कहते है असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है और अगर सफलता की सीढ़ी ही किसी के समस्या के समाधान से जुड़ा हो तो सफलता तो मिलनी ही थी। आज की कहानी ऐसे शख्सियत की है जिसकी शुरुवात यूपी रोडवेज की खटारा बसों में धक्के खाते हुए हुई थी जिसने अपनी करियर की शुरुवात एक साधारण मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) की नौकरी से की और फिर अरबों डॉलर की कंपनी का मालिक बन गया। हम बात कर रहे हैं भारत की दिग्गज दवा कंपनी Mankind Pharma (मैनकाइंड फार्मा) के संस्थापक, रमेश जुनेजा (Ramesh Juneja Success Story) की। जिनकी बिजनेस स्टोरी आज के युवा उधमी के लिए प्रेरणास्तोत्र है।
यह कहानी पैसे कमाने की नहीं है, यह उस सोच की कहानी है, उस जिद्द की कहानी है, जो साबित करती है कि अगर इरादे पक्के हों, तो जेब में कम पैसे होने के बावजूद भी इतिहास रचा जा सकता है। आइए जानते हैं आखिर कैसे मेरठ की तंग गलियों से निकलकर रमेश जुनेजा जी ने फोर्ब्स (Forbes) की लिस्ट तक पहुँचने का यह अविश्वसनीय सफर पूरा किया ।
शुरुआती संघर्ष: जब यूपी रोडवेज ही थी सहारा
रमेश जुनेजा का जन्म 1955 में उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। सपनों और जिम्मेदारियों के बीच पले-बढ़े रमेश ने विज्ञान में ग्रेजुएशन किया और 1974 में ‘कीफार्मा लिमिटेड’ (KeePharma Ltd) के साथ अपने करियर की शुरुआत की। शुरुआती दिन बेहद संघर्षपूर्ण थे। उन्होंने अपनी करियर की शुरुवात एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (MR) से किए। उनका काम था अलग-अलग शहरों में जाना और डॉक्टरों को अपनी दवाइयों के बारे में समझाना। लेकिन नौकरी करते हुए तनख्वा कम होने के कारण उसके पास न तो उनके अपनी गाड़ी थी और न ही ज्यादा पैसे।
रमेश अक्सर मेरठ से पुरकाजी या आसपास के कस्बों में जाने के लिए यूपी रोडवेज की बसों का इस्तेमाल करते थे। तपती गर्मी में घंटों बसों में सफर करना, पसीने में लथपथ होकर डॉक्टरों के क्लीनिक के बाहर अपनी बारी का लंबा इंतजार करना—यही उनकी दिनचर्या थी। लेकिन इन्हीं मुश्किलों ने उन्हें बाज़ार की असलियत समझाई।

वो एक पल जिसने सेल्समैन को बिजनेसमैन बना दिया
1975 में, उन्होंने Lupin Limited ज्वाइन किया और जहाँ उन्होंने 8 साल तक काम किया। इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसने एक आम सेल्समैन को एक विजनरी बिजनेसमैन बना दिया। एक बार उन्होंने देखा कि एक गरीब व्यक्ति को अपने परिवार के इलाज के लिए दवा खरीदने हेतु अपने गहने (Jewelry) बेचने पड़े। दवाई के लिए गहने बेचना मध्यमवर्गीय परिवार के लिए काफी दुखद स्तिथि होती है, उन्होंने भी भी वही दर्द महसूस किया जो उस परिवार के आँखों मे थी। उन्होंने महसूस किया कि भारत में दवाइयां बहुत महंगी हैं और आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। यहीं से उन्होंने ठान लिया— “मैं एक ऐसी कंपनी बनाऊंगा जो अमीर हो या गरीब, हर इंसान को सस्ती और अच्छी दवा उपलब्ध कराएगी।”
पहली कोशिश मे चखे विफलता का स्वाद
कहते हैं न, सफलता का रास्ता सीधा नहीं होता। 1994 में रमेश जुनेजा ने अपने एक दोस्त के साथ मिलकर ‘Bestochem’ नाम की कंपनी शुरू की। उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी और मेहनत लगा दी, लेकिन अफ़सोस, यह पार्टनरशिप और कंपनी सफल नहीं हो पाई। उन्हें कंपनी छोड़नी पड़ी। यह एक बहुत बड़ा झटका था। कोई और होता तो शायद टूट जाता या वापस नौकरी करने लगता। लेकिन रमेश जुनेजा ने हार नहीं मानी। उनका सपना टूटा नहीं था, बस थोड़ा और मजबूत हो गया था।
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50 लाख से हजारों करोड़ का साम्राज्य (The Rise of Mankind)
असफलता से सीखने के बाद, 1995 में रमेश जुनेजा ने अपने छोटे भाई राजीव जुनेजा के साथ मिलकर अपनी नई कंपनी की नींव रखी—जिसका नाम था Mankind Pharma। इसकी शुरुआत उन्होंने केवल 50 लाख रुपये से की थी। उस समय उनकी टीम में सिर्फ 25 मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव थे। संसाधन कम थे, लेकिन विजन बहुत बड़ा था।
उनकी रणनीति बिल्कुल साफ़ थी— “सस्ती दवाएं और बेहतरीन क्वालिटी।” जहां बड़ी कंपनियां महंगी दवाएं बेचकर मुनाफा कमा रही थीं, वहीं रमेश जुनेजा ने कम मुनाफे पर ज्यादा लोगों तक दवा पहुंचाने का फैसला किया। उनका यह ‘आम आदमी वाला फार्मूला‘ काम कर गया। पहले ही साल में कंपनी ने 4 करोड़ रुपये का कारोबार किया, जो उस समय एक बड़ी बात थी।

फोर्ब्स लिस्ट मे नाम और घर-घर में मिली पहचान
आज Mankind Pharma भारत की सबसे बड़ी और भरोसेमंद दवा कंपनियों में से एक है। जिसमे Manforce, Prega News और Gas-O-Fast जैसे ब्रांड्स आज हर घर की ज़रूरत बन चुके हैं, वो इन्हीं की देन हैं। जिस व्यक्ति ने कभी बस में धक्के खाए थे,आज उसी मेहनत को फोर्ब्स (Forbes) ने सबसे अमीर भारतीयों की सूची में शामिल किया। रमेश जुनेजा की कहानी हमें सिखाती है कि शुरुआत आप कहाँ से करते हैं, यह मायने नहीं रखता। मायने यह रखता है कि आप जाना कहाँ चाहते हैं। उन्होंने एक समस्या (महंगी दवाइयां) देखी और उसे सुलझाने के लिए अपना जीवन लगा दिया। सफलता तो बस उसी सेवा का इनाम है।

