चौधरी चरण सिंह भारत के इतिहास में इकलौते ऐसे प्रधानमंत्री रहे, जो अपने कार्यकाल में कभी संसद की सीढ़ियां नहीं चढ़ सके। उनकी सरकार इंदिरा गांधी की कांग्रेस (I) के समर्थन पर टिकी थी। लेकिन फ्लोर टेस्ट वाले दिन से ठीक एक दिन पहले 19 अगस्त को इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया। चौधरी चरण सिंह जानते थे कि उनके पास बहुमत का नंबर नहीं हैं। उन्होंने संसद जाकर हारने के बजाय, संसद जाने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद वे 20 अगस्त 1979 से 14 जनवरी 1980 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे और इस दौरान भी संसद में नहीं गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन उस छोटे से कार्यकाल में ‘सुशासन’ के ऐसे किस्से (Chaudhary Charan Singh Story) मशहूर हैं जिसके आज भी मिसाल दिए जाते हैं। और ऐसा ही एक मशहूर किस्सा है साल 1979 का… जब देश का प्रधानमंत्री अपनी एसी गाड़ी और सुरक्षा छोड़कर, भेष बदलकर एक थाने में जा पहुंचा।
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जब पीएम के पास पहुंची रिश्वतखोरी की शिकायत
किस्सा अगस्त 1979 की है। चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बने कुछ ही दिन हुए थे। उनके पास लगातार शिकायतें आ रही थीं कि उत्तर प्रदेश के थानों में गरीबों की सुनवाई नहीं होती और पुलिसवाले रिश्वतखोरी में लिप्त हैं। किसान नेता होने के नाते चौधरी साहब को यह बात चुभ गई। बार-बार शिकायत मिलने के बाद चरण सिंह खुद ही हकीकत भांपने के लिए किसान का भेष धारण कर थाने पहुँच गए थे। कई पूर्व नेता बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह कभी भी भेष बदलकर पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों का निरीक्षण करने पहुंच जाते थे।

जब जेब कटने की रिपोर्ट लिखवाने पहुँचे प्रधानमंत्री
शाम के करीब 6 बज रहे थे। एक 75 साल का बुजुर्ग, जिसने मैला-कुचैला कुर्ता-धोती पहन रखा था और जिसके कपड़ों पर धूल जमी थी, उत्तर प्रदेश के इटावा के ऊसराहार थाने के गेट पर पहुंचा। अंदर घुसते ही सिपाही ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और कड़क आवाज़ में पूछा, “कौन हो? यहां क्यों आए हो?” उस बूढ़े किसान (चरण सिंह) ने दबी और डरी हुई आवाज़ में कहा, “दरोगा बाबू हैं? मुझे रपट लिखवानी है।” जवाब मिला, “साहब नहीं हैं। बताओ क्या हुआ?”
चरण सिंह ने एक कहानी गढ़ते हुए कहा:
“साहब, मैं मेरठ का रहने वाला हूं। खेती-किसानी करता हूं। सुना था यहां इटावा में बैलों की जोड़ी सस्ती मिलती है, इसलिए बैल खरीदने आया था। लेकिन रास्ते में किसी ने मेरी जेब काट ली। अब मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं बची, मैं घर कैसे जाऊंगा? मेरी रपट लिख लो।”
हेड कांस्टेबल ने नजरें टेढ़ी करते हुए पूछा, ‘तुम मेरठ से यहां आ गए और तुम्हें पता नहीं चला? चलो भागो यहां से, हम ऐसी झूठी रिपोर्ट नहीं लिखते। हमारा समय बर्बाद मत करो।” चरण सिंह ने बहुत कोशिश किये कि उनकी रपट लिख जाए लेकिन पुलिसवाले अपनी अकड़ में थे। अंत में कांस्टेबल ने कहा, ‘जाओ शिकायत नहीं लिखी जाएगी।
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रिपोर्ट लिखवा देंगे पर खर्चा पानी लगेगा
निराश होकर चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh Story) थाने के बाहर आकर खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद थानेदार साहब आए, लेकिन उन्होंने भी उस ‘गरीब किसान’ की बात अनसुनी कर दी। तभी एक सिपाही ने उसे बुलाया और धीरे से बोला अगर किसान कुछ पैसे (घूस) का जुगाड़ कर ले तो उसकी रिपोर्ट लिखी जाएगी। परेशान किसान ने पुलिस के इस ऑफर को मान लिया। इसके बाद मुंशी ने शिकायत लिखनी शुरू कर दी। रिपोर्ट लिखने के बाद मुंशी ने पूछा, “बाबा, अंगूठा लगाओगे या दस्तखत करोगे?” बूढ़े किसान ने कहा, “मैं दस्तखत करूंगा।”

जब मैले कुर्ते की जेब से निकाले प्रधानमंत्री की मुहर
उन्होंने पेन उठाया और कागज पर साफ-साफ अक्षरों में लिखा— ‘चौधरी चरण सिंह’। मुंशी अभी नाम पढ़ ही रहा था कि उस किसान ने अपने मैले कुर्ते की जेब से एक मुहर निकाली और कागज पर जोर से ठोंक दी। जिस पर लिखा था— ‘प्रधानमंत्री, भारत सरकार’।
वह मुहर देखते ही थाने में मानो सांप सूंघ गया। मुंशी के हाथ से कलम छूट गई। थानेदार और सिपाहियों के चेहरों का रंग उड़ गया। तभी बाहर सायरन की आवाज आई। कुछ देर में प्रधानमंत्री का काफिला भी वहां पहुंच गया। सभी आला अधिकारी भी वहां पहुंच गए।
चौधरी चरण सिंह ने एक पल की भी देरी नहीं की। उन्होंने वहीं खड़े-खड़े पूरे थाने को सस्पेंड करने का आदेश दिया और अपनी गाड़ी में बैठकर चले गए। 1979 का यह किस्सा (Chaudhary Charan Singh Story) बताता है कि चौधरी चरण सिंह संसद भले ही न जा पाए हों, लेकिन जनता के बीच उनकी पकड़ कितनी मजबूत थी। उन्होंने उस दिन साबित कर दिया कि सत्ता दिल्ली के एसी कमरों से नहीं, बल्कि धूल भरे रास्तों और थानों की हकीकत जानकर चलाई जाती है। वह मुहर की आवाज आज भी उस थाने के इतिहास में गूंजती है।

