जिस समाज में बेटी को अक्सर बोझ समझा जाता है, वही समाज बाद में उसी बेटी की ममता और त्याग के आगे नतमस्तक हो जाता है। आज हम आपको जिस माँ की कहानी के बारे मे बताने जा रहे है, उस माँ के हिस्से मे शुरुवाती जीवन मे जितना दर्द और त्याग था, इस समाज को आईना दिखाना के लिए काफी है । उनके दर्द का इंतहा सिर्फ इस बात से कल्पना कीजिए कि क्या एक माँ अपने बच्चे का पेट भरने के लिए शमशान घाट में जलती हुई लाश की आग पर रोटी बनाकर खा सकती है? क्या हो जब एक महिला को 9 महीने की गर्भावस्था में पति ने घर से निकाल दिया, उस महिला ने गाय के बाड़े में बच्चे को जन्म दिया और पत्थर से अपनी ही नाड़ (Umbilical Cord) काटी। सुनने मे थोड़ा अजीब लग सकता है लेकिन यह कहानी है 1400 से ज्यादा अनाथ बच्चों (Mother of Orphans) की माँ कही जाने वाली सिंधुताई सपकाल (Sindhutai Sapkal Story) की।
लेकिन इस महान माँ की कहानी की शुरुआत ही एक ऐसे अपमान से हुई थी जिसने बचपन में ही उसका दिल तोड़ दिया था।

सिंधुताई सपकाल की बचपन की कहानी
इस दर्दनाक लेकिन प्रेरणादायक कहानी की शुरुआत 14 नवंबर 1948 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले में हुई। एक गरीब चरवाहे के घर बेटी ने जन्म लिया। आमतौर पर बच्चे के जन्म पर खुशियां मनाई जाती हैं, लेकिन यहाँ मातम छा गया क्योंकि परिवार वाले बेटी नहीं चाहते थे। घरवाले की नफरत का आलम यह था कि बच्ची का नाम ही ‘चिंदी’ रख दिया गया। मराठी में ‘चिंदी’ का मतलब होता है— ‘फटा हुआ कपड़ा’, जो किसी काम का नहीं होता।
सिंधुताई को बचपन से ही पढ़ने का बहुत शौक था, लेकिन उनकी माँ को यह कतई मंजूर नहीं था। हालाँकि, पिता के सहयोग से वो स्कूल तो जाने लगीं, लेकिन माँ उन्हें भैंस चराने भेज देती थीं। सिंधुताई का जज्बा देखिए—जब भैंसें पानी में बैठती थीं, वो दौड़कर स्कूल जाती थीं और छुट्टी होने से पहले वापस आ जाती थीं। उनके पास लिखने के लिए स्लेट नहीं थी, तो वो ‘भरवा’ (Pimpal) के पेड़ के पत्तों पर कांटों से लिख-लिखकर अपनी पढ़ाई पूरी करती थीं।
अगर आपको सुनीता देवी (Sunita Devi) की कहानी पसंद आई थी, तो सिंधुताई का यह संघर्ष आपको रोने पर मजबूर कर देगा।”
10 साल की उम्र में शादी और दर्दनाक संघर्ष
लेकिन गरीबी और समाज की रूढ़िवादी सोच ने यहां भी उनका हक़ छीन लिया जिस उम्र में बच्चियां गुड़ियों से खेलती हैं, उस उम्र में सिंधुताई की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर दिया गया। महज 10 साल की उम्र में चिंदी की शादी 30 साल के एक आदमी, श्रीहरि सपकाल (Sindhutai Sapkal Husband Name) से कर दी गई। ससुराल में भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ। सिंधुताई बताती हैं कि वहां दिन भर गोबर उठाना, मार खाना और ताने सुनना ही उनकी दिनचर्या बन गई थी।
कहानी को विडिओ मे देखें-
जीवन का सबसे खौफनाक मंज़र तब आया जब सिंधुताई 9 महीने की गर्भवती थीं। उनके पति ने गाँव वालों की झूठी बातों में आकर उन्हें बुरी तरह पीटा और घर से बाहर निकाल दिया। वह अंधेरी रात थी, बारिश हो रही थी और उन्हें प्रसव पीड़ा (Labor Pain) शुरू हो चुकी थी। सिर छुपाने के लिए उन्हें कोई जगह नहीं मिली, तो वो एक गाय के तबेले (Cowshed) में जाकर गिर गईं।
उसी रात, गाय के गोबर और कीचड़ के बीच, सिंधुताई ने एक बच्ची को जन्म दिया। वहां न कोई डॉक्टर था, न कोई अपना। दर्द से तड़प रही सिंधुताई ने वहां पड़े एक नुकीले पत्थर को उठाया और खुद अपनी नाड़ (Umbilical Cord) काटकर बच्चे को अलग किया। जरा सोचिए, उस वक्त उस माँ पर क्या गुजरी होगी!
Sindhutai Sapkal Story: जब शमशान घाट को घर बनाना पड़ा
हमारे समाज मे जब एक बेटी ससुराल से ठुकराई जाती है, तो उसे उम्मीद होती है कि मायके में माँ उसे गले लगाएगी, एक महिला अपनी बेटी का दर्द समझेगी। लेकिन सिंधुताई के साथ जो हुआ, वो पत्थर दिल को भी पिघला दे। जब वो अपनी माँ के घर पहुंचीं, तो पता चला कि पिता का साया उठ चुका है और माँ ने उन्हें “कुलक्षिणी” कहकर दरवाज़ा बंद कर दिया।
अब वो कहाँ जातीं? गोद में नन्ही जान और पेट में भूख की आग। सिंधुताई रेलवे स्टेशन पर भीख मांगने लगीं। रात को सोने के लिए कोई सुरक्षित जगह नहीं थी और समाज के दरिंदों का डर अलग था। इसलिए, वो कभी गाय के तबेले में तो कभी शमशान घाट में जाकर सोती थीं।
सिंधुताई का एक मशहूर कथन है: “इंसान रात को शमशान से डरता है, लेकिन मुझे इंसानों के बीच डर लगता था, इसलिए मैं भूतों के बीच सोती थी।”
एक बार भूख इतनी ज़ोरों की थी कि कहीं से थोड़ा आटा तो मिल गया, लेकिन पकाने के लिए आग नहीं थी। उन्होंने देखा कि पास में एक लाश जल रही है। उन्होंने उसी मुर्दे की आग पर तवा रखा, रोटियां सेकीं और अपनी भूख मिटाई। यह वो पल था जिसने उन्हें अंदर तक तोड़कर रख दिया, लेकिन साथ ही उन्हें पत्थर से भी ज्यादा मज़बूत बना दिया।

