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हीलियम गैस के चैंबर में क्यों रखी गई है भारतीय संविधान की असली कॉपी?

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26 जनवरी 1950 को जब भारत गणतंत्र बना, तब हमें एक ऐसा संविधान मिला जो दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि 75 साल बाद भी उस मूल दस्तावेज के पन्ने पीले (Indian Constitution Original Copy) नहीं पड़े, आखिर ऐसा क्यूँ? भारत के गौरवशाली इतिहास को सहेजने के लिए विज्ञान का एक ऐसा अद्भुत प्रयोग किया गया है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

हाथों से लिखा गया है भारत का संविधान

अक्सर लोग समझते हैं कि संविधान की मूल प्रति को टाइप या प्रिंट किया गया होगा, लेकिन हकीकत यह है कि इसे कैलिग्राफर प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने अपने हाथों इसे इटैलिक शैली में लिखा था। रायजादा ने इसके लिए कोई फीस नहीं ली थी, बस उनकी एक शर्त थी कि संविधान के हर पन्ने पर उनका नाम और आखिरी पन्ने पर उनके दादाजी का नाम होगा। इसके साथ ही, शांतिनिकेतन के महान कलाकार नंदलाल बोस और उनकी टीम ने हर पन्ने पर भारत की संस्कृति और इतिहास को चित्रों के जरिए उकेरा है।

किस पेपर मे लिखी गई भारत का संविधान?

संविधान की यह मूल प्रति ‘पार्चमेंट पेपर’ पर लिखी गई है। यह कागज बहुत ही खास होता है, लेकिन इसमें एक बड़ी समस्या यह है कि नमी (Moisture) और ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर यह धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है। हवा में मौजूद सूक्ष्मजीव और फंगस इसके रेशों को खा सकते हैं, जिससे स्याही फीकी पड़ सकती है।

कैसे सुरक्षित रखी गई भारतीय संविधान की कॉपी?

संविधान की सुरक्षा के लिए इसे संसद भवन की लाइब्रेरी के एक विशेष चैंबर में रखा गया है। इसे सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिकों ने ‘हीलियम गैस’ तकनीक का चुनाव किया।

Indian Constitution Original Copy
Indian Constitution Original Copy
  1. ऑक्सीजन मुक्त वातावरण: हीलियम एक ‘इनर्ट’ यानी अक्रिय गैस है। यह किसी भी चीज के साथ रासायनिक प्रक्रिया (Chemical Reaction) नहीं करती। गैस चैंबर से ऑक्सीजन को पूरी तरह बाहर निकालकर हीलियम भर दी जाती है, जिससे सूक्ष्मजीव पनप ही नहीं सकते।
  2. तापमान और नमी का संतुलन: चैंबर के अंदर नमी को 40% (प्लस-माइनस 5%) और तापमान को स्थिर रखा जाता है। इसके लिए कक्ष में आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं जो हर पल डेटा मॉनिटर करते हैं।
  3. सिल्ड बॉक्स: संविधान को काले फलालैन के कपड़े पर रखा गया है और फिर उसे सील बंद कांच के बॉक्स में रखा गया है।

शुरुआत में, संविधान की प्रतियों को मखमल के कपड़े में लपेटकर नेफथलीन बॉल्स के साथ रखा जाता था। लेकिन 1990 के दशक में महसूस किया गया कि यह तरीका लंबे समय के लिए सुरक्षित नहीं है। इसके बाद, 1994 में National Physical Laboratory (NPL) और भारत सरकार ने अमेरिका की तर्ज पर वैज्ञानिक तकनीक विकसित की। तब से, यह हीलियम गैस के सुरक्षित सुरक्षा चक्र में है।

भारत का संविधान हमारे लोकतंत्र का आधार स्तंभ है। प्रेम बिहारी नारायण रायजादा की शानदार कैलिग्राफी और नंदलाल बोस की कलाकारी को सुरक्षित रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। हीलियम गैस चैंबर जैसी उन्नत तकनीक यह सुनिश्चित करती है कि भारत के निर्माण की यह गाथा आने वाले हजारों सालों तक सुरक्षित रहे और हमारी आने वाली पीढ़ियां इसे देखकर गर्व महसूस कर सकें।

कौन थे प्रेम बिहारी नारायण रायजादा?

प्रेम बिहारी नारायण रायजादा का जन्म 1901 में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित कैलिग्राफर परिवार में हुआ था। उनके दादा, राम प्रसाद सक्सेना, एक प्रसिद्ध विद्वान और कैलिग्राफर थे, जिन्होंने रायजादा को फारसी और अंग्रेजी कैलिग्राफी की बारीकियां सिखाईं। रायजादा ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से की थी। जब संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार कर लिया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसे इटैलिक शैली में लिखवाना चाहते थे।

Indian Constitution Original Copy written by prem bihari narayan Rayjada

प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने संविधान के 395 अनुच्छेदों, 8 अनुसूचियों और प्रस्तावना को लिखने पूरे 6 महीने लगे। इस विशाल कार्य के लिए उन्होंने 303 नंबर के 432 होल्डर पेन निब का इस्तेमाल किया। पूरे संविधान में एक भी जगह काट-छांट या गलती नहीं मिली। उनकी इटैलिक लिखावट इतनी सधी हुई थी कि देखने वाले को वह प्रिंटेड लगती थी।

प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने जहाँ पन्नों पर शब्द उकेरे, वहीं शांतिनिकेतन के आचार्य नंदलाल बोस और उनकी टीम (जैसे राममनोहर सिन्हा) ने इन पन्नों के किनारों को सजाया। उन्होंने मोहनजोदड़ो से लेकर गुप्त वंश और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तक के चित्रों के जरिए भारत के इतिहास को संविधान के पन्नों पर जीवंत कर दिया।

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