कैसे एक कानून के छात्र ने भारतीय सिनेमा के सबसे प्रिय डेविड अंकल की पहचान बनाई?

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डेविड अब्राहम चेउलकर: हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसे कलाकार हुए जो बड़े नायक बने बिना भी दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। डेविड अब्राहम चेउलकर उन कलाकारों में से एक थे। उन्हें लोग अभिनेता से ज्यादा एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में याद करते हैं। पर्दे पर उनका किरदार चाहे कुछ मिनटों का हो, लेकिन […]

डेविड अब्राहम चेउलकर: हिंदी सिनेमा में कुछ ऐसे कलाकार हुए जो बड़े नायक बने बिना भी दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। डेविड अब्राहम चेउलकर उन कलाकारों में से एक थे। उन्हें लोग अभिनेता से ज्यादा एक भरोसेमंद चेहरे के रूप में याद करते हैं। पर्दे पर उनका किरदार चाहे कुछ मिनटों का हो, लेकिन उनकी मौजूदगी फिल्म को अलग पहचान देती थी। सबसे दिलचस्प बात यह है कि डेविड को बाद की पीढ़ियों ने दयालु चाचा, शिक्षक या मार्गदर्शक के रूप में देखा, वो युवावस्था में खेलों का शौकीन थे, बॉडी बिल्डिंग करते थे और वो कानून की पढ़ाई कर चुके थे। अभिनय की दुनिया में वो किसी सुनियोजित योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि परिस्थितियों ने उन्हें वहां पहुंचाया।

ठाणे में जन्म, लेकिन पहचान पूरे देश में

महाराष्ट्र के ठाणे के एक शिक्षित परिवार में 21 जून 1908 को डेविड अब्राहम चेउलकर का जन्म हुआ था। उनकी रुचि बचपन से ही पढ़ाई और खेल दोनों में थी। स्कूल के दिनों में उन्हें अनुशासित और मेहनती छात्र माना जाता था। उनकी शिक्षा मुंबई के प्रतिष्ठित संस्थानों में हुई, जहां उन्होंने स्नातक और कानून की पढ़ाई पूरी की। भाषा पर उनकी पकड़ मजबूत थी और जो आगे चलकर मंच संचालन तथा अभिनय में उनके काम आया।

खेलों से गहरा लगाव

फिल्मों में उनके छवि के माध्यम से यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि अपने यंग ऐज वे नियमित व्यायाम करते थे और बॉडी बिल्डिंग में रुचि रखते थे। शारीरिक फिटनेस उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा थी। उस समय जब जिम संस्कृति आम नहीं थी, तब भी वे व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा मानते थे। यही अनुशासन उनके जीवन में भी दिखाई दिया।

अभिनय की पहली सीख घर के पड़ोस से

डेविड के अभिनय की शुरुआत किसी फिल्म स्टूडियो से नहीं हुई। बचपन में पड़ोस में आयोजित छोटे-छोटे नाटकों में भाग लेते हुए उन्होंने मंच का अनुभव हासिल किया। यहीं से संवाद बोलने, दर्शकों की प्रतिक्रिया समझने और किरदार को महसूस करने की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे अभिनय उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनता चला गया।

फिल्मों में आने के फैसले का विरोध

आज की तरह उस समय फिल्म उद्योग को सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। ऐसे में जब डेविड ने फिल्मों में करियर बनाने की इच्छा जताई, तो परिवार के कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया। हालांकि उन्होंने अपना निर्णय नहीं बदला। उन्हें विश्वास था कि अभिनय उनका वास्तविक क्षेत्र है। समय के साथ उनकी सफलता ने सभी शंका को खत्म कर दिया।

लंबा संघर्ष और फिर ‘बूट पॉलिश’ से पहचान

1937 में उन्होंने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की, लेकिन पहचान मिलने में वर्षों लग गए। शुरुआती दौर में उन्हें छोटे-छोटे भूमिकाएं मिलीं। साल 1954 में आई फिल्म Boot Polish ने उनकी जिंदगी बदल दी। फिल्म में निभाया गया ‘जॉन चाचा’ का किरदार दर्शकों के दिलों तक पहुंच गया। यह भूमिका संवेदनशीलता, करुणा और मानवीय मूल्यों का प्रतीक बन गई। यही वह फिल्म थी जिसने डेविड को पूरे देश में पहचान दिलाई।

‘डेविड अंकल’ की छवि कैसे बनी?

बूट पॉलिश के बाद दर्शकों ने उन्हें केवल अभिनेता के रूप में नहीं देखा। उनकी सहजता और अपनापन लोगों को अपने परिवार के किसी बड़े सदस्य की याद दिलाता था। धीरे-धीरे फिल्म उद्योग और दर्शकों के बीच वे ‘डेविड अंकल’ के नाम से लोकप्रिय हो गए। यह उपनाम किसी प्रचार अभियान से नहीं, बल्कि लोगों के स्नेह से मिला था।

जवाहरलाल नेहरू भी उनके प्रशंसक थे

डेविड की पहचान फिल्मों तक सीमित नहीं रही। वे एक प्रभावशाली मंच संचालक भी थे और कई राष्ट्रीय कार्यक्रमों का संचालन कर चुके थे। उनकी स्पष्ट भाषा, संतुलित प्रस्तुति और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उन्हें सांस्कृतिक कार्यक्रमों में विशेष स्थान दिलाया। उस दौर के कई राष्ट्रीय नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों ने उनके काम की सराहना की।

डेविड अब्राहम चेउलकर

150 से अधिक फिल्मों में काम

अपने लंबे करियर में डेविड अब्राहम चेउलकर ने लगभग 150 फिल्मों में अभिनय किया। हालांकि वे कभी पारंपरिक नायक नहीं बने, लेकिन चरित्र अभिनेता के रूप में उनकी पहचान बेहद मजबूत रही। उन्होंने यह साबित किया कि सिनेमा में यादगार बनने के लिए मुख्य भूमिका निभाना जरूरी नहीं है।

एक कलाकार से बढ़कर इंसान

डेविड की सबसे बड़ी पहचान उनकी विनम्रता थी। फिल्म उद्योग में लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्होंने सादगी नहीं छोड़ी। परिवार, मित्रों और सहयोगियों के प्रति उनका व्यवहार हमेशा सम्मानजनक रहा। यही कारण था कि उन्हें केवल दर्शक ही नहीं, बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री सम्मान की नजर से देखती थी।

विरासत जो आज भी जिंदा है

2 जनवरी 1982 को डेविड अब्राहम चेउलकर का निधन हो गया। लेकिन उनके निभाए किरदार और उनकी मुस्कान आज भी पुरानी फिल्मों के माध्यम से जीवित हैं। भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम उन कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने अभिनय को लोकप्रियता से अधिक मानवीय संवेदनाओं से जोड़ा। शायद यही वजह है कि दशकों बाद भी उन्हें उसी स्नेह के साथ याद किया जाता है, जिस स्नेह से लोग उन्हें ‘डेविड अंकल’ कहा करते थे।


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