वो एक पल जिसने ‘चिंदी’ को ‘माई’ बना दिया
इतना दुख सहने के बाद सिंधुताई पूरी तरह टूट चुकी थीं और आत्महत्या तक करने का विचार आ रहा था। लेकिन तभी एक छोटी सी घटना ने उनका जीवन बदल दिया। स्टेशन पर उन्हें एक बूढ़ा भिखारी दिखा जो प्यास से तड़प रहा था और पानी मांग रहा था। सिंधुताई ने सोचा— “मरना तो है ही, जाते-जाते थोड़ा पुण्य ही कर दूँ।”
उन्होंने उसे पानी पिलाया और अपनी बची हुई रोटी खिला दी। उस भिखारी की आँखों में जो सुकून और आभार था, उसने सिंधुताई को झकझोर दिया। उन्होंने सोचा— “दूसरों के लिए जीने में जो सुख है, वो मरने में नहीं।” बस, उसी दिन ‘चिंदी’ मर गई और जन्म हुआ ‘एक माँ’ का, एक सागर से भी गहरी ममता का।
इसके बाद उन्होंने रास्तों पर भटकते अनाथ बच्चों को अपनाना शुरू किया। वो भीख मांगतीं, खुद भूखी रहतीं, लेकिन उन बच्चों का पेट भरतीं। धीरे-धीरे वो एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 1400 से ज़्यादा बच्चों की ‘माई’ (माँ) बन गईं। उन्होंने उन बच्चों को पढ़ाया-लिखाया और डॉक्टर, इंजीनियर व वकील बनाया।

क्षमा की शक्ति: जब पति को बनाया ‘बेटा’
समय का पहिया घूमा। सिंधुताई अब पूरी दुनिया में मशहूर हो चुकी थीं। उन्हें 750 से ज्यादा सम्मान मिल चुके थे। एक दिन, 80 साल का एक बूढ़ा आदमी उनके आश्रम आया। वो कोई और नहीं, उनका वही पति था जिसने उन्हें घर से बाहर निकाला था। वो रो रहा था और माफ़ी मांग रहा था।
कोई और होता तो शायद उसे धक्के मारकर निकाल देता। लेकिन सिंधुताई का दिल देखिए… उन्होंने कहा—
“मैं अब तुम्हारी पत्नी नहीं बन सकती, मैं हज़ारों बच्चों की माँ हूँ। अगर तुम चाहो तो मेरे ‘बेटे’ बनकर रह सकते हो।”
उन्होंने अपने पति को ‘बेटे’ के रूप में स्वीकार किया और ताउम्र उनका ख्याल रखा। इसे कहते हैं भारतीय नारी की असली शक्ति और ममता।
सिंधुताई सपकाल आज हमारे बीच नहीं हैं (उनका निधन 2022 में हुआ), लेकिन उनकी ममता अमर है। उनका कहना था— “मेरे सिर पर छत नहीं थी, इसलिए मैंने सबके लिए छत बनाई।” सिंधुताई की कहानी (Sindhutai Sapkal Story) हमें सिखाती है कि जीवन में दुख कितना भी बड़ा हो, अगर हौसला है तो आप दुनिया बदल सकते हैं । सिंधु ताई की कहानी किसी महिला की कहानी नहीं बल्कि ऐसे समाज की कहानी है जहाँ स्त्री तभी पूजी जाती है जब वो पहले सब कुछ खो चुकी होती है ।

