भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में कुछ फैसले ऐसे हैं, जिनका असर केवल अदालत की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे पूरे लोकतंत्र की दिशा बदल देते हैं। ऐसे ही फैसलों के केंद्र में एक नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता है— जस्टिस हंस राज खन्ना। वे भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) बन सकते थे। वरिष्ठता के आधार पर अगला नंबर उन्हीं का था। लेकिन एक फैसला ऐसा आया, जिसने उनके करियर की दिशा बदल दी।
वर्ष 1976 में देश आपातकाल (Emergency) के दौर से गुजर रहा था। हजारों लोग बिना मुकदमे के जेलों में बंद थे। मौलिक अधिकार निलंबित थे और सरकार की शक्तियां अपने चरम पर थीं। ऐसे समय में सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ के सामने एक सवाल था—क्या आपातकाल में भी नागरिक अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है? चार न्यायाधीश एक तरफ थे। लेकिन एक व्यक्ति अकेला खड़ा रहा। वह थे— Justice H. R. Khanna। उनका वही असहमति वाला फैसला (Dissent) आज भारतीय न्यायपालिका के इतिहास की सबसे साहसी आवाजों में गिना जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश तक का सफर
जस्टिस हंस राज खन्ना का जन्म 3 जुलाई 1912 को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। उनके पिता सरब दयाल खन्ना प्रसिद्ध वकील और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सार्वजनिक जीवन के व्यक्ति थे। घर का वातावरण कानून, न्याय और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा हुआ था। यही कारण था कि बचपन से ही उनकी रुचि विधि (Law) की पढ़ाई की ओर बढ़ी। उन्होंने अमृतसर और लाहौर में शिक्षा प्राप्त की तथा वकालत शुरू की। उनकी ईमानदारी और कानूनी समझ ने उन्हें जल्दी ही न्यायपालिका तक पहुंचा दिया। 1952 में वे जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने। इसके बाद पंजाब हाईकोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और अंततः 1971 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त हुए।
1975 की Emergency और भारतीय लोकतंत्र
25 जून 1975 को देश में आपातकाल घोषित हुआ। इसके बाद हजारों विपक्षी नेता, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक बिना मुकदमे के गिरफ्तार कर लिए गए। सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 359 के तहत कुछ मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन पर रोक लगा दी। इसी दौरान देशभर की हाई कोर्टों में बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाएं दाखिल होने लगीं। सरकार का तर्क था कि जब मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन निलंबित है, तब अदालतें भी किसी नागरिक की गिरफ्तारी की समीक्षा नहीं कर सकतीं। यही विवाद बाद में ADM Jabalpur vs Shivkant Shukla के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसे भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे चर्चित Habeas Corpus Case भी कहा जाता है।
जब पूरे देश की नजर सुप्रीम कोर्ट पर थी
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सरकार का पक्ष था कि आपातकाल में यदि किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के हिरासत में लिया गया है, तो वह अदालत में अपनी स्वतंत्रता की मांग नहीं कर सकता। सुनवाई के दौरान जस्टिस खन्ना ने एक महत्वपूर्ण सवाल पूछा— “यदि कोई पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत दुश्मनी में किसी व्यक्ति की हत्या कर दे, तो क्या तब भी अदालत कुछ नहीं कर सकती?” सरकारी पक्ष से जो उत्तर मिला, उसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उत्तर था कि आपातकाल में अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। यहीं से स्पष्ट हो गया कि मामला केवल कानूनी बहस का नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा का था।
चार जज के खिलाफ Justice Hans Raj Khanna अकेले खड़े रहे
28 अप्रैल 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। पांच न्यायाधीशों में से चार ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। लेकिन Justice Hans Raj Khanna ने असहमति दर्ज की। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता केवल संविधान द्वारा दिए गए अधिकार नहीं हैं, बल्कि सभ्य समाज की मूल आधारशिला हैं। यदि राज्य किसी व्यक्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के स्वतंत्रता से वंचित कर सकता है और अदालत भी उसकी सुनवाई न करे, तो यह कानून के शासन (Rule of Law) की अवधारणा को समाप्त कर देगा। उनका यह ऐतिहासिक Dissent भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे प्रसिद्ध असहमति वाला निर्णय माना जाता है।
फैसला सुनाने पर इसकी कीमत चुकानी पड़ी
