आज के डिजिटल युग में, जब हम स्पॉटिफाई (Spotify) या यूट्यूब पर एक क्लिक में अपना मनपसंद गाना सुन लेते हैं, तो यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि भारत में एक वक्त ऐसा भी था जब सरकार ने फिल्मी गानों पर ‘पाबंदी’ लगा दी थी। आज हम जिस विविध भारती या एफएम (FM) पर दिन-रात गाने सुनते हैं, आजादी के तुरंत बाद हालात ऐसे नहीं थे। उस समय रेडियो सरकार के नियंत्रण में था और इसे केवल ‘शिक्षा’ और ‘शास्त्रीय संगीत’ का माध्यम माना जाता था । आजाद भारत के इतिहास में एक वक्त ऐसा भी आया था जब सरकार ने फिल्मी गानों को ‘अश्लील’ और ‘पश्चिमी’ मानकर उन पर पाबंदी लगा (Ban on Bollywood Songs on AIR 1952) दी थी।
यह कहानी सिर्फ एक ‘पाबंदी’ की नहीं है बल्कि यह कहानी है उस जिद की थी, जिसने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया और भारत में ‘रेडियो सीलोन’ (Radio Ceylon) और ‘विविध भारती’ (Vividh Bharati) जैसे मंचों को जन्म दिया। लता मंगेशकर, जिनकी आवाज को दबाने की कोशिश की गई, वही आवाज इस पूरे किस्से की धुरी बनी।
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जब मंत्री जी को फिल्मी गाने ‘खराब’ लगने लगे
कहानी की शुरुआत होती है 1952 में, देश को आजादी मिले अभी 5 साल ही हुए थे। जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में सूचना और प्रसारण मंत्री (Information & Broadcasting Minister) बने थे बी.वी. केसकर (B.V. Keskar)। केसकर साहब शास्त्रीय संगीत (Classical Music) के बहुत बड़े विद्वान और समर्थक थे। लेकिन हिंदी फिल्मों के गानों से उन्हें सख्त नफरत थी। उनका मानना था कि फिल्मी गाने भारतीय संस्कृति की छवि को धूमिल कर रहे हैं। उन्हें लगता था कि ये गाने “अश्लील” हैं और “पश्चिमी सभ्यता की सस्ती नकल” हैं। उनका मानना था कि अगर रेडियो पर दिन-रात “आना मेरी जान, मेरी जान…” जैसे गाने बजेंगे, तो देश के युवाओं का मानसिक पतन हो जाएगा।
अपनी इसी सोच के चलते उन्होंने एक ऐतिहासिक फैसला लिया— जिसके तहत All India Radio (AIR) पर हिंदी फिल्मी गानों के प्रसारण पर रोक लगा दी (Ban on Bollywood Songs on AIR 1952)गई और नए नियम के मुताबिक, रेडियो पर सिर्फ 10% समय ही सुगम संगीत (Light Music) को दिया जा सकता था.
नतीजा यह हुआ कि लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों की आवाज सरकारी रेडियो से गायब हो गई। लता मंगेशकर, जो उस समय तक एक बड़ी स्टार बन चुकी थीं, उनके गाने अब भारतीय रेडियो पर बजना बंद हो गए। उस समय लता मंगेशकर की आवाज घर-घर में गूंज रही थी। ‘महल’ (1949) और ‘बरसात’ (1949) जैसे फिल्मों के गानों ने उन्हें स्टार बना दिया था। लेकिन रातों-रात, सरकारी रेडियो से उनकी आवाज गायब हो जाना श्रोता को एक लिए बड़ा धक्का जैसा था।

जब सरहद पार से आई ‘बिनाका गीतमाला’ की गूंज
आकाशवाणी पर सन्नाटा छा गया। सरकार ने फिल्मी गानों की जगह शास्त्रीय संगीत का समय बढ़ा दिया। लेकिन जनता को यह बदलाव पसंद नहीं आया। लोग अपने ट्रांजिस्टर पर लता, रफी और मुकेश की आवाज ढूंढते रहे, पर वहां सिर्फ राग-रागिनियां सुनाई देती थीं। भारत के दक्षिण में स्थित श्रीलंका (तब सीलोन) का रेडियो स्टेशन, Radio Ceylon, जो उस समय एक शक्तिशाली ट्रांसमीटर के साथ काम करता था, ने इस मौके को भांप लिया। रेडियो सीलोन ने हिंदी फिल्मी गानों का प्रसारण शुरू कर दिया। और यहीं से एंट्री हुई एक युवा आवाज की— अमीन सयानी (Ameen Sayani)।
उन्होंने ‘बिनाका गीतमाला’ (Binaca Geetmala) शुरू किया। जो हर बुधवार रात 8 बजे, पूरा भारत आकाशवाणी को बंद करके रेडियो सीलोन ट्यून करने लगा। इसका लोकप्रियता इतना लता मंगेशकर की जो आवाज दिल्ली के रेडियो स्टेशन से ‘बैन’ थी, वह कोलंबो के रेडियो स्टेशन से पूरे भारत में गूंजने लगी।
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यह स्थिति भारत सरकार के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गई। जहाँ एक तरफ मंत्री बी.वी. केसकर अपनी जिद पर अड़े थे वही दूसरी तरफ देश का हर रेडियो सेट पर ‘विदेशी’ स्टेशन (रेडियो सीलोन) बज रहा था। लता मंगेशकर और फिल्म इंडस्ट्री के लोगों ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने साफ कर दिया कि अगर सरकारी रेडियो उन्हें सम्मान नहीं देगा, तो वे वहां नहीं गाएंगे। (इससे पहले लता जी ने रेडियो पर गायकों का नाम न लिए जाने के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी और जीती थीं)।

सरकार को झुकना पड़ा और जन्म हुआ विविध भारती का
आखिरकार, जनता के दबाव और रेडियो सीलोन की बढ़ती लोकप्रियता ने सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया। अधिकारियों को समझ आ गया कि अगर उन्होंने फिल्मी संगीत को वापस नहीं लाया, तो All India Radio अपनी पूरी ऑडियंस खो देगा। आखिरकार सरकार को आप जनता की पसंद के सामने झुकना पड़ा। सरकार ने हार मानी और फिल्मी गानों के लिए एक पूरी तरह से नया चैनल शुरू किया— विविध भारती (Vividh Bharati)।
आज हम विविध भारती को जिस सुनहरे दौर के गानों के लिए जानते हैं, उसका जन्म इसी ‘बैन’ (Ban on Bollywood Songs on AIR 1952) के जवाब में हुआ था। इतिहास गवाह है कि कला पर जब भी पहरे लगाने की कोशिश की गई, उसने बहने का कोई न कोई नया रास्ता ढूंढ ही लिया। और साथ ही इस घटना ने साबित कर दिया कि लता मंगेशकर की आवाज किसी सरकारी मुहर की मोहताज नहीं थी। जब उन्हें अपने ही देश के रेडियो ने नकारा, तो हवाओं ने सरहदें लांघकर उनकी आवाज लोगों तक पहुंचाई। 1952 का वह ‘बैन’ अगर न लगा होता, तो शायद न तो रेडियो सीलोन का इतना बड़ा इतिहास बनता, न अमीन सयानी की आवाज हमें मिलती और न ही विविध भारती जैसा मंच हमारे पास होता। लता मंगेशकर की आवाज को खामोश करने की वह कोशिश, अंततः उनकी आवाज को और भी ज्यादा बुलंद करने का कारण बन गई।
