हर सफल बिजनेस के पीछे करोड़ों रुपये की पूंजी नहीं होती, बल्कि एक ऐसा संघर्ष होता है जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। हेल्थटेक कंपनी Healthians के संस्थापक दीपक साहनी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय ऐसा था जब उनके परिवार का चलता-फिरता कारोबार अचानक बंद हो गया और घर की आर्थिक स्थिति पूरी तरह बिगड़ गई। लेकिन उसी कठिन दौर ने एक ऐसे उद्यमी को जन्म दिया, जिसने आगे चलकर भारत की सबसे तेजी से बढ़ती हेल्थटेक कंपनियों में से एक खड़ी कर दी। आज Healthians की वैल्यू करीब ₹3000 करोड़ बताई जाती है, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने के लिए दीपक साहनी ने वह संघर्ष देखा है, जिसे सुनकर हर युवा प्रेरित हो सकता है।
11वीं में पढ़ाई के दौरान बदली जिंदगी
दीपक साहनी दिल्ली में पले-बढ़े। उनका बचपन सामान्य तरीके से बीत रहा था, लेकिन 11वीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उनकी जिंदगी अचानक बदल गई। उनके पिता का अच्छा-खासा चलता कारोबार घाटे में चला गया। परिवार की आर्थिक स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। ऐसे समय में जब अधिकांश छात्र अपने करियर की तैयारी में लगे रहते हैं, दीपक ने परिवार की जिम्मेदारी संभालने का फैसला किया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखी, लेकिन साथ ही कमाई के रास्ते भी तलाशने शुरू कर दिए।
19 साल की उम्र में शुरू किया कारोबार
महज 19 वर्ष की उम्र में दीपक ने एक रिश्तेदार से ₹2 लाख उधार लिए और कंप्यूटर असेंबलिंग का छोटा-सा बिजनेस शुरू किया। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी— ग्राहक कहां से आएंगे? उस समय न सोशल मीडिया था और न डिजिटल मार्केटिंग का दौर। ऐसे में उन्होंने ऐसा तरीका अपनाया, जो आज भी बिजनेस स्कूलों में सीखने लायक माना जा सकता है।
बस स्टैंड पहुंचकर बांटते थे पर्चे
दीपक रोज सुबह लगभग 4 बजे बस स्टैंड पहुंच जाते थे। वह अखबार वितरित करने वाले हॉकरों से मिलते और अपने बिजनेस के प्रचार वाले पर्चे अखबारों के अंदर रखवाते थे। रोजाना की यह मेहनत धीरे-धीरे रंग लाने लगी। लोग उनके बारे में जानने लगे और ऑर्डर मिलने शुरू हो गए। करीब दो वर्षों के भीतर उन्होंने लगभग ₹12 लाख की कमाई कर ली। इससे उन्होंने न केवल अपना कारोबार बढ़ाया बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिति भी काफी हद तक संभाल ली।
यहीं से Healthians का आइडिया आया
कंप्यूटर बिजनेस के बाद दीपक ने हेल्थकेयर सेक्टर को समझना शुरू किया। उन्हें महसूस हुआ कि भारत में अधिकांश लोग बीमारी होने के बाद इलाज पर भारी रकम खर्च करते हैं, लेकिन समय रहते हेल्थ चेकअप कराने की आदत बहुत कम लोगों में है। यहीं से उनके दिमाग में एक नया बिजनेस मॉडल आया। उन्होंने सोचा कि अगर लोगों के घर तक भरोसेमंद और सस्ती डायग्नोस्टिक सेवाएं पहुंचाई जाएं, तो लाखों लोगों की जिंदगी आसान हो सकती है। इसी सोच के साथ 2014 में Healthians की शुरुआत हुई।
इसकी शुरुआत आसान नहीं थी
आज घर बैठे ब्लड टेस्ट कराना सामान्य बात लगती है, लेकिन 2014 में यह एक बिल्कुल नया मॉडल था। लोगों को भरोसा नहीं था कि कोई व्यक्ति घर आकर सैंपल ले जाएगा और रिपोर्ट भी सही होगी। निवेशकों को भी इस मॉडल पर संदेह था। लेकिन दीपक को अपने आइडिया पर पूरा विश्वास था।
12 निवेशकों ने किया मना
दीपक साहनी अपने स्टार्टअप का आइडिया लेकर एक के बाद एक निवेशकों के पास गए। लेकिन लगातार 12 बड़े निवेशकों ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। अधिकांश लोगों का मानना था कि भारत में यह मॉडल सफल नहीं होगा। लेकिन दीपक ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने प्रोडक्ट और सर्विस को लगातार बेहतर बनाया। यही धैर्य आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ।
क्रिकेटर युवराज सिंह ने जताया भरोसा
दीपक की कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब पूर्व भारतीय क्रिकेटर युवराज सिंह, जिन्होंने खुद कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ाई जीती थी, उनके स्टार्टअप से जुड़े। युवराज सिंह के निवेश फंड YouWeCan Ventures ने Healthians में ₹1 करोड़ का शुरुआती निवेश किया। इस निवेश ने कंपनी को नई पहचान दिलाई। इसके बाद दूसरे निवेशकों का भरोसा भी बढ़ने लगा और कंपनी तेजी से आगे बढ़ती गई।
आज 250 से ज्यादा शहरों में पहुंच चुकी है कंपनी
आज Healthians देश के 250 से अधिक शहरों में अपनी सेवाएं दे रही है। कंपनी के जरिए अब तक 90 लाख से ज्यादा लोग हेल्थ टेस्ट करा चुके हैं। Healthians आज भारत की प्रमुख हेल्थटेक कंपनियों में शामिल है और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इसका वैल्यूएशन करीब ₹3000 करोड़ तक पहुंच चुका है।
अब दूसरे स्टार्टअप्स में कर रहे हैं निवेश
करीब एक दशक तक Healthians को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के बाद दीपक साहनी अब नए उद्यमियों को भी आगे बढ़ाने में जुटे हैं। उन्होंने लगभग ₹100 करोड़ का व्यक्तिगत निवेश फंड तैयार किया है, जिसके माध्यम से वे शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स में निवेश कर रहे हैं। उनका मानना है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, जरूरत केवल सही मार्गदर्शन और भरोसे की है।
दीपक साहनी की सफलता यह बताती है कि मुश्किल हालात इंसान को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत भी बना सकते हैं। 11वीं कक्षा में परिवार पर आए आर्थिक संकट से लेकर सुबह चार बजे पर्चे बांटने तक का सफर आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। आज उनकी कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ा सपना देखने का साहस रखते हैं।
निष्कर्ष
सफलता अक्सर उन्हीं लोगों के हिस्से आती है जो असफलताओं के बावजूद कोशिश करना नहीं छोड़ते। दीपक साहनी की यात्रा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सही सोच, लगातार मेहनत और धैर्य के दम पर एक साधारण शुरुआत भी करोड़ों की कंपनी में बदल सकती है।
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