सरला ठकराल: जब भारतीय महिलाओं के लिए आसमान सिर्फ सपना था, तब उन्होंने उसे अपनी मंजिल बना लिया

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सरला ठकराल: आज भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां महिला पायलटों की भागीदारी सबसे अधिक है। भारतीय विमानन क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी वैश्विक औसत से कहीं बेहतर मानी जाती है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। जब समाज में महिलाओं के लिए घर की चौखट ही सबसे […]

सरला ठकराल: आज भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां महिला पायलटों की भागीदारी सबसे अधिक है। भारतीय विमानन क्षेत्र में महिलाओं की मौजूदगी वैश्विक औसत से कहीं बेहतर मानी जाती है। लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं था। जब समाज में महिलाओं के लिए घर की चौखट ही सबसे बड़ी सीमा मानी जाती थी, तब एक युवा महिला ने विमान का कॉकपिट संभालकर पूरे देश की सोच बदल दी।

वह महिला थीं सरला ठकराल—भारत की पहली लाइसेंस प्राप्त महिला पायलट। उन्होंने केवल विमान नहीं उड़ाया, बल्कि उस दौर की सामाजिक सोच को भी चुनौती दी। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सपनों को पूरा करने के लिए साहस, आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास सबसे जरूरी होते हैं।

बचपन से ही अलग सोच रखने वाली लड़की

सरला ठकराल का जन्म 8 अगस्त 1914 को दिल्ली में हुआ था। उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब देश स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से गुजर रहा था और महिलाओं की शिक्षा तथा करियर के अवसर बेहद सीमित थे। कम उम्र से ही सरला नई चीजें सीखने में रुचि रखती थीं। हालांकि उस समय शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि यह लड़की एक दिन भारतीय विमानन इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बनेगी।

शादी के बाद मिली सपनों को उड़ान

महज 16 वर्ष की उम्र में सरला का विवाह पायलट पी.डी. शर्मा से हुआ। उस समय अधिकतर महिलाओं का जीवन विवाह के बाद घर-परिवार तक सीमित हो जाता था, लेकिन सरला के जीवन में यह विवाह एक नए अध्याय की शुरुआत साबित हुआ। पी.डी. शर्मा स्वयं प्रशिक्षित पायलट थे। उन्होंने अपनी पत्नी की उड़ान के प्रति जिज्ञासा को पहचाना और उसे प्रोत्साहित किया। परिवार का सहयोग मिलने के बाद सरला ने जोधपुर फ्लाइंग क्लब में प्रशिक्षण लेना शुरू किया। यहीं से उनका सपना वास्तविकता में बदलने लगा।

जब पहली बार उड़ाया विमान

साल 1936 भारतीय विमानन इतिहास के लिए यादगार बन गया। प्रशिक्षण के दौरान सरला ठकराल ने लाहौर में जिप्सी मॉथ (Gypsy Moth) नामक दो-सीटर विमान उड़ाया। यह केवल एक प्रशिक्षण उड़ान नहीं थी। यह उस दौर की सामाजिक सोच के खिलाफ एक साहसी कदम भी था। कहा जाता है कि सरला ने अपनी पहली एकल उड़ान भारतीय परंपरा का सम्मान करते हुए साड़ी पहनकर पूरी की। उस समय यह दृश्य लोगों के लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था।

21 साल की उम्र में रचा इतिहास

सरला ठकराल ने उड़ान प्रशिक्षण के दौरान लगातार मेहनत की। उस समय पायलट लाइसेंस प्राप्त करने के लिए लंबा उड़ान अनुभव जरूरी होता था। करीब 1000 घंटे की उड़ान पूरी करने के बाद उन्होंने ‘A’ लाइसेंस हासिल किया और केवल 21 वर्ष की उम्र में भारत की पहली महिला पायलट बनने का गौरव प्राप्त किया। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं थी। इसने देशभर की महिलाओं को यह विश्वास दिलाया कि विमान उड़ाना केवल पुरुषों का पेशा नहीं है।

समाज की सोच से आगे निकल चुकी थीं सरला

जब सरला ने विमान उड़ाना शुरू किया, तब बहुत से लोग इसे महिलाओं के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे। इसके बावजूद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बाद में एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि पहली उड़ान के समय उनके पति और ससुर दोनों बेहद उत्साहित थे। परिवार के इस सहयोग ने उन्हें आत्मविश्वास दिया और आगे बढ़ने की प्रेरणा भी। सरला का मानना था कि महिलाओं को अवसर मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना सकती हैं।

जिंदगी ने लिया कठिन मोड़

सफलता की इस उड़ान के बीच वर्ष 1939 सरला ठकराल के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आया। उसी वर्ष एक विमान दुर्घटना में उनके पति पी.डी. शर्मा का निधन हो गया। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा व्यक्तिगत आघात था। इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया। युद्ध के कारण नागरिक विमानन गतिविधियां प्रभावित हुईं और सरला की कमर्शियल पायलट बनने की आगे की ट्रेनिंग भी रुक गई। उनका सबसे बड़ा सपना अचानक अधूरा रह गया।

