इलाज करना चाहते थे, लेकिन गांधीजी ने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा, “मैं आपका इलाज क्यों कराऊं? क्या आप मेरे देश के चालीस करोड़ लोगों का मुफ्त इलाज करते हैं?”
यह प्रश्न किसी भी डॉक्टर को निरुत्तर कर सकता था। लेकिन डॉ. रॉय ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “बापू, मैं आज केवल मोहनदास करमचंद गांधी का इलाज नहीं कर रहा। मैं उस व्यक्ति का इलाज कर रहा हूं, जो पूरे भारत के करोड़ों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।” कहा जाता है कि यह उत्तर सुनने के बाद गांधीजी ने उनका उपचार स्वीकार कर लिया। यह संवाद केवल डॉक्टर और मरीज के बीच नहीं था, बल्कि सेवा और राष्ट्रभक्ति की भावना का अद्भुत उदाहरण था।
राजनीति में आए, लेकिन डॉक्टर की पहचान कभी नहीं छोड़ी
साल 1925 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा। उन्होंने चुनाव लड़कर उस समय के वरिष्ठ नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को हराया और सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने। बाद में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, कोलकाता नगर निगम, कोलकाता विश्वविद्यालय और अनेक सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़े। कोलकाता के मेयर रहते हुए उन्होंने—
- मुफ्त प्राथमिक शिक्षा
- सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
- स्वच्छ पेयजल
- बेहतर सड़कें
- नगर प्रशासन में सुधार
जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य किए। उनकी सोच स्पष्ट थी—स्वस्थ नागरिक ही मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री बनने से पहले क्यों कर दिया था साफ इनकार?
1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन पश्चिम बंगाल के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा था। विभाजन के कारण लाखों शरणार्थी राज्य में आ चुके थे। सांप्रदायिक तनाव, बेरोजगारी, आवास की कमी और आर्थिक संकट ने प्रशासन को कमजोर कर दिया था। ऐसे समय में कांग्रेस नेतृत्व चाहता था कि डॉ. बिधान चंद्र रॉय राज्य की कमान संभालें। लेकिन उन्होंने शुरुआत में यह जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि वे राजनीति से अधिक चिकित्सा सेवा में योगदान देना चाहते हैं।
कहा जाता है कि महात्मा गांधी ने उनसे कहा कि अब देश को अस्पताल में बैठे डॉक्टर से ज्यादा प्रशासन संभालने वाले सेवक की जरूरत है। गांधीजी के आग्रह के बाद उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार की। 23 जनवरी 1948 को वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और अगले 14 वर्षों तक राज्य का नेतृत्व किया। उनके कार्यकाल को आधुनिक पश्चिम बंगाल की नींव रखने वाला दौर माना जाता है।
जिसने केवल अस्पताल नहीं बनाए, बल्कि पूरे शहर बसा दिए
मुख्यमंत्री बनने के बाद डॉ. रॉय ने केवल प्रशासन नहीं चलाया, बल्कि भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए योजनाबद्ध विकास पर जोर दिया। उनकी दूरदृष्टि के कारण पश्चिम बंगाल में कई नए नगरों का विकास हुआ। इनमें प्रमुख हैं—
- बिधाननगर (सॉल्ट लेक)
- कल्याणी
- दुर्गापुर
- अशोकनगर-कल्याणगढ़
इन शहरों का उद्देश्य केवल नई बस्तियां बसाना नहीं था, बल्कि विभाजन के बाद आए लाखों विस्थापित लोगों को सम्मानजनक जीवन और रोजगार उपलब्ध कराना भी था। आज ये शहर पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुके हैं।
IIT खड़गपुर की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई
भारत को आजादी मिलने के बाद तकनीकी शिक्षा को मजबूत बनाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। डॉ. बिधान चंद्र रॉय उन नेताओं में थे जिन्होंने इस दिशा में गंभीर पहल की। उन्होंने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पश्चिम बंगाल में एक विश्वस्तरीय तकनीकी संस्थान स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। इसी सोच का परिणाम था आईआईटी खड़गपुर, जो आज भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थानों में गिना जाता है। उनका मानना था कि किसी भी राज्य का भविष्य केवल उद्योगों से नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अनुसंधान से तय होता है।