जस्टिस खन्ना को पूरी तरह अंदाजा था कि उनका यह फैसला सत्ता को पसंद नहीं आएगा। उनकी आत्मकथा और विभिन्न संस्मरणों में उल्लेख मिलता है कि उन्होंने अपने परिवार से कहा था कि इस निर्णय के बाद उनका मुख्य न्यायाधीश बनना लगभग असंभव हो जाएगा। वे जानते थे कि वरिष्ठता की परंपरा टूट सकती है। फिर भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनके लिए न्यायाधीश की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सत्ता को खुश करना नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा करना थी।
Chief Justice का पद नहीं दिया गया
जनवरी 1977 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए. एन. रे सेवानिवृत्त हुए। परंपरा के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को अगला मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता था। उस समय सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश Justice Hans Raj Khanna थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने इस परंपरा को तोड़ते हुए Justice M. H. Beg को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया। यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में सबसे विवादित नियुक्तियों में गिना जाता है। इसके तुरंत बाद जस्टिस खन्ना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
Emergency से पहले भी निभाई थी ऐतिहासिक भूमिका
बहुत कम लोग जानते हैं कि जस्टिस खन्ना केवल ADM Jabalpur केस की वजह से ही महान नहीं माने जाते। वर्ष 1973 के ऐतिहासिक Kesavananda Bharati Case में भी उनका योगदान निर्णायक था। इसी फैसले में Basic Structure Doctrine सामने आई, जिसके अनुसार संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती। आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत संवैधानिक सुरक्षा इसी सिद्धांत को माना जाता है और इसमें जस्टिस खन्ना की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
Chief Justice की कुर्सी गई, लेकिन सिद्धांत नहीं छोड़े
भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने की दौड़ में सबसे आगे होने के बावजूद जस्टिस हंस राज खन्ना को यह पद नहीं मिला। वरिष्ठता की परंपरा तोड़ते हुए जनवरी 1977 में सरकार ने जस्टिस एम. एच. बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया। न्यायपालिका के इतिहास में इसे सबसे विवादित नियुक्तियों में गिना जाता है। उस समय पूरे देश में यह संदेश गया कि एक न्यायाधीश को उसके स्वतंत्र फैसले की कीमत चुकानी पड़ी। लेकिन जस्टिस खन्ना ने कोई सार्वजनिक विवाद नहीं किया। उन्होंने किसी पर व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया। उन्होंने केवल अपने पद से इस्तीफा दिया और शांतिपूर्वक न्यायालय से विदा ले ली। उनका यह फैसला भी उतना ही ऐतिहासिक माना जाता है, जितना उनका असहमति वाला निर्णय।
सत्ता बदल गई, लेकिन उन्होंने निजी लाभ नहीं लिया
1977 में आपातकाल समाप्त हुआ और जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई। उस समय कई नेताओं ने जस्टिस हंस राज खन्ना को सक्रिय राजनीति में आने का प्रस्ताव दिया। उन्हें चुनाव लड़ने तक का सुझाव दिया गया, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। वे मानते थे कि एक पूर्व न्यायाधीश को राजनीतिक लाभ के लिए अपनी प्रतिष्ठा का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी तरह आपातकाल से जुड़े मामलों की जांच करने वाले आयोग में भी शामिल होने का प्रस्ताव आया, लेकिन उन्होंने निष्पक्षता की मर्यादा का हवाला देते हुए उसे भी स्वीकार नहीं किया। यह उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी— उन्होंने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
बिना वेतन किया कानून सुधार का काम
न्यायपालिका से अलग होने के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ। वे भारत के विधि आयोग (Law Commission) के अध्यक्ष बने और कानून सुधार से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सुझाव दिए। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने इस जिम्मेदारी के लिए कोई वेतन स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि कानून केवल अदालतों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आम नागरिक को न्याय दिलाने का प्रभावी माध्यम बनना चाहिए।
केंद्रीय कानून मंत्री बने और तीन दिन में दे दिया इस्तीफा
1979 में प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की सरकार ने उन्हें केंद्रीय कानून मंत्री बनने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने देशहित में यह जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलीं कि सरकार संसद में बहुमत साबित नहीं कर सकी। सरकार गिरने के साथ ही जस्टिस हंस राज खन्ना ने भी केवल कुछ दिनों के भीतर अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वे सत्ता से चिपके रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। उनके लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण सार्वजनिक मर्यादा थी।
राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़े