हार मानना उनकी फितरत नहीं थी

कई लोगों के लिए यह परिस्थितियां जीवन का अंत साबित होतीं, लेकिन सरला ठकराल ने इसे नई शुरुआत बना दिया। उन्होंने तय किया कि यदि उड़ान फिलहाल संभव नहीं है, तो जीवन में किसी नए क्षेत्र में पहचान बनाई जाएगी। यही निर्णय आगे चलकर उनके दूसरे सफल करियर की नींव बना।

कला और डिजाइन की दुनिया में बनाई नई पहचान

विमानन क्षेत्र में आगे बढ़ने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन सरला ठकराल ने परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने अपने भीतर छिपी दूसरी प्रतिभा को पहचाना और कला की दुनिया में नया रास्ता चुना। उन्होंने लाहौर के मेयो स्कूल ऑफ आर्ट्स (अब नेशनल कॉलेज ऑफ आर्ट्स) से फाइन आर्ट्स और पेंटिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने चित्रकला, टेक्सटाइल डिजाइन और आभूषण डिजाइन के क्षेत्र में काम शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक सफल कलाकार और डिजाइनर के रूप में बनने लगी। यह उनकी जिंदगी का दूसरा अध्याय था, जिसने साबित किया कि असफलता किसी मंजिल का अंत नहीं, बल्कि नए रास्ते की शुरुआत भी हो सकती है।

विभाजन के बाद नई शुरुआत

1947 में देश के विभाजन ने लाखों परिवारों की तरह सरला ठकराल के जीवन को भी प्रभावित किया। उन्हें लाहौर छोड़कर दिल्ली आना पड़ा। नई जगह, नए हालात और नई जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने हार नहीं मानी। दिल्ली में उन्होंने अपने हुनर के दम पर खुद को फिर से स्थापित किया। उन्होंने डिजाइनिंग और कला के क्षेत्र में अपना काम शुरू किया और एक सफल उद्यमी के रूप में पहचान बनाई। उनकी यह यात्रा बताती है कि मजबूत इरादों वाले लोग परिस्थितियों से नहीं, अपने फैसलों से पहचाने जाते हैं।

दूसरी शादी और नया जीवन

कुछ वर्षों बाद सरला ठकराल ने आर.पी. ठकराल से विवाह किया। इस नए जीवन में भी उन्होंने अपने परिवार और करियर के बीच संतुलन बनाए रखा। उन्होंने कभी अपनी पहली उपलब्धि को ही अपनी पहचान नहीं बनने दिया। पायलट बनने के बाद भी उन्होंने कला, डिजाइन और सामाजिक कार्यों के माध्यम से समाज में अपना योगदान जारी रखा।

भारत की महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

सरला ठकराल की उपलब्धि केवल इतिहास की एक घटना नहीं है। उन्होंने उस समय विमान उड़ाया, जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और नौकरी तक आसान नहीं थी। उनकी सफलता ने यह संदेश दिया कि यदि अवसर और समर्थन मिले तो महिलाएं किसी भी क्षेत्र में पुरुषों के बराबर या उनसे बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। आज भारतीय विमानन कंपनियों में महिला पायलटों की संख्या दुनिया के कई विकसित देशों से अधिक है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बदलाव की शुरुआत उन अग्रणी महिलाओं से हुई, जिन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को चुनौती दी। सरला ठकराल उन्हीं में सबसे प्रमुख नाम हैं।

आज भी क्यों याद की जाती हैं सरला ठकराल?

भारतीय विमानन इतिहास में सरला ठकराल का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता है। वे केवल भारत की पहली महिला पायलट नहीं थीं, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच की प्रतीक भी थीं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सपनों तक पहुंचने का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार परिस्थितियां दिशा बदल देती हैं, लेकिन यदि संकल्प मजबूत हो तो सफलता किसी न किसी रूप में जरूर मिलती है।

दुनिया को अलविदा कहा

15 मार्च 2008 को 91 वर्ष की आयु में सरला ठकराल का निधन हो गया। हालांकि उनका जीवन आज भी भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। विमानन क्षेत्र से लेकर शिक्षा और महिला सशक्तिकरण तक, उनका नाम हमेशा उन लोगों में शामिल रहेगा जिन्होंने समाज में नई सोच की नींव रखी।

निष्कर्ष

आज जब भारत महिला पायलटों की संख्या के मामले में दुनिया के अग्रणी देशों में गिना जाता है, तो इस उपलब्धि के पीछे सरला ठकराल जैसी साहसी महिलाओं का योगदान भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने उस दौर में विमान उड़ाया, जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर करियर बनाना भी आसान नहीं था। उन्होंने साबित किया कि परंपराओं का सम्मान करते हुए भी नई ऊंचाइयों को छुआ जा सकता है। सरला ठकराल केवल भारत की पहली महिला पायलट नहीं थीं, बल्कि वे उस विश्वास की पहली उड़ान थीं जिसने आने वाली पीढ़ियों की लाखों बेटियों को अपने सपनों के लिए आसमान चुनने का साहस दिया।


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