भारत रत्न मिला… लेकिन जीवनशैली नहीं बदली
डॉ. बिधान चंद्र रॉय के योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1961 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। लेकिन सम्मान मिलने के बाद भी उनके जीवन में कोई विशेष बदलाव नहीं आया। वे पहले की तरह मरीजों का इलाज करते रहे, सरकारी बैठकों में शामिल होते रहे और जनता की समस्याएं सुनते रहे। उनके लिए पुरस्कार कभी लक्ष्य नहीं थे। उनका मानना था कि सबसे बड़ा सम्मान जनता का विश्वास होता है।
अपना घर भी समाज सेवा के लिए दान कर दिया
डॉ. रॉय का जीवन सादगी और सेवा का उदाहरण था। उन्होंने अपना निजी आवास भी चिकित्सा सेवा के लिए समर्पित कर दिया, ताकि वहां लोगों के इलाज की व्यवस्था की जा सके। यह निर्णय बताता है कि उनके लिए निजी संपत्ति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण समाज का हित था।
1 जुलाई… जिस दिन जन्म और निधन
डॉ. बिधान चंद्र रॉय के जीवन का सबसे भावुक संयोग यही है कि उनका जन्म और निधन—दोनों 1 जुलाई को हुआ। 1 जुलाई 1882 को उन्होंने जन्म लिया। ठीक 80 वर्ष बाद, 1 जुलाई 1962 को उन्होंने अंतिम सांस ली। बताया जाता है कि अपने अंतिम दिन भी वे सामान्य दिन की तरह काम करते रहे। उन्होंने मरीजों को देखा, सरकारी फाइलें निपटाईं और दिनचर्या पूरी की। उनका पूरा जीवन अंत तक सेवा के लिए समर्पित रहा।
भारत में National Doctors’ Day की शुरुआत कब हुई?
डॉ. बिधान चंद्र रॉय के योगदान को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने 1991 से हर वर्ष 1 जुलाई को National Doctors’ Day के रूप में मनाने की परंपरा शुरू की। इस दिन केवल डॉ. रॉय को ही याद नहीं किया जाता, बल्कि देशभर के उन सभी डॉक्टरों को सम्मान दिया जाता है, जो अपने ज्ञान और सेवा से लाखों लोगों का जीवन बचाते हैं। यही कारण है कि भारत में 1 जुलाई केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि चिकित्सा सेवा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है।
डॉ. बिधान चंद्र रॉय हमें क्या सिखाते हैं?
डॉ. रॉय का जीवन हमें सिखाता है कि एक व्यक्ति यदि ज्ञान, ईमानदारी और सेवा को अपना उद्देश्य बना ले, तो वह समाज की दिशा बदल सकता है। उन्होंने कभी डॉक्टर होने पर गर्व नहीं किया, बल्कि डॉक्टर होने की जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया, शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार माना और चिकित्सा को मानवता की सबसे बड़ी सेवा समझा। इसी कारण आज भी उनका नाम केवल चिकित्सा इतिहास में नहीं, बल्कि भारत के महान राष्ट्रनिर्माताओं की सूची में भी सम्मान के साथ लिया जाता है।
निष्कर्ष
हर वर्ष जब हम 1 जुलाई को किसी डॉक्टर को धन्यवाद कहते हैं, तो हमें उस महान चिकित्सक को भी याद करना चाहिए, जिसकी स्मृति में यह दिन मनाया जाता है। डॉ. बिधान चंद्र रॉय ने यह साबित किया कि एक डॉक्टर केवल मरीजों का इलाज नहीं करता, बल्कि समाज, शिक्षा, प्रशासन और राष्ट्र के भविष्य को भी नई दिशा दे सकता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह प्रेरणा देता रहेगा कि असली महानता पद, प्रसिद्धि या पुरस्कार में नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा में होती है।
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FAQs
भारत में National Doctors’ Day कब मनाया जाता है?
भारत में हर वर्ष 1 जुलाई को National Doctors’ Day मनाया जाता है।
1 जुलाई को ही National Doctors’ Day क्यों मनाया जाता है?
यह दिन भारत रत्न डॉ. बिधान चंद्र रॉय की जयंती और पुण्यतिथि दोनों होने के कारण उनकी स्मृति में मनाया जाता है।
डॉ. बिधान चंद्र रॉय कौन थे?
वे भारत के प्रसिद्ध चिकित्सक, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद, पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और भारत रत्न सम्मानित महान व्यक्तित्व थे।
डॉ. बिधान चंद्र रॉय को भारत रत्न कब मिला?
उन्हें 1961 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।
National Doctors’ Day की शुरुआत कब हुई?
भारत सरकार ने 1991 से 1 जुलाई को National Doctors’ Day के रूप में मनाना शुरू किया।