1982 में विपक्षी दलों ने उन्हें भारत के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। उनका मुकाबला ज्ञानी जैल सिंह से हुआ। हालांकि वे चुनाव नहीं जीत सके, लेकिन उनके व्यक्तित्व और निष्पक्ष छवि की पूरे देश में व्यापक सराहना हुई। यह चुनाव हारने के बाद भी उनकी प्रतिष्ठा कम नहीं हुई। लोग उन्हें पहले की तरह न्यायपालिका की नैतिक आवाज मानते रहे।
1999 में मिला पद्म विभूषण
भारतीय न्यायपालिका और सार्वजनिक जीवन में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1999 में उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। यह सम्मान उस व्यक्ति को मिला जिसने कभी पद या पुरस्कार के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।
41 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना Justice Hans Raj Khanna सही थे
जस्टिस हंस राज खन्ना के ऐतिहासिक असहमति वाले फैसले की वास्तविक जीत उनके जीवनकाल के बाद दिखाई दी। वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने Justice K. S. Puttaswamy v. Union of India (Privacy Judgment) मामले में स्पष्ट कहा कि ADM Jabalpur का बहुमत वाला फैसला गलत था। अदालत ने माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा संविधान के मूल मूल्य हैं और जस्टिस हंस राज खन्ना का असहमति वाला निर्णय ही सही संवैधानिक दृष्टिकोण था।
यानी जिस फैसले के कारण वे भारत के मुख्य न्यायाधीश नहीं बन सके, वही फैसला चार दशक बाद भारतीय संविधान की सबसे मजबूत व्याख्याओं में शामिल हो गया। यह भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का दुर्लभ उदाहरण है, जहां समय ने एक अकेले न्यायाधीश को सही साबित किया।
संजीव खन्ना और न्यायिक विरासत
जस्टिस हंस राज खन्ना की न्यायिक विरासत उनके परिवार में भी आगे बढ़ी। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश Justice Sanjiv Khanna उनके भतीजे हैं। उनके पिता Justice Dev Raj Khanna दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे। साक्षात्कारों में संजीव खन्ना बता चुके हैं कि बचपन से ही वे अपने चाचा जस्टिस हंस राज खन्ना के निर्णयों और कार्यशैली से प्रेरित रहे। उन्होंने उनके अनेक नोट्स, फैसले और दस्तावेज सुरक्षित रखे। जब वे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने, तो संयोग से उनका पहला दिन उसी कोर्टरूम में था, जहां कभी उनके चाचा न्याय किया करते थे। यह केवल पारिवारिक संयोग नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका की एक प्रेरक विरासत भी थी।
इतिहास Justice H. R. Khanna को याद रखेगा
भारतीय लोकतंत्र में अनेक न्यायाधीश आए और गए। कई मुख्य न्यायाधीश बने, कई ऐतिहासिक फैसले भी दिए। लेकिन बहुत कम लोग ऐसे हुए जिन्होंने अपने करियर, पद और भविष्य की परवाह किए बिना केवल संविधान का साथ चुना। जस्टिस हंस राज खन्ना ने यह साबित किया कि न्यायाधीश की सबसे बड़ी ताकत उसकी कुर्सी नहीं, बल्कि उसका चरित्र होता है। उन्होंने दिखाया कि अदालतें तभी लोकतंत्र की रक्षा कर सकती हैं, जब वे सत्ता से असहज सवाल पूछने का साहस रखें।
निष्कर्ष
जस्टिस हंस राज खन्ना का जीवन भारतीय न्यायपालिका के लिए एक आदर्श है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश बनने का अवसर खो दिया, लेकिन संविधान के प्रति अपनी निष्ठा कभी नहीं छोड़ी। उनका असहमति वाला फैसला आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी नैतिक विरासतों में गिना जाता है। आज जब न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की चर्चा होती है, तो जस्टिस हंस राज खन्ना का नाम सबसे पहले याद आता है। उन्होंने यह साबित किया कि इतिहास हमेशा पद पाने वालों को याद नहीं रखता, बल्कि उन लोगों को अमर कर देता है जो सही समय पर सच का साथ देते हैं।
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FAQs
Justice Hans Raj Khanna कौन थे?
जस्टिस हंस राज खन्ना भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे, जिन्हें आपातकाल के दौरान दिए गए ऐतिहासिक असहमति (Dissent) वाले फैसले के लिए जाना जाता है।
ADM Jabalpur Case क्या था?
यह 1976 का ऐतिहासिक मामला था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आपातकाल के दौरान नागरिकों के बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) अधिकार पर फैसला दिया था। जस्टिस हंस राज खन्ना ने इसमें सरकार के खिलाफ अकेले असहमति जताई थी।
Justice Hans Raj Khanna Chief Justice क्यों नहीं बन पाए?
ADM Jabalpur मामले में उनके असहमति वाले फैसले के बाद वरिष्ठता की परंपरा तोड़ते हुए सरकार ने उनसे जूनियर जस्टिस एम. एच. बेग को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दिया।
Kesavananda Bharati Case में Justice Hans Raj Khanna की क्या भूमिका थी?
उन्होंने उस ऐतिहासिक फैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसमें Basic Structure Doctrine स्थापित हुई। इसी सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
Justice Sanjiv Khanna का Justice H. R. Khanna से क्या संबंध है?
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश Justice Sanjiv Khanna, Justice Hans Raj Khanna के भतीजे हैं।

